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Monday, November 10, 2025

दिवोदास की कथा

दिवोदास की कथा 


आज दिन भर सुखद व्यस्तता बनी रही।सुबह टहलने के बाद उन दोनों ने कुछ देर साइकिल चलायी। हरसिंगार के पेड़ इन दिनों पूरे शबाब पर हैं। कई पेड़ों के नीचे बिछी फूलों की चादर आकर्षित कर रही थी, पुन: फ़ोटोग्राफ़ी करने गये। शनिवार साप्ताहिक सफ़ाई का दिन भी है। जून ने नूना के बालों में रंग भी लगा दिया। थोड़ा बच गया तो लगभग साल भर बाद अपने बालों में भी लगा लिया। शाम को पुन: साइकिल से जाकर एक नया पौधा और एक गमला ख़रीद कर लाये, सीढ़ी के मोड़ पर रखना है। गमलों के नीचे रखने वाली प्लेट्स भी ख़रीदीं।नाश्ते में दोसा और फ़िल्टर काफ़ी, लंच में ब्रोकोली की खिचड़ी। किचन का भार जून ने ही सँभाल लिया है जैसे। कल बच्चों के आने का दिन है, वह इडली के साथ कश्मीरी हलवा बनाने वाले हैं।दोपहर को छोटी बहन का फ़ोन आया, थोड़ी परेशान लग रही थी, काम का दबाव है और स्वास्थ्य भी पूरा ठीक नहीं है। बहनोई की आँख का कल कैट्रैक का ऑपरेशन है। उसे एक अच्छा सा संदेश लिखने का तय किया नूना ने।एक अच्छी नींद बहुत से रोगों का इलाज है।पापाजी से उसकी  चार दिन बाद बात हुई, उन्हें आज की कविता अच्छी लगी।जून के भेजे कुकीमैन बिस्किट उन्हें मिल गये हैं। ‘काव्यालय’ पर एक पुरानी कविता पोस्ट की है। 


आज का इतवार अच्छा रहा। सुबह लॉन में नई लगी घास पर नये पाइप से पानी डाला, पर शाम से मूसलाधार वर्षा हो रही है।नौ बजे नन्हा और सोनू आ गये थे। भरवाँ इडली व लोभिया भी बनाया था। कश्मीरी हलवा विशेष था। पहली बार मैक पर सभी को व्हाट्सेप कॉल की। दीदी आज बहुत खुश लग रही थीं, वह इंगलिश ग्रामर सीख रही हैं।उन्होंने साइलेंस कोर्स के बारे में भी पूछा। कल मंझले भाई-भाभी से बात हुई। उनकी बिटिया बहन की बिटिया से टोरंटो में मिली। शाम को बादलों से झाँकता सूर्यास्त पल भर को देखा। नन्हा आज ईवी ले गया है, सर्विसिंग करानी है। अगले हफ़्ते उसके जन्मदिन पर पार्टी होगी, मेनू आज ही बन गया। 


आज दोपहर कुछ फ़ोटो प्रिंट करके फ़्रेम में लगाये, फिर छत तक जाने वाली सीढ़ी की दीवार पर लगाये। बैंक में अकाउंट खोलने के लिए फार्म भरा। नन्हे ने क्रैब मोबाइल स्टैंड खिड़की पर लगा दिया था, सुबह योगा सेशन की रिकार्डिंग की। आज पहली बार ज्वार का दलिया खाया, अच्छा लगा। एसी का स्विच बदला। बाथरूम का लीकेज अभी ठीक नहीं हुआ। रात के भोजन में मोरिंगा  का थेपला बनाया। 

   

