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Friday, February 23, 2018

विघ्नविनाशक हे गणनायक



आज सुबह उसे टीवी पर सद्गुरू के पावन वचन सुनने का मौका मिला है. वह गणेशजी का वन्दन उस स्त्रोत से कर रहे हैं जो आदि शंकराचार्य द्वारा किया गया है. गणेश जी प्रथम मूलाधार चक्र के अधिपति हैं. उन का जागरण ही चैतन्य को जगाता है, भीतर शक्ति को मुक्त करता है. वे अजन्मा, निर्विकार, निराकार, गुणातीत, चिदानन्दरूप हैं, पर उनका साकार रूप भी बहुत अनुपम है. सद्गुरू उनकी वन्दना करते हुए कह रहे हैं, साकार के आलम्बन के साथ-साथ निराकार में पहुँचना है, निरंजन तक पहुंचना है. जो परब्रह्म है, सर्वव्यापी है, जगत का कारण है, सुख प्रदाता है, दुःख हर्ता है. जो ज्ञान, ज्ञाता व ज्ञेय तीनों है, सब के भीतर देखने वाला ही वह चैतन्य है. गणेश पूजा के उत्सव के दौरान भक्त भगवान के साथ खेलना चाहते हैं. उनकी मूर्ति बनाकर प्राण प्रतिष्ठा की जाती है, भीतर की चेतना को ही उसमें स्थापित करते हैं. भगवान जो कुछ भक्त को देते हैं, वे भी उन्हें अर्पण करना चाहते हैं. जैसे सूरज व चाँद भगवान की आरती करते हैं, भक्त कपूर जलाकर आरती करते हैं. पुनः उन्हें अपने हृदय में स्थापित करके साकार मूर्ति को जल में प्रवाहित कर देते हैं. गणपति विद्या के अधिपति भी हैं, सर्व पूजित ब्रह्म तत्व भी वही हैं. उन्हें स्वयं के भीतर अनुभव करना ही सच्ची पूजा है. स्वयं के भीतर विराजमान निराकार शक्ति के साथ खेलना ही पूजा है. चेतना में छिपे गुणों को जागृत करना ही पूजा का लक्ष्य है.

बंगलूरू में दो दिन उन्हें और बिताने हैं. आज गणेश पूजा है. जून यहीं निकट ही कुछ सामान लेने गये हैं. नन्हा भी किसी काम से बाहर गया है. आज उसका अवकाश है. कुछ देर पहले नेट पर उसने एक इंटरव्यू लिया. आज बाई नहीं आई है. सुबह कुक आया था, नाश्ते में पोहा बनाया है. कुछ देर बाद वे तीनों घूमने जायेंगे. पहले चिड़ियाघर, फिर राजधानी में दोपहर का भोजन, जहाँ बड़े भाई की बिटिया भी आ जाएगी, जो यहीं रहकर पढ़ाई करती है. उसके बाद वे आर्ट ऑफ़ लिविंग आश्रम जायेंगे. उसने आज सुबह महाभारत में भगवद गीता का एपिसोड देखा. गीता अब कुछ-कुछ समझ में आने लगी है. पहले कृष्ण ज्ञान योग की बात करते हैं, आत्मा के ज्ञान की बात, पर अर्जुन उसे समझ नहीं पाता. फिर वे निष्काम कर्मयोग की बात करते हैं. कर्म किये बिना कोई रह नहीं सकता, पर कर्म बंधन न बने इसके लिए स्वार्थ के बिना कर्म करना होगा. फल पर उनका अधिकार नहीं है, केवल कर्म पर ही है. यज्ञ रूप में किये गये कर्म उन्हें बांधते नहीं हैं तथा रजोगुण को शांत रखते हैं. अर्जुन जब यहाँ भी संदेह से मुक्त नहीं हो पाया तब कृष्ण ने भक्ति योग की बात कही. परमात्मा को अर्पण हुए कर्म भी मुक्ति का कारण बनते हैं. कृष्ण की महिमा को जानकर अर्जुन के मन में श्रद्धा का जन्म होता है, वह उनकी बात समझ जाता है.


