आज स्वामी विवेकानंद जी के जन्मदिन पर हुबली-धारवाड़, कर्नाटक में छब्बीसवाँ ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ मनाया गया, प्रधान मंत्री भी वहाँ पहुँचे हैं। इस बार का विषय था, ‘विकसित युवा, विकसित भारत’। सुबह वे घर से सवा नौ बजे निकले। एसबीआई में लॉकर का काम हो गया। कुछ देर नन्हे की सोसाइटी की लाइब्रेरी से लेकर धूप में बैठकर ओशो की एक किताब पढ़ी, अच्छी किताब है।आज डेंटिस्ट ने उसके दातों में लगाये इंप्लांट्स में स्क्रू भी लगा दिये हैं। अब एक हफ़्ते बाद जाना है।आज उनका मंगाया हिन्दी की एक अत्यंत प्रतिष्ठित, सांस्कृतिक, संग्रह पत्रिका ‘नवनीत’ का पहला अंक आ गया। भारतीय विद्या भवन से प्रकाशित होने वाली इस पत्रिका को इतने दिनों बाद फिर से पढ़ना एक सुंदर अनुभव होगा।उसे याद है, बचपन में पापाजी अपने दफ़्तर की लाइब्रेरी से हर महीने इसके अंक लाया करते थे। शाम को छोटी बहन का फ़ोन आया, बहनोई के जन्मदिन पर कविता की फ़रमाइश थी, उसने लिखकर भेज दी है। उनका रेस्तराँ अच्छा चल रहा है, पर हिस्सेदार भारत आ गये हैं। इस बार बैंगलुरु में भी ठंड पड़ रही है, कल सुबह तापमान चौदह डिग्री होने की संभावना है। पापा जी ने कहा, आज वह धूप में बैठे, सर्दियों की धूप कितनी कीमती होती है।जून लोहड़ी के लिए कुछ सामान लाए हैं, कल वे आग जलायेंगे।
आज बहुत दिनों बाद उसके सिर में हल्का दर्द है। कारण दो हो सकते हैं, पहला सुबह-सुबह दूध पीना और दूसरा नाश्ते में हरे चने और बेसन का चीला, ऊपर से जून ने लंच में भी हरे चने का पुलाव बनाया, उनके अनुसार उन्हें अधिक समय तक रखा नहीं जा सकता था। किसी का भोजन ही उसके लिए रोग का कारण बन जाता है, औषधि भी वही है। गरिष्ठ भोजन का असर उसे तुरंत महसूस होने लगता है, दोपहर के ध्यान में नेत्र कैसे उनींदे हो रहे थे और शाम को टहलते समय शुरू में पैर कितने भारी लग रहे थे। सुबह ‘काव्यालय’ में एक पोस्ट प्रकाशित की, एक कवि/पाठक ने कहा है, उसकी कविता में अध्यात्म के लक्षण हैं, प्रणाम भेजा है। स्वयं को जानना यदि अध्यात्म है तो सचमुच ‘मन’ अब स्वयं की हक़ीक़त जान गया है। यह एक साधन है, विचार, भाव तथा स्मृति को संजोने का साधन, यह प्राण ऊर्जा से चलता है, प्राण अपनी ऊर्जा आत्मा से ग्रहण करते हैं, भोजन तथा नींद से से भी। भोजन सात्विक और हल्का हो तो शरीर, मन, प्राण,तीनों हल्के रहते हैं। आत्मा अर्थात ‘मैं’ इनकी साक्षी हूँ तथा इनका आश्रय भी। आत्मा की उपस्थिति में ही ये काम करते हैं।