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Tuesday, April 7, 2026

अनंत से टक्कर - माइकल फ़िशमैन की किताब

  अनंत से टक्कर - माइकल फ़िशमैन की किताब 


आज मृणालज्योति में शिक्षक दिवस मनाया गया। एक शिक्षिका ने उनकी तरफ़ से उपहार ख़रीद कर बाँटे, तस्वीरें भेजी और शाम को एक अन्य शिक्षिका ने फ़ोन पर बात की।नूना के मन में  कितनी ही स्मृतियाँ सजीव हो उठीं। सुबह रामचंद शुक्ल का “कविता क्या है” निबंध सुना, कविता के बारे में कल रात को भी यू ट्यूब पर सुना था। सारे विचार और भाव गुनते-गुनते मन काव्यमय हो चुका था। दोपहर को एक लेख लिखा, काव्यालय में भेजा है, आगे हरि इच्छा! शाम को पापा जी से बात की, आत्मज्ञान पाने का ख़्याल वह संतों, महात्माओं के लिए छोड़ देना चाहते हैं, पर नूना को लगता है, ध्यान और समाधि का अभ्यास करना उनका काम है, शेष परमात्मा की कृपा! 


सुबह वे टहलने गये तो भीतर एक स्थिर तत्व की धारणा की। शरीर चल रहा था, पर भीतर कोई स्थिर था। बाद में प्राणायाम के बाद बाहर शोर था, भीतर मौन था। शाम को ध्यान के लिए बैठी तो मंत्रजाप के साथ अर्थ भी भासित हो रहा था। शाम को पापाजी को बताया, चेतना चारों ओर है, मन को उसकी ओर ट्यून करना है, अर्थात मन का सुर उसके साथ मिलाना है। दो दिन बाद यहाँ गणेश उत्सव आरम्भ हो रहा है, सुंदर पंडाल पहले ही लग गया है। एक दिन नैनी ने एक फ़ार्म हाउस में स्थापित गणपति को देखने को भी बुलाया है।


आज का दिन गणपति के नाम था, सुबह फार्म हाउस, दोपहर को पड़ोसी के यहाँ और शाम को सोसाइटी की सार्वजनिक पूजा में वे सम्मिलित हुए।ललिता सहस्रनाम का पाठ भी हुआ, कल दोपहर विष्णु सहस्रनाम का जाप है, पीत रंग के वस्त्र पहनकर जाना है, परसों हरे। 


आज ग्यारह सितम्बर की घटना को हुए बीस वर्ष हो गये, नूना को आर्ट ऑफ़ लिविंग कोर्स किए भी। गुरुजी ने आज मुरुगन मंजुल वाटिका का उद्घाटन किया।


आज गणेश पूजा का विसर्जन हो गया। उन्होंने शयन कक्ष के बाहर बने बड़े से छज्जे पर बैठकर एक ट्रैक्टर पर गणपति की सजी-धजी विशाल प्रतिमा को ले जाते हुए देखा।कुछ लोग नाच रहे थे, कुछ एक-दूसरे पर रंग लगा रहे थे, ढोल आदि बज रहे थे। 


आज छोटी ननद से एक परिचिता के बारे में बात हुई। इसी महीने कोर्ट में केस की अंतिम तारीख़ है, शायद तलाक़ का फ़ैसला हो जाये। परसों नूना से उसके पति ने बात की थी, कह रहा था, रिश्ते निभाना इतना सरल भी नहीं होता।पत्नी के ख़िलाफ़ तलाक़ का केस उसी ने दाखिल किया है और अब चाह रहा है, समझौता हो जाये, पर इसके लिए पहल भी ख़ुद नहीं करना चाहता। कोई और उसकी बात पत्नी को जाकर बताये और वह सब कुछ भुलाकर उसे माफ़ कर दे।कितना विचित्र है मानव का मन ! अपनी गलती देखना ही नहीं चाहता। अक्सर पति-पत्नी एक दूसरे से सदा परेशान रहते हैं। अब हर समय कोई किसी की जी-हजूरी तो नहीं कर सकता, हर आत्मा स्वतंत्र है। जीवन सभी को एक सा मिला है, ताली दोनों हाथ से बजती है। 

 

