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Tuesday, October 28, 2014

सिन्धी पुलाव


मोह सदा दुखदायी होता है, सन्तान के मोह में पड़कर माता-पिता कम संताप नहीं पाते. मोहवश उन्हें अपनी सन्तान में वे कोई दोष देखना ही नहीं चाहते. ऐसे में वे स्वयं के साथ साथ सन्तान को भी दुःख की ओर ले जाते हैं. इस मोह के पीछे होती है आशा, सन्तान से स्नेह और सम्मान पाने की आशा, संसार में भी वे सन्तान द्वारा सम्मानित होना चाहते हैं. यदि निस्वार्थ भाव से सन्तान के प्रति वे अपने कर्त्तव्यों का पालन करें, उसे अपने मार्ग पर जाने की स्वतन्त्रता दें यही दोनों के लिए श्रेष्ठ है. इस जगत में यदि कोई अपना है तो वह है नितांत अपना आप. आत्मा ही अपनी है. सुख-दुःख का केंद्र वही होनी चाहिए. बाहरी वस्तुओं, व्यक्तियों, घटनाओं के द्वारा स्वयं को सुख-दुःख के झूलों में झूलने देना आत्मा या ईश्वर का अपमान है. एक न एक दिन सभी को इस सत्य का सामना करना है, मृत्यु का पल कौन सा होगा कोई नहीं जानता. ये जो थोड़े से दिन एक-दूसरे के साथ बिताने को मिले हैं, वे तप-तप कर नहीं सहज होकर जीने हैं. जो कुछ जैसा है वैसा ही स्वीकारें. मन को बिगड़ने न देना ही समझदारी है. यह दुनिया सिर्फ उनके लिए नहीं बनी है, दिए को तो बुझना ही है, तूफानों का सामना करते हुए वह उतनी देर जला क्या यह आश्चर्य की बात नहीं ! ईश्वर के बिना कोई विश्रांति स्थल नहीं, वही उनकी कामनाओं का, आकांक्षाओं का केंद्र होना चाहिए, मन उसी की शरण ले और किसी का न आश्रित हो न कभी अपने कर्त्तव्य को भूले. हृदय और वाणी जब एक हो तो प्रार्थना सफल होती है. ईश्वर निकटतम है, उससे निकटतम और कोई भी नहीं !

आज ‘अमृत कलश’ में एक हास्य कवि आये थे, उन्होंने कुछ आध्यात्मिक कविताएँ भी सुनायीं, पर उनके पास कहने के लिए कुछ ज्यादा नहीं था, एक ही बात को घुमा-फिरा कर कह रहे था, पर इतना तो सत्य है की ईश्वर प्रेमी थे और जो वास्तव में ईश्वर को चाहता है उसकी बातों में सत्य झलकता है. ईश्वर प्रीति के लिए कर्म करने से मानव स्वस्थ होते जाते हैं क्योंकि तब श्रम किया जाता है विश्राम पाने के लिए ! आज बाबाजी ने कहा, “जीवात्मा को इस शरीर और संसार से सुख ढूँढना व्यर्थ है, उसी तरह जैसे यात्री के लिए अजगर का सिराहना बना कर शैया करना व्यर्थ है.”

आज उनकी नींद देर से खुली, जून और उसके सिर में जो भारीपन कल सुबह से बना हुआ था, आज सुबह उठकर भी बरकरार था. परसों रात उन्होंने देर तक जागकर फिल्म देखी, उसके पूर्व जून ने सिन्धी भोजन खिलाया. पुलाव, भिन्डी और तला हुआ पापड़, दोनों का मिलाजुला असर...और शायद उसके भी पूर्व शाम को रेकी के कोर्स को लेकर उनका गर्मागर्म वार्तालाप...जिसमें कोई तत्व नहीं था या फिर इतवार की सुबह व्यर्थ ही अलसाये हुए देर से उठना. इन सबका असर यही रहा कि मन से सात्विक भाव पूर्णतया जाते रहे और तामसिकता ने अड्डा जमा लिया. कल दो बार वह क्रोध करते-करते भी सजग हुई. आज सुबह भी नन्हे को उठाने के लिए थोड़ा जोर से बोलना पड़ा. पर जगत के व्यवहार के लिए इतना खूँटा तो बांधना ही पड़ेगा. कुछ ही देर में नन्हा पढ़ने जायेगा. उसकी सखी ‘रेकी’ के बारे में विस्तार से बताने वाली था, उसे लगा शायद अब वह न बताये या यह उसके ही मन का भ्रम है. वे अपने आसपास वही देखते हैं जो मन का दर्पण दिखाता है. बहुत दिनों से संगीत अभ्यास भी नहीं किया है, शायद सिर के भारीपन का इलाज संगीत में छुपा हो !