Monday, November 3, 2014

नेपाल के राजा


नेपाल के राजा वीरेंद्र, रानी ऐश्वर्या तथा उनके परिवार के अन्य कई सदस्यों सहित ग्यारह लोगों की हत्या का समाचार सुनकर कल बहुत दुःख हुआ, उनके ही पुत्र ने अपने विवाह को लेकर उठे विवाद के कारण गोली चला दी ऐसा पहले सुनने में आया, बाद में उसने स्वयं को भी गोली मार दी, पर गोली उसकी पीठ में लगी है. टीवी समाचारों में सुना, वे एक पढ़े-लिखे उच्च पदों पर रह चुके अपनी माँ के प्रति श्रद्धा रखने वाले राजकुमार थे, युवराज थे, भला ऐसा जघन्य कार्य क्यों करेंगे, अस्पताल में उनकी भी बाद में मृत्यु हो गयी है. उनके चाचा नागेंद्र को अब राजा बनाया गया है, जिनके अनुसार यह एक दुर्घटना थी पर इस पर विश्वास करना कठिन है. नेपाल की जनता के लिए यह दुःख सह पाना कितना कठिन होगा, उसे याद है इंदिरा गाँधी तथा राजीव गाँधी की मृत्यु पर भारत के लोग कितने दिनों तक संयत नहीं हो पाए थे. नेपाल में जनता सडकों पर उतर आई है इतने बड़े हत्याकांड को भुला पाना तो असम्भव है, पचा पाना कोई कम कठिन नहीं है, जब वह स्वयं को नेपाल की प्रजा की जगह रखकर देखती है तो काँप जाती है. यह दुःख बहुत गहरा है, इसके जख्म इतने गहरे हैं कि रह-रह कर उनमें टीस उठती रहेगी. ईश्वर के बंदे खुद ऐसी करनी करते हैं फिर सब कुछ उसी पर डाल देते हैं कि ईश्वर को यही मंजूर होगा !

कल डायरी नहीं खोल सकी, सुबह व्यस्त रही फोन पर बात करने में, दोपहर नन्हे को पढ़ाने में और शाम को वे एक मित्र के यहाँ गये. बाबाजी आज भक्ति पर बोल रहे हैं. भक्ति प्रेम का उच्च रूप है. स्नेह, प्रेम और श्रद्धा के अतिरेक का नाम ही भक्ति है. अलौकिक अनुराग का नाम ही है भक्ति ! सुबह से शाम तक जन्म से मृत्यु तक मनुष्य की दौड़ सुख के लिए होती है. मन का विकार रहित उल्लास या सुख ही भक्ति है ! उन्होंने बताया, भूताकाश, हृदयाकाश तथा चिदाकाश...तीन आकाश हैं, जो बाहर दिखाई देता है वह भूताकाश है, जो हर्षित अथवा उदास होता है वह हृदयाकाश है, जो इसे हर्षित अथवा उदास हुए देखता है वह चिदाकाश है, वहीं खुदा का बसेरा है जो हर वक्त प्रकट होने के लिए तत्पर है पर मानव ने इतने मोटे-मोटे पर्दे डाल रखे हैं उसके और ह्रदयाकाश के मध्य कि वह उसकी नजरों से दूर ही रहता है ! पिछले दिनों वह सात्विक भाव से दूर ही रही, राजसिक वृत्ति और कभी-कभी तामसिक वृत्ति भी प्रकट हो रही थी, आज पुनः ईश्वरीय कृपा से सत्संग सुनने को मिला और इसका ही प्रभाव है कि वह पुनः सद्भावना से युक्त है. पिछले दिनों कोई नई कविता भी नहीं लिखी, लिखने के लिए बैठी तक नहीं. आज भी वर्षा हो रही है, परसों रात को आरम्भ हुई तो थमने का नाम नहीं ले रही है. जून और उसका दोनों का वजन दो-दो किलो बढ़ गया है, उन्हें इस पर नियन्त्रण रखना होगा, अमूल दूध का ही असर जान पड़ता है.


कुछ पाने के लिए कुछ खोना नहीं पड़ता, कुछ मिलने पर कुछ खो जाता है. सत्य मात्र ईश्वर है शेष सभी परिवर्तनशील है, कोई लाख इसे अपने अनुकूल बनाने का प्रयत्न करता रहे पर उस चादर की तरह जो छोटी है, कहीं कहीं से प्रतिकूलता आ ही जाएगी, इसलिए समझदारी इसी में है कि अनुकूलता की चाह ही छोड़ दी जाये. आज गुरु माँ का प्रवचन प्रेरणादायक था उन्होंने कहा, संकीर्णता छोड़कर यदि कोई अपनी दृष्टि को विश्वव्यापी बना ले तब ईश्वर की आराधना करने के लिये कुछ छोड़ना नहीं पड़ेगा, जिसे छूटना होगा वह अपने आप ही छूटता चला जायेगा. यह सारा जहाँ ही तो अपना है जब तक वह इस दुनिया में है, दुनिया के किसी कोने में कुछ भी अच्छा या बुरा घटित हो किसी न किसी रूप में उसका असर तो पड़ता ही है. 

