नटखट बकरी
आज शाम वे दोनों पूरा डेढ़ घंटे तक कभी बातें करते, कभी मौन पेड़-पौधों को निहारते चलते रहे। ‘प्रकृति फार्म हाउस’ से होते हुए ‘थरालू स्टेट झील’ तक पहुँचे, कुछ पल वहाँ रुककर ‘थतगुप्पे झील’ पर रुके, जहां से ‘ट्यूज़डे फ़ार्म स्टे’ होते हुए घर पहुँचे। वापसी में सड़क पर बकरियों और भेड़ों का एक झुंड आगे-आगे जा रहा था। एक महिला उन्हें हाँक रही थी। एक छोटी बकरी बहुत नटखट थी, उसी को सँभालने में महिला का अधिक समय व श्रम लग रहा था। रास्ते में नन्हे से बात हुई, उन्हें आश्चर्य हो रहा था, कि वे लोग इतनी पैदल यात्रा कैसे कर सके। नूना ने कुछ तस्वीरें भी उतारीं। सुबह भी जून कार से दूर तक ले गये। दोनों तरफ़ घनी हरियाली और सुबह का सन्नाटा ! अधिकतर रास्ता बहुत अच्छा था, कहीं-कहीं सड़क टूट गई थी।
कल की लंबी पैदल यात्रा के कारण आज सुबह उठने में थोड़ी देर हुई, पर उसके बाद दिनचर्या नियमित हो गई।जब तक योग साधना आरंभ की, दिन शुरू हो गया था। स्कूल बसें आनी शुरू हो गयीं, इसलिए सिट आउट पर काफ़ी शोर आ रहा था, बहुत दिनों बाद योग कक्ष में ध्यान किया। शरीर से बाहर आकाश में ध्यान टिकाने से शरीर में कितना हल्कापन महसूस होता है। इसीलिए गुरुजी सदा सिर से एक फुट ऊपर ध्यान ले जाने को कहते हैं। देह और मन रेत और चीनी की तरह कभी मिल ही नहीं सकते। चेतना सदा पदार्थ से अलग है पर उसका अनुभव पदार्थ में जाकर ही हो सकता है। यदि पानी ही पानी हो तो पानी को अपनी खबर नहीं होगी, थोड़ी सी भूमि आ जाये तो जल स्वयं को भूमि से पृथक मानेगा और अपने पर भी नज़र जाएगी। उनका भी यही हाल है, वे जो नहीं हैं, जब वह देखते हैं तो ख़ुद पर भी नज़र जाती है। आज छोटी बहन से बात हुई। वह अब प्रसन्न है। उसका क्लिनिक खुल गया है और एओएल के शिक्षक का कार्य भी कर रही है। आज उसका ऑनलाइन इंट्रो है, शनिवार को दोपहर के भोजन के साथ इंट्रो है। छोटा भाई घर आया हुआ है, अगले महीने उसकी सेवा निवृत्ति हो जाएगी, पापाजी ने बताया। उसके बाद वह घर पर रहेगा तो उन्हें बहुत अच्छा लगेगा।अगले महीने वह लखनऊ जा रहा है, छोटी बिटिया की डाक्टरी की पढ़ाई समाप्त हो रही है, उसे घर लाना है।
आज लिखने के लिए पर्याप्त समय है, पर नूना का पेन रीफ़िल बदलने के कारण ठीक नहीं चल रहा। शायद रीफ़िल छोटी है। जब तक चीजों की नाप ठीक न हो , जैसे चप्पलों या वस्त्रों की तो वे भी खलते हैं। आज ओबीए की एक वरिष्ठ सदस्या का फ़ोन आया, इस माह के अंत में वे उन्हें तथा दो अन्य परिवारों को दोपहर के भोजन के लिए ले जायेंगी। जून ओबीए के काम में उनकी बहुत सहायता करते हैं। जून ने उससे पूछा, उन्होंने ‘आदमी और इंसान’ फ़िल्म देखी है ? कुछ याद नहीं आया तो उसने कहा, इस फ़िल्म में अवश्य ही एक आदमी होगा और दूसरा इंसान, आदमी यदि इंसान नहीं बन पाया तो हैवान बन जाएगा। आज महर्षि अरविंद की ‘सावित्री’ पुस्तक के अंश की व्याख्या सुनी। वह अंग्रेज़ी में पढ़ रही है, पर उसकी भाषा अति क्लिष्ट है और भाव भी अति दुरूह। दोपहर को चैत्य सत्ता पर आलोक पांडे का प्रवचन सुना। चैत्य सत्ता को जागृत करना अध्यात्म में पहला कदम है, उसके बाद ही साधना का आरम्भ होता है। जैसे नरसी मेहता ने भी कहा है, आत्मज्ञान के बिना भक्ति अधूरी है। शाम को गुरुजी द्वारा निर्देशित चक्रों पर ध्यान किया, हवा इतनी तेज चलने लगी थी पर तब भी मन टिका हुआ था।उसने कहीं पढ़ा था, गुरुजी घंटों ध्यान में बैठे रहते थे।