Tuesday, September 27, 2016

लैप टॉप पर कविता


आज जून लंच पर घर नहीं आ रहे हैं. सुबह-सवेरे वे दोनों टहलने गये थे, ठंडे मौसम का सामना करो तो सारी ठंड काफूर हो जाती है. नया वर्ष आने वाला है, उसके मन में नये-नये सूत्र आने लगे हैं, नये साल के लिए लोग कितने प्रण लेते हैं. सर्दियों की सुबह में कैसी शांति पसरी है चहुँ ओर, कोई जल्दी नहीं है. समाचारों में सुना, कल बनारस में शीतला घाट पर बम विस्फोट हुआ, आरती का वक्त था, विदेशी सैलानी भी थे, घायल हुए कुछ, एक बच्ची की मौत भी हुई. आतंकवाद की जड़ें कितनी गहरी चली गयी हैं, और कितने हृदयशून्य हैं आतंकवादी.

नेट नहीं चल रहा है आज, ब्लॉग पर कुछ पोस्ट नहीं किया. वह डायरी में एक कविता खोज रही थी, माना सुंदर है जग, सुंदर... फिर से लिख सकती है, बहुत समय व्यर्थ किया उसकी खोज में, कई बार वे यूँही व्यर्थ के कामों में लग जाते हैं. सोये हुए व्यक्ति की यही निशानी है. दोपहर को भोजन के बाद जब आराम कर रही थी, मन में कितनी पंक्तियाँ गूँज रही थीं, नये वर्ष की कविता के लिए. आज मौसम ने फिर करवट ली है, बदली छायी है, ठंड बढ़ गयी है, सब घर के भीतर ही बैठे हैं. कल वर्षों बाद गुरूजी की पुस्तक God loves fun दुबारा पढ़ी. बहुत अच्छी लगी, आज उन्हें सुना भी, कितने सहज रहते हैं वह और कितने केन्द्रित भी..अनोखे हैं वह और वे भी कितने भाग्यशाली हैं कि उनके होते हुए वह आए हैं धरती पर ! कह रहे थे, शब्दों को अर्थ मानव देते हैं, लोगों को नाम भी वे देते हैं, धारणाएँ वे बनाते हैं, सब उनका खुद का ही किया धरा है. वे व्यर्थ ही अपने विचारों को इतना महत्व देते हैं, जो उन्हें कहीं का नहीं रखते, आज तक इन शब्दों ने क्या भला किया है जो आगे करेंगे.. जो शब्द मौन में ले जाकर छोड़ दें वही काम के हैं !

शनिवार को वे पिकनिक पर गये, रविवार को मैराथन में भाग लिया, आज प्रेस जाना है और कल विशेष बच्चों के स्कूल. जून के दफ्तर में ऑडिट चल रहा है, अभी तक आये नहीं हैं. बादल नहीं हैं पर बाहर घना कोहरा है. परसों धूप इतनी तेज थी जैसे मई-जून में होती है, कल दिन भर वर्षा होती रही और आज.. कुदरत अपना सारा खजाना खोल के बैठी है, अलग-अलग मौसम के रंग बिखर रहे हैं. भीतर साक्षी भाव दृढ़ हो रहा है या नहीं इसका भी पता नहीं चलता..परमात्मा और आत्मा तो एक ही हैं फिर भान किसे हो, कोई हो तो उसे भान होगा, वहाँ एक मौन है..एक शून्य..एक आकाश. कल पिताजी ने उसकी कविताएँ पढ़ीं, बल्कि सुनीं, छोटा भाई उन्हें पढ़कर सुना रहा था. सम्भवतः वह स्वयं भी लैप टॉप ले लें, फिर स्वयं ही पढ़ सकेंगे.

आज एक अनोखा अनुभव कुछ पल के लिए हुआ ही होगा. शास्त्रों के वचन घटित होते स्पष्ट दिखे. स्वयं को पानी की तरह जिस जगह गयी उसी रूप में ढलते देखा, फिर स्वयं में टिकते हुए भी देखा. वृत्ति जैसी हो वैसा ही रूप स्वयं भी धर लेता है मन और वृत्ति कब कौन सी उठ जाएगी, उन्हें भी पता नहीं होता और वे उन विचारों को इतना महत्व देते हैं..सब माया है..सम्भवतः अब जाके उसे ध्यान का सूत्र समझ में आया है. कल बड़ी भतीजी का जन्मदिन है, उसके लिए कविता लिखने की कोशिश करेगी..

एक चुलबुली हंसमुख कन्या
पढ़ती होटल मैनेजमेंट
पहली बार है घर छोड़ा

मस्ती करना शौक है उसका
पाक कला में हुई निष्णात
रंगत गोरी सुंदर मुखड़ा..

5 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 29-09-2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2480 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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    1. बहुत बहुत आभार दिलबाग जी !

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    1. स्वागत व आभार !

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  3. प्रसन्न हो जायेगी पढ़ कर !

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