Thursday, October 7, 2021

तुंगभद्रा के किनारे

तुंगभद्रा के किनारे 


रात्रि के नौ बजे हैं, रात्रि भोजन के बाद टहलते समय पिताजी से बात की। वह आज व कल अकेले रहेंगे, नवासी वर्ष की उमर में भी वह अकेले रह सकते हैं, यह क़ाबिलेतारीफ़ है। उन्होंने बताया, एक नयी किताब पढ़ी, ‘गॉड डेल्यूजन’, जो छोटी पोती ने दी है। उसे भी आध्यात्मिक किताबें पढ़ने का शौक़ है, पर नूना ने इस किताब के बारे में पढ़ा तो आश्चर्य हुआ, इसमें ईश्वर के अस्तित्त्व को नकारा गया है। लेखक नास्तिक है और उसे धर्म की कोई आवश्यकता नज़र नहीं आती। शायद आस्तिक होने के लिए नास्तिकता के पुल को पार करके ही आना होता है। शाम को वे निकट स्थित एक नर्सरी में माली ढूँढने गये, कल एक माली छत देखने आएगा, जहाँ टैरेस गार्डन उगाना है, शायद अगले वर्ष तक उनके सपनों का बगीचा तैयार हो जाए।आज लॉन में नयी घास भी लगवायी। जून ने बताया सोलर पैनल के द्वारा आज बिजली का अधिकतम उत्पादन हुआ, सुबह ठंड थी पर दिन में तापमान बत्तीस डिग्री था। आज अचानक शयनकक्ष के स्नानघर में पानी रिसने लगा, शायद दीवार में कोई पाइप ब्लॉक हो गयी है।


कल शाम एक पुराने परिचित के पुत्र के विवाह समारोह में सम्मिलित हुए, जहाँ कई पुराने परिचित  मिले। पुराने मित्रों से मिलना कितना सुखद अनुभव होता है। आज दिन में एओएल का ट्रांसक्रिप्शन का कार्य पहली बार किया। शाम को शिवरात्रि उत्सव के कार्यक्रम में आश्रम गये। हज़ारों की भीड़ थी। ‘मैं’ को पीछे रखकर किया गया कार्य ही सेवा है, गुरूजी ने अपने प्रवचन में कहा। सुबह जून के एक मित्र परिवार सहित आए थे,  उनकी डाक्टरी पास पुत्री अगले पाँच दिन यहीं रहेगी। वह सहयोगी प्रवृत्ति रखने वाली बहुत शांत स्वभाव की है और समझदार भी। मृदुभाषी है, सहज और धीरे बोलती है। उसे एमडी की परीक्षा की तैयारी करनी है।  अगले हफ़्ते दोनों परिवारों को मिलकर हम्पी और हौस्पेट की यात्रा पर जाना है।  बहुत दिनों बाद रेलयात्रा का आनंद मिलेगा। 


सुबह-शाम बगीचों में भ्रमण करते, सूर्योदय व सूर्यास्त की तस्वीरें उतारते दिन बीत रहे हैं। शाम को बैडमिंटन खेला। नन्हे ने बगीचे के लिए सौर ऊर्जा से जलने वाली दो मशालें भेजी हैं, दिन भर में ऊर्जित हो जाती हैं, रात भर जलती हैं, उनकी रोशनी दूर से ही दिखती है। कल छोटी डाक्टर अपने घर चली जाएगी। 


आज सुबह सात बजे वे एक मित्र परिवार के साथ हौस्पेट पहुँच गये थे। समाचारों में सुना, कोलकाता में गृह मंत्री ने बयान दिया है कि सीएए का व्यर्थ ही विरोध किया जा रहा है। आस्था पर संत संचित, क्रियमाण व प्रारब्ध कर्म के बारे में बता रहे हैं। यह यात्रा क्रियमाण कर्म है, इसमें होने वाले अनुभव प्रारब्ध कहे जा सकते हैं। संचित कर्म में से कुछ कर्मों के कारण ही वे इस दुनिया में आए हैं। आज तुंगभद्रा नदी पर बना बांध देखने जाना है। कर्नाटक में कई सुंदर प्राकृतिक स्थल हैं तथा मानव की अपरिमित क्षमता से बनाए गए कई दर्शनीय स्थान भी। यहाँ लोहे का बड़ा भंडार है जिस कारण स्टील की कई फ़ैक्टरियाँ भी हैं। ज्वर,

कल सुबह यात्रा का आरंभ एक ऐसे स्थान से किया जहाँ बच्चों और युवाओं के लिए रोमांचक खेल थे, वहाँ कुछ झूले, रस्सी के पुल आदि बने थे। उन्होंने उस स्थान का भरपूर लाभ उठाया और अपनी क्षमता को पहचाना। दोपहर को एक सहकारी बैंक में गए। जिसकी स्थापना मित्र के पिता जी ने की है। शाम तक तुंगभद्रा के किनारे पहुँचे। सूर्यास्त का अनुपम दृश्य देखने बहुत सारे दर्शक आए थे। पार्क में संगीतमय फ़ौवारे लगे थे। पूरा वातावरण एक मोहक स्वप्नलोक की रचना कर रहा था। उसके बाद मित्र अपने चचेरे भाई के यहाँ ले गये। जहाँ ज्वार की रोटी के साथ मूली-टमाटर का रायता, मूँगफली व लाल मिर्च की चटनी, मेथी-पालक वाली दाल तथा अंकुरित सलाद था, सभी व्यंजन स्थानीय थे और अति स्वादिष्ट भी।मित्र की चाचीजी से  ज्वार की रोटी बनाना भी सीखा। लगभग उबलते हुए पानी में इसका आटा गूँथा जाता है। घर में दो बच्चे भी थे जो काफ़ी समय तक मोबाइल पर ही खेल रहे थे।एक ही दिन में कितने सारे अनुभव हो गये, यात्रा कितना कुछ नया सिखाती भी है। कल उन्हें बादामी गुफ़ाएँ देखने जाना है। 


