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Monday, November 10, 2025

दिवोदास की कथा

दिवोदास की कथा 


आज दिन भर सुखद व्यस्तता बनी रही।सुबह टहलने के बाद उन दोनों ने कुछ देर साइकिल चलायी। हरसिंगार के पेड़ इन दिनों पूरे शबाब पर हैं। कई पेड़ों के नीचे बिछी फूलों की चादर आकर्षित कर रही थी, पुन: फ़ोटोग्राफ़ी करने गये। शनिवार साप्ताहिक सफ़ाई का दिन भी है। जून ने नूना के बालों में रंग भी लगा दिया। थोड़ा बच गया तो लगभग साल भर बाद अपने बालों में भी लगा लिया। शाम को पुन: साइकिल से जाकर एक नया पौधा और एक गमला ख़रीद कर लाये, सीढ़ी के मोड़ पर रखना है। गमलों के नीचे रखने वाली प्लेट्स भी ख़रीदीं।नाश्ते में दोसा और फ़िल्टर काफ़ी, लंच में ब्रोकोली की खिचड़ी। किचन का भार जून ने ही सँभाल लिया है जैसे। कल बच्चों के आने का दिन है, वह इडली के साथ कश्मीरी हलवा बनाने वाले हैं।दोपहर को छोटी बहन का फ़ोन आया, थोड़ी परेशान लग रही थी, काम का दबाव है और स्वास्थ्य भी पूरा ठीक नहीं है। बहनोई की आँख का कल कैट्रैक का ऑपरेशन है। उसे एक अच्छा सा संदेश लिखने का तय किया नूना ने।एक अच्छी नींद बहुत से रोगों का इलाज है।पापाजी से उसकी  चार दिन बाद बात हुई, उन्हें आज की कविता अच्छी लगी।जून के भेजे कुकीमैन बिस्किट उन्हें मिल गये हैं। ‘काव्यालय’ पर एक पुरानी कविता पोस्ट की है। 


आज का इतवार अच्छा रहा। सुबह लॉन में नई लगी घास पर नये पाइप से पानी डाला, पर शाम से मूसलाधार वर्षा हो रही है।नौ बजे नन्हा और सोनू आ गये थे। भरवाँ इडली व लोभिया भी बनाया था। कश्मीरी हलवा विशेष था। पहली बार मैक पर सभी को व्हाट्सेप कॉल की। दीदी आज बहुत खुश लग रही थीं, वह इंगलिश ग्रामर सीख रही हैं।उन्होंने साइलेंस कोर्स के बारे में भी पूछा। कल मंझले भाई-भाभी से बात हुई। उनकी बिटिया बहन की बिटिया से टोरंटो में मिली। शाम को बादलों से झाँकता सूर्यास्त पल भर को देखा। नन्हा आज ईवी ले गया है, सर्विसिंग करानी है। अगले हफ़्ते उसके जन्मदिन पर पार्टी होगी, मेनू आज ही बन गया। 


आज दोपहर कुछ फ़ोटो प्रिंट करके फ़्रेम में लगाये, फिर छत तक जाने वाली सीढ़ी की दीवार पर लगाये। बैंक में अकाउंट खोलने के लिए फार्म भरा। नन्हे ने क्रैब मोबाइल स्टैंड खिड़की पर लगा दिया था, सुबह योगा सेशन की रिकार्डिंग की। आज पहली बार ज्वार का दलिया खाया, अच्छा लगा। एसी का स्विच बदला। बाथरूम का लीकेज अभी ठीक नहीं हुआ। रात के भोजन में मोरिंगा  का थेपला बनाया। 

   

सुबह वे उठे तो वर्षा हो रही थी।शायद रात भी होती रही थी। बाद में कुछ देर को थमी तो टहलने गये।बोटेनिका का गेट खुला था, सो उधर ही चले गये। सड़कों पर कई जगह पानी भरा हुआ था। सोमनहल्ली के रास्ते में  सुवर्णमुखी नदी में तेज गति से जल  बह रहा था। रास्ते में कीचड़ भी था। एक जगह लाल मुसंडा की एक डाल टूट कर गिर गई थी, घर आकर उसकी कटिंग्स लगा दी हैं। दस बजे बैंक जाना था। जून ने कार में पेट्रोल भरवाया, सौ रुपये से अधिक है एक लीटर का दाम। नन्हे से बात हुई, उसने बताया, सुबह सवा आठ बजे वह सीट पर बैठा था और अभी नौ बजे आख़िरी कॉल ख़त्म हुई है। उसने अमेजन और मिन्तरा के बिज़नेस की कुछ बातें बतायीं। सोनू अभी भी फ़ोन पर थी, वह अपने नये काम को रोज़ एक घंटा सीखती है।आज वर्टिकल गार्डन बनाने की ओर पहला कदम बढ़ाया। 


आज रात्रि भोजन के बाद वे टहलने निकले तो औरेंज जास्मिन के फूलों की सुवास ने मन मोह लिया पर लौटे तो पड़ोस के निर्माणाधीन मकान से धुँए की गंध आयी जो एसी के द्वारा खींच लिए जाने पर कमरे में भी भर गई है। ‘देवों के देव में’ काशी के राजा रिपुंजय द्वारा वरदान प्राप्त करने के बाद शिव की विदाई का अद्भुत दृश्य दिखाया गया। दिवोदास या रिपुंजय की कथा शिव पुराण में आती है। इनके चरित्र पर एक पुस्तक भी लिखी है राहुल साँस्कृतायन ने। आज कुछ देर गुरुवार के मंत्र का जाप किया। मृत्यु के बारे में एक प्रवचन सुना। शरीर में जीवन प्राणों के द्वारा ही टिका हुआ है। समान, प्राण, अपान, उदान और व्यान पाँच प्राण हैं, जिनके जाने से शरीर में मृत्यु के बाद भी कुछ देर तक जीवन के लक्षण दिखायी देते हैं। हर कोशिका में जीवन है तथा उसमें ज्ञान भी है। जून ने आज सुबह झूले पर टचवुड लगाया, बहुत सुंदर लग रहा है। आजकल वह उत्साह से भरे रहते हैं और नए-नए काम ढूँढा करते हैं। सब्ज़ी का ट्रक आया था और फलवाला घर आकर इमाम पसंद आम दे गया। नन्हे ने दो तरह के सौंफ भेजे हैं, जो पूरा वर्ष चलेंगे।नूना को लगता है, जीवन ऐसे ही छोटे-छोटे पलों से मिलकर बनता है, जिन्हें गौर से देखने पर उस अनाम की छाप हर कहीं दिखायी देती है।    


Thursday, December 14, 2023

लैवेंडर के बीज

आज ‘विजय दिवस’ मनाया जा रहा है। सन ७१ में आज ही के दिन बांग्ला देश का जन्म हुआ था। पाकिस्तानी सेना ने आत्म समर्पण कर दिया था। प्रधानमंत्री ने विजय चौक पर मशाल जलायी। उन्होंने ‘१९७१’ फ़िल्म देखी, भारत के कुछ सिपाही जो पाकिस्तान में रह जाते हैं, उनके दुखद प्रवास की कहानी। किसान आंदोलन अभी भी जारी है। आज कन्नड़ भाषा के कुछ और शब्द सीखे, बट्टा- वस्त्र, आदिगे- रसोई, चिक्का-छोटा।नये माली से कन्नड़ में बात की, एक वाक्य ही सही, इतवार से काम पर आएगा। नन्हे ने कुछ और गमले मँगवाये हैं, उनके टैरेस गार्डन के लिए।एक मून लाइट लैंप भी भेजा है, उसे चार्ज किया। रंग बदलती है उसकी सतह, बहुत सुंदर लगता है। 


आज पूरे नौ महीने बाद एक घंटे के लिए वे आश्रम गये, जो कोरोना के कारण इतने महीनों से बंद था। लोग बहुत कम थे। गुरुजी का सत्संग अभी एक महीने बाद ही आरम्भ होगा। ब्रिटेन में कोरोना का नया वेरियेंट मिला है, जो तेज़ी से फैलता है। वहाँ फिर से लॉक डाउन लग गया है। भतीजी को उसके जन्मदिन पर छोटी सी कविता भेजी, उसने छोटा सा थैंक्यू लिख कर जवाब दिया। कविता की कद्र कम को ही होती है शायद, कविता कोई क्यों लिखता है, शायद जब कोई खुश होता है तो ख़ुशी बाँटना चाहता है। नाश्ते में आज मूँगदाल के चीले बनाये। उसने सोचा है, शनिवार के दिन कोई न कोई चित्र बनाएगी। इतवार बच्चों के नाम रहता है। सोम से शुक्र हर दिन एक ब्लॉग को समर्पित रहेगा। इस तरह सभी पर बात धीरे-धीरे ही सही आगे बढ़ेगी। सुबह वे दोनों ननदों को याद कर रही थी, कि एक-एक करके उनके फ़ोन आ गये, टेलीपैथी इसी को कहते हैं शायद। सुबह नैनी आयी तो बहुत उदास थी। शायद घर में झगड़ा हुआ था। पीकर आये पति ने उसे चोट पहुँचायी थी। न जाने कितनी महिलाएँ इस तरह अत्याचार सहती हैं, जबकि वह कमाती है, छह घरों में काम करती है। बहुत खुश रहती है और मन लगाकर काम करती है।  