Tuesday, December 15, 2015

गणेश और शिव


आज उसे याद आ रहा है कि पहली बार जब सद्गुरू को देखा था तो देखते ही वह स्तब्ध हो गयी थी, उनके वर्तन ने, उनकी वाणी ने मन हर लिया, जिसके सामने हृदय झुक जाये वह सद्गुरु ही मंजिल तक ले जाता है. जो बुद्धि दूसरों में दोष देखती है वह नीचे गिराने वाली है, ज्ञान कभी भी नकारात्मक नहीं दिखाता, सदा सकारात्मक ही दिखाता है. उसके भीतर न जाने कितनी कमिया हैं, उन्हें यदि बुद्धि न देख सके तो वह बुद्धि पक्षपाती है, बुद्धि में राग-द्वेष हो, लोभ तथा ईर्ष्या हो तो ऐसी बुद्धि परदोष दिखाने लगती है. सद्गुरू कहते हैं आत्मा में रहकर ही कोई सारे दुखों से दूर हो सकता है. सतत् होश रखने की जरूरत है, उस समय तक रखने की जरूरत है जब तक जरा सा भी घास-पात भीतर न रह जाये, जब जरा सा भी घास-पात भीतर न रहे तो होश स्वभाव बन जाता है. यह होश मुक्त अवस्था में ला देता है. यही जीवन मुक्ति है.

इच्छा गति है, यह भविष्य में है, जब कोई इच्छा न रहे तभी कोई वर्तमान में आता है, स्मृति ही भूत है, समय केवल वर्तमान में है, वे कल्पना और स्मृति में रहकर वर्तमान को खोते रहते हैं, अपने आप को खो देते हैं. वर्तमान में आते ही वे साक्षी बन जाते हैं, शक्ति बच जाती है, और वे ऊपर की यात्रा कर सकते हैं, पानी नीचे बहता है और भाप ऊपर उठती है, भीतर भी जब ऊर्जा एकत्र हो जाती है, तो वह ऊपर की और जाने लगती है.

आज उसने सुना काल, स्वभाव, पुरुषार्थ, प्रारब्ध, नियति यह पांच संजोग मिलते हैं तब कोई कर्म होता है, और वे स्वयं को कर्ता मानकर सुखी-दुखी होते रहते हैं. कर्ता भाव से मुक्त होते ही चिंता का कोई कारण नहीं रहता. जीत भी यदि उसकी नहीं है तो अहंकार का कोई कारण नहीं बचता और हार भी यदि उसकी नहीं है तो दुःख भी नहीं, ईर्ष्या भी नहीं. उन्हें पकड़े रहने में दुखों को प्रयोजन भी क्या है, वे इतने मूल्यवान तो नहीं कि दुःख उनकी ओर आएं. यह जगत की व्यवस्था उनके लिए तो नहीं चल रही है, जो एक झूठे केंद्र को मानकर चलता है वह भीतर के सच्चे केंद्र को पाने से वंचित रह जाता है. अहंकार दूसरों के मत पत आधारित है. दूसरे का ध्यान मिले यही अहंकार का भोजन  है. यही अहंकार तो छोड़ना है.

ठीक ही कहते हैं एक माँ कई बच्चों को अकेले पाल सकती है पर कई बच्चे मिलकर एक माँ को सहारा नहीं दे सकते. जिस घर में माँ सुख से न रह पाती हो, उसे न रखा जाता हो, वह शांति का सागर कैसे बन सकता है. उसके अंतर में सासुमाँ के प्रति सम्मान है पर वाणी कठोर हो जाती है कभी-कभी, जो अवश्य उन्हें चुभती होगी. कल जून ने पिता से उनकी बात करके दोनों का दिल दुखाया. उन्हें क्या अधिकार है बड़ों का असम्मान करें. यही सोचना चाहिए कि भाग्यशाली हैं कि दोनों का हाथ सिर पर है.