Tuesday, June 15, 2021

पुलवामा का दर्द


उस दिन “शांति धाम” से लौटकर भी वहाँ की स्मृति दिन भर मन में बनी रही. वहाँ की मैनेजर एक महिला थीं, उनके पति को मधुमेह की बीमारी है, शरीर पर पूरा नियंत्रण नहीं है फिर भी काम में उनकी सहायता करते हैं. उन्होंने ही आश्रम दिखाया. एकमात्र पुत्र दुर्घटना में चल बसा, अभी कुछ समय पहले ही वे ये लोग यहाँ आये हैं, और काम समझ रहे हैं, ऐसा कहा. पुत्र होते हुए भी कुछ लोग अकेले रहने को विवश हैं शायद यही सोचकर वे अपने मन को समझा लेते होंगे। दोपहर को मोदीजी का कोकराझार में दिया भाषण सुना, जिसको सुनने के लिए चार लाख लोग आए थे, सभी बोडो भारत सरकार के साथ हुए समझौते से प्रसन्न थे. पूरे शहर में मानो उत्सव का माहौल बना हुआ था. बीती रात असम के इस शहर में लाखों दीये भी जलाए गये. मोदीजी ने कहा कि सरकार ने बोडो की समस्याओं को समझा और उनका हल निकाला. बोडो आतंकवादी संगठनों ने भी शांति का मार्ग अपना लिया है. उन्होंने कहा, सभी को बैर छोड़ना होगा, हिंसा से कभी कुछ हासिल नहीं हुआ है. उसे असम में निवास के समय बोडो आंदोलन के कारण हुई हिंसा और आए दिन के असम बंद के दिन याद हो आए। कोकराझार का नाम ही तब हिंसा का पर्याय बन गया था। आज उसका मन भी उन लोगों की ख़ुशी में शामिल था। कल दिल्ली में चुनाव है, संभवतः इस बार बीजेपी जीतेगी। कल वे आर्ट ऑफ़ लिविंग के अनुसंधान विभाग में गये, जून को बुलाया था सेवा काम के सिलसिले में। रास्ते में श्री श्री स्कूल भी देखा। बहुत सुंदर स्थान है। परसों इस सोसाइटी में स्थित एक नया पार्क देखा, वह मुख्य सड़क से काफ़ी अलग है। आज घर के सामने की सड़क बनना आरम्भ हुई है।आज आश्रम में स्थित एम्पिथिएटेर में सत्संग हुआ। गुरूजी ने पहले ध्यान कराया फिर प्रश्नों के उत्तर दिए। उन्होंने कन्नड़ में भी बोला, अब काफ़ी समझ में आने लगा है, संस्कृत के कई शब्द इसमें भी हैं। भीड़ बहुत थी। एक व्यक्ति जो मैक्सिको से आया था उसकी श्रद्धा अपार थी, उसने थैंक्स कहा और उसकी आवाज़ डबडबा गयी हो जैसे आंसुओं में। एक लड़की ने मधुर गीत गाया। छोटी बहन ने उसके और अपने एक पुराने फ़ोटो को देखकर एक पेंटिंग बना दी है, वे दिगबोई के गोल्फ़ के मैदान में थे, जब यह चित्र लिया गया था। यूएई में उसके घर को एओएल का एक सेंटर बना दिया है। वह बहुत खुश थी, सेवा से जो ख़ुशी और शक्ति मिलती है उसकी तुलना किसी अन्य ख़ुशी से नहीं की जा सकती।


कल सुबह सवा नौ बजे वे घर से निकले और रात को नौ बजे वापस आए। जून का स्वास्थ्य परीक्षण हो गया, सब सामान्य है। वह लाओत्से की पुस्तक पढ़ती रही, कुछ देर एक फ़िल्म देखती रही मोबाइल पर प्रियंका चोपड़ा की। नन्हा व सोनू एक मित्र के विवाह के संगीत में गये हैं, उन्हें वहाँ छोड़ते हुए वे घर आए। आज सुबह वे गाँव के पोस्ट ऑफ़िस गये जो किसी के घर में है, एक कमरे का डाक खाना, जिसकी ब्रांच पोस्ट मास्टर एक महिला हैं, वह अपने पति को काम सिखा रही थीं, ताकि ज़रूरत पड़ने पर वह भी कुछ कर सकें।
सुबह से बड़ी भाभी का स्मरण हो रहा है। पाँच वर्ष हो गये उन्हें जग से विदा लिए हुए, उससे एक या दो वर्ष ही बड़ी रही होंगी उमर में। बेहद ख़ुशदिल और जीवंत स्वभाव वाली पर उन्हें हृदय का रोग था। भाई ने उनकी तस्वीरों से एक सुंदर वीडियो बनाया है। उसे एओएल के कोर्सेस के लिए बनी वेब साइट्स का हिंदी अनुवाद करना था, तब पता चला कितने सारे कोर्स होते हैं आश्रम में। गुरूजी कितना काम करते हैं, शायद सत्रह-अठारह घंटे तो करते ही होंगे। कल संभवतः वे ‘शिकारा’ देखने जाएँ, अगले हफ़्ते एक मित्र के पुत्र के विवाह में सम्मिलित होने जाना है। ‘आप’ को दिल्ली में बासठ सीटें मिली हैं और बीजेपी को मात्र आठ। केजरीवाल ने काफ़ी काम किया है दिल्ली में और बिजली पानी मुफ़्त, महिलाओं के लिए बस व मेट्रो में टिकट भी नहीं लगती।जनता तो तत्काल लाभ देखती है।


आज पुलवामा हमले को पूरा एक वर्ष हो गया। पिछले वर्ष आज ही के दिन जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर सी आर पी एफ के क़ाफ़िले पर विस्फोटक सामग्री से भरे वाहन से टकराकर आत्मघाती हमला किया गया। इस हमले की ज़िम्मेदारी पाकिस्तानी आतंकवादी संगठन जैशे मोहम्मद ने ली थी।उसे याद है टीवी पर सैनिकों के शव की पंक्तियाँ थीं, सारा देश आक्रोश से भर गया था। आज भी एक कविता लिखी, दोपहर को रिकार्ड की फिर पोस्ट भी की। शाम को आश्रम में गुरूजी का एक रिकॉर्डेड साक्षात्कार देखा, बच्चों ने सुंदर गीत गाए। आश्रम में अंतर्राष्ट्रीय महिला सम्मेलन आरंभ हो गया है। दोपहर को मृदुला सिंह जी को सुना, अन्य कई वक्ता भी थीं। पैशन, डिस्पैशन व कम्पैशन पर उन्हें बोलना था।


आज दोपहर जून के परिचित दक्षिण भारतीय एक पुराने सहकर्मी मिलने आए, पूरे तेईस वर्षों के बाद वे मिले। उनके लिए भोजन बनाने में नन्हे और सोनू ने बहुत मदद की, वे लोग कल आ गये थे, शाम को जून सभी को अपने बड़े भांजे के यहाँ ले गये, काफ़ी दूर है उसका घर, दो घंटे की ड्राइव के बाद वहाँ पहुँचे, इतने समय में तो कोई दूसरे शहर ही जा सकता है,। उसे लेकर सब ‘उटा’ गये विशुद्ध स्थानीय भोजन के लिए प्रसिद्ध है यह जगह। उटा का अर्थ कन्नड़ भाषा में भोजन होता है। पिताजी से पता चला, छोटा भाई परिवार के साथ यूरोप जा रहा है अगले महीने, उस दौरान बड़े भाई उनके पास आकर रहेंगे।

