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Monday, March 18, 2013

गर्म पानी का पाइप



  पिछले दो दिन यूँ हीं गुजर गए जैसे हर बार गुजरते हैं. शनिवार को नन्हा स्कूल नहीं गया था, ऐसे में सुबहें थोड़ा व्यस्त हो जाती हैं, उसकी मार्कशीट मिल गयी है, सोशल में दो नम्बर कम हैं बाकि सभी विषयों में शत-प्रतिशत अंक मिले हैं. अभी-अभी एक पत्र लिखा है, घर जाना है पर जाने क्यों यात्रा का उत्साह नहीं है. पत्र में क्या असत्य लिखा था ? क्या वह अपनों से भी अर्थात अपने से भी झूठ बोल सकती है...रात को फिर अजीब स्वप्न देखे..सर्वोत्तम में एक लेख पढ़ा था, उसमें लिखा था नींद गहरी न हो तो स्वस्थ नहीं रहा जा सकता, या फिर...पर जब ‘वह’ उसके पास है तब इतनी माथापच्ची करने की उसे क्या जरूरत है.

  कल मंझले भाई की चिट्ठी आयी, उससे एक सवाल पूछा था उसने, जब वह ‘योगी कथामृत’ पढ़ रही थी. उसने बहुत अच्छा जवाब दिया है. विनोबा जी ने अध्यात्मवादी होने के लिए तीन निष्ठाएं बतायी हैं-
निरपेक्ष नैतिक मूल्यों पर आस्था,
जीवमात्र की एकता और पवित्रता में विश्वास तथा
मृत्यु के बाद भी जीवन की अखंडता में विश्वास

भाई ने तो स्वीकार किया कि पहली निष्ठा में वह खरा नहीं उतरता और अगर वह अपने मन में झांक कर देखे तो... वह भी अभी बहुत पीछे है, प्रयास करती है, मगर कई बार असफल रहती है. विश्वास उसे तीनों में है. अच्छाई में विश्वास हो..यह तो सभी के साथ होता है लेकिन उसका पालन कौन कितना करता है.

  कल उन्हें घर जाना है, जून अवश्य ही मना करेंगे यह डायरी ले जाने के लिए..वह भी सबके साथ कहाँ लिख पायेगी बल्कि एक पतली कॉपी या कुछ पन्ने ले जाने से ठीक रहेगा...अपने विचारों या भावनाओं को उकेरने के लिए.

 लगभग एक महीने बाद वह लिख रही है. यात्रा के दौरान कई खट्टे-मीठे अनुभव हुए, जिन्हें मन के पृष्ठों पर तो आज भी स्पष्ट देख रही है. माँ-पिता का जीवन के प्रति अनूठा उत्साह देखकर मन गहरे तक प्रेरित होता है. घर में सभी से मिलकर अच्छा तो लगा पर एक-दो बार ऐसा भी लगा कि एक औपचारिकता है जो सभी निभाए चले जा रहे हैं.. पर इस पर अफ़सोस नहीं होता..यह तो परम सत्य है कि इंसान हर काम अपनी खुशी पहले देखकर करता है, यह बात सभी के लिए सत्य है. उन्हें यहाँ आए चौथा दिन है, पहले दिन उसकी उड़िया सखी मिलने आई, खाना खिलाया. यानि उम्मीद के दिए जल रहे हैं और कयामत तक जलते रहेंगे. दूसरों के लिए सोचना यदि हम शुरू कर दें तो दूसरे खुदबखुद..आज इस वक्त साढ़े दस बजे हैं, सिर भारी है, शरीर की हल्की सी पीड़ा भी मन को कैसे प्रभावित कर लेती है, तभी जो वास्तव में लिखना चाहिए था वह न लिखकर सिर की बात लिख गयी. नन्हे की ऑंखें यात्रा के दौरान शहर के प्रदूषण से लाल हो गयी थीं, बहुत संवेदनशील हैं वे धूल व धुएं के प्रति.

