Showing posts with label पीड़ा. Show all posts
Showing posts with label पीड़ा. Show all posts

Monday, September 11, 2017

मंगल मैत्री


एक रात्रि स्वप्न में स्वयं को किसी दुःख से छुड़ाने के लिए रोकर पुकार लगाते सुना, फिर अपने ही मुँह से एक धातु का उपकरण निकालकर हाथ में रखा, स्पष्ट था कि पीड़ा का कारण यही था. तब जैसे किसी ने कान में फुसफुसा कर कहा, अपने आप को स्वयं ही क्यों दुखी बनाती हो? फिर नींद खुल गयी.

एक स्वप्न में देखा, उठना चाहती है पर आँखें हैं कि खुलने का नाम नहीं लेतीं, बंद आँखों से ही चल पड़ती है तो सामने दीवार आ जाती है, दिशा बदल कर सड़क पर आ जाती है और आँखें खोलने में समर्थ हो जाती है. एक स्वप्न में खुद को निरंतर ७८६ को उच्चारित करते हुए पाया. एक और स्वप्न में भगवान शंकर का जयकार करते हुए. ये सारे स्वप्न यही तो बता रहे थे कि न जाने कितने बार यह चक्र घूम चुका है अब कहीं तो इसे रुकना होगा. कभी-कभी ऐसे व्यर्थ के विचार भी आते कि हँसी आती, पर जो-जो भीतर रिकार्ड किया है वह तो निकलेगा ही, सारी साधना समता भाव बनाये रखने की है. कोई भी अनुभव कितना भी सुंदर क्यों न हो समाप्त हो जाता है, पर भीतर की समता एक चट्टान की तरह अडिग रहती है.

अंतिम दिन का पाठ भी अतुलनीय था, जिसमें मंगल मैत्री सिखायी गयी. प्रतिदिन सुबह व शाम की साधना के बाद सारे विश्व के लिए मंगल कामना करने को कहा गया जिससे सारे पुण्य केवल स्वयं की शुद्धि के लिए समाप्त न हो जाएँ सब दिशाओं में उन्हें प्रसारित करना होगा. सबके मंगल में ही अपना मंगल छिपा है, भगवान बुद्ध की यह मंगल भावना कितनी पावन है. धरा पर यदि कोई जगा हुआ न हो तो इसकी रौनक कोई देख ही न पाए, उस तरह, जिस तरह यह वास्तव में है ! जो दिखायी नहीं देता, वह उससे ज्यादा सुंदर है जो दिखायी देता है. ‘शील, समाधि और प्रज्ञा’ भगवान बुद्ध के बताये इस मार्ग पर चलकर न जाने कितने लोग दुखों से मुक्ति का अनुभव कर चुके हैं, और अनेक भविष्य में भी करते रहेंगे. 

कल यात्रा विवरण पूरा हुआ. इस समय दोपहर का पौने एक बजा है. बाहर के बरामदे में बैठकर लिखने का सुअवसर हफ्तों बाद मिला है. लॉन में फूल खिले हैं, धूप पसरी है और अवश्य तितलियाँ भी होंगी. अभी तक सुबह के वक्त हवा में ठंड का अहसास होता है. उसके गले में खराश है. पिछले दिनों दिनचर्या तथा भोजन के बदलाव और मन के आपरेशन के कारण, अथवा पता नहीं क्या है इसके पीछे. उसका मन या कहे ‘मन’ न जाने कितने संस्कार छिपाए है और हर पल वे नये संस्कार बनाते चल रहे हैं. उनसे जो भी गलत हुआ है, उसका हिसाब तो चुकाना ही होगा. प्रकृति का नियम है विकार जगाया तो व्याकुल होना ही पड़ेगा. अतीत में जो विकार जगाये तथा जिन्हें अचेतन मन की परतों में दब जाने दिया, साधना के द्वारा वे उभर कर ऊपर आते हैं तो देह पर ही प्रकट होते हैं. परमात्मा हर क्षण उनके साथ है, वह हर भाव, विचार तथा कृत्य का साक्षी है, वह अकारण दयालु है, कृपा का सागर है. उसकी उपस्थिति का अनुभव होने के बाद राग-द्वेष व मोह के बंधन नहीं बाँधते. ऐसे व्यक्ति के लिए अब न कोई अपना है न ही पराया. न ही मूढ़ता उसे भाती है. देह में होने वाले स्पंदन तथा अनुभूतियाँ उसका स्मरण करा देती हैं. 