Wednesday, June 9, 2021

वीर सावरकर पर फिल्म

 


आज श्री रामसुखदास जी की लिखी भगवद् गीता के अठारहवें अध्याय की व्याख्या पढ़ी। एक श्लोक में कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, जिस ज्ञान से मनुष्य पृथक-पृथक सब भूतों  में एक अविनाशी परमात्मा भाव को विभाग रहित समभाव से स्थित देखता है, उसी ज्ञान को तुझे सात्त्विक जानना चाहिए. ऐसे ही सात्विक ज्ञान को प्राप्त करना हर साधक के एकमात्र लक्ष्य होता है. जेन ऑस्टिन की पुस्तक “सेंस एंड सेंसिबिलिटी” पर बनी फ़िल्म का कुछ भाग देखा, वर्षों पहले यह पुस्तक पढ़ी थी। दोपहर को लेखन, शाम को योग, दिन इधर शुरू होता है उधर बीत जाता है। कल छोटी बहन के विवाह की वर्षगाँठ है, कुछ पंक्तियाँ लिखेगी उनके लिए। जून ने छत पर बने शेड के लिए चाइम मँगवाया है, कुछ देर में आने वाला है। 


आज छोटी बहन से बात की, कल शाम उसके यहाँ शानदार पाँच कोर्स पार्टी हुई। कुल बाइस लोग थे। दो दशक से दो वर्ष अधिक हो गये विवाह को। आज गणतंत्र दिवस पर एक कविता प्रकाशित की ब्लॉग पर। सुबह असम से एक सखी का फ़ोन आया, पुत्र का विवाह तय हो गया है, अक्तूबर में होगा। मार्च में ‘रोका’ है। परसों माँ की पुण्यतिथि है, उनके लिए भी मन में कुछ पंक्तियाँ उमड़ रही हैं।


यहाँ उनका पहला  गणतन्त्र दिवस बहुत अच्छा बीता। सुबह जल्दी उठे, आठ बजे ध्वजारोहण था। वे तैयार होकर समय से पूर्व ही पहुँच गये। सुबह ही एक छोटी सी कविता लिखी थी, उसे रिकार्ड करके व्हाट्सएप पर भेजा। पहली बार यहाँ के निवासियों से मिलना हुआ। उन्होंने अपना परिचय कराया। उसने एक कविता पढ़ी, जून को ध्वजारोहण करने का सौभाग्य मिला, उन्होंने सूट पहना था और तिरंगे का एक ब्रोच भी लगाया था कोट पर। कई लोग तो घर के वस्त्रों में ही उठकर आ गये थे। वहाँ मैसूर पाक भी बाँटा गया। लौटकर परेड देखने बैठे, पूरे मनोयोग से एक साथ पूरी परेड शायद वर्षों बाद देखी, झांकियाँ, नृत्य के कार्यक्रम, सेनानी, तथा सेना के उपकरण ! प्रधानमंत्री ने लोगों का स्वागत किया। दोपहर को नन्हा और सोनू आ गए, वे दोनों डाइटिंग कर रहे हैं, एक महीने का कोर्स है, दोनों का वजन घटा है. सबने मिलकर छत पर असम से लाया लकड़ी और बेंत का झूला लगवाया. फैमिली ट्री के लिए फोटो चुने. जून जिन्हें घर पर ही प्रिंट कर देंगे और फिर वे उन्हें फ्रेम में लगा देगें. शाम की चाय नन्हे ने बनाई, फिर सब  रॉक गार्डन में टहलने गए, घर में चल रहा सिविल का काम अगले दो हफ्ते और चलेगा. इसके बाद वे वर्टिकल गार्डन का शुभारम्भ करेंगे. कल गेस्टरूम में एसी लग रहा है, परसों बेड भी आ जायेगा, मेहमान आएं, उसके पूर्व ही उनका कमरा तैयार होना चाहिए. घर में वाटर सॉफ्टनर भी लग गया है, यहां का पानी खारा होने के कारण स्टील के नलों पर सफेद निशान बन जाते हैं. बहते हुए पानी वाली बुद्धा की जो मूर्ति पिछले हफ्ते नन्हे ने भिजवाई थी, बहुत आकर्षक है पर उसमें से पानी छलक जाता है और कमरे के फर्श भीग जाता है, उसे वापस भिजवाना पड़ेगा. 


आज शाम ‘वीर सावरकर’ पर बनी एक पुरानी फिल्म का पहला भाग देखा. देश को आजाद कराने के लिए क्रांतिकारियों ने कितने कष्ट सहे हैं. आज मोदी जी व अमित शाह को कितने लोगों के अपशब्द सुनने पड़ते हैं, देश को चलाने का काम करना काँटों का ताज पहनना है. दिल्ली के चुनावों में कुछ ही समय शेष रह गया है. इस बार चुनावी मुद्दा सीएए ही है, यदि मोदी जी जीतते हैं तो उनकी साख बढ़ेगी अन्यथा भी उनका प्रभाव घट तो नहीं सकता है. भारत को उनके जैसा दृढ इच्छाशक्ति वाला प्रधानमंत्री चाहिए. योग शिक्षिका ऋषिकेश से वापस नहीं आयी है. उन्हें घर पर ही साधना का क्रम जारी रखना होगा. वह मंगल व गुरुवार को ललितासहस्रनाम व विष्णु सहस्रनाम के पाठ में वह जा सकती है, यहां महिलाओं का एक समूह उसे आयोजित करता  है. 


आज शाम को आश्रम से एक स्वयंसेवक का फोन आया और बाद में संपादक के नाम एक पत्र, जिसका हिंदी में अनुवाद करना था, शाम तक करके भेज दिया. अनुवाद का पहला सेवा कार्य करके उसे ख़ुशी हुई. अभी-अभी नन्हे का भेजा कुछ सामान आया, ऐसा सामान जिसका नाम भी नहीं सुना था, कोल्ड प्रेस जूस आदि. सावरकर की फिल्म का दूसरा भाग भी देख लिया, उनकी भविष्यवाणी सही सिद्ध हो रही है. 


आज शहर जाकर एक नई फिल्म देखी, पंगा, आजकल की लड़कियों के जीवन से जुड़ी हुई फिल्म. गुरुजी के एक ज्ञान पत्र का हिंदी अनुवाद किया.  शाम को आश्रम गए. वहीं स्थित एक भोजनालय में कल रात हुए किसी कार्यक्रम के बाद फूल बिखरे हुए थे. सजावट घर के लोग अपना सामान समेट रहे थे पर बासी फूलों की उनके लिए क्या कीमत होगी, गुलदाउदी व गेंदे के सैकड़ों फूल और मालाएं वहां बिखरी हुई थीं. गुरूजी को अष्टावक्र गीता पर बोलते हुए सुना. कितना अनोखा ज्ञान  है उनके पास, जीवन को धन्य करने वाले शब्द, ब्रह्म की सुंदर व्याख्या और उस तक पहुंचने के कितने सुंदर मार्ग ! अध्यात्म ही जीवन का सार है और परमात्मा ही जगत का सार ! 


