Thursday, September 3, 2015

यस कोर्स की टीचर


कल जून रहे हैं, सो समय का ध्यान रखना होगा. समय की पाबंदी ठीक है पर क्या यह भी एक बंधन नहीं है. सभी तो मुक्ति चाहते हैं, पर भीतर से मुक्ति मिल जाये तो बाहर के बंधन कुछ नहीं बिगाड़ पाते. उन्हें भीतर से मुक्त होना है. अपने विचारों से, आदतों से, परनिंदा से, दुर्बलता से, भय से तथा हर समय कुछ न कुछ करते रहने की खुदबुद से. वे पूर्ण विश्राम में ही राम को पा सकते हैं. आजकल गुरूजी ‘नारद भक्ति सूत्र’ पर बोल रहे हैं. प्रेम की पराकाष्ठा ही भक्ति है, वह भक्ति पूर्ण विश्राम में मिलती है, जब भीतर सारी चाह मिट जाये. इस जगत में वे कितना भी पालें कभी पूर्णता का अनुभव हो ही नहीं सकता, प्रेम में ही वह पूर्ण हो सकते हैं. अभी जो भीतर कभी-कभी एक बेचैनी सी छा जाती है वह इसी पूर्णता की तलाश है. उनके मन में जो विभिन्न कल्पनाएँ चलती हैं, वे जो राय बना लेते हैं व्यर्थ ही दूसरों के बारे में, वह सबसे बड़ी बाधा है इस पूर्णता की प्राप्ति में. वे अपनी ऊर्जा व्यर्थ ही गंवा देते हैं. जैसे ही स्वयं में आ जाते हैं, वैसे ही पूर्ण शांति का अनुभव होता है. मन से आत्मा में आने में उतना भी समय नहीं लगता जितना पलक झपकने में. साधना सरल है पर उसे कठिन समझ रखा है ! जो अप्रमादी है वही प्रगति करता है. मन तथा आत्मा को अलग-अलग देखना यदि आ जाये तो बाहर का व्यवहार भीतर को छू नहीं पाता, बाहर का व्यवहार तो इन्द्रियों, मन तथा बुद्धि के आधार पर होता है पर आत्मा तो इन सबसे अलग है और वह आत्मा ही वे हैं. उसका व्यवहार सासुमाँ को अवश्य थोड़ा खलता होगा, उसकी उदासीनता !

जून आज वापस आ गये हैं, इस समय ऑफिस गये हैं. कुछ देर में वह टहलने जाएगी और मिसेज परमार के साथ टहलकर वापस आ जाएगी. पिछले तीन दिनों से वह शाम को उसके साथ घर आती हैं, उनकी बेटी आर्ट ऑफ़ लिविंग का बच्चों का ‘यस कोर्स’ करवा रही है. उन्होंने कई रोचक बातें अपने रिश्तेदारों के बारे में बतायीं. नन्हे की फोन पर बातचीत जारी है. आज की पीढ़ी जो सामने है उससे बात नहीं करती, जो दूर है उनसे बात करती है. उसकी खुद की पीढ़ी, जो सामने है न उनसे और जो दूर हैं न उनसे, किसी से भी बात नहीं करती और उनसे पहले की पीढ़ी सबसे बात करना चाहती है, यही जनरेशन गैप है.  


फिर एक अन्तराल..आज पूरे दस-ग्यारह दिनों बाद डायरी खोली है. उसे यात्रा पर जाना था. नन्हा भी साथ गया. जून के साथ होने पर वह निश्चिंत रहती है पर अब सजग रहकर यात्रा करनी थी. कुछ भी परेशानी उन्हें न हो इसके लिए सारा इंतजाम जून ने कर दिया था. दिल्ली से आगे की ट्रेन की टिकट भी यहीं से बुक कर दी थीं. कल ही वे वापस आए हैं, जून भी यहाँ ठीक रहे, यह बड़ी उपलब्धि है वरना पहले उन्हें उसका बाहर जाना बहुत खल जाता था. जब कोई स्वयं संतुष्ट होता है तोआस-पास के लोग भी धीरे-धीरे वैसा ही व्यवहार करना सीखने लगते हैं. इस यात्रा में पिताजी, दीदी, दोनों छोटे भाईयों, बड़ी भाभी, छोटी बहन सभी से अध्यात्म चर्चा हुई. छोटे भाई ने तो अपने भीतर छुपी प्यास तथा गुरू के प्रति प्रेम का वर्णन बहुत सहज शब्दों में किया. ट्रेन यात्रा के दौरान उसने बताया, जब ध्यान में बैठता है तो उसे अपने साथ ही ईश्वर की उपस्थिति सद्गुरु के रूप में होती है. मंझले भाई को ज्ञान तथा योग दोनों की प्यास थी. वे सभी उच्च जीवन की ओर बढ़ रहे हैं, एक ही परिवार के अंश होने के कारण उनके भीतर बहुत कुछ साझा है. यहाँ इस जगत में वे किसी कारण से एक ही साथ इकट्ठे हुए हैं. उसकी यह यात्रा सफल रही ऐसा लगता है. पिता का धैर्य तथा प्रेम, छोटी भाभी की उदासीनता तथा भीतर की लगन, बच्चों की सहजता.. सभी कुछ अपने आप में पूर्ण थे. सभी के रहन-सहन का स्तर भी ऊंचा हुआ है. दीदी ने एक सत्संग हॉल बनाया है, जहाँ हर हफ्ते कीर्तन होता है. उनके भीतर भी ज्ञान तथा प्रेम का प्रकाश स्पष्ट झलकता है 

2 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, मेड इन इंडिया - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. उच्च जीवन की ओर अग्रसर हो पाना सच में बहुत बड़ी उप्लब्धि है ।

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