Friday, November 13, 2015

मधु-कैटभ


मृत्यु के समय और उसके पहले क्या होता है, इसके बारे में नीरू माँ भी आजकल बता रही हैं तथा वह जो पुस्तक पढ़ रही है, Tibeten book of living and dying उसमें भी यह बताया गया है कि मरने की तयारी कैसे करनी चाहिए. मृत्यु को जीवन का अंग मानकर जीवन में ही इसके लिए तयारी करनी चाहिए. एक-एक करके सारे सेन्स ऑर्गन काम करना बंद करने लगते हैं, इसी तरह मन भी आपने शुद्ध स्वरूप में आ जाता है, जिसने जीवन में अभ्यास किया है वह इसे पहचान कर मुक्त  हो सकता है पर जो जानता ही नहीं वह पुनः जन्म-मरण के चक्र में फंस जाता है. उन्हें नित्य-प्रति हर क्षण आत्मा में ही रहना होगा, कोई राग नहीं, कोई द्वेष नहीं, कोई छल-कपट नहीं, कोई चाह नहीं ! आज सुबह नींद चार बजे से भी पहले खुल गयी, आजकल सुबह उठकर टीवी नहीं खोलती तो समय काफी बच जाता है, स्नान भी सुबह हो जाता है. कल रात को जून से वह बात करने लगी कि उन्हें तथा कुछ अन्य को विदेश चले गये कुछ लोगों को देखकर जो लगता है कि पिछड़ गये, यहीं रह गये, यहाँ का जीवन एकरस लगता है, इन बातों का कांटा मन से निकाल देना चाहिए, जो ज्ञान से ही सम्भव है, पर वह समझ नहीं पाए. मानव अपने दुखों से भी मुक्ति नहीं चाहते, उन्हीं में रहकर स्वयं को पीड़ित मानकर सुखी होते हैं. पर इससे उसके लिए सीखने की बात यह है की चाहे कोई अपना हो या पराया ( वैसे पराया कोई है नहीं ) किसी को सलाह देने या समझाने की कोई जरूरत नहीं है, यदि कोई स्वयं दुःख से दूर होना नहीं चाहता तो कोई दूसरा उसे चाहकर भी नहीं निकाल सकता. सो अपने ज्ञान को अपने भीतर ही सम्भाल कर रखना चाहिए, हरेक को अपना रास्ता खुद ही ढूँढना पड़ता है ! उसे हर हाल में मुक्त रहना है !

आज मई का एक गर्म दिन है, आज उन्होंने मृणाल ज्योति में पुराने पर्दे, कुशन वगैरह भिजवाये, शायद उनके कुछ काम आयें. घर में जितना कम सामान हो अच्छा है. कल शाम दक्षिण भारतीय पड़ोसिन अपने भाई अरुणाचलम् तथा माँ को लेकर आई, उसकी माँ ने क्रोशिये से बना एक ऊन का रुमाल दिया, उनकी अवस्था भी काफी है तथा मस्तिष्क की कोई बीमारी भी है पर अभी तक हाथ से काम करती हैं क्रोशिये का. उनके माथे पर चन्दन लगा था तथा चेहरे पर मुस्कान थी. वह हिंदी नहीं बोल पातीं पर दिल की भाषा में कोई शब्द नहीं होते. जून अभी आने वाले होंगे, उसने ध्यान कक्ष की सफाई की, इसके बावजूद वहाँ चीटियों का आना जारी है. इतिहास पढने में उसे उतनी रूचि नहीं है यह नेहरु जी की पुस्तक पढ़ते समय पता चल रहा है.