अभी नन्हे से बात हुई, कल इतवार है, वह दोपहर को पास्ता बनाने को कह रहा है। सोनू कुछ हफ़्तों के लिए माँ के घर गई है। आज सुबह सोलर पैनल की सफ़ाई की। नैनी आज पूर्ववत थी, उसे देखकर अच्छा लगा। बातों-बातों में जून ने कहा, वे बोर हो गये हैं। उसने सोचा, जो जगत से बोर हो जाएगा, वह यदि भीतर नहीं मुड़ा तो उसके जीवन में रस नहीं रहेगा। कोरोना ने न जाने कितने लोगों को बोर और उदास कर दिया है। 


नन्हा आया तो उनके भावी नये पड़ोसी बैठे थे। उन्होंने अपने घर के बारे में कई रोचक बातें बतायीं। उनका घर दुमंज़िला होगा, जिसमें स्वीमिंग पूल होगा और छत पर एक से अधिक बगीचे। होम थियेटर तथा एक बड़ा सा मंदिर। उनके सपनों का घर जब तक बन कर तैयार नहीं जाता, उन्हें शोर तथा अन्य असुविधाएं झेलनी पड़ेंगी, इसके लिए वह शुरू से ही क्षमा माँगने आये थे। 


सुबह सवा चार बजे नींद खुली। समय की धारा बहती जा रही है। वह नींद और सपनों में वक्त गुज़ार देते हैं अथवा तो इधर-उधर के कामों में। सुबह टहलते समय भ्रमण-ध्यान किया। शीतल पवन चेहरे को सहला रही थी, आकाश में तारे चमक रहे थे और वातावरण पूर्णतया शांत था। ऐसे में मन स्वतःही एकाग्र हो जाता है। आज उसने लैवेंडर के बीज बोए हैं। शायद एक हफ़्ते में पौध निकल आयें। नन्हे के भेजे हुए गमले आ गये हैं, इतवार को वह मिट्टी लेते हुए आएगा। जून ने कोकोपीट व खाद भी मँगवा दी है।नाश्ते के बाद वे वोटर कार्ड बनवाने पंचायत के दफ्तर गये, पर संबंधित महिला कर्मचारी नहीं मिली। शाम को पिताजी से बात हुई, वे तीन हफ़्तों बाद दिल्ली से घर लौट आये हैं। रास्ते का विवरण बताया, कैसे ढाबे पर रुके, पेट्रोल भरवाया, सब्ज़ियाँ ख़रीदीं। उन्हें मिले उपहारों के बारे में बताया। घर आकर वह बहुत खुश हैं। किसान आंदोलन ख़त्म होने का  नाम ही नहीं ले रहा है। पश्चिम बंगाल में बीजेपी अगले चुनावों की तैयारी में अभी से लग गई है।       


Wednesday, May 31, 2017

पिको आयर की किताब


इतवार की सुबह, जून नहा-धोकर नाश्ता कर पुनः विश्राम कर रहे हैं. अभी सवा दस ही बजे हैं. घर व बगीचे में सफाई का काम चल रहा है. उसने ब्लॉग खोला, कुछ पढ़ा. लग रहा है जैसे कोई काम ही नहीं है, समय ढेर सारा है हाथ में है. आज धूप भी निकली है. दोपहर को बच्चों से मिलना जाना है. उनकी ऊर्जा का, समय का सही उपयोग हो सके इसक लिए निरंतर सजग रहने की आवश्यकता है !

आज जून दिगबोई गये थे, दोपहर लंच पर नहीं आने वाले थे, सो सुबह का काम खत्म होने पर यानि सफाई कर्मचारी व नैनी के जाने के बाद वह भी घर से निकल पड़ी. अपनी लेन, सामने वाली लेन तथा बायीं तरफ वाली लेन में कुल सात घरों में गयी. चार महिलाएं मिलीं, तीन में कोई नहीं था. सभी को कल शाम के सत्संग के लिए निमन्त्रण दिया. एक के यहाँ उनकी माँ व मासी भी थीं, उन्हें भी आने के लिए कहा. तीन अन्य महिलाओं के नाम भी उसे याद आए जिन्हें फोन करना है. आज नन्हे की मित्र की माँ ने उन दोनों व नन्हे के लिए लिखीं कविताएँ भेजीं, सुंदर शब्दों व भावों का प्रयोग किया है. वह हिंदी में एमए हैं. उसे अपनी कविताओं की एक पाठिका मिल गयी हैं तथा एक सखी भी. उनसे बात हुई, वह बहुत आशाजनक दिखीं. वह भी लिख सकती हैं ऐसा विश्वास उनके भीतर जगा है. उसकी मित्र ने दो किताबें भेजी है, PICO IYER की लिखी किताबें, जापान की संस्कृति का चित्रण कराती हैं, वह काफी मुश्किल किताबें पढ़ती है. अच्छा है उसे पढने का इतना शौक है. दीदी से भी बात हुई, उन्होंने बताया, कल वह बेटे बहू व पोती को पिताजी से मिलाने ले जाने वाली हैं. वह उसके जीवन की कहानी पढ़ रही हैं और समझ भी रही हैं, कितना अंतर था तब के मन में और एक है आज का मन..अनंत के साथ एक होता हुआ..
जून आज कोलकाता गये हैं, चौथे दिन लौट आयेंगे. इस बड़े घर में वह पहली बार अकेले रहने वाली है. इस घर में सबसे अच्छी बात यही है कि घर के भीतर से ही पूरा बगीचा नजर आता है. सुबह वर्षा हो रही थी, सो वह भ्रमण के लिए नहीं जा सकी. नैनी की जिठानी सिलाई जानती है, वह खाली पड़े गेस्ट रूम में उसकी मशीन पर कुछ काम कर रही है. उसके जाने की बाद ही वह टहलने जाएगी.
कल रात देर से सोयी, पढ़ती रही, फिर स्वप्न देखे, सुबह उठकर ध्यान किया, आर्ट ऑफ़ लिविंग रेडियो सुना. एक अन्य सदस्या से मिली, उनके लिए कविता लिखी. दोपहर को हिंदी का नया पाठ पढ़ाया. जून का फोन आया दो बार. अखबार में बिहार के बाइस बच्चों के विषाक्त भोजन खाने से हुई मृत्यु के बारे में पढ़ा, कितने लापरवाह हैं लोग, तमिलनाडु में भी एक स्कूल में बच्चे बीमार हुए हैं. देश में मानव संख्या इतनी अधिक है कि जान की कीमत घट गयी है, गरीबों को जीने का अधिकार नहीं है.
परसों यानि शनि की दोपहर जून को आना था, वह इन्तजार करती रही, फिर अकेले ही भोजन किया, वह सवा दो बजे आये. शाम को वे ‘राँझना’ देखने गये, अच्छी फिल्म है. इतवार शाम को वे एक मित्र परिवार से मिलने गये, वे अगले वर्ष अगस्त में रिटायर हो रहे हैं, पर उनका मन अभी से यहाँ से उचट गया है, ऐसा उन्होंने कहा. इस दुनिया से भी तो एक दिन जाना है, लोगों का मन दुनिया से भी तो उचट जाना चाहिए फिर तो..

जून आज दोपहर घर नहीं आये, उसने लंच में दही के साथ दो आलू परांठे बनाये, सिर्फ अपने लिए पूरा भोजन बनाने का उसका कभी मन नहीं होता, अकेले होने पर ज्यादातर खिचड़ी बना लेती है. शाम को एक सखी के यहाँ सत्यनारायण की पूजा में जाना है, फिर बंगाली आंटी के यहाँ और फिर आर्ट ऑफ़ लिविंग सेंटर. आज गुरू पूर्णिमा जो है, शाम को वहाँ गुरू पूजा होगी. रात का भोजन भी बाहर ही है.  

