ज्ञानेश्वरी
नन्हे ने समारोह की सुंदर तस्वीरें भेजी हैं। जून का स्वास्थ्य पहले से बेहतर है। सुबह नूना उठी तो वह पहले ही उठ चुके थे। घर का काम बिना नैनी के ठीक-ठाक चल रहा है। आज वसंत पंचमी पर कविता प्रकाशित की। छोटा भाई सिक्किम में काफ़ी स्थान देख रहा है, उसमें जोश और उत्साह बहुत है। छोटी बहन परीक्षा की तैयारी में लगी है।
अभी कुछ देर पूर्व एक विचित्र स्वप्न देखकर नूना की आँख खुली। वह और माँ एक कमरे में सोये हैं। थोड़ी दूर पर दूसरा कमरा है, जहाँ छोटी बहन सोयी है, उसका बिस्तर इस कमरे से दिखायी पड़ता है। माँ कहती हैं, बिटिया क्या हुआ, मैं आ जाऊँ ? नूना उसकी तरफ़ देखती है तो तकिये के ऊपर टहनियों की भाँति हाथ हिल रहे हैं, जैसे कोई डूबता हुआ व्यक्ति जल के ऊपर हाथ निकालता है। कुछ देर देखने के बाद नूना उसके पास जाती है, अब वह टहनियाँ कहीं ग़ायब हो गयीं। किसी के बोलने की आवाज़ आ रही है।वह उसे हिलाती है, उसका चेहरा नीले रंग से रंगा है, माथे पर सफ़ेद रंग है और गले पर भी हरा या कोई अन्य रंग। नूना उसे आवाज़ देती है, पर वह गहन निद्रा में है। वह माँ को आवाज़ देती है, वह आती हैं पर उसकी यह हालत देखकर भयभीत नहीं होतीं, बल्कि हँसने लगती हैं, ज़ोर से नहीं, पर हल्की सी मुस्कान छा जाती है उनके मुख पर, तभी नींद खुल जाती है। क्या अर्थ हो सकता है इस स्वप्न का? उसके पहले गुरुजी के आश्रम के दो व्यक्तियों को उनके काम के सिलसिले में आये तथा काम करते हुए देखा था। गुरुजी की चर्चा भी हुई।
आज सुबह स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर पंच तत्वों में विलीन हो गयीं। दो दिन का राष्ट्रीय शोक मनाया जा रहा है और राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार मुंबई के शिवाजी पार्क में किया गया है। नन्हा व सोनू भी बैंगलुरु पहुँचने वाले हैं। आज लता जी पर एक पोस्ट प्रकाशित की, उनको चाहने वाले करोड़ों की संख्या में हैं। ईश्वर भी उन्हें अपने पास बुलाकर आनंदित हो रहे होंगे। नूना ने आज रामकृष्ण परमहंस के बारे में पढ़ा और सुना।अद्भुत संत थे वह, ईश्वर के साक्षात रूप उन्हें दिखते थे, उनकी साधना अतुलनीय थी। उन्होंने ध्यान का महत्व बताया, वह स्वयं भी घंटों ध्यान में लीन रहते थे।
आज जून ने कहा, कल से सुबह टहलने जाएँगे।लेकिन दो दिन बाद ही एकांत वास से बाहर आयेंगे। सभी से फ़ोन पर बात कर लेते हैं।आज अमर संत ज्ञानदेव द्वारा लिखी ‘ज्ञानेश्वरी’ पहली बार सुनी। जिसने भी उसे रिकॉर्ड किया है, धन्य है वह ! बहुत ही रोचक ढंग से लिखी गई है। जिसे सुनते-सुनते ही समाधि का अनुभव होने लगता है।भारत में अनोखे योगी व संत हुए हैं, जिनके लिए कुछ भी असंभव नहीं है। वह कहीं भी प्रकट हो सकते हैं। परमात्मा की शक्तियाँ अनंत हैं, जो उनसे जुड़ जाता है, वह उन शक्तियों कि स्वामी बन जाता है। एक ही चेतना से यह सारा जगत बना है, उसी में स्थित है, उसी से भरा हुआ है। मानव जन्म का एकमात्र उद्देश्य है, अपने सत्य स्वरूप को जानकर स्वयं को परमात्मा के प्रति समर्पित कर देना। यदि आत्मा का अनुभव होने के बाद भी कोई संसार की कमाना करे तो उससे बड़ा अभागा कौन होगा ?
जून आज आठ दिन बाद असोसिएशन के दफ़्तर गये। कल से ऊपर के कमरे में शिफ्ट हो जाएँगे। कोरोना का अनुभव अंततः उन्होंने भी कर लिया।सुबह आकाश में चंद्रमा को ढूँढा, नहीं दिखा, रात्रि भ्रमण के समय दिखा। चंद्रमा भी तो धरती के घूमने के कारण प्रतिदिन पूर्व से उगता है और पश्चिम में अस्त होता है। जो हर दिन लगभग 50 मिनट की देरी से होता है। पूर्णिमा के दिन चाँद सूर्यास्त के समय पूर्व दिशा में उगता है और सूर्योदय के समय पश्चिम में अस्त होता है।अमावस के दिन यह सूर्योदय के साथ उदय होता है और सूर्यास्त के समय अस्त होता है। रात की रानी में भी कलियाँ आयी हैं। पापा जी ने आज ‘आरती संग्रह’ की बात बतायी, वह भी धर्म व अध्यात्म में पूरी तरह डूब गये हैं।
आज सुबह जून किन्हीं लक्ष्मी नायक जी से दोसा-इडली ले आये थे। वह अपनी आज़ादी का उत्सव मना रहे थे। उसके बाद बाज़ार गये, वापसी में थलगतपुरा झील देखने गये, जहाँ जाकर बहुत निराशा हुई। झील का अधिकांश पानी सूख गया है, कुछ पौधों और काई ने शेष पानी को ढक लिया है। रास्ते में एक अन्य झील देखने के लिए रुके, वहाँ भी आधी से अधिक झील शैवाल से ढकी थी। वे घर लौटे तो नैनी प्रतीक्षा कर रही थी, उसे बच्चों के स्कूल जाना था, सो जल्दी आयी थी। शाम को पुन: ज्ञानेश्वरी सुनी। इस समय जून कॉलेज के दिनों को याद कर रहे हैं।जो बीत गया वह सपना ही तो है।
आज बहुत दिनों बाद वे आश्रम गये। गुरुजी हैदराबाद गये हैं, उनकी अनुपस्थिति में भी आश्रम में एक शांति और आनंद की छाया फैली हुई थी।फूल खिले थे, कोयल की कूक सुनायी दे रही थी और मंद पवन बह रही थी।उन्होंने विशालाक्षी मंडप में ध्यान किया, पंचामृत में अल्पाहार लिया और सुंदर रास्तों पर भ्रमण करते रहे। सूर्यास्त के बाद वे घर लौट आये। एक कुर्ती भी ख़रीदी जो नूना को परसों किताबों की दुकान में पहन कर जानी है।



