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Friday, August 14, 2015

टिंडे की सब्जी


आज सुबह चार बजे ही नींद खुल गयी, रात को जल्दी सो गयी थी. मन अपेक्षाकृत शान्त है, किन्तु अभी भी पहले की सी स्थिरता नहीं आई है. यात्रा में ध्यान में जो व्यवधान पड़ा उसका असर स्पष्ट दिखाई पड़ रहा है. मन में बेवजह ही विचार चलते रहते हैं, कभी भूत के, कभी भविष्य के, कभी आत्मग्लानि के, कभी अहंकार के, वह साक्षी भाव से सभी को देखा करती है. उनके भीतर कितना कुछ भरा पड़ा है. एक ब्रहमांड बाहर है तो एक उनके भीतर भी है. कभी-कभी ध्यान में कुछ चेहरे दीखते हैं, कौन हैं वे, शायद उसके किसी पिछले जन्म के परिचित या उसके स्वयं के चेहरे ! उस दिन कैसा अजीब स्वप्न देखा था, एक पौधे के तनों के सिरों पर जानवरों के चेहरे, पौधा और जन्तु एक साथ. पौधा जैसे कीट बन गया था या कीट जैसे पौधा बन गया था. उसे यह बताने के लिए स्वप्न आया होगा कि द्वैत नहीं है. सब एक ही है. उस दिन आश्रम में भी तो यही विचार बार-बार मूर्त होता हुआ लग रहा था कि सभी कुछ एक ही तत्व से बना है, एक ही तत्व भिन्न-भिन्न रूपों में प्रगट हो रहा है. सब उसी एक आत्मा का विस्तार है. दृष्टिकोण यदि विशाल हो तो सारे छोटे-छोटे भेद, दुःख, दर्द खत्म हो जाते हैं. सद्गुरु उन्हें इसी विशाल दृष्टि को अपनाने को कहते हैं. मेरे-तेरा का झगड़ा अब बहुत हो चुका, अब तो उत्सव की बेला है, अमृत बरस रहा है, ज्योति जल रही है, प्रकाश में नहाना है तथा अमृत छकना है. भीतर तृप्ति तभी मिलेगी, नहीं तो जगत के सामान भरते-भरते उम्र निकल जाएगी और हाथ कुछ भी नहीं आएगा. उनके सम्मुख हर क्षण दो रास्ते होते हैं, एक प्रेय दूसरा श्रेय, चुनाव उन्हें करना है तभी कल्याण होगा !

जून आज आ गये हैं, उनका गला खराब है, इस समय आराम कर रहे हैं. आज सुबह वह देर से उठी, रात को देर तक पढ़ती रही फिर कुछ देर ध्यान किया और सुबह स्वप्न देखती रही. सद्गुरु कहते हैं जैसे ही नींद खुले उठ जाना चाहिए, सोये रहना ठीक नहीं है, तमस बढ़ता है, प्रमाद ही मृत्यु है. आज पढ़ा कि आयु मिली है ईश्वर की प्राप्ति के लिए, वे व्यर्थ ही सोकर गंवा देते हैं, उतनी देर ध्यान –भजन करें तो यह कमाई होगी. उसे ईश्वर ने कितनी सुविधाएँ दी हैं ध्यान-भजन के लिए, आजकल तो विशेष रूप से, थोड़ा सा घर का काम और हाथ में ढेर सारा समय परमात्मा को याद करने के लिए. आज दो घंटे ध्यान करने का प्रयत्न किया, पता नहीं कितनी देर वास्तव में ध्यान घटित हुआ. मन आजकल वश में नहीं रहता, यहाँ तक कि क्रिया के वक्त भी इधर-उधर भाग जाता है, वह शेष समय उस पर ध्यान नहीं देती शायद इसीलिए ! गुरुमाँ ने कहा था कि जो विचारों से मुक्त है वही  मुक्त है. अब से मन पर ज्यादा ध्यान रखेगी. आज यहाँ कई दिनों बाद धूप निकली हाई. पहली बार एसी चलाया इस वर्ष. पहली बार टिंडे बने हैं. जून दिल्ली से लाये हैं, भिस, टिंडे तथा बेबी कॉर्न. कल दीदी का फोन आया था, परसों जीजाजी से बात की उन्हें लगा कि उसके भीतर वैराग्य ज्यादा ही जाग रहा है. उसकी एक सखी का भी यही विचार है उसकी सासूजी ने बताया और इधर उसे लगता है कि राग छूटता ही नहीं, राग-द्वेष से मुक्त मन ही तो ध्यानस्थ हो सकता है. सद्गुरु कहते हैं कुछ जान के चलो, कुछ मान के चलो, वे साधना के पथ पर प्रगति कर रहे हैं यह मानना ही चाहिए तभी प्रेरणा मिलेगी.     


