Thursday, August 31, 2017

गुजरात का रण


कल दोपहर से ही रात को आने वाले मेहमानों के लिए भोजन बनाने में व्यस्त थी. शाम को जून जब घर आये तो बताया कि घर में किसी की मृत्यु हो जाने के कारण वे लोग आज नहीं आ रहे हैं. कहते हैं न दाने-दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम, फोन करके एक अन्य मित्र परिवार को बुलाया, जिन्हें भोजन बहुत पसंद आया. आज दोपहर उसने आंवले का मुरब्बा और अचार दोनों बनाये. मुरब्बे की तैयारी कई दिन से चल रही थी. आगामी यात्रा के लिए सामान बांधा. कल माँ की तीसरी बरसी है, वे बच्चों को भोजन करायेंगे. नन्हा आज गुजरात गया है. सुबह से ही वह अनजान लोगों के मध्य घूम रहा है और भोजन आदि भी उसे मिल रहा है. वह ड्राइवर के परिवार से भी मिला, इस समय ‘भुज’ में है, कल ‘रण’ जायेगा.

आज का दिन काफी अलग रहा. सुबह उठने से पूर्व नींद में जाने का अनुभव किया, फिर मन की गहराई में जाकर असत्य बोलने के संस्कार पर काम किया. वहाँ जैसे परमात्मा स्वयं आकर सिखा रहे थे. उठकर साधना की. फिर माँ की स्मृति में प्रसाद बनाया. मृणाल ज्योति भी ले गयी. इस संस्था का नाम कैसे पड़ा, इसकी जानकारी भी आज हुई. जिन दम्पत्ति ने यह स्कूल खोला है, उनकी पहली सन्तान साढ़े तीन वर्ष का पुत्र मृणाल ज्योति अपने ही स्कूल की बस से सडक पार करते समय टकरा गया, और उसकी मृत्यु हो गयी. इसी दुःख में उनकी पुत्री, दूसरी सन्तान जन्म से ही विशेष जन्मी. उसकी शिक्षा के लिए जब कोई स्कूल नहीं मिला तो उन्होंने ऐसे बच्चों के लिए अपने पुत्र की याद में यह स्कूल खोला जो आज सौ से अधिक विशेष बच्चों को शिक्षा व इलाज का अवसर दे रहा है. आज स्कूल में शिलांग से किसी स्वयं सेवी संस्था की एक कार्यकत्री आयीं थी. जो महिलाओं के अधिकारों पर काम कर रही हैं. उनसे अच्छी बातचीत हुई. शाम को ह्यूस्टन वाली महिला अपनी भांजी के साथ आयीं. यात्रा की तैयारी हो गयी है. कल इस समय वे कोलकाता में होंगे. दो हफ्ते बाद लौटेंगे.


आज दोपहर साढ़े बारह बजे घर से चले. हवाई यात्रा ठीक रही सिवाय इसके कि हाथ के बैग में छाता रखा था, हवाईअड्डे पर खोल कर दिखाना पड़ा. सुबह अलार्म बजने से पूर्व ही किसी ने उठा दिया. उससे भी पहले सुंदर रंगीन बड़ी-बड़ी तितलियों को देखा, उनके रंग कितने शोख थे और उनका आकर भी बहुत बड़ा था. उठकर ध्यान किया कुछ देर फिर प्राणायाम. माली आदि सभी को निर्देश दिए, अगले दो हफ्ते उन्हें ही घर-बगीचे की देखभाल करनी है. कृष्ण ने कहा है, जो उसकी शरण में जाता है, उसे वह बुद्धियोग प्रदान करते हैं. आज बताया कि कर्ताभाव से मुक्त होकर रहने में ही बंधन कट जाते हैं. पहले कितनी ही बार यह बात पढ़ी है, सुनी है, लिखी है, पर भीतर के गुरू ने बताया और बात समझ में आ गयी. वे जो अहंकार को मिटाना चाहते हैं, कर्ता बनकर उसे बढ़ा देते हैं. शाम के सात बजे हैं. वे लोग आईआईएम कोलकाता में हैं. यह कैम्पस काफी विशाल है, अँधेरे में कुछ ठीक से नहीं देख पाए पर झील व वृक्षों की कतारें अवश्य ही मनमोहक होंगी. कल सुबह वे जल्दी उठकर भ्रमण के लिए जायेंगे और फोटोग्राफी भी करेंगे.