आज हिन्दी दिवस पर हिंदी भाषा पर पापाजी से चर्चा हुई, ध्यान के बारे में भी।सजगता ही ध्यान है, सजगता ही ज्ञान है, वही शांति है और वही प्रेम है। जब वह सजग होती है, भीतर एक शक्ति का अनुभव होता है। कल रात साढ़े ग्यारह बजे घर की सारी बत्तियाँ अपने आप जल गयीं, नींद खुल गई, फिर देर तक नहीं आयी। ऑटोमेशन में ही शायद कुछ गड़बड़ी हुई।


आज दोपहर वे कब्बन पार्क घूमने गये। यह पार्क १८७० में बनाया गया था, ३०० एकड़ में फैला है। वहाँ के राज्य पुस्तकालय के हिन्दी विभाग में कई किताबें देखीं। तेलगू कवि सी एन रेड्डी की किताब ‘कविता मेरी सांस’ की एक सुंदर कविता पढ़ी। डिजिटल फॉर्म में उसे यह पूरी किताब मिल गई है। 

आज मोदी जी का जन्मदिन है।नूना ने उनके लिए एक कविता लिखी। उन्होंने शंघाई में अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के सत्ता ग्रहण करने को मान्यता नहीं दी, बल्कि इसे ग़लत बताया है।उनके अनुसार यह समावेशी सरकार नहीं है। इंसानियत के नाते भारत फिर भी उनकी सहायता करना चाहता है। भांजी और भतीजी का जन्मदिन भी एक दिन पड़ता है, उनके लिए भी उसने कविताएँ लिखीं। आज सुबह नींद खुली तो एक स्वप्न में ड्राइवर एक गाड़ी को गोल-गोल घुमा रहा था, जैसे मन कल्पना के घोड़े दौड़ाता है, पर कहीं नहीं पहुँचता। वास्तव में आत्मा को कहीं पहुँचना ही नहीं है, थमकर ख़ुद को देखना भर है!  


कल सुबह वे एक पुराने मित्र के यहाँ गये थे, एक दिन व एक रात बिताकर आज लौट आये। कितनी ही पुरानी बातें की, उनका नया घर देखा और सोसाइटी में टहलते रहे। बातों-बातों में सखी ने कहा, वे लोग एक कमरे में सामान रखकर, घर किराए पर देकर असम चले जाएँगे, ऐसा विचार कर रहे हैं। 


सलारपुरिया सिलेस्टा का 

फ़्लैट नंबर चार सौ चार 

रहता है जहाँ दशकों पुराना 

एक मित्र परिवार 

घर जैसा मिला वहाँ आदर सत्कार 

अपनापन और सहज प्रेम प्यार 

झील किनारे बैठ कर 

गुजारी शाम 

लौटते पक्षियों को निहार 


आज नूना ने अमेजन से मँगवायी माइकल फ़िशमैन की पुस्तक ‘स्टमबलिंग इनटू इनफिनिटी’ पढ़नी आरम्भ की है। लेखक वर्षों से आर्ट ऑफ़ लिविंग से जुड़े रहे हैं ।उनकी आध्यात्मिक यात्रा व जीवन के संघर्ष के बारे में यह पुस्तक है। अवश्य ही उसे अच्छी लगेगी। पापा जी ने आज “एक ओंकार सतनाम…” का अर्थ बताया। शाम को आश्रम में स्वामी अलेक्ज़ेंडर मिले, वह “श्री श्री योग भाग-२”  सिखा रहे हैं। वर्षों पूर्व असम में वह उन्हें मिले थे और उनके साथ बेसिक कोर्स भी किया था।जून आज असोसिएशन की पहली मीटिंग में भी गये थे।


गुरुजी ने कुछ दिन पूर्व ‘मृत्यु’ पर कुछ प्रश्नों के उत्तर दिये थे, नूना को उन्हीं को आधार बनाकर एक लेख लिखना है। उसने सोचा, कल जून गाड़ी की सर्विसिंग के लिए जाएँगे, उस समय लिखेगी।रात को एक विचित्र स्वप्न देखा, कोई सामान ठीक कर रही है कि अचानक हाथ के ऊपर से छोटे-छोटे हाथी गुजरने लगते हैं, हल्के बैंगनी रंग के हाथी हैं, इतने स्पष्ट और सुंदर दिख रहे थे, उनके पैर व सूंड, सभी कुछ सुडौल थे, पर शीघ्र ही आँख खुल गई और जाना कि यह स्वप्न ही था। माइकल फ़िशमैन की किताब में कितने ही चमत्कारों का ज़िक्र है, गुरुजी के साथ जो भी जुड़ा है, उसके जीवन में चमत्कार होते ही रहते हैं। आज असोसिएशन की सभा उनके घर पर थी। 


