गीत गतिरूप
आज सुबह कुछ पुरानी कविताओं को दुरस्त किया। उस समय मात्राओं की गणना के लिए ‘गीत गतिरूप’ नहीं था। काव्यालय की वाणी जी द्वारा निर्मित यह एक उपयोगी डिजिटल सॉफ़्टवेयर है जो काव्य में छंद बद्ध कविताओं की मात्राओं की सटीक गणना करता है। इसमें शब्दों के पर्यायवाची भी दिये गये हैं, जिससे उचित शब्द ढूँढने में समय बचता है। शाम को टहलने के लिए उन्होंने जैसे ही घर से बाहर कदम बढ़ाया, वर्षा आरंभ हो गई। इस समय थम गई है। समय की धारा मंथर गति से बहती जा रही है, अब लगता है, जैसे न कुछ पाना है, न कुछ जानना है, एक ठहराव सा आ गया है मन में। कल बच्चों के साथ “आदिपुरुष” देखने जाना है। फ़िल्म के बारे में एक विशेष व रोचक बात का ज्ञान हुआ, जहाँ कहीं भी यह फ़िल्म दिखायी जा रही है, एक सीट हनुमान जी के लिए ख़ाली रखी जाती है। ऐसी मान्यता है कि हनुमान जी चिंरजीवी हैं और जहाँ राम कथा होती है, वह उपस्थित रहते हैं। अगले हफ़्ते उन्हीं मित्र दंपत्ति ने अपनी बिटिया के यहाँ बुलाया है। बिटिया बाहर गई है, उसका पालतू कुत्ता घर पर है, जिसकी देखभाल के लिए वे दोनों गये हुए हैं। वह इलाक़ा दो घंटे दूर है, बैंगलोर में दूरी किलोमीटर में नहीं बल्कि समय में नापी जाती है। वहाँ उन्हें यात्रा के लिए कुछ ख़रीदारी भी करनी है। गुजरात के कच्छ में आया विनाशकारी चक्रवाती तूफ़ान बिपरजॉय अब कमजोर हो गया है। कच्छ के अलावा और भी कई तटीय ज़िलों पर इसका असर पड़ा। इसके कारण बहुत मात्रा में आर्थिक नुक़सान हुआ। अब यह राजस्थान की ओर बढ़ गया है। जहाँ इसका प्रभाव दिखायी दे रहा है।
उन्होंने ‘आदिपुरुष’ देख ली है।फ़िल्म में अंधेरे के दृश्य अधिक हैं। कई बार किसी विदेशी फ़िल्म जैसी लग रही थी। फ़िल्म की भाषा भी कुछ और संयत हो सकती थी। हिन्दी के किसी जानकार को संवादों के हिन्दी में अनुवाद दिखा लेने चाहिए थे। फिर भी कुल मिलाकर फ़िल्म अच्छी ही कही जाएगी। वैसे बहुत लोग इसकी आलोचना भी कर रहे हैं। वे सुबह नाश्ते के बाद घर से निकले थे और रात को नौ बजे लौटे। नूना ने यात्रा के लिए जूते ख़रीदे।जून ने घर के लिए सामान ख़रीदा। घर में क्या ख़त्म हो रहा है, क्या लेना है, इसका उन्हें बहुत ध्यान रहता है।
कल रात सोने में देर हुई सो सुबह भी देर से शुरू हुई। टहलने गये तो प्रतिदिन की तरह धुंधलका नहीं था। दिन निकल आया था।पीले चंपा के फूल, रोज़ जिनकी सुगंध ही आती थी, आज साफ़ दिखायी दे रहे थे। मधु मालती की एक बेल भी एक दीवार पर चढ़ी हुई थी, बहुत सुंदर तस्वीर आयी है उसकी। जून के बनाये नाश्ते में दोसा था और मूँगफली की चटनी, कल छोटी बहन ने उसकी विधि बतायी थी। नन्हे ने उसके लिए लकड़ी का एक और कैनवास भेजा है रंग भरने के लिए, ‘पट्टचित्र’ नाम है उसका, दोपहर को एक घंटा उसमें रंग भरे। ऑडिबल पर हिन्दी के एक प्रसिद्ध लेखक ‘स्वयंप्रकाश’ की आत्मकथा ‘धूप में नंगे पाँव’ का कुछ अंश सुना। बहुत रोचक है। संस्मरण के साथ इसमें यात्रा वृत्तांत भी है और डायरी लेखन भी। शाम को नूतन की एक पुरानी फ़िल्म ‘गौरी’ देखी। जिसमें एक दृष्टिहीन लड़की की दुख भरी कहानी है।