Friday, October 31, 2014

प्रेमचन्द की कहानियाँ


आज उसका जन्मदिन है, सुबह से कई फोन आ चुके हैं. सखियों के, भाई बहनों के, पिता का फोन और मामीजी का जवाब भी आ गया है. सुबह से कई बार माँ को याद कर चुकी है, उनका फोटो देखती है तो हाथ अपने आप ही जुड़ जाते हैं. शाम को छोटी सी पार्टी है. आज सुबह एक कहानी टाइप की, नन्हे को हिंदी में भावार्थ लिखाया, अब वह सो रहा है वरना यह समय भी उसी के साथ बीतता. कुछ देर पहले सोचा क्यों न समय का सदुपयोग करते हुए बैठक की थोड़ी सफाई ही कर दी जाये पर हाथ के झाड़न से वह थर्मस कप टूट गया जो मंझले भाई ने विवा हके अवसर पर उसे तोहफे में दिया था. खैर..पर उसका कुछ असर और कुछ इसका कि बगीचे में पत्ते बिखरे हैं, नैनी ने अभी तक सफाई नहीं की है, मन उत्साहित नहीं है. जन्मदिन पर क्या उदास होने का भी हक नहीं है ! यूँही मन भी बदलते मौसमों की तरह होता है जैसे कोई बाहर के मौसम का साक्षी रहता है उसमें अपनी इच्छा से फेर बदल नहीं कर सकते वैसे ही भीतर के मौसमों को साक्षी भाव से देखते रहना होगा. शाम को कोई दूसरा मौसम आ जायेगा. जून और नन्हा दोनों ने उसे बहुत सुंदर कार्ड्स दिए हैं. उसने सोचा एक कविता यदि लिखे तो मन फिर अपने आप में लौट आए !

न ही परसों और न ही कल वह ‘जागरण’ सुन सकी, आज सुना है. मौसम की तरह मन शांत है. रात भर होने के बाद इस समय वर्षा रुकी हुई है. मन में ईश्वर के लिए यानि अच्छाई के लिए, सत्य के लिए चाह बनी रहे, स्मृति बनी रहे तो संसार का आश्रय नहीं लेना पड़ेगा. निर्भयता का भाव उदय होगा. ईश्वर कार्य का प्रेरक भी है, निर्वाहक भी है, और फलदाता भी है. उसकी स्मृति बनाये रखें तो जीवन की नाव अबाध गति से चलती रहेगी. मन. बुद्धि और अहंकार के शोर में ईश्वरीय प्रेरणा सुनाई नहीं पडती. वह इतने निकट है कि उससे निकट कोई और नहीं. वह हर क्षण सद्कार्यों के लिए प्रेरित करता है लेकिन मन अनसुनी करता है. और संसार के शोर को सुनने के लिए अपने को व्यस्त रखता है.

आज दीदी का जन्मदिन है, सुबह उन्हें फोन पर शुभकामनायें दीं. पिता से भी बात हुई, मकान का सौदा हो गया है. इसी महीने रजिस्ट्री भी हो जाएगी, सम्भवतः जून को जाना पड़े. इस समय नन्हा और वह दोनों घर पर नहीं हैं. वह अपनी स्वाभाविक प्रसन्नता के मूड में नहीं है. बाबाजी की बात पूर्णरूप से सही है जब कोई ईश्वर का स्मरण करता है तो अंदर का स्रोत अपने आप खुल जाता है. इधर जन्मदिन के बाद से वह सुबह ठीक से ध्यान आदि नहीं कर पा रही है, हो सकता है इसका कोई शारीरिक कारण भी हो, वही हरमोन का चक्कर, खैर इस महीने की साहित्य अमृत भी आ चुकी है, प्रेमचन्द की कहानियों की किताब भी लायी है, सो हिंदी का वातावरण तो है घर में और नन्हे को हिंदी भी पढ़ा रही है पर लिखें के लिए समय व एकांत चाहिए जो फ़िलहाल नहीं मिल पाते, थोड़ी ही देर में वे दोनों आते होंगे. लंच का समय होने वाला है.