आज पूरा दिन बहुत ही अलग बीता। कल रात स्वप्न में गुरुजी को देखा था, सुबह तो उसका असर था ही, शाम तक मन इतना हल्का हो गया, जैसे कोई पुराना बोझ उतर गया हो। यह बोझ भीतर था, इसका भी बोध नहीं था, यह जैसे अस्तित्त्व का भाग ही बन गया था, ह्रदय पर जैसे कोई चट्टान पड़ी थी, जो पहले हटी तो थी पर थोड़ा सा भाग वहीं रह गया था, उसे संभाल कर रखा हुआ था। भय, सहानुभूति पाने की आकांक्षा, स्वयं को पीड़ित समझने की भावना, और स्वयं के प्रति हुए अन्याय को सहेज कर रखने का प्रयास, अपने रोष को उचित ठहराने के तर्क ! इतना क्रोध तो स्वाभाविक है, आख़िर अपना भी तो कोई स्वाभिमान है, अपने को श्रेष्ठ मानने की भावना, ये सारे पत्थर ही थे, जो उस चट्टान को वहाँ रखे हुए थे। अच्छा है कि घर जाने से पहले यह बोध घटा है। मन हल्का है भीतर तक। स्वयं को पूरी तरह स्वीकार करने के बाद ही कोई इस जगत को पूरा स्वीकार कर पाता है। यह जगत परमात्मा की लीला है। हर पल यहाँ कितना कुछ घट रहा है। वह अनंत चैतन्य सब जानता है, क्योंकि जानने वाला वही है। मन सीमित है, बुद्धि एक पोखर के समान है, पर सागर विशाल है। उस विशाल के प्रति पूर्ण समर्पण ही मुक्त करता है। उसे अपने लिए कुछ नहीं करना है, उसी ने जन्म दिया है, वही कुशलक्षेम की रक्षा करेगा। आज की रात कितनी भिन्न होगी और स्वप्न कितने अनोखे ! आज वह भी असोसिएशन की मीटिंग में गई थी, जून को अध्यक्ष चुना गया है।     


  


Friday, March 29, 2019

रागी का पेय



कल दोपहर जून आ गये थे, बड़ी ननद ने आम व बर्फी भेजी है. सोनू ने सुंदर सी पोशाक तथा जून स्वयं ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ आश्रम से नीली योगा कुर्ती लाये हैं. आज बहुत दिनों के बाद चार पोस्ट्स लिखीं. काव्यालय पर उसकी एक कविता कल प्रकाशित होने जा रही है. वर्षों पूर्व उसने ऐसा चाहा था, वह स्वप्न अब पूर्ण होने को है. कल बातूनी सखी का फोन आया, वह एक नया ब्लॉग या या पेज शुरू करने जा रही है अपने विचार लिखने के लिए, जो अन्य महिलाओं को प्रेरित करें. उसने कोई नाम पूछा था अपने पेज के लिए. जून का गला खराब है, यात्रा में काफी थकान हुई, नींद भी पूरी नहीं हुई होगी, इस उम्र में अनियमितता होने पर सेहत तो बिगड़ेगी ही. आज उसने चाय के स्थान पर रागी का पेय बनाकर पीया. बहुत दिनों बाद गुरूजी को एक पत्र भी लिखा.

जानने की शक्ति ही ज्ञान है. परमात्मा ज्ञेय नहीं है, वह ज्ञान है. जब कोई कहे, उसने जान लिया, उसकी जानने की शक्ति समाप्त हो जाती है, इसलिए ब्रह्म अनंत है. उसे जान लिया है, ऐसा कहना ही मिथ्या है. ज्ञान ही व्यक्ति को जड़ सा बना देता है. आज नेट पर अचानक ही ‘शिव सूत्र’ पर गुरूजी के प्रवचन सुनने को मिल गये. एक ही चेतना विभिन्न योनियों में प्रकट हो रही है. हर योनि के प्रति आदर रखना भीतर चैतन्य की निशानी है. वे जब इस संसार के साथ एकत्व का अनुभव करते हैं तो अपने चैतन्य को अनुभव करना सम्भव होता है. देह के साथ जब एकत्व का अनुभव करते हैं तो उसी क्षण पार्थक्य का अनुभव होने लगता है. एक कोशिका से यह देह बनी है, इससे अधिक कलात्मक क्या हो सकता है. कला का सभी आदर करते हैं, यह संसार ईश्वर की एक कला है. जीवंत व्यक्ति ही दूसरों का सम्मान कर सकता है. फिर ज्ञान का बंधन छूट जाता है !