सुबह वे उठे तो वर्षा हो रही थी।शायद रात भी होती रही थी। बाद में कुछ देर को थमी तो टहलने गये।बोटेनिका का गेट खुला था, सो उधर ही चले गये। सड़कों पर कई जगह पानी भरा हुआ था। सोमनहल्ली के रास्ते में  सुवर्णमुखी नदी में तेज गति से जल  बह रहा था। रास्ते में कीचड़ भी था। एक जगह लाल मुसंडा की एक डाल टूट कर गिर गई थी, घर आकर उसकी कटिंग्स लगा दी हैं। दस बजे बैंक जाना था। जून ने कार में पेट्रोल भरवाया, सौ रुपये से अधिक है एक लीटर का दाम। नन्हे से बात हुई, उसने बताया, सुबह सवा आठ बजे वह सीट पर बैठा था और अभी नौ बजे आख़िरी कॉल ख़त्म हुई है। उसने अमेजन और मिन्तरा के बिज़नेस की कुछ बातें बतायीं। सोनू अभी भी फ़ोन पर थी, वह अपने नये काम को रोज़ एक घंटा सीखती है।आज वर्टिकल गार्डन बनाने की ओर पहला कदम बढ़ाया। 


आज रात्रि भोजन के बाद वे टहलने निकले तो औरेंज जास्मिन के फूलों की सुवास ने मन मोह लिया पर लौटे तो पड़ोस के निर्माणाधीन मकान से धुँए की गंध आयी जो एसी के द्वारा खींच लिए जाने पर कमरे में भी भर गई है। ‘देवों के देव में’ काशी के राजा रिपुंजय द्वारा वरदान प्राप्त करने के बाद शिव की विदाई का अद्भुत दृश्य दिखाया गया। दिवोदास या रिपुंजय की कथा शिव पुराण में आती है। इनके चरित्र पर एक पुस्तक भी लिखी है राहुल साँस्कृतायन ने। आज कुछ देर गुरुवार के मंत्र का जाप किया। मृत्यु के बारे में एक प्रवचन सुना। शरीर में जीवन प्राणों के द्वारा ही टिका हुआ है। समान, प्राण, अपान, उदान और व्यान पाँच प्राण हैं, जिनके जाने से शरीर में मृत्यु के बाद भी कुछ देर तक जीवन के लक्षण दिखायी देते हैं। हर कोशिका में जीवन है तथा उसमें ज्ञान भी है। जून ने आज सुबह झूले पर टचवुड लगाया, बहुत सुंदर लग रहा है। आजकल वह उत्साह से भरे रहते हैं और नए-नए काम ढूँढा करते हैं। सब्ज़ी का ट्रक आया था और फलवाला घर आकर इमाम पसंद आम दे गया। नन्हे ने दो तरह के सौंफ भेजे हैं, जो पूरा वर्ष चलेंगे।नूना को लगता है, जीवन ऐसे ही छोटे-छोटे पलों से मिलकर बनता है, जिन्हें गौर से देखने पर उस अनाम की छाप हर कहीं दिखायी देती है।    


Thursday, April 6, 2017

नवम्बर की धूप


पिछली तीन रात्रियों को ठीक एक बजकर सैंतालीस मिनट पर कोई उसे उठा देता है. उसके बाद भीतर से कोई कहता है जीवन अब बदल जायेगा. पूर्ववत् नहीं रहेगा. एक ख़ुशबू की परत, चारों ओर लिपटी रहती है. उनके भीतर कितने खजाने हैं, रंगों, खुशबुओं और संगीत के खज़ाने ! उसका मन एक अनोखी शांति से भर गया है, मन उसका नहीं रहा इसलिए कोई अदृश्य सत्ता ही अब सूत्रधार है. परसों लेडीज क्लब की मीटिंग है, वह मृणाल ज्योति की डोनेशन बुक लेकर जाएगी.

कल रात एक स्वप्न देखा, एक कार में वह बैठी है और उसे कुछ ही दूर जाना है पर उस कार में न स्टीरियंग है न ब्रेक. वह निर्धारित स्थान से आगे चली जाती है, सड़क आ गयी है जिस पर सामने से तेज गति से आते वाहन हैं. उसे डर लगता है पर गाड़ी बिना टकराए मुड़ कर किनारे से निकल जाती है.