Tuesday, March 11, 2014

नये स्कूल में पहला दिन


आज का इतवार कुछ अलग है, जून सुबह नौ बजे ही नाश्ता करके निकल गये, दो बजे लौटे. नन्हा यहीं पडोस में किसी के यहाँ पिकनिक पर गया है. मौसम आज गर्म है, कुछ देर पूर्व कुछ बूँदें पड़ीं फिर थम गयीं. कल दोपहर भर और सुबह भी नन्हा टेनिस खेलता रहा, धूप से चेहरा लाल हो गया पर जोश कम नहीं था. वह DPS जाने के लिए तैयार हो गया है, अब कुल मिलाकर बीस बच्चे हो गये हैं जो यह से जायेंगे.

कल फिर उड़ीसा और बंगाल के तटवर्ती इलाकों में तूफान आया सो यहाँ भी बदली फिर छाई है, उन्हें थोड़ी देर बाद दिगबोई के लिए निकलना है, नन्हे की फ़ीस जमा करनी है, ड्रेस व किताबें खरीदनी हैं. कल से वह स्कूल जाएगा. सुबह उसे उठाया तो अपने खराब मूड में था, शायद नींद से उठाने पर बच्चों का ऐसा ही मूड रहता हो, शायद उन्हें सपनों से जगाया जाना नागवार गुजरता हो. वह सुबह-सवेरे ही उस पर झुंझला गयी, कुछ देर वह उदास रहा फिर सामान्य हो गया. कल से उसे और भी जल्दी उठाना होगा, देखें क्या होता है, कहीं उनकी सुबहें करुण दृश्यों से न भर जाएँ ! कल शाम उसने नन्हे को संज्ञा के भेद, उदाहरण आदि पढाये, जाने से पूर्व सर्वनाम भी पढ़ाना है. उसने देखा है, अक्सर उसके जबड़े एक दूसरे पर दबाव डालते हैं. तनाव ग्रस्त होने पर ऐसा होना स्वाभाविक है, पर सामान्य अवस्था में भी ध्यान न देने पर ऐसा हो जाता है. शायद नींद में भी ऐसा होता होगा. नींद में तरह-तरह के विचार एक के बाद एक मन में आते हैं. जिनका आपस में कोई तारतम्य नहीं होता न ही कोई अर्थ निकलता है. ध्यान किये हफ्तों बीत गये हैं. नन्हे के DPS जाने पर सुबह वक्त मिल सकेगा.
आज नन्हा पहली बार अपने नये स्कूल में नई कक्षा में बैठा होगा, सुबह वह पांच बजे उठी, सवा  पांच बजे उसे उठाया और साढ़े छह बजे तक ही जून और वह दोनों तैयार थे. आज उसका रिजल्ट भी निकलने वाला है. पड़ोस का बच्चा ले आएगा. उसकी कुछ किताबें नहीं मिली हैं, स्वेटर भी बाजार बंद होने के कारण नहीं मिला. कल शाम वह पुराना गृह कार्य करता रहा. रात वे जल्दी सो गये ताकि सुबह तरोताजा होकर जल्दी उठ सकें. नन्हे का स्कूल का अनुभव ही बतायेगा कि उनका उसे दिगबोई भेजने का निर्णय सही है या गलत. आज जून को अपना पेपर प्रस्तुत करना है. इतवार को उन्हें बाहर जाना है. आज कृष्णामूर्ति की पुस्तक में पढ़ा कि जीवन में क्रम स्वयंमेव आना चाहिए प्राकृतिक रूप से, ऊपर से थोपी हुई कोई भी वस्तु स्वाभाविक नहीं होती और न ही उसका असर होता है. प्रत्येक मानव यदि अपने स्वाभाविक रूप में रहे तो द्वंद्व पैदा ही न हो.

कल नन्हे का रिजल्ट आया और जैसी कि उन्हें उम्मीद थी वह अपने सेक्शन में प्रथम आया है. वैसे वह इससे भी अच्छा कर सकता है, कल उसका पहला दिन अच्छा रहा, शाम को आया तो खुश था, कल से कई लोगों ने बधाई दी है, कुछ लोग पूछते हैं कि नन्हे को DPS में दाखिला कैसे मिला आदि. उनकी ख्वाहिश थी कि उसे अच्छे स्कूल में पढ़ायें सो ईश्वर ने पूरी कर दी है. आज बहुत दिनों बाद उसने पीटीवी पर एक ड्रामा देखा, दिल को छू जाते हैं भोले भाले किरदार, अपने बेहद अपने लगते हैं. आज सुबह उसने ‘रामकुमार भ्रमर’ की एक कविता रजनी बाला पढ़ाई, उस छात्रा को अपनी लिखी एक कविता भी दिखाई. पिछले पूरे हफ्ते वह DHC के लिए नहीं पढ़ सकी. अर्थात हिंदी लेखन के कोर्स के लिए.  




Friday, January 3, 2014

स्वर्ण जयंती समारोह


अभी-अभी भगवद् गीता का वह श्लोक पढकर आ रही है जहां भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, उन्हें श्रद्धा से भेंट की गयी एक पत्ती भी अति प्रिय है, एक स्नेह भरा हृदय...और कुछ नहीं चाहिए ईश्वर को, अब तो वैज्ञानिक भी ईश्वर की सत्ता को मानने लगे हैं. बिग बैंग का प्राइम कॉज कहें या गॉड कहें कोई सुपर पावर तो है ही, और हमारे मन में उन असीम सम्भावनाओं का खजाना छिपा है जो इस रहस्य को खोल सकती हैं. ध्यान का महत्व और भी बढ़ जाता है. कल क्लब में डिब्रूगढ़ विश्व विद्यालय से आये प्रोफेसर राज का भाषण बहुत रोचक था, अन्तरिक्ष व ब्रह्मांड के बारे में नई जानकारियां मिलीं, कई सुप्रसिद्ध वैज्ञानिकों के विचार जानने को मिले. आज शाम को कोई मेहमान आयेगा शायद सुबह से ही बैठक में फूल सजाने की प्रेरणा हो रही है.

आज जून का जन्मदिन है और कल हमारे देश का भी जन्मदिन यानि जश्ने आजादी कल मनाया जायेगा. यहाँ कर्फ्यू रहेगा सुबह ६ बजे से दोपहर १२ बजे तक. कैसी विडम्बना है भारत में रहकर वे यहाँ झंडा आरोहण में भाग नहीं ले सकते. यूँ देखा जाये तो देश भक्ति मन में होनी चाहिए  अगर झंडा नहीं भी फहरा सके तो क्या ?

आज आजादी की पचासवीं सालगिरह के शुभ अवसर पर उसका मन भारतीय होने पर गर्व अनुभव कर रहा है और वह पूरे दिल से यह चाहती है कि जितनी बार भी उसका जन्म इस धरती पर हो भारत ही उसका देश हो ! टीवी पर आधी रात को हुए संसद के विशेष अधिवेशन की रिकार्डिंग आ रही है. कल रात ११ बजे तक वह जगी फिर नींद ने घेर लिया. मल्लिका साराभाई का नृत्य और ए आर रहमान का गीत संगीत दोनों ही भव्य थे. कल शाम को जून के जन्मदिन की छोटी सी पार्टी अच्छी रही सिवाय एक बात को छोड़कर, नैनी ने पहले ही चाय बनाकर रख दी और वह कड़क हो गयी. गल्ती उसी की थी, पर सब अपने लोग थे जो किसी ने कुछ नहीं कहा. आज सुबह  लालकिले की प्राचीर से प्रधान मंत्री का भाषण सुना, जो प्रेरणादायक होने के साथ कमियों की ओर ध्यान दिलाने वाला था. इस समय भीम सेन जोशी का आवाज में ‘वन्दे मातरम्’ यह प्रसिद्ध गीत बज रहा है जो बंकिम चन्द्र ने आजादी की लड़ाई के दौरान लिखा था. कुछ गीत अमर हो जाते हैं जैसे इक़बाल का तराना, सारे जहाँ से अच्छा..गांधीजी, नेहरु और सुभाष चन्द्र बोस के भाषणों के अंश सुने और मन उनके सम्मुख स्वतः झुक गया. लता मंगेशकर के गाए गीत की अभी प्रतीक्षा है. आज रात star टीवी  पर Train to Pakistan आएगी और १५ अगस्त का दिन बीत जायेगा.