उन्होंने वर्षों पूर्व महर्षि महेश योगी के साथ रहते हुए दिल्ली में (नक़ली) पंडितों के क्रोध को शांत किया था। उनके अंदर समझौता कराने की कला पहले से ही थी। गुरुनानक की पुस्तक आगे बढ़ रही है, कैसे चौथे-पाँचवे गुरु के आते-आते सिख धर्म के रूप में परिवर्तित होता गया।नानक की यात्राओं का वर्णन लेखक ने बहुत सुंदर ढंग से किया है। आज सुबह कुछ देर पार्क आठ में प्राणायाम किया, हवा शीतल थी और वातावरण शांत, तब छह भी नहीं बजे थे। जून कैलाश मानसरोवर यात्रा के बारे में एक वीडियो देख रहे हैं संभवत: वे भी कभी भविष्य में यह यात्रा कर सकते हैं। यह पर्वत पंद्रह हज़ार फ़ीट की ऊँचाई पर स्थित हैं, यात्रा अत्यंत कठिन है, पर हज़ारों लोग हर वर्ष यहाँ जाते हैं।
आज सुबह चार बजे नन्हा अपने एक सहकर्मी के साथ चेन्नई गया है। उसका फ़ोन आया, तब काम ख़त्म करके होटल जा रहा था। उसे कल भी आज की तरह तीन-चार मीटिंग्स करनी हैं। अस्पतालों में जाकर उनके सीईओ से मिलना है, ताकि उन्हें प्रैक्टो के बारे में बता सके।उसने बताया, सोनू के माँ-पापा बांग्लादेश गये हुए हैं। नूना को रुद्र पूजा के बारे में एक लेख का अनुवाद करना है। सावन के महीने में हर सोमवार को आश्रम में रुद्र पूजा होती है।
आज दिन भर बादली और वर्षा का साम्राज्य छाया रहा। हवा ठंडी हो गई है और तापमान २०-२१ डिग्री। आज मणिरत्नम द्वारा निर्देशित एक तमिल फ़िल्म ‘पोन्नियिन सेल्वन’ का पहला भाग देखना शुरू किया है। इसमें दसवीं शताब्दी के चोल वंश के राजाओं की कहानी दर्शायी गयी है। दोपहर को पेंटिंग का काम थोड़ा सा आगे बढ़ाया। सुबह का ध्यान गहरा था। सूक्ष्म शरीर को कितना स्पष्ट अनुभव किया। बिना कान के सुना, बिना वस्तु के वस्तु का होना महसूस किया। कितना विचित्र था सब कुछ। दिन भर मन एक विचित्र से आनंद में डूबा रहा। मानव देह के भीतर कितने महान रहस्य छिपे हैं। शाम को गुरु जी की आवाज़ में रुद्रम की व्याख्या सुनी। जून ने सुबह स्वादिष्ट पोहा तथा दोपहर को स्वादिष्ट कढ़ी बनायी। आजकला वह भी बहुत प्रसन्न रहते हैं। नन्हे का फ़ोन आज नहीं आया, कल सुबह वह वापसी की यात्रा पर निकलेगा।
अभी कुछ देर पहले मन फिर अहंकार के बहकावे में आ गया। जब वे स्वयं को देह मानते हैं तभी तो अहंकार के शिकार होते हैं। यदि स्वयं को आत्मा ही मानें तो कैसा अपमान और कैसा सम्मान, ऐसा लगता है जैसे किसी बाह्य शक्ति ने विचारों को भ्रमित कर दिया हो। जहां केवल ज्ञान और प्रेम का वास होना चाहिए, वहाँ क्रोध, शिकायत, उलाहना और अलगाव का क्या काम? मन का स्वभाव ही ऐसा है, वह संस्कारों के वश होकर ही ऐसा करता है। पर यह तो तय है कि पल भर के लिए वाणी कठोर हो सकती है पर दिल जरा भी नहीं ! आज नन्हा चेन्नई से वापस आ गया, सीधा ऑफिस चला गया, जैसे जून किया करते थे। अभी-अभी यह ख़्याल मन में आया, कहीं यह वाद-विवाद किसी अन्य बात की तरफ़ इशारा तो नहीं कर रहा ? सुबह से ही मन में हल्की सी बेचैनी थी, जिसकी परिणति हुई। आश्चर्य होता है कि अब किसी बात का इतना असर होने का क्या कारण है? जबकि पहले इससे बड़ी बात को भी नज़रंदाज़ किया है। इसका कारण ईश्वर ही जानते हैं, अब उसके साथ जो भी होता है, उससे जो भी होता है, उसके पीछे एक वही कारण है। उसकी इच्छा के बिना कुछ भी नहीं होता, जब यह जीवन भी उसी का दिया है, तो हर पीड़ा और हर ख़ुशी भी उसी की दी हुई है। आज सुबह एक कविता लिखी थी, यदि उसे कविता कहा जा सकता है तो….