आज सुबह देर तक परमात्मा से भीतर वार्तालाप हुआ. वर्षों पहले का एक वाक्य उभर कर आया और फिर उसे एक गहरे कुँए में धकेल दिया गया, जिसका कोई अंत नहीं था, जिसकी कोई तली नहीं थी, वह कुआं अँधेरा था पर उसकी दीवारें और गोलाई अभी भी स्पष्ट है. अहंकार के प्रतीक वे शब्द वर्षों पूर्व जून के लिए कहे गये थे. कल जब वे फिल्म देखकर आये और दीदी ने फोन पर कहा, आप लोग तो सदा समय का पालन करते हैं. जो शब्द उसने कहे, कि जून को फिल्म अच्छी लगी, वही कारण हैं इस देरी का, तो इसमें भी कहीं अहंकार छिपा हुआ था. स्वयं को विशेष मानकर अन्य को वे स्वयं से कम आंकते हैं, यही तो अहंकार है. फिर भीतर से आवाज उठी, काम समाप्त हो गया ? जिस कार्य की पूर्ति के लिए वह साधना के क्षेत्र में आई थी, वह पूर्ण हो गया. अब समझ में आ रहा है, परमात्मा की राह पर जब वे चलते हैं तो उनका एक हिडन एजेंडा भी होता है. वे स्वास्थ्य, सुन्दरता, यश की कामना से अध्यात्म के क्षेत्र में आते हैं. परमात्मा ही जिसका लक्ष्य हो ऐसे बिरले ही होते हैं. कल से ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ का बेसिक कोर्स आरम्भ हो रहा है. कम से कम पन्द्रह और अधिक से अधिक बीस महिलाएं प्रतिभागिनी हो जायेंगी.

Friday, September 15, 2017

फूलों पर श्वेत तितली


रात्रि के आठ बजे हैं, अभी-अभी वे बाहर टहल कर आये हैं. गेट के दोनों ओर लगे श्वेत और गुलाबी कंचन के वृक्ष फूलों से भर गये हैं. ठंडी बयार बह रही थी. सुबह का भ्रमण भी सुखद था. मार्च का प्रथम दिन है आज, धूप में अब तेजी आ गयी है. दोपहर को बच्चों को अभ्यास कराया, ध्यान करते हुए वे कितने शांत लग रहे थे, कुछ पल पहले शोर मचाते हुए जो दौड़ रहे थे, कुछ ही पलों में स्थिरता को अनुभव करने लगे थे. उड़िया सखी आयी तो उसे शील, समाधि, प्रज्ञा के बारे में बताया. आठ मार्च को महिला दिवस के अवसर पर गुरूजी ने कुछ विशेष कार्यक्रम करने को कहा है. वह आस-पास की महिलाओं को बुलाकर कुछ बताएगी. आज प्रधान मंत्री को NASCOM के रजत जयंती कार्यक्रम में बोलते सुना, अच्छा लगा. कश्मीर में बीजेपी और पीडीपी की संयुक्त सरकार बन रही है, यह भी एक बड़ी सफलता है.