आज सद्गुरु ने बताया चंड-मुंड, मधु-कैटभ था शुम्भ-निशुम्भ सब भीतर हैं. रक्तबीज भी डीएनए की विकृति है. राग-द्वेष ही मधु-कैटभ हैं और उनसे तब तक मुक्ति नहीं मिल सकती जब तक चेतना प्रेम में विश्राम न पाले. हृदय और मस्तिष्क ही चंड-मुंड हैं, अति भावुकता भी नहीं और अति-बौद्धिकता भी नहीं, दोनों का संतुलित मेल ही जीवन को सुंदर बनाता है. जन्मों-जन्मों के संस्कार जो बीज रूप में भीतर पड़े हैं उनसे भी तभी मुक्ति हो सकती है जब चेतना मुक्त हो अर्थात स्वयं को शुद्ध-बुद्ध आत्मा जानें, तन व मन दोनों के साक्षी व द्रष्टा बनें, अभी तो तीन एक-दूसरे से चिपके हुए हैं, एक को पीड़ा हो तो दूसरी उसे अपनी पीड़ा मान लेता है, एक को हर्ष हो तो दूसरा उसे अपना हर्ष मान लेता है और होता यह है कि एक न एक को तो सुख-दुख का अनुभव होता ही है, तो हर वक्त बेचारी चेतना बस परेशान-दुखी या फूली हुई रहती है, उसे कभी मन के साथ भूत में जाकर पछताना पड़ता है तो कभी भविष्य में जाकर आशंकित होना पड़ता है, वह कभी चैन से रह ही नहीं पाती, नींद में भी मन उसे स्वप्न की दुनिया में ले जाता है.



Friday, August 21, 2015

मलेशिया का मौसम


अभी-अभी नैनी ने कुछ कहा पर वह ठीक से सुन नहीं सकी और कुछ और समझ कर उस बात का जवाब दिया. उसका ध्यान पूरी तरह से उस पत्र में था जो वह सद्गुरु को लिख रही थी. आज सुबह एक परिचित का फोन आया, तीन दिनों के लिए उन्हें स्थान मिल जायेगा. कोई शुभ कार्य करने जब कोई निकलता है तो प्रकृति उसमें सहायता करने को आ जाती है. उसे लगता है उनका यह सेवा प्रोजेक्ट बहुत सफल होगा. ईश्वर के लिए किया गया कार्य कभी असफल हो ही नहीं सकता. कुछ देर पहले जून का फोन आया था, सुबह ससुराल से पिताजी का फोन भी आया, टिकट कराने की बात कह रहे थे. आज सुबह चिड़ियों की आवाज ने जगाया, स्वप्न में देखा( या वह तंद्रा थी) कि नीले आकाश में गुरूजी आगे-आगे तथा वह पीछे-पीछे चल रही है. मौन है प्रकृति ! मौन से ही ओंकार की उत्पत्ति हुई, उस दिन यह बात सुनी, यह बात सीधे दिल में उतर गयी है, मौन भाने लगा है..भीतर का मौन, कभी-कभी जब कोई विचार नहीं रहता वह इस मौन को सुनती है. यही वह शांति है, जिसे वह अनुभव करती आई है उसमें से फिर आनंद फूटता है, सभी क्यों नहीं इस आनंद को चख पाते, कितना सहज है यह पर जिसे नहीं मिला उसके लिए उतना ही कठिन ! तभी तो कहते हैं ईश्वर निकटतम है और दूरस्थ भी ! वह तो जैसे कृत-कृत्य हो गयी है. कृतज्ञता से कभी-कभी आँखें भर आती हैं. शास्त्रों के वचन कितने सच्चे लगते हैं. संतजन प्रिय लगते हैं और परमात्मा अपने लगते हैं, यही तो भक्ति है न !
बाहर तपन है पर भीतर शीतलता है ! जिसे तृष्णा की आग नहीं जलाती वह सदा ही शीतलता का अनुभव करता है. आज सुबह उठी तो मन-प्राण ध्यान से पूर्ण थे, आज एकादशी है, मन भोजन का ध्यान तो कर रहा है पर फलाहार का ही. मन का निरोध करना तो सम्भव नहीं लगता हाँ उसकी धारा को एक गति अवश्य दी जा सकती है. कल ध्यान करते समय मन में वह घटनाएँ मुखर हुईं जिनमें अन्यों का दोष देखा था. अपनी गलती तब नजर नहीं आई थी, पर अब स्पष्ट दिखी. भीतर की गंदगी को बाहर कर ध्यान पवित्र कर देता है. उस दिन जून जो इतना क्रोधित हुए तो बिलकुल सही था. उसने श्रद्धा का दामन छोड़ दिया था, अपनी अस्वस्थता से कितनी शीघ्र घबरा गयी थी. धैर्य का साथ छोड़ देने से वे बाहरी वस्तुओं, व्यक्तियों, परिस्थितियों को अपने सुख-दुःख के लिए दोषी मानने लगते हैं, वे यह भूल जाते हैं कि उनके स्वयं के कर्म ही उन्हें सुखी-दुखी बनाते हैं, फिर जिन्हें वे स्वयं से भी अधिक प्रेम करते हैं, उन्हें अपनी पीड़ा के लिए ( अपनी तुच्छ पीड़ा के लिए ) दोषी ठहराना तो निहायत ही घटिया काम है. वह कितना नीचे गिर गयी थी, ईश्वर ने सब देखा होगा, हंसा होगा वह कि उससे प्रेम का दम भरने वाली स्वयं का दर्द नहीं सह पायी. इस जन्म में जिस किसी को भी उसने जितनी भी बार दुखी किया है, सबमें उसका दोष स्पष्ट रूप से था, वह सभी से क्षमा मांगती है ! अपने उस दोष के कारण ही उसने स्वयं भी बहुत दुःख उठाया है, अब और नहीं..बस..यह बात सदा याद रहे !