पिछले दो दिन कुछ नहीं लिखा, कल बच्चे आये थे, देर रात वापस गए, परसों की बात याद नहीं है, और वे पिछले जन्मों को याद करने का प्रयत्न करते हैं. आज वे सोसाइटी में स्थित एक घर से अक्की रोटी लाये, अक्की रोटी यानि चावल के आटे की रोटी ! जून कल सामान्य जाँच कराने अस्पताल जाने वाले हैं, दिन भर लग जायेगा. आज पहली बार श्लोक पाठ में सम्मिलित हुई. कई बार मन में यह विचार आया है कि सही उच्चारण करके श्लोक पाठ करना सीखे, ईश्वर ने यह इच्छा पूरी करने का सुअवसर भी दे दिया है. गुरूजी भी कहते हैं, संस्कृत के श्लोक, मन्त्र आदि का उच्चारण मात्र ही ऊर्जा को ऊपर उठा देता है. आज सासु माँ की सातवीं पुण्यतिथि है, वे ‘शांति धाम’ गए जो यहां से निकट ही स्थित एक वृद्धाश्रम है. जहां तीस महिलाएं और दस पुरुष आश्रमवासी हैं. वहां का वातावरण अच्छा था. हरियाली और साफ-सफाई थी, पर ऐसी जगहों पर एक अजीब सी उदासी भी रहती है. वह भी झाँक रही थी. न जाने किन परिस्थितियों में उन्हें घर से बाहर आश्रम में आना पड़ा हो. आश्रम के लिए कुछ सामग्री देकर व कुछ समय बिताकर वे लौट आये. 


Wednesday, June 2, 2021

पके केले के पकोड़े


 आज वे खादी की दुकान में गये, मल्लेश्वर स्थित यह दुकान बहुत बड़ी थी और वस्त्रों के अलावा कई कलात्मक वस्तुएं भी वहाँ थीं। नन्हा और सोनू सवा दस बजे ही आ गये थे जब वह और जून पड़ोसी के यहाँ बीहू का विशेष जलपान करने गये थे। आर्ट ऑफ़ लिविंग के लिए उनका रिज्यूमे ठीक करने में सोनू ने सहायता की , फिर उसे भेज भी दिया। गुरुजी के लिए कुछ सेवा कार्य करने का उनका स्वप्न संभवतः निकट भविष्य में पूर्ण होगा। गुरु जी का लगाया प्रेम का बीज अब फूल बनने की ओर कदम रख रहा है। उन्हें इस कार्य को करके ख़ुशी होगी, परमात्मा की इस दुनिया में परमात्मा के कुछ काम आ सकें वह भी तो उसकी इच्छा से ही होना संभव है। कल दीदी का फ़ोन आया, वह विटामिन डी तथा कैल्शियम लेने के कारण अब काफ़ी ठीक हैं। जून को सर्दी लग गयी है, पिछले दो-तीन दिनों से ठंड बढ़ गयी है। उन्हें गले में हल्का दर्द है। कल हो सका तो वे धूप निकलने के बाद ही टहलने जाएँगे। नन्हे ने एक बिजली से चलने वाला लाइटर भिजवाया है, जिससे मोमबत्ती या अगरबत्ती जला सकते हैं।  

आज सुबह पौने चार बजे ही उसकी नींद खुल गयी, चारो तरफ शांति थी। जून साढ़े पाँच बजे उठे, जब वे टहलने गये तो दिन अभी निकला नहीं था, मौसम ठंडा था।नाश्ते के बाद कुछ देर धूप में भी निकले। जून को बाल कटवाने थे सो पैदल ही सोसाइटी के मुख्य द्वार तक बढ़ते गये। सड़क के दोनों ओर बोगेनवेलिया के रंग-बिरंगे सुंदर फूल खिले थे, कई तस्वीरें उतारीं। असम में जून के ड्राइवर का काम कर चुके एक जन का फ़ोन आया, उसने बताया अगले हफ़्ते सीएए के ख़िलाफ़ कोर्ट में सुनवायी है, अब तक जो शांति बनी हुई है, वह उसके बाद बनी रहेगी, कहा नहीं जा सकता। कई दिनों बाद आज घर में सिविल का काम नहीं हुआ, ब्लॉग पर एक पोस्ट लिखी। शाम को वे निकट स्थित गाँव के मंदिर में गये। जो दक्षिण भारतीय वास्तुकला के अनुसार बना हुआ हनुमान जी का सुंदर मंदिर है। वापसी में यहाँ के एकमात्र छोटे से नए खुले रेस्तराँ में एक कप कॉफी के लिए रुके, पके हुए केले के पकोड़े पहली बार चखे।बुद्ध की पुस्तक समाप्त होने वाली है। बुद्ध अमर हैं, युगों बीत जाएँगे और लोग उनसे ज्ञान प्राप्त रहेंगे। बुद्धम शरणम गच्छामि ! संघम शरणम गच्छामि ! धम्मम शरणम गच्छामि !


आज वे लालबाग गये थे, जहां गणतंत्र दिवस पुष्प प्रदर्शनी चल रही थी।  कल से आरम्भ हुई है और छब्बीस जनवरी तक रहेगी। ग्लास हाउस में स्वामी विवेकानंद की स्मृति में सुंदर पुष्प सज्जा की गयी है। बड़े भाई, भतीजी, नन्हा, सोनू, उनके एक मित्र दम्पति तथा वे दोनों, सभी ने फूलों का आनंद लिया। उन्होंने फूलों के गमले लिए, पिटूनिया, पोइनसेटिया और गुलदाउदी के फूलों के गमले । लाल बाग का इतिहास बहुत पुराना है, हैदर अली ने इसकी नींव रखी थी। कई एकड़ में फैले इस बाग में दूर तक फैले लॉन हैं, हज़ारों क़िस्म के वृक्ष हैं, सुंदर बगीचे हैं, बंगलूरू की शान यह वनस्पति उद्यान साल भर किसी न किस प्रकार के फूलों से भरा रहता है। उससे पूर्व जून अपना सूट सिलने देने गये। बड़ी ननद का फ़ोन आया था, छोटी बिटिया का विवाह तय हो गया है। दो माह के बाद होगा।  