आज इतवार है, कल शाम से ही वह कुछ परेशान है. कारण वह जानती है पर उसका निवारण नहीं कर पा रही है. उस दिन उन्होंने वह फिल्म देखी, सामान्य ही लगी उसे. कल शाम वे मेला देखने गये, आज सुबह उसने तिरंगा सैंडविच बनाया और दिखाने के लिए सेक्रेटरी के यहाँ ले गयी, उन्हें पसंद आया और कुछ देर पहले उनका फोन आया कि वह स्टेज की सजावट की जिम्मेदारी भी ले, हॉल का प्रबंध तो वह दख ही रही थी अब यह काम....शायद यही उसकी परेशानी का सबब  है और एक बात और उसे परेशान कर रही है, पिछले कुछ दिनों से हिंसा की घटनाएँ बढ़ गयी हैं, उल्फा और बोडो दोनों ने ही असम के निर्दोष लोगोंपर हमले तेज कर दिए हैं, इन्सान कहाँ जा रहा है, इस अंधी दौड़ का कहीं तो अंत होगा. उसने ईश्वर से प्रार्थना की, वह उन्हें सही मार्ग दिखाए.

कैसी है यह विडम्बना
हँसते हैं अधर, पर आँखों में अश्रु आते भर
इक हाथ उठा, इक हाथ बढ़ा
दोनों का लक्ष्य भिन्न मगर
हिंसा का कैसा चला दौर
आजाद मुल्क आजाद फिजां
फिर क्यों न बने यह सबका घर



Friday, November 29, 2013

परियों के किस्से


इतवार भी बीतने वाला है, जैसे कल शनिवार बिना कुछ कहे-सुने बीत गया. सुबह घर के कार्यों में और दो-तीन फोन करने में बीती, दोपहर सुस्ताने में और शाम कुछ देर फिल्म देखी, फिर एक मित्र परिवार आ गया और रात उसकी नादानी के कारण थोड़ी परेशानी में, जल्दी काम करने के प्रयास में थोड़ा सा हाथ जो जला लिया, सुबह देर से उठी, पर दर्द नहीं था. कल रात और आज सुबह भी आचार्य गोयनका जी की बातें बहुत याद आयीं और मन जल्दी ही संयत हो गया. इतवार के सारे काम निपटाते-निपटाते दो बज गये. नाश्ते में डोसा बनाया था, अभी-अभी बड़ी बहन का फोन आया, उसने उनके घर आने का वादा भी कर दिया है, उनकी यात्रा में केवल दो सप्ताह रह गये हैं, फ़िलहाल तो नन्हे के इम्तहान में सिर्फ एक सप्ताह रह गया है. इस वक्त मन शांत है जीवन सार्थक है यदि जीने का कोई लक्ष्य हो, दोपहर बाद टीवी देखते-देखते महसूस हुआ जून और नन्हा उसके अस्तित्त्व के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं, वे हमेशा उसके साथ हैं, इसलिए कभी-कभी वह उनकी उपेक्षा कर जाती है, पर वे उसके लिए v.v.v.i.p. हैं. आज आखिर नैनी की रजाई बन ही गयी, उस दिन सपने में देखा था, उसके दोनों बच्चे नीले रंग की रजाई पिछले गेट से ला रहे हैं,, कौन कहता है, सपने बस सपने ही होते हैं.   

आज बहुत दिनों बाद पीटीवी सुन रही है, जो चैनल वह देखती थी वहाँ उर्दू की बजाय कश्मीरी या पख्तो भाषा में गजलें आ रही हैं. गजलें उसे हमेशा से अच्छी लगती आई हैं. बेहद मीठी भाषा में एक गजल आ रही है पर भाषा कठिन है और अब एल टीवी पर यह गजल... ‘कभी बेकसी ने मारा..कभी बेबसी ने मारा...’
जून का फोन आया है, वह आज देर से आएंगे. कल रात उन्होंने उसे अचम्भित किया यह कहकर कि कल वह income tax के rules के बारे में उसे बतायेंगे. विपसना के बारे में उनका घर आने वाले मेहमानों से बात करना और रात देर तक इधर-उधर की बातें करना अच्छा लगा. अच्छा लगता है इतवार दोपहर को साइकिल से जाकर अख़बार लाना और पढ़ना, शामों को नियमित खेलने जाना. वह अनुशासित हो रहे हैं. पहले इतवार को उनका उनका सबसे बड़ा काम होता था आराम. आज पत्रों के जवाब भी देने हैं, वक्त भी है और मूड भी, वैसे वह मूड की प्रतीक्षा नहीं करती, पत्र लिखना अच्छा लगता है और जवाब तो देना ही चाहिए हर पत्र का जो उनके पास आया है. उनके बगीचे में पत्ता गोभी के साथ इन दिनों टमाटर बहुत हो रहे हैं. फूलों की भी बहार है.

आज नन्हे के स्कूल में पुरस्कार वितरण समारोह था, उन्हें भी बुलाया गया था, पिछले वर्ष के लिए नन्हे को पुरस्कार मिला है. बच्चों ने बहुत अच्छे कार्यक्रम प्रस्तुत किये. एक छोटी लडकी बहुत तन्मयता से नाच रही थी उसके नृत्य में एक अजीब सी कशिश थी.

कहाँ खो गये क्या हो गये
वे मीठे बचपन के दिन
परियां जब सचमुच होती थीं
भूतों के किस्से सच्चे थे
खुशियों का कोई मोल नहीं था
आंसू भी अपने लगते थे

नन्हा आज घर पर है, सुबह से उसे पढ़ा रही थी, समय कैसे बीत गया पता ही नहीं चला, इस समय वह टीवी देख रहा है अभी जून के आने में कुछ मिनट हैं. उसकी परीक्षाओं के बाद उन्हें जाना है, मार्ग में परेशानियाँ तो आएँगी ही छोटी-मोटी और उन्हें सहने के लिए अभी से खुद को तैयार करना होगा, और भी कई छोटे-बड़े लक्ष्य हैं जिन्हें पाना है. जिन्दगी के ये अनमोल पल यूँही गंवाने के लिए नहीं हैं. कभी अपने आप से जो वादे किये थे उन्हें पूरा करना है. खुद की तलाश में जो सफर अभी अधूरा है उसे भी. जीवन का अर्थ सही मायनों में तलाशना है. अपने इर्द-गिर्द जो कुछ भी है उसे बेहतर और बेहतर बनाना है. अपने परिवेश को परिजनों को और अपने आपको भी इस जग में सही और सार्थक ढंग से स्थापित करना है.



Friday, August 2, 2013

नेता जी का सौवाँ जन्मदिन


जून इस समय ट्रेन में होंगे, और उसे यकीन है इस क्षण उनके बारे में ही सोच रहे होंगे. उसने अनजाने में ही आज वह पेन उठा लिया है जो इस बार वे लाये थे, उनके रहते एक बार भी नहीं  लिखा इससे, अच्छा लिखता है उसने मन ही मन उन्हें इसके लिए धन्यवाद दिया. नन्हे के मित्रगण आये हैं आज, क्रिकेट खेलने, वह व्यस्त है, आज उसे पुरस्कार भी मिला है स्कूल में. दोपहर को उसकी एक सखी आ गयी थी, उसे छोड़कर आयी तो नन्हा आ गया, कुछ देर उनके यहाँ रहने वाली बिल्ली से खेलता रहा.

आज एक बेहद ठंडा इतवार था, उन्होंने ज्यादा समय घर में ही चंदामामा पढ़ते, वीडियो गेम खेलते और टीवी देखते हुए बिताया, सुबह वर्षा भी हो रही थी. शाम को फिर वही शरारती बच्चा अपने माँ-पिता के साथ आया, नन्हा उस उम्र में कितना शांत था. उन्होंने २६ जनवरी को लंच पर बुलाया है, अच्छा रहेगा, उसने सोचा गणतन्त्र दिवस की भावना के साथ वे उस दिन को और भी अच्छी तरह बिता सकेंगे. जून अपने एक मित्र की छोटी बहन की शादी में सम्मिलित होने के बाद ही लौटेंगे.

और कोई दिन होता यानि जून घर पर होते तो इस वक्त वे दोपहर का भोजन कर चुके होते, पर आज उसे भूख ही नहीं लग रही है. सुबह सामान्य रही, ठंड बहुत है, खिड़की के शीशे से छन कर  आती रौशनी से पता चल रहा है, बाहर धूप निकल आई है, लंच के बाद कुछ देर धूप में ही विश्राम करेगी. कल नन्हा नहा-धोकर अच्छी तरह तैयार होकर अपने एक मित्र के यहाँ जाने के मूड में था, कॉमिक्स बदलने के लिए, पर उसने अपनी माँ से पूछ कर बताया, वे लोग कहीं जा रहे हैं, वह कुछ देर तो परेशान रहा जैसे उस दिन स्कूल से आकर था जब मैडम का कहा काम करना भूल गया था, फिर अपने आप ही ठीक हो गया. बच्चों जैसा स्वभाव यदि बड़ों का भी हो जाये तो कहीं कोई कड़वाहट न रहे.

