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Thursday, October 18, 2012

नए वर्ष का स्वागत



दिसम्बर का प्रथम दिवस, सर्दी जितनी होती है इस महीने में उतनी नहीं है. सम्भव है इस महीने में ठंड बढ़े. आज बड़े भाई का जन्मदिन है. आज उसने कक्षा आठ को अंकगणित में समानुपात पढ़ाया, उनका कोर्स बहुत कम हुआ है, और छात्राएं भी होशियार नहीं लगीं, गलती छात्राओं की कम, अध्यापकों की अधिक है. गणित के वह टीचर..लगातार पान चबाते हुए...क्या प्रभाव डाल पाएंगे विद्यार्थियों पर. वितृष्णा सी होती है देखकर..खैर, किसी तरह ग्यारह दिन और पढ़ाना है.

अभी तक जून के पहुंचने की कोई खबर नहीं आयी है, उसे चिंता होने लगी है. पता नहीं क्या बात है, उसके मन में विचारों की श्रंखला चलने लगी, वह ठीक तो होगा, क्या उसे यह बात पता होगी कि उसका कोई समाचार उन्हें नहीं मिल रहा है. फिर भीतर से किसी ने कहा कि परसों यानि सोमवार को उसका पत्र अवश्य आयेगा. उसने मन ही मन ढेरों शुभकामनायें उसके स्वास्थ्य के लिए कीं, उसकी खुशी के लिए कीं और मन हल्का हो गया. आज ही उसे पता चला कि जब अगले शनिवार तक उसके गणित के सत्रह पाठ हो जाएंगे और विज्ञान के ग्यारह, उसी दिन अध्यापन का अंतिम दिन है.

इतने दिनों से डायरी नहीं खोली, आज जाकर अवसर मिला है, अध्यापन फ़िलहाल तो समाप्त हो गय है. अब सोमवार से पढ़ाई शुरू होगी. आज माँ-पिता व छोटे भाई-भाभी के पत्र आये हैं. छोटी बहन का पत्र आया था, उसे जवाब लिखा है, पता नहीं उस पर क्या प्रतिक्रिया होगी. काकू की तबियत अभी तक ठीक नहीं हुई है, उसने सोचा कि उसे एक कार्ड भेजेगी. जीजाजी भी नहीं होंगे सो दीदी का पत्र तो आने से रहा. उसकी ननद भी जो बैंक की तरफ से ट्रेनिंग में गयी हुई थी, आजकल में लौटने वाली है.

आज बहुत दिनों बाद थ्योरी की कक्षाएं हुईं, कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था. सुबह से वे खाली थे, फिर अंतिम दो कक्षाएं हुईं, सुधा मैम का लेक्चर अच्छा था, आरती मैम का विषय बहुत उबाऊ था, और किसी दिन पढातीं तो शायद ऐसा न होता पर दिन भर प्रतीक्षा करते करते मन थक चुका था. कल कालेज में गेम्स होंगे, पीटी करवानी होगी, उसने अपना नाम तो दे दिया है. परीक्षा की तारीखें आ गयी हैं, १५ अप्रैल से शुरू होंगी और अप्रैल के आखिर तक चलेंगी संभवतः. मई में वे अपने घर जायेंगे.

आज जून का पत्र आया है. शाम को बाजार गयी थी, लौटी है कुछ देर पूर्व ही, मन-मस्तिष्क थका हुआ है. कल कालेज में कुछ नहीं हुआ सिवाय बातों के. आज सोचा है देर से जायेगी. सिर्फ ‘बागवानी’ होगी और सम्भवत ‘जनसंख्या’ का पीरियड हो, पर उसे बाद में नोट किया जा सकता है. वह नए वर्ष के लिए कुछ कार्ड्स लायी है.

नववर्ष के शुभागमन के साथ ही
तुम्हारे सौभाग्य का उदय हो...
चलते चलो
जीवन के पथरीले पथ पर
दर्द जितना अधिक हो
सुख उतना ही ज्यादा होता है उसके मिटने पर
तपकर ही निखरोगे
जीवन की धूप में तपकर
निखार आएगा
नए वर्ष में स्वप्न देखो
तारों को छूने के
तभी आकाश तक पहुंच पाओगे
जीवन के इस समुद्र में
तैर कर पार हो जाओगे
चलना, तपना, तैरना और स्वप्न पूर्ण करना
क्या चारों पर्यायवाची नहीं..?