एक शुद्ध, बुद्ध, मुक्त चेतना इस देह में रहकर इन्द्रियों द्वारा इस प्रकृति का अनुभव प्राप्त करती है. मन के द्वारा मनन करती है, बुद्धि के द्वारा निर्णय लेती है तथा अहंकार के द्वारा क्रिया करती हुई प्रतीत होती है. जबकि उसका स्वभाव मात्र जानने का है, वह ज्ञाता व द्रष्टा मात्र है. देह स्वभाव के अनुसार कार्य करती है, मन स्वभाव के कारण कभी भूत कभी भविष्य में जाता है. बुद्धि स्वभाव के अनुसार घटनाओं को परखती है, वह आत्मा इन सबको देखती है, वह शुद्ध चेतना भीतर है जो प्रतिपल इन सबको देखती है, तथा वह अपने में पूर्ण है और प्रतिक्षण संतुष्ट है. मन द्वारा कार्य किये जाने पर तथा बार-बार उसे दोहराए जाने पर जो संस्कार अंतर्मन पर पड़ गये हैं, उन्हें भी उभरने पर वह साक्षी भाव से देखती है. आँखों के द्वारा इस सुंदर सृष्टि को निहारना, स्वयं के भीतर ही अद्भुत नाद को सुनना उसे भाता है. स्वयं के अनंत स्वरूप में गहरे उतरते चले जाना और कोई बाधा, कोई अवरोध न पाना भी ! परमात्मा का विभिन्न रूपों में प्रकट होना भी ! आज स्कूल में छोटे बच्चों की योग कक्षा लेते समय एक तितली आयी और एक बच्चे के सिर पर  मंडराने लगी, बड़े बच्चों की कक्षा में एक तितली घायल अवस्था में पड़ी दिखी. पिछली बार उसके मन में पुराने किसी संस्कार के जगने पर हिंसा का विचार आया था. परमात्मा के मार्ग विचित्र हैं. वह रहस्यमय तो है ही, प्रकट होकर भी वह अप्रकट है ! आज एक परिचिता के साथ मृणाल ज्योति भी गयी, जिसके दिव्यांग भाई की वर्षों पहले मृत्यु हो गयी थी, उसके जन्मदिन पर दिव्यांग बच्चों के लिए खाने-पीने का कुछ सामान ले गयी थी वह. जून आज सुबह से ही व्यस्त हैं, ओएनजीसी से कुछ लोग आये हैं.

रात्रि के साढ़े आठ बजे हैं. तेज वर्षा हो रही है. बादल सुबह भी थे जब वह पैदल चलकर बुजुर्ग आंटी से मिलने गयी. वह बिस्तर पर बैठकर किताब पढ़ रही थीं, खुश हुईं देखकर. अपनी सेविका की बहुत शिकायत कर रही थीं, जैसे कि अक्सर कुछ वृद्ध व्यक्ति शिकायत करना अपना स्वभाव ही बना लेते हैं. अगले हफ्ते वे गुरूपूजा रखवा रहे हैं. कितनी कृपा है गुरू की उन पर. जीवन का सही अर्थ उन्होंने ही बताया है. धरा पर यदि कोई जागा हुआ न हो तो इसकी रौनक कोई देख ही न पाए उस तरह जिस तरह ये वास्तव में हैं ! जो दिखाई नहीं देता वह उससे ज्यादा सुंदर है जो दिखाई देता है...परमात्मा सदा ही किसी न किसी रूप में धरा पर मौजूद रहता है. वैसे तो वही है हर रूप में..पर इस बात को समझने के लिए जो सूक्ष्म दृष्टि चाहिए वह तो गुरू ही देता है ! आज शाम उन्हें गुलाब जामुन बनाने हैं, कल होली है, वे न भी खेलें तो कोई अतिथि घर आये, उसके स्वागत के लिए कुछ मीठा तो होना ही चाहिए. मौसम आज भी अच्छा है. ठंडी सी सुहावनी हवा बह रही है, एक श्वेत तितली फूलों पर मंडरा रही है, उड़ती हुई तितली कितनी मोहक लगती है ! बड़ी भाभी का स्वास्थ्य अब ठीक हो रहा है, कमजोरी बहुत है ऐसा बड़े भाई ने बताया. उसने मन ही मन प्रार्थना की, ईश्वर उन्हें शीघ्र स्वस्थ करे ! कल शाम को आठ महिलाओं को विपासना के बारे में बताया, शील, समाधि व प्रज्ञा के बारे में भी बताया. उन्हें अच्छा लगा, अगले महीने फिर आने को कहा है. कल पुस्तकालय से तीन किताबें लायी. वी. एस. नायपाल की आत्मकथा, डा. मनमोहन सिंह पर एक पुस्तक तथा आर के नारायण की पुराणों से संबंधित एक पुस्तक. तीनों पुस्तकें यकीनन अच्छी होंगी. परमात्मा रह-रह कर किसी न किसी इशारे से अपनी याद दिला देता है ! यदि कुछ देर तक उसका स्मरण न आये तो...    