Monday, August 28, 2017

मोदी की कहानी


आजकल वह Andy Marino की नरेंद्र मोदी जी पर लिखी किताब पढ़ रही है. किताब बहुत रोचक है. मोदीजी की कर्मठता और नये-नये विचारों को अपनाने का गुण बहुत अच्छा है. वह हर काम को नये अंदाज में करना चाहते हैं. आज ब्लॉग पर नयी कविता पोस्ट की, ‘मन की बात’ पर. भारत और अमेरिका को ऐसे नेता मिले हैं जो राजनीतिज्ञ कम देशभक्त ज्यादा हैं. किसी व्यक्ति के बारे में बिना सच जाने कितनी गलत बातें फैलायी जा सकती हैं, पर सच एक न एक दिन उजागर हो ही जाता है. दिल्ली का चुनाव उनके लिए एक चुनौती है.

रात्रि के साढ़े नौ बजे हैं, जून के दफ्तर में आज ऑडिटर आये थे, उनका डिनर क्लब में है. कल दोपहर लंच भी बाहर ही होगा. कल रात देर तक सजगता बनी रही. नींद के लिए तमोगुण चाहिए. सुबह व्यायाम करने से पहले तन में अलस लग रहा था, पर बाद में तन-मन दोनों हल्के हो गये. आज शाम को वे एक वृद्ध महिला के घर गये, जिनकी बहन ह्यूस्टन से आयी हुई हैं, वर्षों पहले वे जब अमेरिका गये थे, उनके घर भी गये थे. उसने सोचा उस समय लिखा हुआ अपना लेख उन्हें दिखाएगी, पर वह नहीं मिला. इसी तरह बोस्टन की यात्रा पर लिखा संस्मरण भी अवश्य कहीं तो होगा.

कल क्लब में मीटिंग थी, जहाँ BMI तथा BMR अदि टेस्ट करवाया. एक महिला अपने साथ सारे उपकरण लेकर आई थीं, सभी को उनकी रिपोर्ट के आधार पर भोजन आदि में बदलाव करने की सलाह भी दी. कल रात को ओले गिरे, समाने वाला बरामदा सफेद छोटे-छोटे दूधिया ओलों से भर गया था. जून दोपहर को दो बजे घर आये, ऑडिटर चले गये हैं, अभी भी कुछ काम शेष है. नन्हे से होली पर घर आने को कहा है. आज सुबह किशोर कुमार के कई अच्छे गीत सुने, फिर जगजीत सिंह की गजलें. संगीत दिल को गहराई तक छू जाता है.

फरवरी का प्रथम दिन ! आज मौसम खिला रहा दिन भर ! सुबह आकाश विभिन्न रंगों से आच्छादित था, हवा में फूलों की सुवास. आज फलाहार का दिन था, पर दिन भर के हल्के भोजन के पश्चात शाम के लिए जून ने कोटू के आटे का हलवा बना दिया जब वह बच्चों की संडे क्लास में गयी थी. आज वह गुलदाउदी का एक पौधा लायी बाजार से !

जून आज जोरहाट गये हैं, कल लौटेंगे. सुबह उसने पोहा-मटर का नाश्ता बनाया. दोपहर के भोजन में देह के लिए ज्वार की रोटी बनायी. आत्मा के भोजन के लिए प्रवचन सुने. विवेकानन्द की जीवनी पढ़ी. मन की तृप्ति के लिए ब्लॉग पर पोस्ट लिखीं. आज तेज चलने का अभ्यास अभी तक नहीं हुआ है, क्लब में होने वाली मीटिंग के लिए जाने में कुछ अभ्यास तो हो ही जायेगा और ‘फिटबिट’ के अनुसार आज का कोटा पूरा हो जायेगा. 