बादल का टुकड़ा


वाणी मधुमंडित, सुवासित हो जिसमें अहंकार की गंध न हो, स्वार्थ की महक न हो. ऐसी वाणी निर्वासनिक मन से ही उपजती है. निष्कपट भक्ति भी ऐसे ही मन में जगती है. प्रार्थना भी ऐसी ही भावदशा में  की जा सकती है. ऐसा मन सभी तरह के विक्षेपों को पचाने योग्य बनता है. कल रात वह प्रार्थना करते-करते सोई. स्वप्न में कन्याकुमारी के दृश्य देखे. सुबह उठी तो मन शांत था. बाबाजी कहते हैं देर सबेर ईश्वर सबके हृदयों में अवश्य प्रकट होगा, उसके स्वागत के लिए मन का दरवाजा हमेशा खुला रखना होगा, मन को निष्कपट, स्वच्छ और कोरा रखना होगा. कामना हर पल नीचे गिराने का प्रयत्न करती है और प्रार्थना ऊपर उठाने का. कल शाम कुछ पुरानी कविताओं को पूर्ण किया. कादम्बिनी को भी दो कविताएँ भेजी हैं, उसके अंतर में कई कविता संग्रह अभी भी दबे हुए पड़े हैं. थोड़ा सा प्रोत्साहन मिले तो बाहर आ जायेंगे, न भी मिले तो कोई हर्ज नहीं, अपने सुख के लिए कविता रचना तो सदा ही जारी रहेगा !

कल अंततः उसकी इच्छा फलवती हुई जून और वह मार्किट गये, उसके जन्मदिवस पर पहनने के लिए हल्के हरे रंग की एक ड्रेस लाये, थोड़ी लम्बी है उसे ठीक किया जा सकता है. आभी आज और कल दो दिन का वक्त शेष है. कल उसने अपना इमेल अकाउंट खोला. आज सुबह हरिद्वार मामीजी के लिए पहले इमेल लिखा, अभी भेजा नहीं है. नन्हे का आज टेस्ट है. गर्मी पूर्ववत है. सुबह नींद खुली तो स्वप्न में कम्प्यूटर, इमेल यही सब देख रही थी, उसके चेतन मन से ज्यादा अवचेतन मन पर इसका प्रभाव पड़ा दीखता है. आज बाबाजी और गोयनका जी दोनों को कपड़े प्रेस करते-करते सुना, एक जो कहता है दूसरा उसका विपरीत कहता हुआ सा लगता है पर दोनों का लक्ष्य एक है. गोयनका जी का मार्ग ज्यादा कठिन है, बाबाजी का बिलकुल सहज ! सहज भाव से अपने भीतर के आत्मदेव पर भरोसा करना है. सुख में ललक पैदा न हो बल्कि सुख बांटने की प्रवृत्ति हो और दुःख में सिकुड़े नहीं, सम भाव रहे यही उनकी शिक्षा का सार है. जैसे-जैसे व्यवहार में समता आती जाएगी, ममता छूटती जाएगी और एक दिन मन सुख-दुःख से ऊपर उठ जायेगा. देह या मन में कोई पीड़ा हो तो यह याद रखना होगा कि यह अनित्य है, सदा रहने वाली नहीं है. परसों उसके जन्मदिन के दिन ही लेडीज क्लब की मीटिंग है, एक सीनियर सदस्या का विदाई दिन भी है. पर वह नहीं जा पायेगी, दो साल पूर्व जब वह जाते-जाते रह गयी थीं, उनके लिए जो लेख लिखा था वह ऐसे ही रखा रह जायेगा. जून और नन्हे को मनाना आसान नहीं होगा, सो जो हो रहा है उसे होने देना चाहिए, वैसे भी इतने वर्षों में कुल मिलाकर दस-पन्द्रह बार से ज्यादा नहीं मिली होगी उनसे, उनके लिए शुभकामनायें घर से ही भेज सकती है.


