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Friday, November 13, 2015

मधु-कैटभ


मृत्यु के समय और उसके पहले क्या होता है, इसके बारे में नीरू माँ भी आजकल बता रही हैं तथा वह जो पुस्तक पढ़ रही है, Tibeten book of living and dying उसमें भी यह बताया गया है कि मरने की तयारी कैसे करनी चाहिए. मृत्यु को जीवन का अंग मानकर जीवन में ही इसके लिए तयारी करनी चाहिए. एक-एक करके सारे सेन्स ऑर्गन काम करना बंद करने लगते हैं, इसी तरह मन भी आपने शुद्ध स्वरूप में आ जाता है, जिसने जीवन में अभ्यास किया है वह इसे पहचान कर मुक्त  हो सकता है पर जो जानता ही नहीं वह पुनः जन्म-मरण के चक्र में फंस जाता है. उन्हें नित्य-प्रति हर क्षण आत्मा में ही रहना होगा, कोई राग नहीं, कोई द्वेष नहीं, कोई छल-कपट नहीं, कोई चाह नहीं ! आज सुबह नींद चार बजे से भी पहले खुल गयी, आजकल सुबह उठकर टीवी नहीं खोलती तो समय काफी बच जाता है, स्नान भी सुबह हो जाता है. कल रात को जून से वह बात करने लगी कि उन्हें तथा कुछ अन्य को विदेश चले गये कुछ लोगों को देखकर जो लगता है कि पिछड़ गये, यहीं रह गये, यहाँ का जीवन एकरस लगता है, इन बातों का कांटा मन से निकाल देना चाहिए, जो ज्ञान से ही सम्भव है, पर वह समझ नहीं पाए. मानव अपने दुखों से भी मुक्ति नहीं चाहते, उन्हीं में रहकर स्वयं को पीड़ित मानकर सुखी होते हैं. पर इससे उसके लिए सीखने की बात यह है की चाहे कोई अपना हो या पराया ( वैसे पराया कोई है नहीं ) किसी को सलाह देने या समझाने की कोई जरूरत नहीं है, यदि कोई स्वयं दुःख से दूर होना नहीं चाहता तो कोई दूसरा उसे चाहकर भी नहीं निकाल सकता. सो अपने ज्ञान को अपने भीतर ही सम्भाल कर रखना चाहिए, हरेक को अपना रास्ता खुद ही ढूँढना पड़ता है ! उसे हर हाल में मुक्त रहना है !

आज मई का एक गर्म दिन है, आज उन्होंने मृणाल ज्योति में पुराने पर्दे, कुशन वगैरह भिजवाये, शायद उनके कुछ काम आयें. घर में जितना कम सामान हो अच्छा है. कल शाम दक्षिण भारतीय पड़ोसिन अपने भाई अरुणाचलम् तथा माँ को लेकर आई, उसकी माँ ने क्रोशिये से बना एक ऊन का रुमाल दिया, उनकी अवस्था भी काफी है तथा मस्तिष्क की कोई बीमारी भी है पर अभी तक हाथ से काम करती हैं क्रोशिये का. उनके माथे पर चन्दन लगा था तथा चेहरे पर मुस्कान थी. वह हिंदी नहीं बोल पातीं पर दिल की भाषा में कोई शब्द नहीं होते. जून अभी आने वाले होंगे, उसने ध्यान कक्ष की सफाई की, इसके बावजूद वहाँ चीटियों का आना जारी है. इतिहास पढने में उसे उतनी रूचि नहीं है यह नेहरु जी की पुस्तक पढ़ते समय पता चल रहा है.

आज सद्गुरु ने बताया चंड-मुंड, मधु-कैटभ था शुम्भ-निशुम्भ सब भीतर हैं. रक्तबीज भी डीएनए की विकृति है. राग-द्वेष ही मधु-कैटभ हैं और उनसे तब तक मुक्ति नहीं मिल सकती जब तक चेतना प्रेम में विश्राम न पाले. हृदय और मस्तिष्क ही चंड-मुंड हैं, अति भावुकता भी नहीं और अति-बौद्धिकता भी नहीं, दोनों का संतुलित मेल ही जीवन को सुंदर बनाता है. जन्मों-जन्मों के संस्कार जो बीज रूप में भीतर पड़े हैं उनसे भी तभी मुक्ति हो सकती है जब चेतना मुक्त हो अर्थात स्वयं को शुद्ध-बुद्ध आत्मा जानें, तन व मन दोनों के साक्षी व द्रष्टा बनें, अभी तो तीन एक-दूसरे से चिपके हुए हैं, एक को पीड़ा हो तो दूसरी उसे अपनी पीड़ा मान लेता है, एक को हर्ष हो तो दूसरा उसे अपना हर्ष मान लेता है और होता यह है कि एक न एक को तो सुख-दुख का अनुभव होता ही है, तो हर वक्त बेचारी चेतना बस परेशान-दुखी या फूली हुई रहती है, उसे कभी मन के साथ भूत में जाकर पछताना पड़ता है तो कभी भविष्य में जाकर आशंकित होना पड़ता है, वह कभी चैन से रह ही नहीं पाती, नींद में भी मन उसे स्वप्न की दुनिया में ले जाता है.