Wednesday, July 5, 2017

बच्चों के योगआसन


आज होली है, वे द्रष्टा बने हुए हैं. उन्हें तो होली हंस बनना है. कंकर-पत्थर को नहीं चुनना है. रतन को चुनना है, ज्ञान रतन है, मन को इन रतनों से भरना है. जीवन में फिर इनका उपयोग करना है. उनका कोई भी कृत्य बिना फल दिए नहीं जाता. स्वयं सुनना है और स्वयं को सुनाना भी है, सुनकर ही वे स्वयं को बदल सकते हैं, जो स्वयं को समझा सकता है वही अन्यों को भी समझा सकता है. जो भी लिखने में आता है, वह स्वप्न जैसा है और जो सत्य है वह लिखने में नहीं आ सकता. पवित्रता, दिव्यता और सत्यता परमात्मा के गुण हैं, उनको धारण करके ही उन्हें काम करना है. मन पवित्र हो, बुद्धि, दिव्य हो और आत्मा सत्य हो तभी वे परमात्मा को स्वयं के द्वारा प्रकट होने दे सकने में सक्षम होंगे. आज एओल के दो टीचर (पति-पत्नी) आये थे, कल से बच्चों का कोर्स होगा. अगले तीन दिन शामें व्यस्त रहेंगी. आज सम्भवतः इस वर्ष की हिंदी की अंतिम कक्षा हुई, अब कुछ दिनों तक तो वह दोपहर को अपना अन्य कार्य कर सकती है.  

 आज स्कूल में प्रिंसिपल ने कहा, वार्षिक उत्सव के लिए बच्चों का योग का भी एक कार्यक्रम तैयार करना है. अगले हफ्ते से कक्षा एक से छोटे बच्चों को भी योग सिखाना है, उन्हें एनिमल पोज तथा उनकी चाल सिखाना ठीक रहेगा. उसके बाद असेम्बली कन्डक्ट करनी है. उसने सोचा है, शुरुआत श्लोक से करेगी फिर धर्म सम्बन्धित कुछ जानकारी, उसके बाद योग अंत में राष्ट्रीय गान. कुछ देर बाद जून आने वाले हैं, बाद में उसे श्री श्री योगा कोर्स में भी जाना है. पिछले तीन दिनों का अनुभव अच्छा रहा, कितना अच्छा उसे शब्दों में कहना कठिन है. देह के प्रति सजगता और बढ़ी है, मन के प्रति और स्वयं के प्रति भी. एक स्थिरता का अनुभव हो रहा है. अस्तित्त्व उसके साथ हर पल है. हर जगह, हर श्वास में, हर धड़कन में, वही साक्षी है, वही दृष्टा है, वही अनुमन्ता है, भोक्ता है, अर्थात मन, बुद्धि तथा देह आदि उसी के लिए हैं. उनकी इन्द्रियों के भोग की सीमा है पर माँग अनंत है, अनंत की चाह अनंत से ही मिट सकती है.

आज कोर्स का अंतिम दिन था. एक अनोखा अनुभव हुआ. शाम्भवी मुद्रा करते समय आज्ञा चक्र पर, सुंदर दृश्य दिखे, चमकदार रंग और फूल जैसी आकृति फिर अचानक ही तन में विभिन्न गतियाँ होने लगीं. कभी आगे-पीछे, कभी दायें-बांये फिर गोल-गोल तेजी से घूमने लगा. सारी आवाजें जैसे कहीं दूर घट रही हों. काफी देर तक बैठ रही, फिर एक ऐसा विचार आया जिससे सारा ध्यान टूट गया, कपड़े धोने का विचार. फिर आँख स्वतः ही खुल गयी. कोर्स के टीचर को उसने ‘श्रद्धा सुमन’ पुस्तिका की एक प्रति भेंट की है, वह अवश्य पढ़ेंगे. आज बंगाली सखी अपने बेटी के विवाह का कार्ड देने आयी.