Tuesday, March 17, 2015

टिंडे की सब्जी


अभी बहुत दूर जाना है, सहिष्णुता की बहुत कमी है. आसक्ति अभी बनी हुई है, लोभ भी बरकरार है और वाणी पर संयम भी नहीं है. ऐसे में ध्यान का क्या लाभ मिलने वाला है. सुबह-सवेरे ही गुरू माँ ने कहा, गलती करो मगर होश से, तो थोड़ी सांत्वना मिली है क्योंकि पूरे वक्त उसे यह पता था कि जो हो रहा है वह ठीक नहीं है यानि होश तो था, अब आगे ऐसी भूल नहीं होगी. कल शाम भजन संध्या में गयी अच्छा अनुभव था. नाम संकीर्तन के द्वारा भी उससे जुड़ा जा सकता है, कृष्ण हृदयों से राग-द्वेष निकाल देते हैं, जब उसका नाम जिह्वा पर नृत्य करता है. असत संग का त्याग करना है, जो भी लक्ष्य से दूर ले जाये वही असत है. कल दोपहर को एक नया अनुभव हुआ बाथरूम में कपड़ों का ढेर उसके देखते-देखते एक निर्मल आभा से युक्त हो गया और एक बार तो हिलता हुआ भी प्रतीत हुआ. उसकी आँखों से कुछ अन्य तरंगें भी निकलने लगी हैं शायद. गुरूजी कहते हैं अनुभवों के पीछे नहीं जाना चाहिए.

आज ‘मृणाल ज्योति’ जाना है, बच्चों को योग सिखाने. मौसम सुहावना है, संगीत की कक्षा हुई. पिछले हफ्ते अभ्यास ठीक से नहीं कर पायी थी, ध्यान में ज्यादा वक्त चला गया, कई बार पुस्तक पढ़ते-पढ़ते ही भाव ध्यान घटने लगता था. ‘ध्यान’ अब एक स्वाभाविक कार्य लगता है जैसे यह उतना ही सामान्य हो जितना भोजन करना. अभी दोपहर के भोजन की थोड़ी सी भी तैयारी नहीं हुई है, नैनी टिंडे काटकर रख गयी है, जो जून कल लाये थे. कल ही वह ढेर सारे आम भी लाये थे. नन्हे को रात को देर तक पढने की आदत है. कई बार लाइट जलाकर ही सो जाता है सो जून ने उसके नॉवल वापस करने के लिए अपने आपस रख लिए थे, पर उसे यह बात नहीं भायी, बहुत नाराज हुआ और सुबह बिना बात किये ही स्कूल चला गया. वे भी कभी माँ से ऐसे ही नाराज हो जाते होंगे. स्कूल से वापस आने तक सब भूल चूका होगा. उन्होंने उसकी किताबें वापस भी रख दी हैं. जून अपने लिए एक तकिया लाये पर वह भी उन्हें अधिक माफिक नहीं आया. पिछले दिनों तकिये की वजह से उनकी गर्दन में दर्द हो गया था. परसों विभाग में उनका एक प्रेजेंटेशन था, अच्छा रहा. कल से वह रह-रह कर सिर के दायें भाग में कुछ सुरसुरी सी अनुभव कर रही है शायद ‘ध्यान’ की वजह से. ईश्वर उसके साथ है जो भी होगा या हो रहा है उनकी देख-रेख में ही हो रहा है !

जुलाई का प्रारम्भ ! मौसम बरसात का है, वर्ष रात को हो चुकी है, सभी कुछ साफ और धुला-धुला सा है. मन भी ईश्वर की भक्ति रूपी जल से धुलकर इस वक्त तो स्वच्छ  प्रतीत हो रहा है लेकिन कब, कैसे और क्यों और कहाँ इस पर मैल का छींटा लग जाता है, पता नहीं चलता, कब सिलवटें पड़ जाती हैं, पड़ने  के बाद तो लेकिन फौरन पता चल जाता है. एक पल भी नहीं लगता इसे निस्तेज होते हुए. .०००१ % भी यदि स्वच्छता घटे तो अहसास फौरन दिलाता है भीतर स्थित परमात्मा रूपी मित्र, वह तो हर क्षण सजग है न. बहुत बचा-बचा कर रखना पड़ता है, व्यर्थ की बातचीत नहीं, व्यर्थ का कुछ भी नहीं. आज सुबह दीदी का फोन आया, वे भांजियों के ब्याह की बात बता रही थीं. अगले डेढ़-दो वर्षों में दोनों की अथवा एक की तो शादी करने का वे इरादा रखते हैं. छोटे भांजे का दाखिला दिल्ली के एक कालेज में हो गया है. पर अभी वह चंडीगढ़ में बीटेक के दाखिले का इंतजार भी कर रहा है. कल शाम को सासु माँ व छोटी ननद की अस्वस्थता की खबर भी मिली. छोटी बहन इसी माह पूना जाने की उम्मीद रखती है. उस दिन चचेरे भाई का खत आया था, उसकी भाषा अच्छी है, विचार भी सधे हुए हैं पता नहीं क्यों उसने अपने शारीरिक रखरखाव पर ध्यान नहीं दिया, गरीबी को इसलिए अभिशाप कहते हैं. नन्हे की फिजिक्स की कोचिंग कल समाप्त हो गयी, अगले टीचर गणित आएंगे. वह अपने मन की करता है, आजाद ख्याल किशोर है. जून और वह दोनों ही उसे बहुत प्यार करते हैं और दो वर्ष वह उनके साथ रहेगा फिर तो पढ़ाई  के लिए उसे बाहर जाना है, हो सकता है तब उसे उनका टोकना याद आए कि वे उसके सुधार के लिए ही उसे सन्मार्ग पर लाने के लिए ही टोकते हैं ! आज दोपहर एक सखी और उसका पुत्र आ रहे हैं राखी बनवाने.