जो हमारे पास है उसका महत्व जानें और जो नहीं है उसके पीछे न भागें तो जीवन में सुख ही सुख है. लेकिन जो भी है वह सदा के लिए नहीं रहेगा यह भी याद रखना है. लक्ष्मी सदा खड़ी रहती है और सरस्वती सदा बैठी रहती है. ज्ञान कभी साथ नहीं छोड़ता लेकिन धन-दौलत व वस्तुएं साथ छोड़ भी सकती हैं. सत्संग को सुनकर गुनने से ही उसका लाभ मिलता है. “एक बुढ़िया थी वह बचपन में ही मर गयी”. यह कहानी बताती है कि सारी उम्र लोग नादान ही बने रहते हैं. ईश्वर स्मरण बना रहे तो यही नादानी समझदारी में बदल जाती है. कल वह ध्यान में ज्यादा देर तक नहीं बैठी, इतर कार्यों में लग गयी सो रात को मन अशांत था, नींद नहीं आ रही थी, कोई कारण नजर नहीं आ रहा था. आज बाबाजी के संगम तट पर दिए गये प्रवचन की रिकार्डिंग सुनाई गयी. हजारों लोगों को पल में हँसा व रुला सकने की सामर्थ्य है. वह लोगों के मन में स्थित ईश्वर को जगा देते हैं. मन उच्च केन्द्रों की ओर चला जाता है, दुनियावी बातें सारहीन लगती हैं. सभी के प्रति मन प्रेम से भर जाता है. आज सुबह उसने बगीचे में काम करने की इच्छा व्यक्त की पर धूप तेज थी, न जाने कहाँ से बादल का एक टुकड़ा आ गया. हवा भी बहने लगी. आधा घंटा वह काम कर सकी. कल उसके जन्मदिन पर भी मौसम अच्छा हो जायेगा, ऐसा उसका पूर्ण विश्वास है.   

Thursday, October 30, 2014

मॉडेम जरूरी है



हर क्षण यदि ईश्वर का स्मरण बना रहे तो मन अपने आप शांत रहेगा, जब उसके प्रेम में हृदय डूब जाये तो संसार मन में प्रवेश नहीं कर सकता क्योंकि जब ईश्वरीय प्रेम की वीणा की झंकार गूँजती हैतो सारा ध्यान वहीं लग जाता है. आज भी उन्हें उठने में देर हुई, जून ने ही उसे उठाया. कल शाम जून और नन्हा एक मित्र के साथ कम्प्यूटर में नई हार्ड डिस्क लगाने में व्यस्त थे, वह अकेले टहलने गयी, शाम का धुंधलका छा चुका था और हवा शीतल थी. बातूनी सखी का फोन आया वह अपने पुत्र की हिंदी को लेकर परेशान है, वह खुद इतनी अच्छी हिंदी बोलती है फिर भी अहिन्दीभाषियों को कुछ दिक्कत तो आती ही है. कल रात मूसलाधार वर्षा हुई, इस समय धूप निकल आई है. कल उन्हें इंटरनेट की सर्विस भी मिल गयी पर मॉडेम ठीक न होने के कारण सर्फिंग नहीं कर सके. नन्हे का आज केमिस्ट्री का टेस्ट है. आज लिखने की शुरुआत ईश्वर स्मरण से की थी पर उसे भूलकर कलम संसार में विचरण करने लगी है. नाव पानी में रहे तो ठीक है पर पानी नाव में आ जाये तो विनाश ही होगा न, मन यह जो खिंचा-खिंचा सा उड़ा-उड़ा सा रहता है, इसी कारण !

अहंकार की हवा मन रूपी गेंद को ठोकर खिलवाती रहती है. जो हम इस दुनिया को बांटते हैं, वही हमें मिलता है. सारा ब्रह्मांड एक प्रतिध्वनि है, प्रतिबिम्ब है. हम जैसा देखना चाहते हैं, दिखाना चाहते हैं वही हमें दिखायी पड़ता है. नम्रता धारण करें तो अहंकार अपने आप छूटता जायेगा, विनीत होकर इस हृदय रूपी घर को ईश्वर को अर्पित करें तो कृपा अपने आप मिलेगी. आज बाबाजी कातर स्वर में ईश्वर को पुकार रहे थे, ऐसी भावपूर्ण प्रार्थना को कौन अनसुना कर सकता है. ईश्वर उनके हृदय में आ बसे हैं, वह श्रोताओं को सिखाने के लिए ही ऐसी प्रार्थना कर रहे हैं ! उसने भी प्रार्थना की, इस जग से विदाई हो उसके पूर्व ही वे ईश्वर का अनुभव कर सकें, बुढ़ापा आये अथवा चिता की अग्नि उन्हें जलाए इसके पूर्व ईश्वर का ज्ञान उनके अज्ञान को जलाकर खाक कर दे. मोहपाश के जाल टूट जाएँ, बंधन खुल जाएँ औए वे पूर्ण मुक्त हो जाएँ. आजाद पक्षी की तरह वे निस्सीम आकश में उड़ान भरना सीख लें, यह जग उनके लिए बंधन का कारण नहीं बल्कि विकास का, उन्नति का साधन बन जाये ! आज वर्षा अभी तक आ रही है, खिड़की से शीतल हवा आकर पंखे की हवा को भी ठंडा कर रही है. नन्हे को आज पढ़ने नहीं जाना है. सोमवार को होने वाले इम्तहान की तैयारी करनी है. आज सुबह वे पहले की तरह पांच बजे उठे. ससुराल से फोन आया, मायके से कोई खबर नहीं आई है. न ही किताब के बारे में कोई खबर मिली है. अगले हफ्ते वे फोन करेंगे. कल शाम फिर जून मॉडेम लगाने में व्यस्त थे, शायद खराब है. वह टहलने गयी और पड़ोसिन से मिल आई, वह स्वस्थ नहीं है, घर जाकर पूर्ण स्वास्थय परीक्षण कराएगी. आजकल मन दुनियादारी में ही उलझा रहता हो सो उसकी कलम यही सब लिखी जा रही हैं, लेकिन ईश्वर हर क्षण उसके निकट है, इन सारी उलझनों के बीच वही तो एक सुलझन है !