आज सुबह वे आश्रम गये, ‘अतिरुद्र होम’ चल रहा था। हजारों की भीड़ थी। शाम को नन्हा आया था, उसे बुखार हो गया है। लालबाग में उस दिन फूलों को ताजा रखने के लिए अथवा किसी कारण से पानी की फुहार छोड़ी जा रही थी, शायद वह ज्यादा भीग गया। बाग में पुस्तकों की एक प्रदर्शनी भी लगी हुई थी, उसने पड़ोस में रहने वाले बच्चों के लिए बाल पुस्तकें ख़रीदीं थीं आज उन्हें दीं। आज शाम को योग कक्षा में आने वाली एक साधिका उनके घर आयी थीं, अब से वह नियमित यहाँ आकर उसके साथ ही शाम को एक घंटा योग साधना करेंगी। इस माह के अंतिम सप्ताह में गुरुजी भगवत गीता के अठारहवें अध्याय पर प्रवचन देंगे। जिसमें अर्जुन कृष्ण से पूछते हैं, सन्यास क्या है? और त्याग क्या है? सन्यास और त्याग दोनों का ही अर्थ कुछ छोड़ना है , पर उनमें अंतर क्या है और उनका मर्म क्या है । 


आज सुबह देर से उठे, ठंड कुछ ज्यादा थी, अब जैकेट पहननी पड़ती है सुबह के वक्त। ‘ओल्ड पाथ वाइट क्लाउड्ज़’ आज पूरी पढ़ ली, बुद्ध ने अपनी मृत्यु की घोषणा पहले ही कर दी थी । मशरूम की सब्ज़ी खाने के बाद उनका स्वास्थ्य बिगड़ा और वह उनका अंतिम भोजन था। जैसे उनका जीवन भव्य था वैसे ही उनकी मृत्यु भी ! साल के वृक्षों ने उन पर फूल बरसाए और कुशीनारा के जन-जन ने उनके लिए अश्रु बहाए। आज भी ब्लॉग पर लिखा, लिखने का क्रम कुछ आरम्भ हुआ है। 


आज वे पुनः आश्रम गये, वहाँ बहुत भीड़ थी , हजारों की भीड़ । कल से संयम कोर्स शुरू हुआ है, शायद उसी में भाग लेने पूरे भारत से साधक यहाँ आए हैं। सदा की तरह गुरुजी ने सरल ढंग से हर प्रश्न का उत्तर दिया। बुद्ध पुरुषों से ही इस धरा की शोभा है। जून आज दोपहर को नन्हे के लिए आयुर्वेदिक दवा देकर आए, सितोप्लादि नाम है दवा का, सर्दी जुकाम में काम करती है। औषधि यदि समय पर ले ली जाए तो रोग जड़ नहीं पकड़ पाता। ‘ऐन विद एन ई’ का अंतिम भाग भी देख लिया, अंत भला तो सब भला ! आज माँ-पापा का स्मरण हो रहा है, उनके कारण ही उसका इस जगत में अस्तित्व है अर्थात इस देह व मन का, जिसके माध्यम से वह व्यक्त हो रही है। उसकी असली पहचान तो अब मिली है, एक शांत, अनंत प्रेम, जो चेतन है, जो मन और बुद्धि  के माध्यम से व्यक्त हो सकता है। जो इस देह के माध्यम से सत्कर्म  कर सकता है। जो इस जगत में अच्छाई का संदेश दे सकता है। जो किसी का निर्णायक नहीं है। जो प्रेम बदले में कुछ नहीं चाहता क्योंकि अनंत में कुछ भी मिलाओ अनंत ही रहेगा। अनंत से कुछ भी निकलो अनंत ही रहेगा। ऐसा प्रेम नित नूतन है। 


Wednesday, May 26, 2021

पिरामिड वैली

 

नव वर्ष का नौवां दिन भी बीत गया। अभी तक  लेखन कार्य आरंभ नहीं हुआ है। भगवान बुद्ध की पुस्तक पढ़ने में ही सारा समय चला जाता है। वह ध्यान पर बहुत जोर देते हैं और शील के पालन पर भी। सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अलोभ और अक्रोध पर, साथ ही प्रज्ञा पर भी। अनुभव करके स्वयं जानने को कहते हैं न कि किसी की बात पर भरोसा करके ! जगत परिवर्तनशील है, सब कुछ नश्वर है, वस्तुओं के पीछे भागना व्यर्थ है और संबंधों के पीछे भी, भीतर की शांति और आनंद को यदि स्थिर रखना है तो अपने भीतर ही उसका अथाह स्रोत खोजना होगा। शांति और आनंद से मन को भरकर ही करुणा के पुष्प खिलाए जा सकते हैं ! किसीके पास यदि स्वयं ही प्रेम नहीं है तो वे किसी अन्य को दे कैसे सकते हैं ! पहले मन को सभी इच्छाओं, कामनाओं, लालसाओं से ऊपर ले जाकर खाली करना होगा। यशेषणा, वित्तेषणा, पुत्रेष्णा और जीवेषणा से ऊपर उठकर भीतर के आनंद को पहले स्वयं अनुभव करना होगा फिर उसे बाहर वितरित करना होगा। जगत में कितना दुख है, दुख का कारण अज्ञान है, अज्ञान को दूर करने का उपाय ध्यान है, ध्यान से ही दुख और शोक के पार जाया जा सकता है। अहंकार को मिटाकर ही कोई इस पथ का यात्री बनता है । धरती, पवन, अनल और जल की तरह धैर्यवान, सहनशील, परोपकारी और पावन बनकर ही बुद्ध ने अपने जीवनकाल में हजारों लोगों के जीवन को सुख की राह पर ला दिया था। उसे भी उसी पथ का राही बनना है। 


आज शाम आश्रम में गुरूजी को सुना, उन्होंने पहले कन्नड़ में बोला फिर अंग्रेजी व हिंदी में। उनके जवाब कितने सटीक होते हैंऔर कितने मजेदार भी, सभी को संतुष्ट करने वाले ! खुले प्रांगण में था कार्यक्रम, हजारों लोग रहे होंगे, जिन्हें गुरुजी के सान्निध्य ने आनंदित किया। । पहले भजनों का दौर चला फिर प्रश्नोत्तर का। अष्टावक्र गीता का एक श्लोक पढ़ा गया, जिसकी व्याख्या की गुरुजी ने। उन्होंने कहा, जब तक अहंकार है तब तक ही झिझक होती है, जब अहंकार नहीं रहता साधक बालवत बन जाता है। आराम बहुत हो गया, उसे अब ब्लॉग पर लिखना आरंभ करना ही होगा, भीतर से कोई बार-बार कह रहा है। नाश्ते के बाद का समय इसी काम के लिए रखा जा सकता है और दोपहर को भोजन के बाद के विश्राम के बाद का समय भी।  यदि जरूरत पड़ी तो समय और भी निकाला जा सकता है। जीवन जैसे दौड़ता ही जा रहा है, समय जो बीत गया वापस नहीं आता ! दोपहर को निकट स्थित खेत से वे सब्जी लाए व चीकू भी जिसे यहाँ सपोटा कहते हैं और बहुतायत में होता है। कल नन्हा व सोनू आए थे, व भांजा भी, वे सब पिरामिड वैली गए थे, जो बहुत सुंदर स्थान है। हरियाली और छोटी पहाड़ियों से घिरा यह विशाल स्थान सुकून से भर देने वाला है।यहाँ  दुनिया का सबसे बड़ा और दस मंजिल इमारत जितना ऊँचा पिरामिड नुमा ध्यान कक्ष है। जब वे कक्ष में पहुँचे तो कुछ लोग वहाँ पहले से ही बैठे थे, पर इतनी गहन शांति थी कि आपनी श्वास की आवाज भी सुनाई दे रही थी। कुछ देर सब उसी मौन में रहे फिर बाहर आकर फूलों के सुंदर बगीचों में।  यहाँ पर दूर-दूर से आकर लोग रहते हैं व ध्यान शिविरों में भाग लेते हैं। कल बहुत दिनों बाद ब्लॉग पर एक कविता लिखी। 