दिसम्बर का महीना शुरू हो चका है कल से, और उसे खबर भी न हुई, बड़े भैया का जन्मदिन था कल, उन्हें खत या कार्ड कुछ भी तो नहीं भेजा. इस बार उनसे कुछ ही घंटों के लिए मिल सकी, भाभीजी भी काफी बदली हुई लगीं, वह बड़ी बुआ जी की तरह लगीं रुआब वाली और कुछ मूडी..आज सुबह से सोच रही थी कि लिखना है पर अब दो बजे वक्त मिला है, डेढ़ घंटा अखबार व संडे पत्रिका पढ़ रही थी, पर इतना पढ़ने का कुछ फायदा भी हुआ, सतही जानकारी से कोई लाभ होता है, अखबार सरसरी निगाह से ही पढ़ा और संडे भी कुछ पन्नों को छोड़कर. यूँ कहे कि आजकल कोई बात उसे प्रभावित नहीं कर पाती है तो ठीक होगा. ‘गीता’ पढ़ते-पढ़ते ही मन शायद अब किसी भी घटना में बंध नहीं पाता, तटस्थ हो गया है. कल सुबह बाएं तरफ आयी नई तेलुगु पड़ोसिन के यहाँ गयी, उसकी दो जुड़वां बेटियां हैं, अच्छा लगा उनसे मिलकर. दोपहर को दायीं ओर वाली उड़िया पड़ोसिन के पास. कल मन था कि घर में लग ही नहीं रहा था.
कल शाम वे एक मित्र के यहाँ गए उनके विवाह की वर्षगाँठ थी, उनका बगीचा भी देखा. आज खत लिखने का दिन है, दोपहर को लिखेगी. नन्हे की ऑंखों की लालिमा तिनसुकिया के डॉ की दवा से ठीक हो गयी है, उसे फोन करके धन्यवाद कहना चाहिए. कल रात वे देर तक बातें करते रहे, पर सुबह स्कूल जाने से पहले वह उसकी आँखों में दवा डालना भूल गयी, जून आते ही पूछेंगे. गर्म पानी का पाइप खराब हो जाने के कारण आने के बाद से उन्हें बाथरूम में गर्म पानी नहीं मिल पा रहा है, नहाने के लिए पानी गर्म करना पड़ता है. आज भी प्लंबर नहीं आया है अभी तक.

Friday, September 21, 2012

गहराई कितनी गहरी...



कल रात वर्षा ने आंखमिचौली खेली, दो बार बिस्तर ऊपर-नीचे हुआ, फिर उन्हें नीचे कमरे में सोना पड़ा, इतनी घुटन, इतनी बंद हवा कि अभी तक सिर भारी लग रहा है, और नींद भी कैसी स्वप्नों भरी थी. इस समय भी मौसम बेहद गर्म है. नन्हा इन सारी परेशानियों के बीच कैसे आराम से सोया है, बच्चे आखिर बच्चे ही होते हैं, बादशाह अपने मन के. दिन में जब वह सोया न हो, उसके हाथ, पैर तथा मुंह चलते ही हैं, न चलते-चलते थकता है न बोलते-बोलते. जून को पत्र लिखते समय वह हर बात लिख देती है, छोटी-बड़ी अपने मन की, और उसके बाद एक अजीब सा खालीपन महसूस होता है, यह अपना आप उड़ेंल देना, अपने को निर्वस्त्र कर देने सा ही है न, कहीं कुछ तो बचा कर रखना ही चाहिए, भले ही जून उसका ‘स्वयं’ ही क्यों न हो, स्वयं से भी कुछ बातें छिपी रहें तो रहस्य बना रहता है, कौतूहल भी. कल रात से उसे खत लिखने के बाद से ही एक रीतापन सा महसूस हो रहा है अब उसका अगला पत्र आने तक ऐसा ही रहेगा.