आज नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का सौवाँ जन्मदिन है. बचपन में जोशोखरोश के साथ वे इस दिन देशभक्ति के गीत गाते थे. कल शाम पड़ोसिन के साथ वह नन्हे को लेकर पुस्तक मेले में गयी, बहुत खुश था वह, किताबों के प्रति उसका स्वाभाविक प्रेम देखकर अच्छा लगता है, उसका मित्र और वह एक स्टाल से दूसरे स्टाल तक घूम घूम कर किताबें देख रहे थे, जून होते तो वे दोनों भी साथ साथ देखते. उसने सोचा एक बार और आयेगी वह यहाँ. उसन असमिया-अंग्रेजी शब्दकोश लिया और एक पतली सी पुस्तक असमिया में ली जिसे पढ़ना अभी शुरू नहीं किया है. कल छोटे भाई का पत्र आया है, उसके पत्र के जवाब में, उसे ख़ुशी हुई कि वह उनकी भावनाओं को अच्छी तरह समझ गया है. देर रात तक वह घर के बारे में ही सोचती रही, माँ-पापा के बारे में, जीवन के प्रति उनके दार्शनिक रुख के बारे में और उनकी खुशियों के बारे में जो वे किसी भी स्थिति में खो नहीं सकते क्योंकि वे किसी बाहरी वस्तु पर आश्रित नहीं हैं, वे पूर्णतया आंतरिक हैं, नितांत उनकी अपनी, जिनपर कोई बाहरी वस्तु असर नहीं डाल सकती, उसे भी अपने अंदर ऐसी ही शांति की तलाश है जो किसी भी तरह के बाहरी प्रभाव से पूर्णतया मुक्त हो, नितांत व्यक्तिगत. लेकिन उस शक्ति भरी शांति का दर्शन सभी को हो... और कभी नन्हा भी कह सके कि उसके माँ-पापा कभी मुसीबत में घबराते नहीं हैं वे नाना-नानी की तरह बहादुर हैं.





Saturday, April 13, 2013

तरबूज की मिठास



आज सुबह दस बजे ही वे घर से चल पड़े थे, यहाँ आकर टीवी धारावाहिकों के प्रति मोह जरा घट गया है. कल शाम ‘देख भाई देख’ देखना भूल गयी और आज सुबह ‘जमीन-आसमान’ भी नहीं देख पायी. पर आज एक अच्छी बात हुई कि बिजली की तार घर के आगे खम्भे तक पहुंच गयी है. पर घर में मीटर लगना अभी बाकी है. अगले हफ्ते घिसाई का काम शुरू हो ही जायेगा ऐसी उम्मीद है. मासी का घर अच्छा लगा पर उनका घर इतना छोटा है और रिश्तेदार इतने ज्यादा कि घिचपिच मच गयी. चाचीजी आज खुश दिखीं, चचेरे भाई बहन से भी मिली. शाम को घर आये तो भाई तरबूज लाया था, इस मौसम का पहला तरबूज ! अच्छा लगा.

  यहाँ आने के बाद उनका पहला इतवार रोज की तरह ही बीता क्योंकि साढ़े नौ बजे से ही बिजली चली गयी थी. शाम को भी नहीं थी की फिल्म देख पाते. दोपहर को माँ-पिता एक परिचित के यहाँ मुहूर्त पर गए थे, उनकी कोठी बहुत सुंदर है, मिठाई भी अच्छी थी, शुद्ध घी के बूंदी के लड्डू व समोसा आदि, नन्हे को उसने खिला तो दिया है पर उसे हमेशा नुकसान  करता है. दोपहर को ही भाई नन्हे को शादी में ले जाने के लिए आया, पर वह राजी नहीं हुआ. उसे भी नूना की तरह भीड़भाड़ से दूर रहना ही पसंद है. फिर वे सोये ही थे कि घंटी बजी, फुफेरा भाई और उसकी पत्नी आये थे, भाई की तुलना में भाभी बेहद सुंदर व शालीन लगी, सुंदर सी साड़ी पहनी हुई थी. उन्होंने बताया, कल ही उनकी बुआ का परिवार पंजाब जा रहा है, उनकी बेटी, उसकी सखी भी आई हुई है. उसके मन में आया है कि एक बार उनसे मिलकर आए.

  नन्हे को घर पर ही छोड़कर वे स्टेशन गए, उसकी सखी की शक्ल की एक लड़की बाहर ही दिखी जहां उनका घर है. माँ ने बताया, यह उसकी छोटी बहन है. आड़ू खरीद कर अंदर गए तो तो सखी व उसकी माँ से भी मुलाकात हुई. वह जरा भी नहीं बदली है, उसका छह वर्ष का बेटा भी बहुत स्मार्ट था. उसका पता लिया है, कभी उसे खत लिखेगी. शाम को नन्हा थोड़ा डल था, उसने खाना भी नहीं खाया, सुबह जब वे घर से जा ही रहे थे कि जून का फोन आया था, नन्हे के चार सौ में से तीन सौ पचानबे अंक हैं, कक्षा में द्वितीय स्थान, वह बेहद खुश था सुबह से पर शाम से ही थोड़ा उदास, शायद उसकी तबियत ठीक नहीं. उसे लेकर वह  भाई के साथ राजा गिफ्ट शॉप गयी, ‘बेटल फील्ड’ एक बोर्ड गेम खरीदा उसके लिए. घर के काम में कोई प्रोग्रेस नहीं है.





Tuesday, January 8, 2013

आक छीं...



कल इतवार था यानि लिखने का भी अवकाश, सुबह तो सारी टीवी के कार्यक्रमों में निकल जाती है, दोपहर को उन्होंने आर्गन्डी के कपड़े से फूल बनाये, पहले उन्हें अलग अलग रंगों में रंगा, फिर स्टार्च लगाया और तब  अलग अलग आकार के फूल बने. शाम को फिल्म देखी. नन्हे का आज विज्ञान का टेस्ट है, उसको सुबह बिस्तर से उठाना बड़ा मुश्किल है, ठंड भी काफी थी आज, पर अब धूप निकल आई है. कल शाम वह बेवजह उदास हो गयी ,कभी-कभी होता है ऐसा उसके साथ, पता नहीं क्यों ? जून उसे गाइड करते, उसे कुछ सिखाते, उससे ज्यादा रूचियाँ होतीं तो....शायद यही कारण है, उन्हें ऑफिस के काम के अलावा दुनिया की किसी वस्तु में दिलचस्पी नहीं है और अगर जरूरी न हो तो शायद..., हो सकता है कि वह कुछ ज्यादा ही सोच रही है पर यह बात सच है किसी हद तक..नन्हे के लिए उन्हें एक आदर्श होना चाहिए जो उसे मार्गदर्शन दे सके, उसे उत्साहित कर सके...पर उसे उनसे इतनी अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए, क्योंकि वह स्वयं ही उनकी अपेक्षाओं पर खरी नही उतरती. शायद कोई भी इंसान ऐसा नहीं जो अपनी अपेक्षाओं को पूर्ण कर पाता हो. लेकिन वह कोशिश तो करती है, उनके प्रति जागरूक तो है, पर वह तो उदासीन हैं जैसे...मस्त अपने आप में. गेंदे की जो पौध उन्होंने लगाई थी उसमें अच्छे फूल नहीं आ रहे हैं, सब खिल जायेंगे तब शोभा बढ़ेगी, वैसे हर फूल की अपनी सुंदरता होती है, आज वह अपनी कही हर बात काट रही है, शायद यह मौसम का असर है, खिली-खिली धूप का उजास मन को स्थिर रहने ही कहाँ दे रहा है. कुछ देर पहले वह उन पंजाबी दीदी को फोन करने की सोच ही रही थी कि उनका फोन आ गया, उनकी नौकरानी के यहाँ कल रात लड़ाई हो गयी, खून खराबे तक बात पहुंच गयी. पहले दिन से लेकर इस सृष्टि पर कितना खून बहा होगा इस धरती पर...पर समुन्दर अभी तक लाल नहीं हुआ..भगवान ?