कल रात कोई स्वप्न नहीं देखा, देखा भी हो तो स्मरण नहीं है. सुबह ठीक चार बजे किसी ने उठा दिया. वह कोई जो उसके भीतर रहता है, वह उसे एक पल को भी नहीं भूलता, वही वह है अब, तो स्वयं को कोई कैसे भूल सकता है. हरसिंगार के वृक्ष के नीचे की छाया में उसकी ही अनुभूति है, उसकी ही ख़ुशबू है जो चारों ओर से घेरे हुए है. सूखे पत्तों की आवाज में भी वही है, हवा की सरसराहट में भी वही, सामने हरी घास पर बिखरी धूप में उसकी ही चमक है, फूलों के रंगों में, शीतल हवा के स्पर्श में वही तो है, अब शरद काल आ गया है, आकाश नीला है और वृक्ष कितने हरे, एक सन्नाटा बिखरा है चारों ओर जो उसकी ही खबर दे रहा है. आज स्वास्थ्य पहले से बेहतर है. वह आने वाला है इसलिए ही देह को तपाकर स्वच्छ किया प्रकृति ने, फिर भीतर के सारे विकारों को निकाल बाहर किया. तन व मन दोनों हल्के हो गये हैं. अब कुछ करना शेष नहीं है, घर का मालिक आ गया है, अब जो भी वह कराएगा, वही होगा !

हरसिंगार के पत्तों से छनकर धूप के नन्हे-नन्हे गोले उसकी डायरी पर बन रहे हैं. यानि परमात्मा के हाथों से बनी कला ! उसके फूल अभी तक गिर रहे हैं, जो एकाध डाली पर अटके रह गये थे. हवा आज भी शीतल है और सड़क पर स्थित खम्भे का बल्ब आज भी कर्मचारी लगा रहे हैं, एक बल्ब के लिए पूरी की पूरी टीम आई है. पिताजी का मनोरंजन हो रहा है. उसने बोगेनविलिया के गमले धूप में रखवा दिए हैं. इस वर्ष उनमें अवश्य अच्छे फूल आएंगे. कल सिर्फ एक टिकट शेष रही, वह भी बिक जायेगी. आज की दो पोस्ट उसने सुबह ही लिख दी हैं, जून ने कहा, नौ बजे से दो बजे तक बिजली नहीं रहेगी.


नवम्बर की गुनगुनी धूप तन को सहलाती है. बाल सूर्य की किरणों की आभा में जब तृण की नोकें चमचमाती हैं, वृक्षों की डालियाँ एक अनोखी आभा से भर जाती हैं. फूलों की सुगंध रह-रह कर नासापुटों में भर जाती है. बोगेनविलिया की डालों से टपकती टप-टप ओस की बूंदें अंतर भिगाती हैं, झरते हुए फूलों की कतार सी जमीन पर बिछ जाती हैं. जीवन को उसकी सुन्दरता का अहसास जो कराती है, अम्बर की वह नीलिमा स्वप्नलोक लिए जाती है. खगों की कूजन ज्यों लोरी सुनाती है ! पत्तों की सरसराहट.. ज्यों पवन पायल छनकाती है. गुलाबी रंगत कलिका की.. भीतर मिलन का अहसास जगाती है. हर शै कुदरत की उसकी याद दिलाती है. इतनी सुंदर थी यह दुनिया क्या पहले भी..उससे इश्क के बाद नजर जो आती है. दूब घास की हरी नोक भी यहाँ सुख सरिता बहाती है, सड़क पर जाते हुए हरकारे की आवाज भी भीतर कैसी हूक जगाती है. बगीचे में करते माली की खुरपी की ध्वनि जैसे सृष्टि का संदेश सुनाती है. रचा जा रहा है हर पल इस जहाँ में चुपचाप ओ मालिक, यह बात आज समझ में आती है. 