कल दांत के उस एक्सरे की रिपोर्ट मिल गयी जो परसों कराया था, डाक्टर ने कहा है RCT करना पड़ेगा, पिछले साल भी जून महीने में घर से वापस आने पर करवाया था. कल रात डायरी में पढ़ा, लगभग १०-१२ दिन लगे थे फिर कुछ हफ्ते बाद परमानेंट फिलिंग हुई थी, उसी सब प्रक्रिया से अब फिर गुजरना होगा, लेकिन इस वर्ष वह ज्यादा जानती है सो तकलीफ कम होगी. आज जागरण में अद्भुत वचन सुनने को मिले, सुबह उठकर प्रभु को नमस्कार करें और दिन भर के लिए उससे आशीष की कामना भी..अपने विश्वास को त्याग पर केन्द्रित करें न कि संग्रह पर. ईश्वर से मिलने जाना हो तो गुनगुनाते हुए उमंग सहित, आह्लाद व उल्लास से भरा मन व चेहरा लिए जाना चाहिए. पूजा करना व्यर्थ होगा जब पहले से ही पूजा की समाप्ति का क्षण नियत कर लेते हैं. सांसारिक जेल से मुक्त होकर जब उस मुक्त से मिलने का क्षण आये तो क्यों न उस मुक्तावस्था को जीभर के महसूस करें. चौबीस घंटों में से कुछ समय तो उल्लसित, उमंग युक्त हृदय लिए उस परमेश्वर की निकटता में गुजारें ! मन तो प्रलोभनों की ओर हर पल दौड़ता रहता है, न चिन्तन करने योग्य विषयोंका चिन्तन करता है, ऐसे मन को समझा-बुझा कर अपने पास बैठाना आ जाये तो आराधना सच्ची होगी.   

Tuesday, October 28, 2014

सिन्धी पुलाव


मोह सदा दुखदायी होता है, सन्तान के मोह में पड़कर माता-पिता कम संताप नहीं पाते. मोहवश उन्हें अपनी सन्तान में वे कोई दोष देखना ही नहीं चाहते. ऐसे में वे स्वयं के साथ साथ सन्तान को भी दुःख की ओर ले जाते हैं. इस मोह के पीछे होती है आशा, सन्तान से स्नेह और सम्मान पाने की आशा, संसार में भी वे सन्तान द्वारा सम्मानित होना चाहते हैं. यदि निस्वार्थ भाव से सन्तान के प्रति वे अपने कर्त्तव्यों का पालन करें, उसे अपने मार्ग पर जाने की स्वतन्त्रता दें यही दोनों के लिए श्रेष्ठ है. इस जगत में यदि कोई अपना है तो वह है नितांत अपना आप. आत्मा ही अपनी है. सुख-दुःख का केंद्र वही होनी चाहिए. बाहरी वस्तुओं, व्यक्तियों, घटनाओं के द्वारा स्वयं को सुख-दुःख के झूलों में झूलने देना आत्मा या ईश्वर का अपमान है. एक न एक दिन सभी को इस सत्य का सामना करना है, मृत्यु का पल कौन सा होगा कोई नहीं जानता. ये जो थोड़े से दिन एक-दूसरे के साथ बिताने को मिले हैं, वे तप-तप कर नहीं सहज होकर जीने हैं. जो कुछ जैसा है वैसा ही स्वीकारें. मन को बिगड़ने न देना ही समझदारी है. यह दुनिया सिर्फ उनके लिए नहीं बनी है, दिए को तो बुझना ही है, तूफानों का सामना करते हुए वह उतनी देर जला क्या यह आश्चर्य की बात नहीं ! ईश्वर के बिना कोई विश्रांति स्थल नहीं, वही उनकी कामनाओं का, आकांक्षाओं का केंद्र होना चाहिए, मन उसी की शरण ले और किसी का न आश्रित हो न कभी अपने कर्त्तव्य को भूले. हृदय और वाणी जब एक हो तो प्रार्थना सफल होती है. ईश्वर निकटतम है, उससे निकटतम और कोई भी नहीं !