हँसी आती है अपनी मूर्खता पर कि अपने जिस दुःख को वह इतना महत्व दे रही थी, वह तो कुछ था ही नहीं, उसकी तुलना में औरों के दुःख कितने बड़े थे पर वे तब भी मुस्कुरा रहे थे. उसका अहंकार ही तुच्छ से दुःख को बड़ा करके दिखाता है बल्कि जहाँ नहीं भी होता वहीं खड़ा कर लेता है. आज ब्यूटी पार्लर में काम करने वाली एक लड़की की बातें सुनकर लगा कि वह अपने सारे दुखों के बीच कितनी शांत है. उसके पिता कैंसंर के मरीज हैं, मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे हैं. कल उसने जून से कहा कि ठीक ही चल रहा है, वह सोच रहे होंगे ऐसा क्या हो गया, आज फोन आने पर कहेगी कि सब कुछ बिलकुल ठीक है. वहाँ का मौसम कैसा है ? खाना कैसा मिलता है ? शाम को क्या करते हैं? तथा तबियत कैसी है ? उसने उनके बारे में कुछ पूछा ही नहीं, अपने तथा नन्हे के बारे में ही बताती रही. जून घर से दूर हैं, उन्हें उससे ज्यादा सम्भल कर चलना होता होगा. आज ध्यान में अद्भुत अनुभव हुआ, उससे पहले सद्गुरु का स्मरण हुआ और मन कृतज्ञता से भर  गया, कितना विश्वास है उनके भीतर, कितनी सहजता, कितना अपनापन, कितना प्रेम..उन्हें सुनना एक अनोखा अनुभव है, वह शांति का सागर हैं, सुबह उठी तो कैसी बेचैनी थी कि अभी तक सत्य का भान नहीं हुआ, पर उन्होंने बताया कि जो भी विकार हैं उन्हें देखते रहें, निर्मूल करने जायेंगे तो वे और दृढ़ होंगे, भीतर अपने आप से जुड़ते जाना है तो जो व्यर्थ है वह छूटता जायेगा अपने आप ही ! क्रोध के प्रति क्रोध का आना भी बंद करना होगा. प्रकाश, प्रवृत्ति तथा मोह के उत्पन्न होने पर भी जो न तो हर्षित होता है न उद्ग्विन होता है, वही कृष्ण के शब्दों में स्थिरमति है !