कल लिखना शुरू ही किया था कि जून आ गए. और फिर दो दिन बीहू का अवकाश..वे बहुत घूमे, कार से, वैन से.. पैदल चलना, मीलों निकल जाना दूर-दूर.. यहाँ सम्भव नहीं है. हरे-भरे पेड़ों के बीच घूमना, काँटों भरे रास्तों पर, ऊबड़खाबड़ पगडंडियों पर ...जैसे उस दिन वे म्याऊं में घूम रहे थे, जो अरुणाचल प्रदेश में है, उसे बहुत अच्छा लगा था प्रकृति के बिल्कुल करीब होना. उसकी तीन कवितायें क्लब की वार्षिक पत्रिका में छपी हैं. सोचा था उसने एक तो अवश्य होगी. मौसम फिर बदली-बदली हो गया है, नन्हा जब स्कूल जा रहा था वर्षा भी हो रही थी. उन्हें घर जाने में बहुत कम दिन रह गए हैं.

परसों उन्हें जाना है, आश्चर्य है घर से न कोई पत्र न कार्ड आया है, वे लोग शादी की तैयारियों में इतने व्यस्त हो गये हैं कि...शायद आज आए. सिर्फ दो दिन के लिए जाना है उन्हें पर सर्दी की वजह से सामान काफी हो गया है, तैयारी लगभग हो गयी है, यात्रा करने से पूर्व जो उत्सुकता, उत्साह और थोड़ी घबराहट सामान्यतः होती है, शुरू होने लगी है. आस्ट्रेलिया और भारत के बीच फाइनल मैच खेला जा रहा है.

कल भारत छह रन से हार गया. शाम को दीदी मिलने आई थीं, उन्हें विदा करते समय दस-पन्द्रह मिनट वह बाहर खुले में खड़ी थी ओस टपक रही थी, उसे सुबह-सुबह दो तीन छींकें आयीं. नन्हे की चम्पक भी आई कल, बहुत खुश था.

Tuesday, November 6, 2012

नॉर्थ ईस्ट की हरियाली



जून का खत आया है, वह भी उसे लिखेगी, दो पेपर हो जाने के बाद. आज पूरे आठ दिन हो गए, अभी कितने दिन और लगेंगे उसकी आँखों को सफेद होने में. परसों पहला पेपर है, तैयारी हुई है या नहीं यही समझ नहीं आ रहा है, पढ़ती है तो सब याद आता है पर किताब बंद करते ही दिमाग में जैसे कुछ रहता ही नहीं. बिजली गायब है पिछले इतवार की तरह. कैसे बीत गए अस्वस्थता के ये आठ दिन, कैसे?

तीन पेपर हो गए हैं, डायरी लिखे हफ्तों हो गए हैं जैसे, आज सर में दर्द सा क्यों है, लिखते समय भी हो रहा था परीक्षा भवन में. पेपर फिफ्टी-फिफ्टी हो रहे हैं, साठ प्रतिशत के लायक तो नहीं हो पा रहे हैं. देखें क्या होता है. अब गणित का पेपर है, और फिर विज्ञान का, उसमें समय कम है, खैर अब पढ़ाई शुरू करनी चाहिए.

लगभग तीन सप्ताह बाद वह लिख रही है, उसकी परीक्षाएं खत्म हो गयीं, जून बनारस आए, वे सब यहाँ आ गए असम, यहाँ आये भी एक हफ्ता हो गया है, सब ठीक चल रहा है, जून का बेहिसाब ध्यान रखना, वह उन्हें स्वस्थ देखना चाहते हैं और थोड़े मोटे भी. घर से पत्र आए हैं. उसने सोचा कल जवाब देगी.

प्रथम जून, यानि ज्येष्ठ का महीना, पर यहाँ तो यह सावन का महीना ही लगता है. साढ़े दस हुए हैं, उसका सुबह का सब काम हो गया है, अभी कोई नैनी नहीं मिली है, पर उसे बनारस में रहकर काम करने की आदत से लाभ हुआ है, उसे यहाँ का काम इतना आसान लग रहा है, नन्हा अपने मित्र के साथ खेल रहा है. जून को शायद आज दिगबोई जाना है, उन्हें वहाँ से आए कल दो हफ्ते हो जायेंगे.

छोटे भाई व बहन को उसने जवाब दिया, उसके जन्मदिन पर दोनों के कार्ड आए थे. आज उनका एक परिचित परिवार सदा के लिए यहाँ से जा रहा है, अब पता नहीं कभी मिलेंगे या नहीं, वैसे वे दिल्ली जा रहे हैं, हो सकता है कभी मिलें. नन्हा आज अभी तक सोया है. उसके हाथों में निशान पड़ गए हैं, छोटे-छोटे दाने से, बाएं हाथ में साबुन पानी से, उन्हें महरी रखनी ही पडेगी.

कल जून की सातवीं तारीख थी, यानि उनके विवाह को कल पांच वर्ष पांच महीने हो गए. जून ने परसों पूछा, क्या वह नियमित डायरी लिखती है, उसने कहा, “नहीं”, अगर लिखती होती तो ‘हाँ’ कहती, अच्छा लगता उन दोनों को ही. जून यहाँ उनके आने के बाद खाने-पीने का बहुत ध्यान रख रहे हैं, कमर का घेरा बढ़ता जा रहा है और तो कहीं कुछ खास असर नहीं दीखता. नन्हा भी काफी कमजोर हो गया था, अब ठीक है, उसका दाखिला भी कराना है, देखें कहाँ होता है. मौसम यहाँ बहुत अच्छा है, आज सुबह बारिश हुई, इस समय दस बजे हैं, नन्हा गिनती लिख रहा है. मंझले भाई व माँ-पिता के पत्र आए हैं, कल वह उन्हें जवाब देगी. आज सुबह अचानक एक कार्यक्रम देखा, टीवी पर- “गीत के ढंग, संगीत के संग” कितना अच्छा गीत था और आवाज भी उतनी ही अच्छी- “फूलों से बातें करता था, खुशबुओं में रहता था... और दूसरा गीत व उसका संगीत तो अच्छा था आवाज ठीक नहीं थी. टीवी पर कल की फिल्म भी अच्छी थी, “हाफ टिकट” किशोर कुमार का अभिनय लाजवाब था अब कहाँ मिलते हैं ऐसे हीरो.
जून ने कहा है कि आज वे डिब्रूगढ़ जायेंगे. वे घर से सैंडविचेज़ बना कर ले जायेंगे. आज शनिवार है खत लिखने का दिन, तीन-चार खत लिखने हैं. कल रात जून ने एक अजीब कहना चाहिए खराब इंग्लिश फिल्म दिखाई, वह भी कहाँ जानते थे कि यह फिल्म ऐसी होगी. उन्हें साफ-सुथरी कलात्मक हिंदी फ़िल्में ही भाती हैं, ऊटपटांग इंग्लिश फिल्मों से दूर रहना ही बेहतर है. टीवी का रिसेप्शन फिर खराब हो गया है.

परसों वे पहली बार डिब्रूगढ़ विश्व विद्यालय गए, वहाँ का पुस्तकालय देखा, कुछ विभाग भी देखे, अच्छा लगा. चार पत्र लिखे, उसे मैडम को भी एक पत्र लिखना है और एक अपनी सहपाठिनी को. सुबह कितनी तेज धूप थी पर अब बादल छाये हैं. ठंडी हवा बह रही है, कितनी अच्छी जगह है भारत का यह उत्तर-पूर्वी राज्य.




Monday, October 15, 2012

जहाज का मॉडल



कालेज में आज उसका दिन ठीक रहा, पूर्णिमा मैडम उसे बहुत अच्छी लगीं, आरती मैडम थोडा दूरी बर्तती हैं, और सिन्हा मैडम भी कम नहीं हैं. शाम को बिजली भी दो बार गयी ऊपर से उमस भरी गर्मी, छोटा सा माचिस की डिब्बियों सा घर, साफ हवा को तरस जाता है मन, कितना याद आता है तब अपना घर खुला–खुला...यहाँ तो..सर्दी का मौसम शायद इतना परेशानी भरा नहीं होगा. सोनू थोड़ा सा खाना खाकर ही सो गया है.

आज पूरा दिन व्यस्तता में ही बीता, आराम भरी व्यस्तता, सुबह के काम तो वही रोज के थे फिर टीवी और तब खोजवां गए, तायी जी के घर, आजकल वह ज्यादा मेहरबान हो गयी हैं. विवाह के इतने वर्षों में दूसरी बार उनके घर गयी, खाना खिलाया और आइसक्रीम. नन्हा सो गया है, कल कालेज की छुट्टी है.