आज ‘अमृत कलश’ में एक हास्य कवि आये थे, उन्होंने कुछ आध्यात्मिक कविताएँ भी सुनायीं, पर उनके पास कहने के लिए कुछ ज्यादा नहीं था, एक ही बात को घुमा-फिरा कर कह रहे था, पर इतना तो सत्य है की ईश्वर प्रेमी थे और जो वास्तव में ईश्वर को चाहता है उसकी बातों में सत्य झलकता है. ईश्वर प्रीति के लिए कर्म करने से मानव स्वस्थ होते जाते हैं क्योंकि तब श्रम किया जाता है विश्राम पाने के लिए ! आज बाबाजी ने कहा, “जीवात्मा को इस शरीर और संसार से सुख ढूँढना व्यर्थ है, उसी तरह जैसे यात्री के लिए अजगर का सिराहना बना कर शैया करना व्यर्थ है.”

आज उनकी नींद देर से खुली, जून और उसके सिर में जो भारीपन कल सुबह से बना हुआ था, आज सुबह उठकर भी बरकरार था. परसों रात उन्होंने देर तक जागकर फिल्म देखी, उसके पूर्व जून ने सिन्धी भोजन खिलाया. पुलाव, भिन्डी और तला हुआ पापड़, दोनों का मिलाजुला असर...और शायद उसके भी पूर्व शाम को रेकी के कोर्स को लेकर उनका गर्मागर्म वार्तालाप...जिसमें कोई तत्व नहीं था या फिर इतवार की सुबह व्यर्थ ही अलसाये हुए देर से उठना. इन सबका असर यही रहा कि मन से सात्विक भाव पूर्णतया जाते रहे और तामसिकता ने अड्डा जमा लिया. कल दो बार वह क्रोध करते-करते भी सजग हुई. आज सुबह भी नन्हे को उठाने के लिए थोड़ा जोर से बोलना पड़ा. पर जगत के व्यवहार के लिए इतना खूँटा तो बांधना ही पड़ेगा. कुछ ही देर में नन्हा पढ़ने जायेगा. उसकी सखी ‘रेकी’ के बारे में विस्तार से बताने वाली था, उसे लगा शायद अब वह न बताये या यह उसके ही मन का भ्रम है. वे अपने आसपास वही देखते हैं जो मन का दर्पण दिखाता है. बहुत दिनों से संगीत अभ्यास भी नहीं किया है, शायद सिर के भारीपन का इलाज संगीत में छुपा हो !



Monday, October 27, 2014

सत्यकाम-धर्मेन्द्र की फिल्म


सुख लेने की इच्छा का त्याग कर सुख देने की कला सीख लें तो अंतर से सुख का वास्तविक स्रोत उजागर होगा, जिन वस्तुओं से भौतिक सुख मिलता है उन्हें बांटने से भी आंतरिक सुख मिलेगा. बाबाजी बहुत सरल शब्दों में मन को संयमित करने के उपाय बताते हैं, ऐसे व्यक्ति इस धरा पर हैं तभी यहाँ रौनक है वरना धरती पर सत्य के लिए स्थान कहाँ हैं. कल ‘सत्यकाम’ फिल्म देखी, वर्षों पहले इसका नाम सुना था, धर्मेन्द्र की प्रसिद्ध फिल्म है. रात को देखकर सोयी थी सपने में भी वही देखती रही. सत्य के कारण कितने दुःख उन्हें झेलने पड़े लेकिन सत्य ने ही अंततः उनकी रक्षा की. जून को भी अच्छी लगी, देर रात तक जग कर वह कम ही टीवी देखते हैं. कल गोयनका जी भी आये थे, कहा, “प्रतिक्रिया ही सुख-दुःख का कारण है, यदि पहले क्षण में कोई प्रतिक्रिया न करे तो संवेगों से बच सकता है.”

आध्यात्मिकता आखिर है क्या ? मन को खाली करना ही तो, ऐसा मन फूल की तरह हल्का होगा, निर्झर की तरह निर्मल होगा, स्फटिक के समान चमकीला होगा और ऐसे मन में उठा संकल्प शुद्ध ही होगा और वह पूर्ण भी होगा. धर्म भीतर है, उसमें टिकने की कला भी आध्यात्मिकता है, उसके बाद ही जीवन में उत्सव का आगमन होता है, अपने आसपास के वातावरण को बेहतर बनाने का प्रयत्न होता है.