Friday, August 25, 2017

नामफाके की पिकनिक


आज सुबह पौने सात बजे ही वे पिकनिक के लिए निकल पड़े थे, ‘नामफाके’ नामक स्थान पर जो यहाँ से बीस किमी दूर है, लगभग पचास लोग इक्कठे हुए. बहुत आनंद मनाया, पानी में उतरे, खेल खेले, अच्छा नाश्ता व भोजन किया, फिर कुछ लोगों द्वारा किया गया बीहू नृत्य देखा. कुल मिलाकर पिकनिक अच्छी रही. शाम को साढ़े तीन बजे घर लौटे, यानि कुल साढ़े छह घंटे वहाँ बिताये और शेष यात्रा में, तैयारी में जो समय गया वह अलग है. जून ने कल दोपहर को खीर बना दी थी, और शाम को तैयारी करके उसने सुबह सबके लिए उपमा बनायी, सभी को पसंद आयी. पिकनिक के मुक्त वातावरण में तन व मन दोनों ही हल्के हो जाते हैं.  

इस वर्ष की कम्पनी की डायरी का रंग अच्छा है. आज ही मिली है हरी-भरी यह डायरी. कल की पिकनिक की तारीफ आज भी हुई, फोटो भी अच्छे आये हैं. बड़ी भांजी के विवाह की वर्षगांठ है, दस वर्ष हो गये उसके विवाह को. नन्हा आज वापस बंगलुरू जा रहा है, इस समय शायद फ्लाईट में होगा. जून कल दिल्ली जा रहे हैं. सुबह सद्गुरू को सुना, अब उनकी बात उसे सीधे वहाँ तक ले जाती है, जहाँ वे उन्हें ले जाना चाहते हैं. जीवन एक यात्रा ही तो है सभी कहीं न कहीं जा रहे हैं,

रात्रि के सवा नौ बजे हैं. दूर कहीं से गाने की आवाजें आ रही हैं, उसकी आँखों में नींद का नाम भी नहीं है. आज सुबह गुरू पूजा और रूद्र पूजा में सम्मिलित होने का अवसर मिला. मौसम अब ज्यादा ठंडा नहीं रह गया है, परसों वसंत पंचमी है अर्थात वसंत भी आरम्भ हो चुका है. आज दोपहर वह बुजुर्ग आंटी से मिलने गयी, उसे देखकर वह सदा की तरह प्रसन्न हुईं, उसे भी उनसे मिलकर अच्छा लगता है. इस उम्र में भी उन्हें अपने वस्त्रों का बहुत ध्यान रहता है, साफ-सुथरे मैचिंग वस्त्र पहनती हैं, बंगाली उपन्यास पढ़ती हैं. शाम को बगीचे में टहलते हुए ओशो की किताब पढ़ी, सारे सदगुरुओं का स्वाद एक सा होता है. अभी कुछ देर पहले उसने कितने ही पन्ने कविताओं से भर डाले हैं..कृपा हुई है ऐसी कि इसकी कोई मिसाल नहीं दी जा सकती. जो कलम दो शब्द नहीं लिख रही थी पिछले कई दिनों से, आज मुखर हो गयी है. बसंत का मौसम जैसे भीतर उतर आया है. परमात्मा की कृपा अनंत है, वह नजर नहीं आता पर अपनी मौजूदगी जाहिर कर देता है. वह यहीं है आसपास ही ! 

जून आज वापस आ गये हैं, ढेर सारा सामान लाये हैं, अमरूद, रसभरी और बेर भी.. और शायद भारी सामान उठाने के कारण ही उनकी कमर का दर्द भी. कल रविवार है, विश्राम उन्हें स्वस्थ कर देगा. आज उनकी लायी विशेष सब्जी बनानी है, शलजम तथा भिस. बगीचे से भी ढेर सारी सब्जियां तोड़ीं. टीवी पर शशि पांडे की बातचीत सुनी, उनकी कोई किताब उसने पढ़ी तो नहीं है, मौका मिलने पर पढ़ेगी.