लगभग दो हफ्ते बाद वह लिख रही है. कल शाम नीचे कमरे में तरह-तरह की गंध भरी थीं. सब्जी बनाने की, मिटटी के तेल की, इतवार के कारण सब देर तक वहीं बैठे थे. घुटन सी हुई, कमरे में हवा आने-जाने के लिए मात्र एक खिडकी है, अगर पृरा कमरा एक गंध से भर जाये तो जल्दी मुक्त नहीं हो सकता. कभी कभी धुआँ भर जाता है, क्योंकि अंगीठी या लकड़ी पर भी कभी-कभी खाना बनाते हैं यहाँ. सोचा, ऊपर सोते हैं पर वहाँ भी उमस थी, जैसे इस समय है, सुबह के पौने छह बजे हैं पर हवा का नाम नहीं. बनारस में हवा की बहुत कमी है, वायु प्रदूषण है यहाँ, साँस लेने में खास तौर से इस घर में घुटन सी महसूस होती है. सब कुछ बंद-बंद, पता नहीं कितने पुराने बने हैं ये मकान, इतने सटे-सटे और पतली सी गली में.
कल जून का एक तार मिला, वह  बहुत जल्दी घबरा जाता है. उसन सोचा वह वहाँ अकेला है, वह उसे ऐसी कोई बात नहीं लिखेगी जिससे वह परेशान हो जाये. आज वह कालेज से जल्दी लौट आयी, तीन अध्यापिकाएँ छुट्टी पर थीं. यह पता चला कि अगले हफ्ते कालेज में प्राथमिक उपचार की ट्रेनिंग दी जायेगी.

वह पत्र लिख रही थी कि थकान महसूस हुई कुछ देर आंख बंद करके लेटी रही और फिर लिखने में लग गयी. कल ही आए पिता जी के अच्छे से पत्र का जवाब भी देना है, उसने सोचा नन्हे के दाखिले की बात हो जाये तब लिखेगी. वे लोग मंझले भाई के पास गए थे, उसके घर नन्हीं गुडिया आयी है, उसने सोचा वह उनके लिए एक कार्ड भेजेगी. आज कालेज में छुट्टी हो गयी. उर्दू को द्वितीय भाषा बनाने के विरोध में सभी कालेज बंद करवा दिए गए, पता नहीं कल भी खुलता है या नहीं. कल सुधा मैडम ‘भारत का संविधान’ में से टेस्ट लेंगी. पूर्णिमा मैम अपने बारे में इतना कुछ बताती हैं, अपना सब कुछ कि...उसे लगता है यह अच्छा नहीं है, छात्राओं से इतना घुल-मिल जाना, सिन्हा मैम की पारिवारिक समस्या के बारे में, नागर मैम की तबियत के बारे में, और अपने पिताजी की आँखों के मोतियाबिंद के बारे में बताती रहीं, हर व्यक्ति कितना पीड़ित है.
कल से कालेज बंद है पर उसे बहुत सारा काम करना है, कल एक चैप्टर ही हो पाया. अभी लिखने बैठी ही थी कि बिजली चली गयी, बनारस की समस्याओं में से एक. उसे ‘एस यू पी डब्ल्यू’ का प्रोजेक्ट भी बनाना है, जिसके लिए ताई जी के यहाँ जाना है, उनकी बेटी हस्तकला जानती है. गणित का काम फैकल्टी ऑफ एडुकेशन आने के बाद ही होगा. वह मन ही मन बाकि कामों का भी हिसाब लगती रही, जब तक बिजली न आ जाये कुछ और किया भी तो नहीं जा सकता.

कल उसने जून से फोन पर बात की, कितनी स्पष्ट ..पता नहीं उसने क्या सोचा हो, कितनी मीठी लग रही थी उसकी आवाज, कहा भले ही न ही पर...प्यार ही तो था वह सब. आज बापू की एक सौ बीसवीं जयंती है, कल गाँधी फिल्म देखी, उनकी महानता पर मन झुक गया. आज बदली है गगन में, वह छत पर बैठी है, नन्हा सो रहा है, अभी कुछ देर पहले ही वह भी उठी है, सुबह ही स्वप्न देखा, जब वह बारहवीं में पढ़ती थी उस समय का, सारी स्मृतियाँ सजीव हो गयीं.

आज सुबह ग्यारह बजे वे ताई जी के यहाँ पहुंच गए, शाम को लौटे. उसे एक जहाज का मॉडल बनाना है, काफी बन गया है, बाकी उनकी बेटी बना देगी. वह कॉलेज भी गयी, प्रोजेक्ट के लिए जो चार्ट आदि बनाने हैं, उसके बारे में जानकारी लेने. वापसी में चचेरी बहन के लिए एक फ्रॉक खरीदा, घर आने के बाद उसे लगा कि दुकानदार ने ज्यादा दाम लिया है, मन भारी हो गया पर उसने सोचा इससे मुक्त होना ही होगा, जो हुआ सो ठीक है, कल इसे पार्सल कर देगी. ननद को एक कार्ड लाने को भी कहा है. उसे हल्की भूख महसूस हुई, पर अगले ही पल लगा नहीं, कुछ खाने का मन नहीं है, उसे आश्चर्य भी हुआ कि खाने का वक्त होने पर भूख अपने आप खबर देने लग जाती है. उसने सोचा जून भी तो इस वक्त आकर शाम का टिफिन ले रहे होंगे. 

Wednesday, October 10, 2012

रफी के गीत



यहाँ आने के बाद से नियमित लिखने का क्रम बन ही नहीं पा रहा है, जब तक एक निश्चित समय तय नहीं कर लेती ऐसा ही होगा, सुबह नन्हे के जाते ही पहला काम क्योंकि उसके पहले तो मुश्किल है, और शनिवार को जून के जाते ही. इतवार को जैसा समय मिले, ज्यादातर सुबह उनके उठने से पहले. आज कितने दिनों के बाद रात से ही वर्षा हो रही है, मौसम ठंडा है रोज तो पसीना पोंछते-पोंछते ही रहना पड़ता था. अभी पौने दस हुए हैं, दोपहर का भोजन बन गया है. उसके सामने तीन-चार कार्य हैं - क्रोशिये का काम, जून का मफलर अधूरा है, टालस्टाय की crime and punishment या कोई अन्य पुस्तक पढ़ना, स्वयं कुछ लिखना अथवा घर की सफाई और पूरा एक घंटा है, वह सोचने लगी कि क्या करे. जून के कान का दर्द ठीक ही नहीं हो रहा, दो-तीन दिन पूर्व वह बहुत नाराज हो गया था, गलती सरासर उसकी थी सो उसके गुस्से पर प्यार आया था उसे, अपने से भी ज्यादा  ख्याल रखता है वह उसका, हर वक्त हर क्षण, उसे भी उसके बिना चैन नहीं मिलता, जितना वक्त वह घर पर रहता है मन होता है वे साथ साथ रहें...पर और भी गम है जमाने में मुहब्बत के सिवा, उसकी पढ़ाई आजकल बिलकुल ठप्प है. नन्हे का स्कूल ठीक चल रहा है, उसने तय किया कि वह क्रोशिये पर नया नमूना उतारेगी.

कल सोनू को स्कूल नहीं भेज पायी काफी देर तक मन परेशान रहा, उसकी भोली बातें भी मन को हँसा नहीं सकीं, पता नहीं ऐसा क्यों होता है कभी-कभी. आज इस समय शाम के पांच बजे हैं, वर्षा पिछले तीन दिनों से लगातार हो रही है, नन्हा सोया है, जून दफ्तर गए हैं, सीएमडी का दौरा है, शायद छह बजे आयें, फिर फील्ड जाना है, आजकल काम ज्यादा बढ़ गया है. दोपहर को भी डेढ़ घंटा देर से आये. कुछ दिन पहले काम कम होने कई शिकायत कर रहे थे.