आज भी कुछ पुरानी कविताओं की वर्तनी सुधारी। सांध्य भ्रमण के समय छोटे-छोटे गुलाबी फूलों के चित्र उतारे, फूलों का संसार कितना अद्भुत है। ऐसे ही तितलियों और मछलियों का भी। नये घर में लकड़ी का काम अभी भी चल रहा है। यह महीना समाप्त होते-होते पूरा हो जाएगा। चिमनी को छोड़कर, जिसका आना अभी शेष है।
आज शाम को आकाश में काले घने बादल छाये थे। कितने आकार नज़र आ रहे थे उनमें, लेटे हुए बच्चे का, योगासन करते हुए एक व्यक्ति का भी, चित्र उतारे। कंचन के पेड़ आजकल फूलों से भर गये हैं। जून के महीने में ऐसा होना केवल बैंगलोर में ही संभव है, जहाँ साल भर फूल खिलते हैं। हर सिंगार के फूलों से रोज़ सुबह उनका लॉन भर जाता है। दोपहर को चित्रकला का काम आगे बढ़ाया। आज से बेनजीर भुट्टो की आत्मकथा ‘मेरी आपबीती’ सुननी शुरू की है। कितना संघर्ष भरा जीवन रहा उनका, बच्चों को उनसे दूर रहना पड़ा, क्योंकि पाकिस्तान में उनकी सुरक्षा को ख़तरा था। जून आज सुबह कुछ परेशान थे। लिवस्पेस से उन्होंने चिमनी के लिए कहा था, पर वे पूरा खर्च उठाने को तैयार नहीं हैं, जबकि पहले इसके लिए वे तैयार थे। अब दोनों को आधा-आधा ख़र्चा करना होगा।
आज ‘विश्व योग दिवस’ है। मोदी जी ने यूएन में एक सौ पैंतीस देशों के लोगों के साथ ‘योग अभ्यास का नेतृत्व किया। जो गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज किया गया है। इस बार की थीम है, वसुधैव कुटुंबकम् के लिए योग। यह थीम भारत के ‘एक धरती, एक परिवार, एक भविष्य’ की भावना को सुदृढ़ करती है। नूना ने सुबह-सुबह एक कविता लिखी, उसे टाइप किया फिर रिकॉर्ड किया। पर योग दिवस के दिन ही योग साधना नहीं कर पायी। सोसाइटी के ‘खेल स्टेडियम’ में जाकर पता चला, योग दिवस के उपलक्ष्य में सुबह साढ़े छह बजे ही वहाँ एक घंटे का सत्र हो चुका है। आज उन्हें मित्र परिवार से मिलने जाना था। दोपहर के भोजन में सखी ने रसम-चावल, भिंडी व रायता परोसा। नन्हे ने ड्राइवर सहित गाड़ी भेज दी थी, वही ले गया। कुछ देर विश्राम करने के बाद सब लोग कमर्शियल स्ट्रीट गये। जहाँ एक दुकान से आगामी कश्मीर यात्रा के लिए सभी ने कुछ न कुछ गर्म वस्त्र ख़रीदे।
आज वे फिर नेत्रालय गये थे। जून को डेंटिस्ट के पास भी जाना था।कल शाम को घर लौटने के बाद बायीं आँख के बायीं तरफ़ हल्की सी चमक आ रही थी। आँख के सामने एक फ़्लोटर भी था। डाक्टर ने कहा, कैट्रैक्ट के बाद ऐसा होना स्वाभाविक है, कुछ दिनों बाद अपने आप ठीक हो जाएगा। लौटते समय वे फ़्लैट का काम देखने भी गये। कल शाम तक सफ़ाई का काम हो जाएगा और परसों बिजली के बल्ब व पंखे आदि लग जाएँगे। इतवार को बच्चों के साथ वे पुनः जाएँगे।