आज बच्चों को उसने ‘सरस्वती पूजा’ और ‘गणतन्त्र दिवस’ पर प्रश्नोत्तरी करवाई. आज छोटी बहन के विवाह की वर्षगांठ है और छोटी भांजी की बिटिया का जन्मदिन..और बराक ओबामा भारत आये हैं. सुबह से टीवी पर उन्हीं से जुड़े कार्यक्रम दिखाए जा रहे हैं. मोदीजी और ओबामा की मित्रता काफी गहरी होती जा रही है. भारत विकास की बुलंदियों को छुएगा. सजग नागरिक होने के नाते उन्हें भी इसके लिए कुछ करना होगा. फ़िलहाल तो कल सुबह ‘गणतन्त्र दिवस’ की परेड देखने जाना है. वापस आकर टीवी पर भी परेड देखनी है. ओबामा के आने से इस बार परेड कुछ विशेष लग रही है. शाम को एक मित्र परिवार को बुलाया है, वह दक्षिण भारतीय व्यंजन बनाएगी.



Thursday, August 24, 2017

परशुराम कुंड की यात्रा


अभी तक जून को नये वर्ष की डायरी नहीं मिली है, वह पुराने साल की डायरी के पीछे के नोट्स के पन्नों पर लिख रही है. मौसम ठंडा है, जनवरी के महीने में बादल छाये हैं नभ पर. कल क्लब का वार्षिकोत्सव था, वे गये थे दोपहर के लंच में. हर साल की तरह शाकाहारी टेबल पर उसकी ड्यूटी भी थी. भोज आरम्भ हुआ ही था कि वर्षा आरम्भ हो गयी, फिर सुरक्षित स्थान पर सब कुछ ले जाना पड़ा. चार बजे घर लौटे. शाम को प्रेस गयी, उसके लेख के साथ पुराना फोटो दिया गया था, उसने बदलवा दिया, यानि अब भी निज लाभ ही दृष्टि में है. यह कितना स्वाभाविक है न, ‘सहज रहो’ यही तो साधना का लक्ष्य है. कल जून ने दो-तीन समूह बना दिए हैं व्हाट्सएप पर, सामाजिक आदान-प्रदान का कितना अच्छा साधन है यह “व्हाट्सएप”.

पिछला सप्ताह व्यस्तताओं से घिरा था. आज ‘मकर संक्रांति’ है, अगले दो दिन जून का दफ्तर बंद है. लेडीज क्लब का कार्यक्रम अच्छी तरह सम्पन्न हो गया. उस दिन दोपहर को जैसे किसी ने उसे कहा, क्लब जाना चाहिए, जहाँ कई सदस्याएं काम में व्यस्त थीं, लगा जैसे वे उसका इंतजार ही कर रही थीं. वे रात्रि को एक बजे वापस आये. अगले दिन विवाह की वर्षगांठ थी, शाम को बाहर खुले में अग्नि जलाकर दो मित्र परिवारों के साथ यह दिन मनाया. उसके अगले दिन तबियत नासाज थी, शायद ठंड लग गयी थी. दो दिन विश्राम किया, अगले दिन वे अरुणाचल प्रदेश स्थित ‘परशुराम कुंड’ नामक एक तीर्थस्थल देखने गये, यह यात्रा एक सुखद स्मृति बनकर उनके अंतर में अंकित हो गयी है. वापसी में एक रात सर्किट हाउस में रुककर घर लौटे, जिसके अगले दिन क्लब में उन सभी सदस्याओं के लिए आभार प्रदर्शन के लिए भोज का आयोजन किया गया था, जिन्होंने कार्यक्रम में किसी न किसी तरह का काम किया था. उसके बाद मृणाल ज्योति में ‘बीहू’ मनाया गया और आज फिर जून ने बाहर लोहड़ी की आग जलाने का प्रबंध किया है.