Wednesday, March 8, 2017

तारों भरा आकाश


जीवन स्वप्न है, वे रात में जो स्वप्न देखते हैं उनके अलावा दिन भर में न जाने कितने स्वप्न देखते हैं, जिनका कोई आधार नहीं. कल रात उसके जीवन की अभूतपूर्व रात्रि थी. भगवद गीता के चार अध्याय पढकर सोयी थी. तारों भरा आकाश दिखा, चन्द्रमा दिखा और न जाने कितने दृश्य दिखे, लेकिन जगते हुए, वह जागरण भी और था, वह निद्रा भी और थी. कब सुबह हो गयी पता ही नहीं चला. सुबह से कई बार स्वयं को स्वप्न देखते हुए जगा चुकी है. उनका सारा जीवन एक लम्बा स्वप्न ही तो है, अब लगता है परम लक्ष्य भी इसी जन्म में मिलेगा. परमात्मा उसे कदम-कदम आगे बढ़ा रहे हैं और किस तरह उसे एकांत का अवसर भी मिल रहा है. परिचित एक-एक कर जा रहे हैं, समय बचता है साधना के लिए पूर्ण सुविधा होती जा रही है. इस बार तो नेट भी नहीं चला सो काफी समय उसके कारण भी बच गया. परसों जून आने वाले हैं, अभी दो रात्रियाँ हैं जिनमें उसे और गहरे अनुभव हो सकते हैं. कल एक सखी का जन्मदिन है, उसने उसकी साधना में अपरोक्ष रूप से बहुत सहायता की है. मानस के छह रिपुओं में काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर को दूर करने के लिए उन्हें पहले देखना आवश्यक था, उन्हें अपने भीतर वह देख पायी, वह उसका आईना बनी. इसके लिए उसका कृतज्ञ होना ही चाहिए. सद्गुरू जैसे उसके सद्गुणों के लिए आईना बने. उनके जीवन में घटने वाली हर छोटी-बड़ी घटना उनके जीवन को गढ़ती है. हर क्षण वह परमपिता उनके साथ है.  क्या नहीं कर सकता वह, अचिन्त्य है, अनुपम है, अनोखा है...उसे कोटि कोटि प्रणाम  !

कल रात भी अनोखी थी. कृष्ण का श्लोक अब स्पष्ट हो रहा है कि योगी तब जगता है जब अन्य सोते हैं. आज सुबह से उसे उसका चेहरा कुछ बदला-बदला लग रहा है. मृणाल ज्योति की प्रिंसिपल को भी लगा होगा जब शाम को उन्होंने कहा वह उससे योग सीखना चाहती हैं और आज ही आएँगी. हवाओं को भी खबर लग जाती है कि कहीं कोई फूल खिला है. सद्गुरू को भी खबर लग गयी होगी, उन्हें तो वर्षों पहले ही लग गयी थी. कितना अद्भुत है सब कुछ. कितना अनोखा है परमात्मा !

नन्हा सा पल खो न जाये
पागल मन यह सो न जाये
इस पल में ही राज छुपा है
जाग गया जो मिला खुदा है
सपनों की कुछ धूल छा गयी
स्वर्णिम रवि न पड़े दिखाई
आशाओं के पत्थर थे कुछ
कोमल पुहुप लता कुम्हलाई

उनके भीतर अनंत आकाश है, अनंत ऊँचाई है और अनंत गहराई है. अनोखे अनुभव हो रहे हैं उसे आजकल. जब कोई भीतर की यात्रा पर निकलता है तो सारी कुदरत उसका साथ देती है. कितना पावन होता है वह क्षण जब किसी के भीतर परम की प्यास जगती है. पहला अनुभव तो सम्भवतः उसी की कृपा से होता है, लेकिन उस अनुभव तक भी भीतर की कोई गहरी आकांक्षा होती है. भीतर तो वही है तो वही निकलता है स्वयं की खोज पर...आकाश में सब घटता है पर कुछ भी नहीं घटता. आकाश एक है, झोंपड़ी का हो या महल का, अरूप एक है रूपवान का हो या कुरूप का. नजर दीवारों पर हो तो भेद नजर आएगा, नजर भीतर के आकाश पर हो तो अभेद ही है..
घाटियों में बसे हैं लोग
बारिशों से डरे हैं लोग
बिजलियों की चमक
भर से कांपते हैं लोग !


आज उससे कविता नहीं बन रही है, लगता है अब परमात्मा उससे कुछ और काम कराना चाहता है. पहले कैसे झर-झर शब्द बहते थे, अब भीतर मौन है, अब शब्दों की क्या जरूरत अब तो मन की धारणा काफी है. अब न कुछ सिद्ध करना है न कुछ पाना है जो पाने वाला था वह खो गया और जिसे सिद्ध करना था वह माया सिद्द्ध हो गया था. भीतर का भय भी नष्ट हुआ, श्वास का कंपन गया, अकंप हृदय चाहिए तो भाव काफी है. सामने वाला चाहे समझे न समझे भीतर तो पता चल ही गया कि कंपन हो गया क्रोध की हल्की सी रेखा भी यदि छा गयी, भीतर पता चल ही जाता है, ईर्ष्या की धूमिल पंक्ति भी पता देती है, शील आवश्यक है और तब भीतर ही सब मिल जाता है, असली कवि स्वयं ही कविता हो जाता है ! 