आज भी वे आश्रम गए थे,आश्रम का वातावरण बहुत आनंददायक होता है। सफलता की परिभाषा बताते हुए गुरुजी ने कहा, जो व्यक्ति हर स्थिति में अपने मन की समता को बनाए रख सकता है वही सफल है।उन्होंने आज ध्यान भी कराया। कर्ताभाव जब खो जाता है तब ही ध्यान घटता है, ऐसा ध्यान जो अप्रयास घटता है। जब भीतर कोई इच्छा नहीं रहती तब ध्यान घटता है, ऐसा ध्यान जो सहज अवस्था का अनुभव कराए। जब न राग रहे न द्वेष, न कोई अपना न पराया, न भूत का पश्चाताप न भविष्य की आकांक्षा, तब ध्यान घटता है, ऐसा ध्यान जो मुक्ति का स्वाद देता है, जो शांति प्रदाता है। आर्जव, क्षमा, दया, संतोष और सत्य जब जीवन में घुलमिल जाते हैं तब ध्यान घटता है।  मुक्ति की चाह ही व्यक्ति को परमात्मा से मिलने की चाह की ओर ले जाती है। बंधन मन को दुख के सिवाय कुछ नहीं देता, आदतों का बंधन, कर्म का बंधन, अहंकार का बंधन, इच्छाओं का बंधन, अहंकार का बंधन, घृणा, क्रोध, ईर्ष्या, संदेह तथा दंभ जैसे विकारों का बंधन ! मानव के मन को कितनी बेड़ियों ने जकड़ रखा है, जो उसे दुख देती हैं पर सुख का भुलावा भी देती हैं। उसके पास आत्मा का अनंत सुख तो है नहीं, सो उसी छोटे से सुख से काम चलाना चाहता है, यह भुलाकर कि बड़ा सा दुख भी पीछे खड़ा है। स्वर्ग के लोभ में लोग नरक को चुन लेते हैं। फूलों के साथ काँटे भी मिल जाते हैं, मित्र ही शत्रु बन जाते हैं एक दिन और देह माटी बन जाती है। मृत्यु के द्वार से कोई नहीं बचता, एक दिन तो सभी को यहाँ से चले ही जाना है ! जहाँ जाना है वहाँ रहना जो सीख लेता है वह ध्यान में ही है ! आज आश्रम में रहने वाले  हाथी को भी देखा, सजा -सजाया हाथी बहुत अच्छा लग रहा था। मस्तक पर तिलक था, गले में घुंघरू थे और माला भी। कई बार गुरूजी उसे अपने हाथों से उसका आहार खिलाते हैं। वे आश्रम के मानव संसाधन विभाग की अध्यक्ष से भी मिले, अपनी रुचि बताते हुए एक ईमेल लिखने को कहा है। आश्रम के कैफे में पुस्तकों के रैक  को साफ करके किताबें ठीक से लगाईं, ऐसा ही लगा जैसे अपने घर को ही सहेज रहे हैं। आश्रम उनके घर जैसा ही है और आगे बनने भी वाला है, जब वे यहाँ नियमित काम करना शुरू कर देंगे। आज असमिया सखी का फोन आया वे लोग इसी माह आएंगे।


Tuesday, May 18, 2021

ओल्ड पाथ व्हाइट क्लाउड्स

नए वर्ष में पहली बार डायरी खोली है। मन में एक गहरी शांति है और कुछ भी लिखने जैसा नहीं लग रहा है। ‘कविता’ भी कई दिनों से नहीं लिखी। बुद्ध के बारे में दोपहर को पढ़ा, बहुत अच्छा लगा। ‘ओल्ड पाथ व्हाइट क्लाउड्स’ में गौतम बुद्ध के जीवन और शिक्षाओं को कितनी खूबसूरती से प्रस्तुत किया गया है. इसमें बुद्धि के जीवन के अस्सी वर्षों को गांव के एक भैंस चराने वाले लड़के स्वस्ति, जो बाद में उनका शिष्य बन जाता है, के माध्यम से और आंशिक रूप से स्वयं बुद्ध के माध्यम से दर्शाया गया है. जीवन के कितने गहरे सत्यों का अनुभव बुद्ध ने किया था, बच्चे उनके प्रथम शिष्य थे। बच्चों को सत्य आसानी से अनुभव में आता है, क्योंकि उनके पास अहंकार की कोई बाधा नहीं होती, न ही वे हर बात को बुद्धि से तोलते हैं, वे सीधे आत्मा से ही अनुभव करते हैं। बुद्ध कहते हैं, जीवन में सभी कुछ परस्पर निर्भर है और नश्वर है; चीजें निरंतर बदल रही हैं। ध्यान की गहराई में जब तन, मन, भावना और विचार सब कुछ स्पष्ट दिखाई देते हैं तब उनके द्वारा प्रभावित होने का डर नहीं रहता। सत्य कभी बदलता नहीं और जगत एक सा रहता नहीं। इस बात को जब भीतर अनुभव कर लिया जाता है तो जीवन सरल हो जाता है। प्रेममय हो जाता है और सारा विषाद खो जाता है। वर्तमान में टिकना ही जागरण है, वर्तमान के क्षण में ही जीवन से मुलाकात हो सकती है। जैसे ही मन अतीत या भविष्य में जाता है, सत्य से नाता टूट जाता है। अतीत जा चुका वह मिथ्या है, भविष्य अभी आया नहीं, केवल यही क्षण सत्य है, इसमें पूरे होश के साथ जीना ही साधक का कर्तव्य है। ऊर्जा का संरक्षण तब ही संभव है।  