आज बीहू का प्रथम अवकाश बीत गया. सुबह दही+गुड़+चिवड़ा का नाश्ता किया, जून ने ब्रोकोली की विशेष सब्जी भी बनाई थी. दोपहर को लॉन में धूप में बैठकर देर तक किताबें पढ़ीं, तथा मोबाईल से कई तस्वीरें व वीडियोज हटा दिए, ज्यादा कुछ संग्रह करके रखना अब नहीं भाता, मन भी खाली रहे और फोन भी. शाम होने  से कुछ पहले बैडमिंटन खेला फिर एक मित्र परिवार से मिलने गये. आज डिनर में मटर की भरवा तंदूरी रोटी बनानी है. सप्ताहांत में पहले दिन राजगढ़ जाना है और इतवार को पिकनिक. निकट स्थित एक इलाके ‘राजगढ़’ में मृणाल ज्योति की एक शाखा खुल रही है. इस इलाके में दिव्यांगों के लिए कोई स्कूल नहीं है, सर्वे करने पर पता चला, लगभग पचास बच्चे आस-पास के गांवों में हैं जिन्हें कोई शिक्षा या इलाज नहीं मिला है. कल वे लोग जायेंगे, राजगढ़ के पुलिस अधिकारी व आर्मी के मेजर को भी बुलाया है. अगले महीने कोलकाता जाना है, जून की ट्रेनिंग है पूरे दस दिन की, सो ‘विपासना कोर्स’ करने का उसका बहुत दिनों का स्वप्न पूरा हो जायेगा.


दूसरा अवकाश भी बीत गया. सुबह की साधना अब सहज ही होती है, परमात्मा ही करा रहा हो जैसे. आज एकादशी है, कुट्टू की रोटी व सागू की खिचड़ी खाने का दिन. नन्हा आज पिलानी में है, कल रांची में था, उसे अपनी कम्पनी के लिए नये लोग चाहिए. कैम्पस इंटरव्यू के लिए गया है. 

Tuesday, August 22, 2017

खजूर की मिठाई


शाम के सवा पांच बजे हैं. आज नये वर्ष का प्रथम दिन है. सुबह साढ़े पांच बजे नींद खुली, कल देर रात तक संगीत व पटाखों का शोर सुनाई देता रहा. नये वर्ष के स्वागत का भला यह कौन सा तरीका हुआ कि औरों की नींद खराब की जाए. आज दोपहर को विशेष भोज था, कुछ मित्र परिवारों के साथ, भिस की सब्जी बनाई, जो वे दिल्ली से लाये थे, यहाँ इसके बारे में कोई नहीं जानता. इसके अलावा हरे चने का चीला, बैंगन का भर्ता, पालक का सूप और खजूर की मिठाई जो जून ने बनाई. नये वर्ष  में मन नये उत्साह से भरा है. उसने मन ही मन कुछ संकल्प दोहराए. नये-नये स्थान  देखने हैं, सेवा के नये कार्य करने हैं तथा सभी को साथ लेकर चलना है. मृणाल ज्योति में ज्यादा समय बिताना है. हर हफ्ते दो दिन सत्संग तथा योग सिखाना है. इतवार का सेवा कार्य तो वैसे ही चलेगा. नियमित ध्यान तथा लेखन कार्य भी करना है. उसका कोई भी निर्णय दूसरों के लिए असुविधा का कारण न बने, प्रमाद रहित रहकर इसका भी ध्यान रखना है.

आकाश पर हल्के बादल हैं, मौसम ठंडा है.आज हिंदी की प्रूफ रीडिंग का कार्य हो गया. कल एक सदस्या के यहाँ उपहारों की पैकिंग का कार्य होगा. आज छोटी ननद व मंझले भाई का जन्मदिन है, दोनों से बात की. नन्हे ने नये वर्ष की पार्टी का फोटो भेजा है. सबके हाथ में गिलास है, उसमें क्या है इसका अंदाज लगाया जा सकता है. अब कैसे वक्त हैं कि आधी-आधी रात तक जगते हैं बच्चे और सुबह-सवेरे सो जाते हैं.