Monday, September 3, 2012

मफलर वाली सर्दी



नया वर्ष शुरू हो गया है. इस वर्ष में पहली बार लिखते समय उसके अंदर मिश्रित भावनाएँ हैं. जून से बार-बार कहकर उसने यह डायरी मंगवाई है, जब नहीं मिली थी तो उसे दुःख भी हुआ था और सोचा कि अब यदि मिली भी, तो भी नहीं लिखेगी, पर उसने इस पर दो बोल (वह भी लिखवाये) लिख दिए हैं तो लगता है कि अब वह लिख सकती है. रही वर्ष के आरम्भ की बात तो वे उसी दिन यानि पहली तारीख को असम पहुँचे थे. वह लगभग दो महीने बाद घर वापस आयी थी. अभी कुछ देर पूर्व दोपहर के भोजन के बाद कुछ देर के लिये सोते समय देखे स्वप्न में वहीं की बातें माँ-पिता, भाई-भाभी से बता रही थी.  दो-एक दिन पूर्व फिर ‘उसे’ स्वप्न में देखा था, अब सत्य कहाँ रह गया है वह, तन त्याग कर स्वप्न ही तो बन गया है. जून ने उसके लिये सेंट्रल स्कूल की सर्विस का फार्म ला दिया है. बनारस से वे लोग रोजगार दफ्तर से रजिस्ट्रेशन नम्बर स्थानांतरित करा के लाए थे, यहाँ के ब्यूरो ने स्वीकार नहीं किया. पीआरसी की बाधा खड़ी कर दी है. उनके पारिवारिक मित्र का नौ-दस साल का पुत्र दस दिनों के लिये उनके घर पर रह रहा है, उसकी माँ को किसी काम से शहर से बाहर जाना पड़ा है. नन्हें को एक साथी पाकर बहुत अच्छा लग रहा है.
आज भी कल का समय है, लेकिन वातावरण में सिहरन अभी से आ गयी है, शाम होते-होते ठंड और बढ़ जायेगी. आज उसने अपनी लेन की श्रीमती दासगुप्ता से मफलर की बुनाई सीखी, वह पहले से बना रही थी, अब उसे खोल कर नए सिरे से बनाएगी. जून के दफ्तर में बाहर से किसी व्यक्ति का एक्सीडेंट हो गया है, वह अस्पताल गया था, कह रहा था, शायद उसे छोड़ने उसके घर जाना पड़े. जून में दूसरों का दर्द महसूस करने की अद्भुत क्षमता है. आजकल उसका ऑफिस नई इमारत में शिफ्ट हो रहा है. इन दिनों उसका सुबह का समय किचन में ही बीत जाता है, उस बच्चे के जाने के बाद अपनी पुरानी दिनचर्या पर आ जायेगी. कल अपनी एक बंगाली मित्र के यहाँ गयी थी उसका बगीचा बहुत सुंदर है. उनके घर की छत से पक्षियों के कारण या धूप के कारण कैसी आवाजें होती रहती हैं, अब तो आदत पड़ गयी है फिर भी इस वक्त बहुत खल रही हैं. उसने सोचा वहाँ बनारस में सभी कुछ ठीक होगा...यहाँ इतनी दूर बैठकर तो ऐसा ही लगता है पर कितने उदास होते होंगे कभी कभी वे लोग. लेकिन ये उदासी उन्हें कहाँ ले जायेगी, कहीं भी तो नहीं. जून आजकल स्थिर हैं. उसके ही कारण एक दिन वह भटक गया था पर उन दोनों को तो हर हाल में अब साथ-साथ जीना है, वे दो कहाँ हैं. वह एक दिन भी उससे नाराज नहीं रह सका और वह तो नाराज थी ही नहीं. जीवन के इस मोड़ पर आकर लगता है अभी तो सही मायनों में उसका जीवन शुरू ही नहीं हुआ...अभी तक आराम ही कर रही थी और जाने कब तक करती रहेगी. मन के सब दरवाजे जैसे भड़भड़ा कर बंद हुए तो खुले ही नहीं, सड़ी हुई बासी हवा के बाद ताजी हवा का झोंका आये तो कितना भला लगता है !