सम्यक वाणी साधक के लिए अति आवश्यक है, उतनी ही जितना सम्यक कर्म, सम्यक विचार और सम्यक ध्यान। भोजन भी साधक को समुचित मात्रा में लेना चाहिए, ऐसा भोजन जो सुपाच्य हो और हल्का हो। आज सुबह का ध्यान अत्यंत प्रभावशाली था, चीजें कितनी स्पष्ट दिखाई दे रही थीं। समझ जैसे  भीतर से स्वत: ही बह रही थी। मानव के भीतर कितनी समझ है और कितनी शांति, एक स्थिरता भरा अनंत आकाश है भीतर ! इसमें टिके रहना ही तो ध्यान है। 


आज भी ब्लॉग पर कुछ नहीं लिखा। कल से प्रारंभ करना है। आर्ट ऑफ लिविंग के एप में गुरुजी की लिखी कई किताबें हैं, वीडियो भी हैं, एक पूरा खजाना है। कल वे आश्रम जाएंगे। गुरुजी एक सप्ताह के लिए आश्रम में रहेंगे। वे स्वयं सेवक का कोर्स भी करने वाले हैं। आज भी दोपहर बाद बुद्ध की पुस्तक पढ़ी, कितनी अच्छी किताब है यह, उल्हास नगर की यात्रा के दौरान मासी के यहाँ यह किताब देखी थी, फिर यहाँ आकर मँगवाई। उसे उनका कृतज्ञ होना चाहिए। बुद्ध कहते हैं सभी कुछ आपस में जुड़ा है और नश्वर है। चीजें जैसी हैं वैसी ही उन्हें देखना आ जाए तो कहीं कोई तनाव, क्रोध, ईर्ष्या, घृणा, नकारात्मकता नहीं टिक सकती। स्वयं में टिककर ही वे आत्मा की शांति और आनंद का अनुभव कर सकते हैं। जो मुक्ति का वरण करता है उसे संसार का आकर्षण नहीं लुभाता। वह तट पर बैठे व्यक्ति की भांति लहरों का आना जाना देखता रहता है और स्वयं में तृप्त रहता है. 


आज गुरूजी को देखा, सुना. वर्षों पहले उन्हें टीवी में नियम से सुनती थी. कैसा सौभाग्य है कि उनके आश्रम में उनको सुनने का अवसर मिल रहा है. वह सरल शब्दों में सभी प्रश्नों के कितने सुंदर उत्तर देते हैं. सत्य में प्रतिष्ठित व्यक्ति कैसा होता है और सिद्ध कौन होता है, आत्म अनुभव कैसा होता है, ऐसे और इसी तरह के प्रश्नों के उत्तर कितनी सहजता से वह दे रहे थे. हिंदी व अंग्रेजी दोनों ही भाषाओँ पर उनकी गहरी पकड़ है और परमात्मा से अभिन्न हैं वह ! आज बुद्ध की किताब आगे पढ़ी, मैत्री और करुणा का कितना सुंदर वर्णन किया है और प्रेम का भी, हृदय कितनी गहरी विश्रांति का अनुभव कर रहा है. संसार के हर जीव के प्रति प्रेम का भाव मन में उदित हो रहा है, सभी तो अपने ही हैं, एक ही हैं, शाम को एक पुरानी सखी का फोन आया, कितना आश्चर्य है कि दोपहर को उसका स्मरण हो आया था और अंतर में प्रेम था. जून के प्रति भी भीतर कितना स्नेह प्रकटा था, उनका स्वभाव बहुत अच्छा है, शाम से उनका व्यवहार भी कितना प्रेमिल लग रहा है. गुरूजी की बात अक्षरशः सत्य सिद्ध हो रही है कि सभी एक ही चेतना से बने हैं ! कल विवाह की सालगिरह है , उससे भी पूर्व से वे एक-दूसरे से परिचित हैं, यानि साथ पुराना है.  


भगवान बुद्ध ने बच्चों को भी ध्यान सिखाया था. उनकी शिक्षा और समझ कितनी लाभप्रद है और कितनी गहरी. वे जीवन और मृत्यु के रहस्य को समझाते हैं, जीवन की नश्वरता और जगत के मिथ्या होने को भी, जैसे गुरूजी कहते हैं, अब तक का उनका जीवन एक स्वप्न से ज्यादा क्या है ? इतने वर्ष बीत गए कुछ वर्ष और हैं, यह देह एक दिन नष्ट हो जाएगी, उनके पहले कितने लोग चले गए, अब उनकी कोई खबर नहीं, वे भी एक दिन हवा हो जायेंगे तो क्यों न इसी क्षण स्वयं के कुछ न होने को स्वीकार कर लें. जीवन एक खेल से ज्यादा क्या है, कृष्ण की लीला या राम की लीला ... आज वे आश्रम गए थे. एच आर विभाग आज भी बन्द था, परसों भी देर हो जाने से कोई नहीं मिला था. कल जून के एक पुराने मित्र परिवार सहित आये, अपने साथ सुंदर सफेद बेला और लाल गुलाब के फूलों की मालाएं लेकर आये थे, एक-दूसरे को पहनने को कहा, तस्वीरें भी खींचीं. शाम को नन्हा व सोनू आये, गुलदाउदी के फूलों का एक गुलदस्ता, खजूर व मिठाई लाये.  लेखन कार्य अभी शुरू नहीं हुआ है, जो पुस्तक पढ़ रही है, उसके खत्म होने पर ही लिखना हो पायेगा. 

 

Wednesday, May 12, 2021

काबिनी के तट पर

 