अभी-अभी प्रेस से फोन आया, अंग्रेजी के कुछ लेख अभी तक टाइप नहीं हुए हैं. दो दिन बाद कार्यक्रम है. पिछले वर्ष वह आरम्भ से ही पत्रिका से जुड़ी थी, पर इस बार ऐसा नहीं है. अब देर भी बहुत हो गयी है. आज दोपहर कुछ देर सोयी तो अजीब सा स्वप्न देखा, जिसमें छोटा भाई भी था और अखाद्य सब्जी का जिक्र था, वह उसे खाने के लिए मना कर रही थी. कल या परसों रात्रि को स्वप्न में ओशो से बातें की. उनका प्रवचन सुनते-सुनते सो गयी थी, सपने में भी वह उसे सुना रहे थे और राह में मिलने वाले लोग भी सुनने लगते थे. मन कितना रहस्यमय है, आत्मा का तो कोई पार नहीं पा सकता, परमात्मा की तो बात ही छोड़ दें. सारी सृष्टि एक रहस्य ही तो है, पता नहीं कब से है और कब तक रहेगी, पता नहीं किसने बनाई है और क्यों ? पता नहीं, वे कौन हैं और परमात्मा से उनका क्या रिश्ता है ? परमात्मा ही वे बनकर खुद को खोज रहा है क्या ? परमात्मा के पास शायद मन नहीं है पर वह तो सर्वज्ञ है, फिर..उसकी सर्वज्ञता में ही शायद मानव भी शामिल है, मानव भी वही है, सब लोग यह बात नहीं जानते, उसे लगता है यही सही है. वह भी वही है, अब वही जाने उससे क्या करवाना है उसे, वही है तो वही जानेगा..अब उसने स्वयं को खुद को बनाया नहीं है, न ही उसे कुछ पता है, सचमुच उसे कुछ भी नहीं पता, वह कौन है, ईश्वर कौन है, यह क्या है, यह सृष्टि ऐसी क्यों है ? बस एक शांति सी है, एक मौन, एकांत और विश्राम !


Monday, August 21, 2017

चेत्तना की ज्योति


शाम के साथ बजने वाले हैं. आज दिन भर धूप के दर्शन नहीं हुए. इस समय तापमान छह डिग्री है. सुबह उठकर कुछ देर प्राणायाम किया फिर बाहर टहलने भी गयी, चारों और श्वेत कोहरा था जो चेहरे पर शीतलता की छाप छोड़ जाता था. उसके बाद किचन में पहले नाश्ता फिर भोजन बनाने-खाने-खिलाने में व्यस्त. महरी दो दिन से नहीं आ रही है. छोटी भाभी बहुत मिलनसार है और सारा काम आराम से निपटा लेती है. दीदी परिवार सहित कल आयीं थीं, सबसे मिलकर अच्छा लगा. बड़ी भांजी से फोन पर बात हुई, चचेरा भाई मिलने आया था, वह कुछ ज्यादा बोलने लगा है, अकेले रहने के कारण उसका मन अब शायद पहले सा मजबूत नहीं रह गया है, फिर भी शारीरिक रूप से पहले से स्वस्थ लगा. पिताजी आज सुबह कह रहे थे, यात्रा पर जाने से पूर्व उनका दिल घबराता है, दो दिन बाद उन्हें जाना है.

कल चचेरी बहन अपने दो बच्चों के साथ आयी थी, बच्चों ने नन्हे के साथ अच्छा समय बिताया. आज सुबह नौ बजे घर से चले और ढाई बजे दिल्ली पहुंच गये. बड़ी गाड़ी थी, स्विफ्ट डिजायर, यात्रा आरामदेह थी सिवाय दिल्ली में भारी ट्रैफिक का सामना करने के. मंझले भाई-भाभी का नया घर बहुत सुंदर है. शाम को भाभी की माँ से मिलने गये, जो अस्थमा की मरीज हैं. उसके बाद आर्मी रेस्टोरेंट में रात्रि भोजन के लिए. सूप, सिजलर, पनीर टिक्का, तंदूरी रोटी दाल और एक सब्जी. पिछले दिनों छोटी भाभी ने भी काफी व्यंजन बनाये थे. कश्मीरी चटनी, अप्पा, मलाई मेथी मटर तथा खजूर के लड्डू, हल्दी वाला दूध. कल शाम शायद बड़ी भतीजी मिलने आये. दोपहर को बड़ी भाभी के यहाँ जाना है. जून टनोर में हैं, जो जैसलमेर से भी आगे हैं.