आज जैन मुनि को सुना, “जीवन रहते ही जीवन का बहीखाता सही कर लेना चाहिए, जीवन का हिसाब-किताब यदि ठीक रहेगा तो मृत्यु के महोत्सव को मनाने की प्रेरणा जगेगी. मरण यदि सजगता में हो तो मन शरीर से अतीत हो जाता है और आत्मा में टिक जाता है. राम को घासफूस की कुटिया में भी चैन था और रावण को स्वर्ण महलों में भी नींद नहीं आती थी. पर न वह कुटिया रही न महल, क्योंकि यहाँ सब नश्वर है. यह मकान भी मरघट है हर क्षण प्राण मर के घट रहे हैं”.  इस समय दोपहर के तीन बजे हैं. सुबह उठे तो पिता को फोन किया. उन्होंने मकान खरीदने वालों के बारे में बातें कीं, अपनी तथा परिवार के अन्य सदस्यों की एक वाक्य में ‘सब ठीक है’ कहकर ही टाल दिया. छोटी बुआ को फोन करने का मन था पर नहीं किया. एक सखी ने कल शाम ‘रेकी’ के कोर्स के लिए पूछा था पर जून साफ मना कर रहे हैं. उसे लगता है वह भी इस वक्त इसके लिए तैयार नहीं है. आज वह पुस्तक फिर से पढ़नी शुरू की है. कल शाम नन्हे के न पढ़ने पर सखी की टिप्पणी ने उसे दो पल के लिए विचलित कर दिया था. पढ़ाई की कोई सीमा नहीं है, दसवीं में तो बिलकुल नहीं. इस वक्त वह टीवी देख रहा है. गणित और हिंदी कुछ देर पढ़ाया पर समय का पूरा उपयोग नहीं हुआ. आज कुछ नया लिखा भी नहीं.

जीवन क्या है ? इसका उत्तर छत्रपति शिवाजी के गुरु समर्थ दास ने दिया – गति और सतर्कता ही जीवन है, प्रवाह में ही मानव प्रगति को पा सकते हैं. जिज्ञासा और जागरूकता भी जीवन है. जिस दिन हृदय में जिज्ञासा न रही वह मृत हो जायेगा. संक्षेप में कहें तो गति, जिज्ञासा और प्रयत्न ही जीवन है. आज भी वही कल का सा मौसम है. कल शाम एक फिल्म देखी, ‘हमारी बहू अलका’. अभी सुबह के आठ बजे हैं पर पंखे से गर्म हवा आ रही है. बाबाजी ने आज कहा कि शीत और ग्रीष्म को सहने की शक्ति भी शरीर में उत्पन्न की जा सकती है. गीता में भी सुख-दुःख के साथ शीत-ग्रीष्म का जिक्र भी आता है. साधक को इन छोटी-मोटी बाधाओं से घबराना नहीं चाहिए, बल्कि मन को सम रखने का प्रयत्न सदा करते रहना चाहिए.


Sunday, October 26, 2014

विधान सभा के चुनाव


“राग और द्वेष भीतर से निकलते नहीं, परमात्मा की प्रीति को भरने से ये अपने आप निकल जायेंगे” आज बाबाजी ने सुबह यह सुंदर वचन कहा साथ ही कबीर के तीन  सूत्र बताये- जोड़ो और तोड़ो, खाली करो और भरो, याद करो और भूल जाओ. अब क्या जोड़ना है और क्या तोड़ना है, किसे और किससे खाली करके फिर भरना है, किसे याद करना है और किसे विस्मृत...ये चिन्तन का विषय है. प्रेम हृदयों में उपजे तो जुड़ना संभव होगा. अहम इसमें सबसे बड़ा शत्रु है, कोई अपना भी यदि प्रतिकूल बात कह दे तो मन कुम्हला जाता है, उस फूले हुए गुब्बारे की तरह पिचक जाता है जिसमें सूई से छेद कर दिया गया हो. इस समय शाम के चार बजे हैं, वर्षा हो रही है, आज सांध्य-भ्रमण का कार्यक्रम सम्पन्न नहीं हो पायेगा. सुबह वह उठी तो जून से कल पड़ने वाले वोट के बारे में थोड़ी बहस हुई, वह वोट देने जाना चाहती है पर जून इसके सख्त खिलाफ हैं, उनकी राय में नेताओं की वजह से ही समाज में सारी बुराइयाँ हैं. नेता लोग करोड़ों का चारा, सीमेंट, यूरिया सभी कुछ हजम कर जाते हैं. दो सखियों से बात की, दोनों सपरिवार वोट देने जाएँगी, यानि उसकी तरह सोचने वाले लोग ज्यादा हैं, पर सदा बहुमत ठीक हो यह जरूरी तो नहीं.