अमिताभ बच्चन को दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाजा गया है, टीवी पर सुना, उन्हें देश का दूसरा सबसे बड़ा पुरस्कार पद्म विभूषण भी मिला है. अभी कुछ देर पूर्व वे (बोट सफारी) नौका यात्रा से लौट कर आये हैं. दोपहर ढाई बजे पहले कार से ‘जंगल रिजॉर्ट’ गए, जहाँ अलग-अलग होटल या रिजॉर्ट में रहने वाले सभी यात्री एकत्र होते हैं और उन्हें सरकारी सफारी में ले जाया जाता है. चार नावें एक साथ रवाना हुईं. नदी का पाट बहुत चौड़ा था. आकाश में तेज सूरज  चमक रहा था. सभी को लाइफ जैकेट पहनने को दी गयीं और रोमांचक यात्रा शुरू हुई. पहले-पहल कई पक्षी दिखने आरंभ हुए. छोटे-बड़े पानी की सतह पर तैरते, उड़ते, डुबकी लगाते, लकड़ी के ठूंठ पर बैठे पक्षी ! एक जगह किंगफिशर दिखा, जब तक जून तस्वीर उतारते, वह उड़ गया. उसके नीले पंख देखकर नाव में बैठे छोटे-बड़े सभी लोग आश्चर्यचकित रह गए. आगे बढ़े तो मोर दिखे जो नृत्य भी कर रहे थे. तट पर हरी घास पर विहार करते हिरनों के झुंड भी कई बार दिखे. एक काला सांभर, एक जंगली सूअर, बंदर, लंगूर तथा दूसरे तट पर स्नान करते हुए जंगली हाथियों का एक परिवार भी देखा. टाइगर दिख जाये,  इस आशा में नाव तट से कुछ दूरी पर रुकी रही, नाविक को लंगूर की आवाज सुनकर अंदेशा हुआ था कि टाइगर हो सकता है. लगभग तीन घंटे दोनों तटों पर स्थित जंगल में दूर से पशु-पक्षी दिखाने के बाद नौका वापस लौट आयी. प्रकृति का एक और सुंदर रूप निहारने का एक और अवसर अस्तित्व  ने उन्हें दिया है. कल सुबह जीप सफारी पर जाना है. आज सुबह जून ने यहाँ के स्वास्थ्य केंद्र में पीठ दर्द का इलाज करवाया. उसने पुस्तकालय से एक पुस्तक ली ‘देवी’ रमेश मेनन की लिखी हुई किताब. अभी कुछ ही देर में वे आज का सांस्कृतिक कार्यक्रम देखने जाने वाले हैं. 


वर्ष का अंतिम दिन, शाम के पौने सात बजे हैं, अर्थात सवा पांच घंटे के बाद नया वर्ष आरम्भ हो जायेगा. नया वर्ष आने से यूं तो सभी जन उत्साहित हैं मगर क्रिकेटर व क्रिकेट को चाहने वाले कुछ विशेष ही प्रसन्न हैं क्योंकि अगले वर्ष में हर दिन ट्वेंटी-ट्वेंटी होगा. कहीं एक और चुटकुला पढ़ा था, इस वर्ष और अगले वर्ष में केवल उन्नीस-बीस का ही अंतर होगा, कुछ ज्यादा नहीं. वे कुछ देर पूर्व कपिला नदी पर बने बाँध के पीछे स्थित झील के किनारे-किनारे दूर तक टहल कर आये. हवा ठंडी थी और जल में लहरें उठ रही थीं , आकाश में चन्द्रमा उदित हो चुके थे. दो पक्षी तट के निकट थे, उनकी तस्वीर उतारें, यह सोचकर एक कदम आगे बढ़ाया तो वे उड़ गए. जल से दो-तीन फीट ऊँचे उड़ते हुए श्वेत पंछी अपनी भाषा में कुछ कहते हुए बहुत सुंदर लग रहे थे. उनकी उड़ान  गरिमापूर्ण थी और ध्वनि में एक आतुरता थी, शायद घर जाने की जल्दी; हल्का धुंधलका छा गया था. उसके पूर्व तट पर स्थित रेस्तरां में लोग शाम की चाय के लिए आ गए थे. दोपहर से ही कुछ  लोग  सफेद रस्सियों से बने झूलों में विश्राम कर रहे थे या किताब पढ़ रहे थे. दोपहर का भोजन देर से किया क्योंकि खुले वाहन में धूल भरे रास्तों पर तेज गति से यात्रा करने के कारण सारे वस्त्र व चेहरे धूल से भर गए थे, इसलिए स्नान के बाद ही नाश्ते के लिए आये. आज उन्हें टाइगर भी दिखे, लंगूर, हिरण, मोर व मंगूज भी. सुबह साढ़े पांच बजे सफारी का आरंभ हुआ। मौसम ठंडा था और जंगल में पक्षियों का कलरव निरंतर गूँज रहा था. वाहन चालक ने कई जगह  रुक कर टाइगर या अन्य पशुओं की प्रतीक्षा की. कई तस्वीरें भी उतारीं. काबिनी में आकर जंगल सफारी करना ही यात्रियों का एक मुख्य उद्देश्य होता है. 


कल रात्रि के सांस्कृतिक कार्यक्रम में मांड्या की एक टीम आयी थी जिसमें एक कलाकार पैंतीस किलो का एक विशेष छत्र अपने सिर पर लेकर नृत्य  कर रहा था, उसका नृत्य आश्चर्यजनक था. आज दोपहर को वे निकट स्थित गाँव में रजनीगन्धा के खेत देखने गए. उनके कहने पर परिवार में पहले महिला ने एक पौधे के कुछ बल्ब निकाल कर दिए फिर घर का आदमी आया और उसने भी दिए. उन्होंने पैसे देने चाहे पर उन्होंने मना कर दिया. वे मैसूर के बाजार में रजनीगंधा के फूल भेजते हैं, ऐसा बताया. दो छोटे बच्चे भी थे वहाँ, माँ-पिता को देखकर वे भी खेत में कुछ काम कर रहे थे. कल सुबह उन्होंने गाँव से ही आयी एक बैलगाड़ी पर आधे घण्टे का टूर किया. गाड़ीवान बहुत सीधा-सादा सा किशोर ही था. उसे गाना गाने को कहा तो शरमा गया. कर्नाटक का ग्रामीण जीवन इस यात्रा में बहुत निकट से देखने को मिला है. गांव साफ-सुथरे हैं और गाय-बकरियां आदि काफी स्वस्थ व ऊंची कद काठी के हैं. कल एक गाय के बछड़े को तेज गति से दौड़ते हुए देखा था, कितनी ऊर्जा थी उसमें. पिछली रात एक छोटा बालक भी इसी तरह स्टेज पर चढ़-उतर रहा था. बच्चे चाहे आदमी के हों या पशुओं के उनमें वैसी ही ताजगी होती है और उतनी ही ऊर्जा ! टीवी पर तेनालीराम शुरू हो गया है, भास्कर कह रहा है, शरीर में जब तक प्राण है और मन में चेतना, तब तक वह अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए तत्पर रहेगा. 


जीवन वही है जो खुशियों से भरा हो, पुण्यशाली हो, संतुष्टि देने वाला हो. सुख लें औरों को सुख बाँटें. यदि वे अपने मन, वचन, कर्म से अन्यों को सुख देते हैं और निर्मल प्रेम बांटते हैं तो उन्हें भी वही कई गुना होकर मिलता है. नकारात्मकता को इस नए वर्ष में त्याग देना है, सत्य का संग करना है, मन की गति को सहज करना है. अध्यात्म की आज के समय में सभी को आवश्यकता है, उन्हें अपने संस्कारों को सरल करना है, ध्यान का अभ्यास बढ़ाना है. नियमित साधना करनी है. महान विचारों से स्वयं का श्रृंगार करना है. वर्ष की अंतिम रात्रि को सोने से पूर्व ऐसे ही संकल्प मन में उठ रहे थे.