आज ठंड कल से भी ज्यादा है. खिड़की से बाहर सिवाय कोहरे की सफेद चादर के कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा. सुबह छह बजे ही उठ गयी, साढ़े आठ बजे तक तैयार थी. पिताजी भी नहा-धोकर नाश्ता करके बांसुरी बजा रहे हैं, चैन की बांसुरी ! नन्हा कल अपने मित्र के यहाँ रहा, अपने मित्रों के साथ कल रात आग जलाकर उसने उत्सव मनाया. आज उसे वापस जाना है. रात्रि के दस बजने को हैं. ठंड बदस्तूर है. दोपहर को बड़ी भाभी ने सरसों का साग व मक्की की रोटी खिलाई. शाम का भोजन भी वहीं किया और आधा घन्टा पहले ही वे लौटे हैं. परसों इस वक्त वे अपने घर में होंगे, समय कैसे बीत रहा है, पता ही नहीं चल रहा.

वे घर लौट आये हैं. सुबह साढ़े पांच बजे उठे और गोभी के पराठों का नाश्ता करके, निकल पड़े, भाई ने चाय बनाई, जैसे मंझला भाई अपने घर पर बनाता है, जैसे जून यहाँ हार्लिक्स बनाते हैं. बड़े भाई को आटा गूंथते हुए भी देखा, अच्छा लगा, वे पहले से ज्यादा शांत और स्थिर लगे. मंझला भाई भी पहले से ज्यादा स्वस्थ लग रहा था. भाभी लेकिन कुछ ज्यादा ही मोटी हो रही हैं. दोनों की बेटियां बहुत लाड़-प्यार में पली हैं. एअरपोर्ट पर दो किताबें खरीदीं, दो दीदी ने दी हैं, एक पिताजी से पढ़ने के लिए ली है, ‘शिवोहम’, वहाँ पढ़ रही थी, पूरी नहीं पढ़ पायी. बहुत अच्छी किताब है. चेतना का दीपक जलता है देह की उपस्थिति में ही, प्राणवायु ही उस दीपक को प्रज्ज्वलित करती है, देह दीपक है, चेतना ज्योति है, चेतना स्वयं को ज्योति स्वरूप जान ले तो सारा भय नष्ट हो जाता है. पिताजी का गला दिल्ली की ठंड में खराब हो गया है, पर उन्हें वहाँ अच्छा लग रहा है. ठंड से बचने के लिए भाभी ने उन्हें गर्म शाल दी, भाई ने ट्रैक सूट और हर समय वे उनके ध्यान रखते हैं. भाभी की माँ का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, वह अस्पताल में हैं, उनसे भी बात हुई. घर आकर अच्छा लग रहा है. परमात्मा उसे किसी उद्देश्य के लिए वहाँ ले गया था. नन्हे ने अपने दिल की बात बताकर स्वयं को हल्का किया, उसका दिल टूटा है पर वह हिम्मती है. भीतर की पीड़ा को व्यक्त नहीं होने देता, स्वयं पर हावी भी नहीं होने देता. परमात्मा ही उसके जीवन का मार्ग तय करने में उसे मदद करेंगे. कल शाम को क्लब में मीटिंग है. अगले हफ्ते प्रेस जाना है. पहली तारीख को एक सखी को भोजन पर बुलाना है. जून ने हरे चने के चावलों बनाये हैं रात्रि भोजन में.