आज छोटी बहन का जन्मदिन है, वह खुश तो होगी, उसे हमारा पत्र व कार्ड भी मिल गया होगा. मुहम्मद रफी की नौवीं पुण्यतिथि भी आज है, उसे याद है जिस वर्ष वे अपने पैतृक स्थान पर लौटकर आए थे, कुछ दिन वे दादाजी के साथ रहे थे, तभी मुहम्मद रफी का देहांत हुआ था. जून ने बनारस फोन करने की कोशिश की पर कोई फायदा नहीं हुआ. आज उसने अपने एक मित्र को तिनसुकिया से टिकट बुक करने को कहा है, देखें क्या होता है, टिकट मिल गयी तो पाँच को उसे जाना होगा, वैसे अभी तक तो यही निश्चित नहीं है कि ट्रेन चल रही है यह नहीं. उसे यहाँ आना ही नहीं चाहिए थे यह कहने का मन नहीं होता. यह एक महीना या बीस-पच्चीस दिन ही, मधुरता से बीते हैं जैसे छुट्टियाँ मिली हों, वहाँ जाकर तो फिर वही कॉलेज, झमेले. कॉलेज जाना हुआ तो नन्हे की देखभाल की समस्या होगी, उसे भी स्कूल भेजना होगा, यह बहुत जरूरी है, उसका वक्त भी अच्छा कटेगा और पढ़ना लिखना भी सीखेगा, वह व्यस्त रहेगी तो घर पर उसे पढ़ा भी कहाँ सकेगी, टिकट मिल जाएँ तभी अच्छा है, तभी उसने घड़ी की और देखा नन्हे को लेने जाना है, महरी का कुछ अता-पता नहीं, बहुत देर से आती है. जून फील्ड गए हैं, शायद देर से आयें.

 



Friday, September 21, 2012

गहराई कितनी गहरी...



कल रात वर्षा ने आंखमिचौली खेली, दो बार बिस्तर ऊपर-नीचे हुआ, फिर उन्हें नीचे कमरे में सोना पड़ा, इतनी घुटन, इतनी बंद हवा कि अभी तक सिर भारी लग रहा है, और नींद भी कैसी स्वप्नों भरी थी. इस समय भी मौसम बेहद गर्म है. नन्हा इन सारी परेशानियों के बीच कैसे आराम से सोया है, बच्चे आखिर बच्चे ही होते हैं, बादशाह अपने मन के. दिन में जब वह सोया न हो, उसके हाथ, पैर तथा मुंह चलते ही हैं, न चलते-चलते थकता है न बोलते-बोलते. जून को पत्र लिखते समय वह हर बात लिख देती है, छोटी-बड़ी अपने मन की, और उसके बाद एक अजीब सा खालीपन महसूस होता है, यह अपना आप उड़ेंल देना, अपने को निर्वस्त्र कर देने सा ही है न, कहीं कुछ तो बचा कर रखना ही चाहिए, भले ही जून उसका ‘स्वयं’ ही क्यों न हो, स्वयं से भी कुछ बातें छिपी रहें तो रहस्य बना रहता है, कौतूहल भी. कल रात से उसे खत लिखने के बाद से ही एक रीतापन सा महसूस हो रहा है अब उसका अगला पत्र आने तक ऐसा ही रहेगा.

परसों उसने सौ रुपये के नोट का फुटकर करवाया, दो ही दिन में आधे पैसे खर्च हो गए, जब तक नोट बंद था ठीक था. ननद के पेपर चल रहे हैं. सोनू और वह छत पर हैं, माँ किचन में. बिना प्रेस किये कपड़े पहने हों कभी याद नहीं पड़ता, सातवीं-आठवीं में पढ़ती थी उसके बाद से तो कभी भी नहीं, यहाँ प्रेस खराब है, पैसे देकर कपड़े प्रेस करना खलता है, पर क्या करें. कल शाम को गर्मी ज्यादा थी उसने स्नान किया, बाल पोंछे ही नहीं, देर तक ठंडक साथ रही. अभी फिर रीठा आदि लगाकर बाल धोए हैं, छींके आनी शुरू हो गयी हैं, लगता है सर्दी होगी, वही कॉमन कोल्ड...

जून का खत आया है, सो मन तो खुश है, पंछी की तरह उन्मुक्त खुले-खुले गगन में उड़ता हुआ सा..उसने भी उसे लिखा है, उस भोले, उदार मित्र को, वह स्वयं भी नहीं जानती थी कि उसके लिए इतना प्यार छिपा है उसके मन में , उसके मन में उसके सिवा और कुछ है भी कहाँ. वह खुश रहे, सुखी रहे यही दुआ निकलती है हर पल. उसको खुश रखना उसका सर्वप्रिय कार्य है. आज घर का माहौल हल्का-हल्का है, माँ भी ठीक हैं, पर उनका दुःख कितना गहरा है उसका अनुमान कोई और नहीं लगा सकता. पर फिर भी जीना तो है ही, खुश भी रहना है, क्यों कि जीवन है तो खुश रहने की इच्छा भी है, सुख की आकांक्षा भी है. दुःख को भुला कर मुस्कुराना भी है. समाचारों का समय हो रहा है, जून भी समाचार दख रहे होंगे.

कल रात उसने ‘गहराई’ फिल्म देखी, फिल्म के दृश्य बार-बार स्वप्न में आ रहे थे. पहले कभी इसके बारे में सुना था. आज इतवार है, वह स्नान करके लिखने बैठी है, नन्हा सो रहा है. जून भी शायद चाय की चुस्कियां ले रहे होंगे. आज शाम को उन्हें चाची की लड़की की मंगनी में जाना है. माँ-पापा का खत भी आया है, उसे घर जाना ही चाहिए. उसने सोचा २८ या २९ को जायेगी, रिजर्वेशन के लिए जून के मित्र को कहना होगा.

 



Friday, September 14, 2012

इतवार की सुबह



ग्यारह बजने में बीस मिनट, सुबह छह बजे उठने के बाद अब एक मिनट हुआ, बैठी है, डायरी लिखने का बहाना है, पैर कुछ विश्राम चाहते हैं और मन भी एक जगह रुक कर कुछ सोचना चाहता है. आज शायद जून का पत्र आये. कल दोपहर और फिर शाम को कितने घंटे व्यर्थ किये, स्वेटर का गला बनाने में, पर अभी तक नहीं बना है, उसे तो पूरा करना ही है, उसके बाद जो गणित की किताबें ली हैं, उन्हें देखना है. सोनू दादाजी के साथ आटा लेने गया है.

सुबह के साढ़े सात बजे हैं, नन्हा सोया है. सो उसे वक्त है कि दिन की शुरुआत करते हुए कुछ सोच सके. नीचे कमरे में एक तो गर्मी थी, दूसरे पडोस में टीवी की आवाज व्यवधान उत्पन्न कर रही थी, सो यहाँ उपर आ गयी है. यहाँ ठंडी हवा (धूल भरी ) आती है, यहाँ उनका बालकनी कम बाथरूम है, इस घर में इतनी समस्याएं हैं पर माँ-पिता ने कभी सोचा ही नहीं कि इसे बदला जाये. जिंदगी के चालीस साल इसी घर में गुजार दिए. माँ की तबियत ठीक नहीं है, उसे तो लगता है उनके तन की अस्वस्थता मन की ही छाया है, पर कौन समझा सकता है उन्हें. जब तक वे खुद न चाहें, वः कुछ करना ही नहीं चाहतीं, उदासीन हो गयी हैं सबसे, पर ऐसे कब तक जिया जा सकता है. वास्तविकता की दुनिया में जितनी जल्दी लौट आयें उतना ही अच्छा है. कल जून का पत्र आया वह उदास है कि उसे उनके पत्र नहीं मिल रहे हैं, पता नहीं क्यों. सुबह का एक कप दूध अभी पिया उसने, उसे समझ नहीं आता कि सुबह से बिना कुछ लिए यहाँ लोग दस-ग्यारह बजे तक कैसे रह लेते हैं. वह पुस्तक पढ़ने बैठ गयी जो प्रवेश परीक्षा के लिए लायी थी.

फिर वही कल का सा समय है, लेकिन वह नीचे कमरे में है, कपड़े प्रेस करने के लिए चादर बिछा रही थी की ननद ने बताया, पिताजी ने ऊपर कपड़े प्रेस करने को कहा है, नीचे जो बिजली खर्च होती है, उसका बिल आता है जबकि ऊपर की बिजली फ्री है, उसे समझ नहीं आता. रात अजीब-अजीब स्वप्न देखती रही, पता नहीं इनमें कोई सार भी है या उसके मन का पागलपन है. कल सभी भाई-बहनों को पत्र लिखे.

सुबह साढ़े पांच बजे ही उठ गयी थी, छत पर टहलने गयी, सूर्योदय के समय बहुत अच्छा लग रहा था. हर जगह की अपनी कुछ विशेषताएं होती हैं, और कुछ खामियां जैसे हर व्यक्ति की. आज इतवार है, सुबह का मीठा दूध पीते समय उसे याद आया, जून इतवार सुबह की चाय पी रहे होंगे. कैसे बीतते होंगे उनके दिन-रात, उसकी याद तो आती होगी. नन्हे ने नीचे से आवाज दी और वह उसे लेकर ऊपर आ गयी है, कह रहा है और सोयेगा और लेट गया है, देखें कितनी देर लेटता है.