आज चुनाव हैं. चार प्रदेशों असम, बिहार, तमिलनाडु, केरल तथा केंद्र शासित प्रदेश पांडिचेरी में तेरह करोड़ मतदाता वोट के अधिकार का प्रयोग करेंगे, अपने भाग्य का फैसला स्वयं करेंगे. शाहजहांपुर तथा कर्नाटका के किसी स्थान पर लोकसभा का उपचुनाव भी होगा. गणतन्त्र ही आज के समाज के लिए या किसी भी युग में सर्वोत्तम शासन पद्दति है. इसमें मानव को पूरी स्वतन्त्रता है, उसके मूल अधिकारों का हनन आसानी से नहीं किया जा सकता. आज सुबह छुट्टी के कारण वे देर से उठे सो सभी कार्य देर से हो रहे हैं. साढ़े दस होने को हैं, बाबाजी को भी ध्यान से नहीं सुना, न ही उचित ढंग से व्यायाम हो पाया न ही हारमोनियम को हाथ लगाया है. आज नाश्ते में कोटू के आटे की रोटी खायी, वर्षों बाद.. बचपन में माँ के हाथ की बनी रोटी खाते थे, व्रत के दिनों में वह इसे बनाती थीं. नन्हा इस समय केमिस्ट्री का गृहकार्य कर रहा है, जून टीवी देख रहे हैं. मौसम आज खुला है, अधिक से अधिक लोग वोट देने जा सकें इसलिए मौसम सहायक हुआ है. कल दिन भर वर्षा होती रही. इस समय चारों ओर निस्तब्धता है, कोई गाड़ी नहीं चल रही है, सिर्फ पंछियों की आवाजें रह रहकर आती हैं या कभी-कभार कोई साइकिल खड़कती हुई चली जाती है, लो, अभी-अभी एक वैनेट भी निकल गयी. नन्हे के कमरे का दरवाजा खोल कर बैठें तो ठंडी हवा हर वक्त आती रहती है तथा सड़क का आवागमन भी स्पष्ट दिखाई देता है !

बाबाजी अक्सर मंत्र की शक्ति की बात करते हैं, पर वह मंत्र जाप नहीं कर पाती, उसे ध्यान में प्रार्थना ही उच्चतर केंद्र तक ले जाने में सहायक होती है. आज सुबह भी कितनी काम की बातें उसने सुनीं. ‘भोजन मात्र पेट भरने का साधन नहीं है, इसके पीछे जीवन दर्शन होता है. रसोईघर की पवित्रता जीवन की पवित्रता बनकर सम्मुख आती है. शुद्ध और निर्मल सात्विक आहार विचारों को संस्कारित करता है. अन्न का प्रभाव विचारों पर, जीवन दृष्टि पर पड़े बिना नहीं रह सकता. भूख लगने पर खाना प्रकृति है इसके विपरीत विकृति है, मेहमान को खिलाना संस्कृति है’. व्यक्ति को बदलने का काम व्यक्ति करता है. जब कोई किसी श्रद्देय व्यक्ति को जानता, मिलता अथवा उसके बारे में अध्ययन करता है तो उसके गुणों को धारण करने की प्रेरणा जगती है. बचपन से उसके जीवन पर न जाने कितने जीवन प्रभाव डाल चुके हैं. माता-पिता, संबंधी, शिक्षक सभी से कुछ न कुछ ग्रहण किया है. उसके व्यक्तित्त्व को ढालने में पुस्तकों के अलावा इनका ज्यादा हाथ है. आज ‘अमृत कलश’ में एक अन्य कलाकार से मुलाकात हुई, ‘राजेश जौहरी’ का यह कार्यक्रम अंतर्मन को छू जाता है. आज भी बदली बनी हुई है, पंखे से ठंडी हवा आ रही है. नन्हा अभी कुछ देर पूर्व ही सोकर उठा है. रात को देर तक जगता है सो सुबह उठ नहीं पाता. कल दोनों बहनों को फोन किया, घर पर फोन करने का अब उत्साह नहीं होता, माँ तो अब सदा उसके साथ हैं, पिता सुबह-सुबह व्यस्त रहते हैं, चाहें तो वह भी कभी-कभी कर सकते हैं पर उन्हें कभी इसकी आवश्यकता महसूस नहीं हुई, पहले भी नहीं और अब माँ के जाने के बाद भी नहीं.