Friday, August 18, 2017

इ रिक्शा में यात्रा


कल से गले में खिचखिच है, आज ज्यादा बढ़ गयी है. तीन दिन बाद यात्रा पर निकलना है, स्वास्थ्य  ठीक हो जायेगा उससे पूर्व ऐसी उम्मीद है. दोपहर बाद साढ़े तीन होने को हैं, सूर्य की अंतिम धूप में बगीचे में कुरसी पर बैठी है वह, मुँह में मुलेठी है, जिसकी मिठास गले को राहत देती है. कुछ देर पूर्व रजाई ओढ़कर लेटी पर भीतर कोई जाग गया है जो बेवक्त सोने नहीं देता. एक दिन तो गहरी नींद सोना ही है. उसके पूर्व कुछ काम हो जाये तो ही अच्छा है. जीवन के पल व्यर्थ न जाएँ, परमात्मा की दी इस अपार क्षमता का उपयोग हो सके ऐसा प्रयत्न सदा ही चलना चाहिए. आज बहुत दिनों के बाद रीडर्स डाइजेस्ट का एक अंक पढ़ा. मलाला की पुस्तक कल खत्म हो गयी, उसका एक भाषण भी सुना. कल शाम को जून के दफ्तर में काम करने वाली एक महिला आई थी अपने पति के साथ. चाहती है उसका तबादला गोहाटी हो जाये, इसी सिलसिले में बात करने आये थे वे. पति का काम वहीं है, ससुराल भी वहीं है. यदि ऐसा न हो पाया तो दोनों के पास अलग होने के सिवा कोई उपाय नहीं है. महिलाओं ने भी पुरुषों की तरह काम करना तो आरम्भ कर दिया है पर इसके लिए कितनी क़ुरबानी देनी पडती है. सास-ससुर को तो अब बहू से कोई भी उम्मीद रखने का अधिकार नहीं रह गया, पति भी यह नहीं कह सकता कि महिला नौकरी छोड़ दे. बगीचे में पानी डालने माली अभी तक नहीं आया है, वैसे एक दिन छोड़कर भी पानी दिया जा सकता है, रात्रि को इतनी ओस गिरती है कि सब कुछ भीग जाता है.

उत्तर भारत में कड़ाके की ठंड पड़ रही है, ऐसा समाचारों में सुना. यहाँ भी मौसम अपेक्षकृत ठंडा है पर धूप भी खिली है. व्हाट्स एप पर दीदी का संदेश सुना. विदेश में रहने वाला बड़ा भांजा परिवार सहित आया है, उससे भी भेंट हो जाएगी. कल स्वप्न में किसी पिछले जन्म का दृश्य देखा, मोह भंग होता है जब पिछले जन्म की सच्चाई सामने आती है. जीवन एक खेल ही तो है, एक स्वप्न मात्र..इसे जो गम्भीरता पूर्वक लेते हैं, वे व्यर्थ ही दुखी होते हैं. मन कितना चंचल है, पल में तोला पल में माशा, इस मन को देखना भी एक मजेदार खेल है. यहाँ सब कुछ बदलने वाला है, सत्य एक है और वह सदा एक सा है अटल. उससे जुड़े रहकर जगत को देखना है, वहाँ न कोई चाह है न ही कोई अभाव ! नये वर्ष के लिए कविता लिखनी है जो वापस आकर पोस्ट करेगी अथवा तो वहीं से मोबाइल पर.


इस समय धूप तेज है, दोपहर के डेढ़ बजे हैं. सुबह ठीक चार बजे किसी ने जगा दिया, जैसे ही उठकर बाथरूम जाने लगी तो अलार्म बजा. तैयार होकर साढ़े पांच बजे ही वे रेलवे स्टेशन आ गये. नन्हे के साथ शताब्दी की तीन घंटे यात्रा का वक्त कैसे बीत गया पता ही नहीं चला. कल जब वह दिल्ली पहुंची, नन्हा उसे लेने एयरपोर्ट आया था, उसे सुखद आश्चर्य हुआ. स्टेशन पर छोटी भाभी और भतीजी लेने आये थे. बैटरी वाली रिक्शा में बैठकर वे घर आ गये. ढोकला व लड्डुओं का नाश्ता किया. धूप में बैठकर फल खाए. दीदी व बुआजी से बात की, दीदी कल आ रही हैं और बुआजी परसों. पिताजी पहले से काफी दुबले हो गये हैं, भोजन भी पहले से कम हो गया है, वैसे अन्य सभी बातों में पूर्ववत हैं. वे उनके साथ दिल्ली जाने के लिए तैयार हैं.