परसों उसने सौ रुपये के नोट का फुटकर करवाया, दो ही दिन में आधे पैसे खर्च हो गए, जब तक नोट बंद था ठीक था. ननद के पेपर चल रहे हैं. सोनू और वह छत पर हैं, माँ किचन में. बिना प्रेस किये कपड़े पहने हों कभी याद नहीं पड़ता, सातवीं-आठवीं में पढ़ती थी उसके बाद से तो कभी भी नहीं, यहाँ प्रेस खराब है, पैसे देकर कपड़े प्रेस करना खलता है, पर क्या करें. कल शाम को गर्मी ज्यादा थी उसने स्नान किया, बाल पोंछे ही नहीं, देर तक ठंडक साथ रही. अभी फिर रीठा आदि लगाकर बाल धोए हैं, छींके आनी शुरू हो गयी हैं, लगता है सर्दी होगी, वही कॉमन कोल्ड...

जून का खत आया है, सो मन तो खुश है, पंछी की तरह उन्मुक्त खुले-खुले गगन में उड़ता हुआ सा..उसने भी उसे लिखा है, उस भोले, उदार मित्र को, वह स्वयं भी नहीं जानती थी कि उसके लिए इतना प्यार छिपा है उसके मन में , उसके मन में उसके सिवा और कुछ है भी कहाँ. वह खुश रहे, सुखी रहे यही दुआ निकलती है हर पल. उसको खुश रखना उसका सर्वप्रिय कार्य है. आज घर का माहौल हल्का-हल्का है, माँ भी ठीक हैं, पर उनका दुःख कितना गहरा है उसका अनुमान कोई और नहीं लगा सकता. पर फिर भी जीना तो है ही, खुश भी रहना है, क्यों कि जीवन है तो खुश रहने की इच्छा भी है, सुख की आकांक्षा भी है. दुःख को भुला कर मुस्कुराना भी है. समाचारों का समय हो रहा है, जून भी समाचार दख रहे होंगे.

कल रात उसने ‘गहराई’ फिल्म देखी, फिल्म के दृश्य बार-बार स्वप्न में आ रहे थे. पहले कभी इसके बारे में सुना था. आज इतवार है, वह स्नान करके लिखने बैठी है, नन्हा सो रहा है. जून भी शायद चाय की चुस्कियां ले रहे होंगे. आज शाम को उन्हें चाची की लड़की की मंगनी में जाना है. माँ-पापा का खत भी आया है, उसे घर जाना ही चाहिए. उसने सोचा २८ या २९ को जायेगी, रिजर्वेशन के लिए जून के मित्र को कहना होगा.

 



Monday, May 7, 2012

अप्रैल फूल


उस दिन अप्रैल की पहली सुबह थी. उन दोनों ने एक दूसरे को अप्रैल फूल बनाया और खूब हँसे. पिछली शाम आंधी आयी थी और हल्की बूंदाबांदी भी हुई, लेकिन सुबह वैसे ही गर्म थी. रात वह अजीब-अजीब स्वप्न देखती रही, बीच बीच में नींद टूट जाती थी, उमस भी थी कमरे में, उठकर जून ने पंखा चलाया पर उसके बाद भी असुविधा में थे तन-मन दोनों. संभव है दिन में सो लेने के कारण ऐसा हुआ हो, या जैसे-जैसे दिन नजदीक आ रहे हैं, दिक्कतें कुछ तो आयेंगी ही. वह पिछले कई दिनों से एक नॉवल पढ़ रही थी. कितनी सूक्ष्मता से दो जोड़ों के चरित्र का चित्रण लेखक ने किया है. कल शाम उन्होंने आपने विवाह की एल्बम देखी और एक पुराना खत पढ़ा, बहुत हँसे अपनी उन दिनों की दीवानगी पर. जून आजकल हर वक्त उसका ध्यान रखने का प्रयत्न करता है, वह खुश है और स्वस्थ भी. उसे घर का काम करने का भी शौक है, इतवार को कपड़े धोने में उसे मजा आता है. दोसे बनाने हों तो तैयारी में सिवाय दाल-चावल भिगोने के उसे और कुछ नहीं करना पड़ता. उसे पीसने के लिये व चटनी बनाने के लिये वे अपने दक्षिण भारतीय मित्र के यहाँ जाते हैं, व बनाने के लिये वह तैयार रहता है.