Friday, May 2, 2014

मिलान कुंदेरा की किताब



दिल था कि संभल ही गया
जां थी कि मचल ही गयी
अक्तूबर महीने का प्रथम दिन, लॉन में हरसिंगार में फूल झरने शुरू हो गये हैं. शरद पूर्णिमा भी आने वाली है, जब चाँदनी रात में चावल की खीर बनाकर चाँद की किरणों से सेवित होने के लिए रखी जाती है. वर्षों पहले उसने वाराणसी में शरद पूर्णिमा की महत्ता पर एक प्रवचन सुना था, जिसकी स्मृति अभी तक बनी हुई है, उसमें रास का जिक्र था, राधा-कृष्ण के प्रेम का, गोपियों के मधुर भाव का. आज भी अवकाश है, उसने लंच में कढ़ी-चावल बनाये. कल शाम एक मित्र के यहाँ भोजन किया, वह भी एक सब्जी बनाकर ले गयी थी पर उसे किसी भी वस्तु में स्वाद नहीं आया.
आज दिन भर कुछ नहीं लिखा पर रात्रि भोजन के बाद बाहर वे टहलने गये तो जुगनुओं की झिलमिल ने मन मोह लिया, नन्हे ने पल भर के लिए एक जुगनू को मुट्ठी में बंद कर लिया और अंगुलियों की दरारों से झांकती रोशनी देखकर मुग्ध हो गया. उसे याद आया कभी-कभी कोई जुगनू खिड़की से उनके कमरे में आ जाता है, अँधेरे कमरे में उसकी उपस्थिति स्पष्ट हो जाती है.

बस थोड़ा सा तम हरते, टिमटिम यूँ चमका करते
बागों, खेतों, जंगल, रस्तों को जलकर उजला करते

अद्भुत काया, पंख सुनहरे, नन्हे-नन्हे दीप जलाये
सूने पथ पर साथी बनते, मीलों संग चलते-चलते

कोमल तन, छुअन कोमल, हाथों पर आ कर टिकते
हुई शाम तो दिया जलाकर, रजनी का स्वागत करते

आज उसने टीवी पर एक हास्य कवि सम्मेलन देखा-सुना, एक किताब पढ़ी Milan Kundera की, बहुत अच्छी लग रही है यह किताब. laughter का विश्लेषण लेखक ने बखूबी किया है. हँसी जो कभी-कभी आती ही जाती है, यूँही रूकती ही नहीं, महान लेखक वाकई महान होते हैं. सोचा हँसी पर खुद भी कुछ लिखे-

खन-खन करती और कभी रुनझुन पायल सी
हँसी बिखरती ज्यों नभ से वर्षा होती

अंतर से फूटे ज्यों झरना अधरों से बिखरे ज्यों नगमा
पड़ श्रवणों में मन को भी गुदगुद करती

गूँज किसी निर्दोष हँसी की बन स्मृति दिल में बसती
कभी भिगोती आँखें भी कभी नम करती  

आज भी धूप काफी तेज है, सफाई अभियान में आज वह स्टोर की सफाई करवा रही है, सुबह हल्का व्यायाम किया, पर इतना पसीना आया और श्वास भी फूलने लगी, शायद यह उसका वहम हो या अभी तक.. थक जाने की हद तक काम करने का मन अब नहीं होता. कल शाम एक सखी के यहाँ एक विज्ञापन देखा, पर इंटरव्यू उसी दिन है जिस दिन उन्हें दीवाली की खरीदारी के लिए तिनसुकिया जाना है, दिसम्बर में घूमने जाने के लिए टिकट भी उसी दिन रिजर्व करानी है. सखी ने लक्ष्मी पूजा के दिन हलवा(सूजी का) खिलाया, लगा कि प्रसाद ही खा रहे हैं. घर से ‘सगड़ा’ भी आया है, वे हर वर्ष भेजते हैं या स्वयं देते हैं, उन तीनों को हाथ पर बांधना है और फिर वापस भी भेजना है. उसे याद आया भैयादूज का टीका भी भेजना है.