Thursday, February 21, 2013

सुपरमैन



फिर एक अंतराल, पिछले दिनों कुछ छोटी-बड़ी समस्याएं मन को घेरे रहीं, पर आज भीतर कुछ प्रकट होने को व्याकुल है, परमात्मा का अनुभव हर कोई कभी न कभी, किसी न किसी रूप में करता है, वह सदा ही साथ रहता है और दुःख में भी मार्ग दिखाता है, वही भला करने की प्रेरणा देता है. अप्रैल का महीना भी आज शुरू हो गया, बचपन में भाई-बहन एक दूसरे को कितना मूर्ख बनाते थे आज के दिन, पता नहीं कहाँ खो गए बचपन के वे दिन, अब तो उम्र के आधे पड़ाव आ चुके हैं वे, लेकिन मन तो वही है, अभी भी कितनी रोक लगानी पड़ती है, किस तरह बंधन में बांध कर वे मन को बड़ा करना चाहते हैं, पर मन है कि अंगुली छुड़ा कर फिर वहीं खड़ा हो जाता है, नहीं तो रात भर नींद क्यों नहीं आती, क्यों काँप उठता है हर आहट पर मन. पिछले कई दिनों से रात उसे दुश्मन लगने लगी है, जितना प्रयत्न करती है सोने का उतना ही नींद दूर भागती है. एक अनजाना, नहीं जाना-पहचाना सा डर समा गया  है मन में. अब इतने बड़े होकर डरना तो बचपना ही हुआ न, नन्हा सो जाता है आराम से, जून भी सो जाते हैं, हालांकि वह उन्हें जगा देती है कई बार. बस वह ही सोचती रहती है, घूमती है अनिश्चय के अँधेरे में. उसे भगवद्गीता का पाठ फिर से शुरू कर देना चाहिए. इस डर को मन से बाहर निकालना बेहद जरूरी है. आज उसने बहुत दिनों बाद चेहरे पर दही-बेसन लगाया. नन्हा स्कूल गया है, उसके इम्तहान इसी महीने की छह तारीख से शुरू हो रहे हैं. जून अभी आने वाले हैं.

पिछले दिनों या कहें कई हफ्तों वह लिखने से कतराती रही है, कारण कई हो सकते हैं, लेकिन अब उन कारणों में न जाकर वह अपने आप से वादा करती है कि नियमित लिखने का प्रयत्न करेगी. उसकी दाहिनी बाँह की कोहनी में हल्का-हल्का दर्द सा रहता है. स्वास्थ्य की दृष्टि से इतनी संवेदनशील हो गयी है कि शरीर की छोटी से छोटी समस्या पर ध्यान जाता है, हर हरकत पर. जून भी सोते समय कभी-कभी चौंक जाते हैं यह आठ सालों में अभी महसूस करने लगी है. नन्हे के खर्राटे भी अब ज्यादा साफ सुनाई देते हैं. उसके दिल के पास हल्का सा दर्द पहले भी कभी कभी होता था पर अब डॉक्टर को दिखाने की जरूरत महसूस होती है. पहले जिन बातों के बारे में कभी सोचा भी नहीं था अब वे सच न हो जाएँ ऐसा लगता है. ज्यादा ज्ञान भी खतरनाक सिद्ध हो सकता है. मेडिकल गाइड में पढकर कितनी जानकारी हुई है उनकी, लेकिन वे सब बातें मस्तिष्क में जैसे रिकार्ड हो गयी हैं. आज नन्हे का चौथा इम्तहान है, सोमवार को अंतिम होगा, फिर गर्मी की छुट्टियाँ शुरू हो जाएँगी. छुट्टियों में उसे व्यस्त रखने के लिए ड्राइंग, पेंटिग या संगीत सिखाने के बारे में वे सोच रहे हैं.

कल इतवार था सो डायरी लिखने का सवाल ही नहीं था क्योंकि इस डायरी में इतवार के लिए जगह ही नहीं है, वैसे भी जून घर पर होते हैं, समय नहीं मिलता, शुरू-शरू में वे दोनों रात को एक साथ बैठकर लिखा करते थे, लेकिन वह कई वर्ष पुराणी बात है, समय कितनी तेजी से गुजर जाता है पता ही नहीं चलता. आज कई दिनों बाद उसका मन उत्साह से भरा है, कल घर पर कुछ लोगों को लंच पर बुलाया है. कितना काम करना है, कुशन कवर आदि बदलने हैं. कई बार वह सोचती है कि घर को खूबसूरत बनाने के लिए और क्या-क्या करना चाहिए. सबसे पहले तो सारे फर्नीचर पर पेंट करवाना है, फ्रिज भी पुराना लगता है. दीवारों पर लगाने के लिए कुछ अच्छी तस्वीरें चाहिए और साइड रैक्स, टीवी स्टैंड आदि के लिए अच्छे कवर. कितना अच्छा लगता है जब घर में इस तरह का कोई आयोजन हो, शाम को बाजार भी करना है. एक मित्र परिवार से मिलने भी जाना है. सोच रही थी लाइब्रेरी भी जायेगी पर इतना समय नहीं होगा. अगले दो दिन छुट्टी है, पत्र तभी लिखेगी.

सोनू ने आज फिर पेन्सिल से अपने बड़े बड़े अक्षरों में कुछ लिख दिया है- “आज मैं बहुत दिनों बाद डायरी लिख रहा हूँ, क्योंकि मेरे exam चल रहे थे, अभी-अभी मैंने दूध पीया और रोते-रोते orange creamy wafers खाए, फिर माँ को डायरी दिखाई और फिर किसी तरह weafers खाए. अब मैं सुपरमैन बनूंगा. नमस्कार. उसके बाद उसने चार आँसू बनाये हैं और लिखा है कल ऊं ऊं ऊं ...” और फिर अपना नाम