Friday, April 8, 2016

फूलों की घाटी


आज उसने अपने तीन ढीले-ढाले किन्तु सुंदर लिबास एक परिचिता दर्जिनी को दिए, वर्षों से उन्हें ऐसे ही पहनती आ रही थी, उसने कहा है, उन्हें उसके नाप का बना देगी. मौसम आज भी भीगा-भीगा है, एक बादलों भरा दिन ! कल अवकाश था, शाम को वे क्लब गये एक हास्य फिल्म दिखाई गयी. एक जगह साधना सत्र में ‘क्रिया’ करायी जानी थी, पर उसने जाने की जिद नहीं की, अब कोई आग्रह नहीं रह गया है, जून जाना नहीं चाहते सो वे दोनों वही करेंगे जो दोनों को पसंद है, ताकि अमन बना रहे. ‘क्रिया’ का अंतिम उद्देश्य भी तो अमन ही है न. फिर प्रेम करने का दम भरने वाले जिसे प्रेम करते हैं उसके लिए अपनी इच्छाओं का त्याग ही करना जानते हैं. ‘क्रिया’ से कुछ पाना भी शेष नहीं रहा, अपनी आत्मा व परमात्मा को जिसने एक बार एक जान लिया अब उसके लिए जगत में पाने योग्य कुछ शेष नहीं रहता, जिसे अमृत मिल गया अब वह और क्या चाहेगा. अगले महीने जून को दस दिनों के लिए बाहर जाना है, तब सम्भव हुआ तो कहीं भी जा सकती है, आर्ट ऑफ़ लिविंग, मृणाल ज्योति तथा अन्य किसी सेवा कार्य के लिए ! कल आचार्य राम की गोमुख यात्रा का विवरण पढ़ा, बहुत अच्छा लगा. वे भी कभी जायेंगे पहाड़ी यात्रा पर, फूलों की घाटी, बद्रीनाथ, केदारनाथ और धौला ! यह इच्छा भी वह अनंत को समर्पित करती है, वह चाहेगा तो फलीभूत होगी. ईश्वर हर क्षण उसका सहायक है, वह उसका मित्र है !

सत्संग एक साधक के लिए अमृत के समान है. आचार्य श्री का संग किया तो उसे भी कोई देवदूत मिल गया है. ध्यान में कितना अभूतपूर्व अनुभव घटा, जैसे कोई प्रेम से भिगो गया हो. एक मूर्ति क्षण भर में कितना-कितना स्नेह लुटा गयी, वह कोई दिव्य आत्मा थी शायद. सुबह प्राणायाम के बाद भी आज्ञा चक्र पर एक सुंदर विग्रह के दर्शन हुए. सूर्यदेव की कोई भव्य मूर्ति या कृष्ण..कोई उससे कुछ कहना चाहता है, वही परमात्मा है, वही इस जगत का नियंता है !


आज समय मिला है कि बैठकर अपने तथाकथित अधूरे रह गये कार्यों की एक सूची बनाये, ऐसे तो मानव के सारे कार्य कभी पूर्ण नहीं हो सकते, मृत्यु की घड़ी आ गयी हो फिर भी लगता है कुछ छूट गया है. सबसे पहले बात पत्रों की, दो पाठकों के पत्र आये थे, जिनका जवाब देना है. एक पत्र गुरु माँ को भी लिखना है भावांजलि भेजते हुए. कविताएँ टाइप करनी हैं, किताबों की आलमारी साफ करनी है नये कमरे की. लाइब्रेरी की किताब बदलनी है, कविगोष्ठी के आयोजन के बार में विचार करना है. आज कविताएँ पढ़ीं दिनकर की और भी कुछ कवियों की, अज्ञेय की भी. सभी के शब्दों के पीछे एक सवाल छिपा है, सभी को परम सत्य की तलाश है, उस परम सत्य की जो उन्हें झलक दिखाकर छिप गया है, जैसे कोई लुभाकर कुछ छिपा ले. कवि होना ही एक खोज होना है, भीतर एक हीरा होने का पता तो जिसे चल जाये पर वह हाथ नहीं आये. कवि न समाज का अंग रह पाता है जैसे और लोग रहते हैं, मात्र यांत्रिक जीवन जीने वाले और न ही वह संत की सी तृप्ति का अनुभव कर पाता है, वह इन दोनों के मध्य में रहता है, एक मधुर प्यास लिए, वह आनन्द के चरम को भी अनुभव करता है तो पीड़ा के गह्वर में भी उतरता है.