Today she is alone at home since 7 in the morning. Jun has joined a training programme for three days in T &D so he is not coming for lunch. She got cleaned dining room and gallery then cooked lunch for Nanha and herself, took bath leisourly at 10.30 then read ‘bhagvad gita’ for half an hour, exercised and watched a music based prog on ptv, anchor was shanaz and guest was a modern lady singer of Pakistan. Song was about freedom, which is very essential thing for every person and for her it is a part of life, to spend some time of day with herself doing the things which she likes, so what is the use of 9-4 job for which she will have to give entire morning also at least eight hours of each day for some money, which she does not want. So ‘yes’ to tinsukiya and no to interview.

आज भी जून दोपहर को घर नहीं आये, कल शाम उन्हें घर आते-आते साढ़े पांच हो गये थे, उनकी ट्रेनिंग अच्छी रही, बहुत सी बातें उन्हें भी बतायीं. ध्यान कैसे करते हैं, मन की विभिन्न अवस्थाओं के बारे में भी, नींद, स्वप्न, तनाव सभी के बारे में. जून को इन सब विषयों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी, सो उन्हें अच्छा लगा. कल रात सोने से पहले व सुबह उठकर भी उन्होंने ध्यान किया. जिन्दगी के एक नये पहलू की ओर उनका ध्यान जा रहा है. वह बेहद खुश लग रहे थे तनाव मुक्त, वाकई में संतुष्ट. उसे इसलिए भी अच्छा लगा कि उम्र के साथ-साथ जो गम्भीरता स्वभाव में आती है वह ध्यान से ही आ सकती है. आज उन्हें प्राणायाम सिखाया जायेगा. उसने सुबह सफाई का काम आगे बढ़ाया फिर पीटीवी देखा, एक फिल्म का थोड़ा सा भाग, फिल्म की नायिका इतनी घरेलू सी लगी. मोहसिन खां का इंटरव्यू भी, जो पहले क्रिकेटर थे फिर फिल्मों में चले गये. एक सखी का फोन आया, उसने व्रत रखा है आज करवाचौथ का, जून को उसने कहा तो हमेशा की तरह उन्होंने टाल दिया उसे भी कहाँ इन बचकानी बातों में रूचि है.




  

Tuesday, September 24, 2013

इक़बाल की शायरी


आज मदहोश हुआ जाये रे...मेरा मन..मेरा मन...शरारत करने को ललचाये रे..मेरा मन ..और सचमुच मन बेकाबू हो गया है. इस उम्र में यूँ बहकना कोई शराफत तो नहीं, पर आँखें हैं कि उम्र का लिहाज नहीं करतीं, फिर दिल तो है दिल लेकिन वह सरसराहट जो बरसों पहले महसूस की थी, सोचती थी वह सब पीछे छूट गया पर दुनिया में इतने अफसाने यूँ ही तो नहीं लिखे गये, हर उम्र में एक बचपन छुपा होता है और उसी तरह एक यौवन भी. उसका सुबह का काम हो चुका है, आज बहुत दिनों बाद धनिये की चटनी बनाई है, यहाँ के बड़े-बड़े नीबुओं में रस बहुत होता है, उसी को डाला है खटाई के लिए, उसका अचार भी बन सकता है पर मुश्किल यह है कि खायेगा कौन ? कल दोपहर एक सखी के यहाँ गयी, उसकी छत पर पर एक अपने-आप उग आया एक जंगली बगीचा देखा, अच्छा लग रहा था. जून की गाड़ी खिड़की से दिखाई दी सो उसने लिखना बंद किया.