आज सत्संग है, उसे सत्संग, ध्यान, साधना, स्वाध्याय के मर्म को जानना होगा. चिन्तन शक्ति व्यर्थ न हो, शक्ति का संचयन हो और फिर उस का सदुपयोग भी. बोलें तो ऐसा कि दूसरों को अप्रिय न लगे. सजगता के साथ-साथ सहजता भी आवश्यक है. जून आज गोहाटी गये हैं, परसों शाम को आयेंगे. आजकल वह अपने कम में बहुत रूचि ले रहे हैं. प्रसन्न रहते हैं तथा उत्साह से भरे. योग का चमत्कार है. उसकी साधना भी ठीक चल रही है, समय को व्यर्थ न गंवाए, यही महत्वपूर्ण है.  

अज सद्गुरू ने ‘गणेश पूजा’ का महत्व बतलाया. गणेश का जन्म पार्वती के शरीर की मैल से हुआ और शंकर जब लौटे तो उन्हें पहचान नहीं सके. पार्वती का अर्थ है जो पर्व, उत्सव अथवा जीवन के रंगमय रूप से उत्पन्न हुई है, एक अर्थ यह भी है जो पर्वत से उत्पन्न हुई है. उसमें जो भी मल, विक्षेप, आवरण है उसके द्वारा ही एक आकृति का निर्माण हुआ जो शिव तत्व, आत्मा को नहीं पहचान पाया. शिव ने उसे नष्ट करके हाथी का सिर अर्थात ज्ञान को आरोपित कर दिया. आत्मा के आने पर सारा मल दूर हो जाता है, ज्ञान उदार होता है इसलिए गणेश लम्बोदर हैं, उनके कान आँखों तक आ जाते हैं अर्थात वह देखी हुई और सुनी हुई बातों का मिलान करते हैं. उनकी सवारी चूहा है अर्थत एक छोटे से उपाय से महान आत्मा का ज्ञान गुरूजन करा देते हैं. एक छोटा सा मन्त्र साधक को भीतर के अनंत साम्राज्य से मिला देता है. उनके हाथ में पाश है अर्थात अंकुश आवश्यक है तथा पेट पर सर्प लिपटा है जो कहता है सदा सजग होकर रहो, उनके हाथ में मोदक है जो मस्ती का संदेश देता है, मस्ती भी सजगता भरी, ऐसे गणेश की उपासना उन्हें करनी है !


Wednesday, February 22, 2012

गणपति बप्पा मोरया



यह कमरा(ड्राइंगरूम+डाइनिंग रूम) जहाँ वह बैठी है, ठंडा है, बाकी दोनों कमरों की तुलना में. बाहर कितनी तेज धूप है, सुबह-सुबह काफ़ी ठंड थी. पुराने घर में धूप का पता ही नहीं चलता था, यहाँ इतन खिड़कियों के कारण रोशनी से भरा रहता है घर. सुबह नल में पानी नहीं आया पहली बार वह स्नान नहीं कर सकी. परसों वे तिनसुकिया गए थे, “शिवधाम” शिव मंदिर देखा पहली बार. भाई का पत्र आया है राखी मिल गयी है. वह चेयर बैक पर फूल काढ़ रही है आजकल. इस हफ्ते भी चार पत्र आये हैं, कोई हफ्ता ऐसा नहीं जाता जब एक या दो पत्र न आते हों.
आज जून ने दांत का एक्सरे कराया है, कहता है कि निकलवाना पड़ेगा, नूना को सोच कर ही डर लगता है, कितना पीड़ादायक होगा यह अनुभव. उसे याद आया माँ ने एक बार दांत निकलवाया था, चेहरा सूज गया था.
कल शाम वे गणेशोत्सव देखने गए थे, पंडाल में काफ़ी भीड़ थी. परसों विश्वकर्मा पूजा देखी, जगह जगह हाथी पर बैठे हुए विश्वकर्मा जी की मूर्तियां स्थापित की गयीं थीं. एक प्रदर्शनी व पूजा के कारण आजकल सब जगह बहुत भीड़ रहती है.