कल जो तामसिकता मन पर छाई थी आज उतर गयी है और एक बार फिर हे ईश्वर ! वह उसकी कृपा के घेरे में आ गयी है. रास्ता भटक गयी भेड़ फिर चरवाहे के पीछे-पीछे चलने लगी है. भटकाव में काँटों ने उसे लहुलुहान कर दिया था और आँखों में जहरीले पत्तों का रस चला गया था, वह जो कुछ देख रही थी वह भ्रामक था पर अब चरवाहे ने उसको पहले सा स्वस्थ कर दिया है. आज भी हल्की-हल्की फुहार के बीच बसंती बयार बह रही है. पीटीवी पर इक़बाल की नज्म सुनी- ‘सूरज’

चाँद तारों के ऊपर जाते-जाते सूरज
श्याम सियाह अमा को उफक से लाली के फूल दे गया...

कुछ ऐसे ही थी पहली लाइन, इक़बाल की शायरी की एक किताब उसके पास भी है, उसने सोचा आज पढ़ेगी. और better sight without glasses पढ़ने का विचार भी कई दिनों से है. स्वामी रामतीर्थ की पुस्तक भी अभी पढ़नी शेष है. पिछले दिनों उसने अख़बार और पत्रिकाओं के अलावा कुछ नहीं पढ़ा, शायद इसी का असर हो कल की अहमकाना हरकतों पर..खैर, अब आज का तस्सवुर करना चाहिए.

किन राहों पर चलना होगा कितनी दूर ठिकाना है
तेरी आवाजों के पीछे और कहाँ तक जाना है

यह शेर किसी हद तक उसके दिल की हालत बयाँ करता है. अक्टूबर का महीना शुरू हो गया है यानि हरसिंगार की भीनी-भीनी खुशबू का महीना, दीवाली की तैयारी और घर की सफाई का महीना. २९ अक्तूबर को माँ-पापा भी आ रहे हैं उनके आने से दीवाली की खुशी दुगनी हो जाएगी. नन्हा आज भी cubs की ड्रेस पहन कर गया है, उसके स्कूल में इंस्पेक्शन है. कल कह रहा था की हिंदी के टीचर कह रहे हैं, दो दिन स्कूल में ड्रामा चलेगा. हर जगह आडम्बर है, ऊपर से कुछ अंदर से कुछ, सच से लोगों को घबराहट होती है, डर भी लगता है.

आज से ठंड का अहसास बढ़ गया है, सुबह स्नान करते समय भी गर्म पानी की आवश्यकता महसूस हुई और इस समय पंखा चलाने पर ठंडक महसूस हुई. गुलाबी ठंड वाली सर्दियां उसे अच्छी लगती हैं आज एक तेलुगु सखी जा रही है, पिछले दस-बारह वर्षों का उनका परिचय था, एक बार मिलकर आने का मन है. जून को एक-दो बार कहना पड़ेगा लेकिन फिर वह मान ही जायेंगे. आज वह नन्हे के खिलौनों का शोकेस भी साफ करेगी. कल उसके हिंदी अध्यापक ने एक लेख लिखने को कहा था, स्कूल जाने तक लिख रहा था.

परसों वे तिनसुकिया गये और डाइनिंग टेबल का ऑर्डर दे ही दिया, कल यानि मंगलवार को यहाँ आ भी जाएगी, थोड़ी मंहगी है पर जून को सस्ती चीजें पसंद भी कहाँ आती हैं. उनके घर के बाहर किचन गार्डन में डालने के लिये जो मिट्टी का ढेर पड़ा है उस पर चढ़कर बच्चे खेल रहे हैं, दिल कहता है खेलने दो पर दिमाग का तकाजा है कि मिटटी बिखर जाएगी और व्यर्थ जाएगी. सो मना करन ही ठीक है. उसकी बांयी आँख से कुछ दिन से पानी आ रहा है, शायद tear duct block हो गयी है. मेडिकल गाइड में पढ़ा अपने आप भी खुल सकती है. कल छोटे भाई और दीदी के पत्र मिले, विस्तृत पत्र.. बड़े मन से लिखे गये हों जैसे. उसका मन कृतज्ञता से भर गया.