आत्मा के लिए ही ये कार्य करते हैं। आत्मा आनंद स्वरूप है। आत्मा स्वयं को सीमित तन, मन तथा प्राण भी मान सकती है तथा स्वयं को जानकर अनंत परमात्मा का अंश भी, अथवा ब्रह्म स्वरूप भी। आज लोहरी का उत्सव मनाया, शाम को बाज़ार गये, शकरकंदी, मूँगफली तथा पेड़े आदि लाये। छत पर आग जलायी, लकड़ियाँ घर पर ही पड़ी थीं, नैनी ने काट दीं।ऐसा माना जाता है कि आज से ठंड घटने लगती है।पौष समाप्त होकर माघ शुरू हो जाता है। परसों मकर संक्रांति है, वे नन्हे और सोनू के साथ मनायेंगे।दीदी के यहाँ भी अग्नि पूजन हुआ, उनके समधी लोग आ गये थे।उन्होंने छोटे भांजे से बात करवायी, उसने बताया दो महीने बाद उसकी विदेशी पत्नी भी भारत आयेगी।छोटी बहन के यहाँ लोहड़ी के साथ बहनोई के जन्मदिन का उत्सव चल रहा है। नवनीत की अनेक कहानियों में से पहली कहानी पढ़नी शुरू की है।
आज दृश्यम-२ देखी, अच्छी फ़िल्म है, सुना है दृश्यम-३ भी आएगी। मकर संक्रांति पर एक रचना का सृजन किया। धूप में बैठकर थोड़ी देर ‘इंटिमेसी’ पढ़ी, ओशो की बातें सीधे दिल पर असर करती हैं। आज एक माली उनका बगीचा देखने आया था, उसने गिनकर बताया, कुल तिरसठ पौधे लगाएगा।छोटे भाई ने आज पोरबंदर से समुद्र का दृश्य दिखाया, अब वह ओशोधाम में है।कल असमिया पड़ोसी के यहाँ बीहू का जलपान करने जाना है।
सुबह तापमान १७ डिग्री था। माली समय पर आ गया था।उसके जाने के बाद मकर संक्रांति के भोज के लिए एक विशेष सब्ज़ी बनायी। नन्हा और सोनू नौ बजे आ गये थे, उन्होंने चाय पी और वे सब पड़ोसी के यहाँ गये। जिन्होंने बड़े प्रेम से नाश्ता कराया, दही, चिवड़ा, गुड़, क्रीम, नारियल व तिल के लड्डू व पीठा, नमकीन आदि। वहाँ से वे बैंगलुरु का प्रसिद्ध ‘बैनयान ट्री’ अर्थात अति प्राचीन व विशाल बरगद का वृक्ष देखने गये। जिसे कन्नड़ भाषा में ‘डोड्डा अलाडा मारा’ कहते हैं। यह वृक्ष चार सौ साल पुराना है और तीन एकड़ के विशाल क्षेत्र में फैला हुआ है। इसका मुख्य तना नष्ट हो गया है, यह हज़ारों जटाओं कि सहारे टिका है। परिसर में पर्यटकों के लिए बेंचें हैं, अनेक बंदर वहाँ विचर रहे थे, जो किसी को नुक़सान नहीं पहुँचा रहे थे।
वे घर लौटे तो सबने हरे चने का ‘बचका’, संक्रांति की विशेष आलू-गोभी की सब्ज़ी, जैसी जून बचपन से अपने घर में बनते देखा करते थे, और दही-चावल लंच में ग्रहण किए।उसके बाद मनायी पतंग उड़ाने की रस्म, नन्हे ने ड्रोन भी उड़ाया, रिमोट से चलने वाली कार चलायी, वापस आकर टेलिस्कोप से दूर के नज़ारे देखे। हल्का सा धुँधलका होने पर अग्नि देवता का आवाहन किया, उसके बाद जिग्सा पजल की शुरुआत की। इस तरह पूरा दिन ही कई गतिविधियों से भरा रहा। इसी बीच शाम को पापाजी से फ़ोन पर चर्चा भी की।
आज सुबह नींद कुछ देर से खुली, शायद कल का असर था। प्रातः भ्रमण भी कम हुआ और आसन भी, शायद उम्र का तक़ाज़ा है या प्रमाद। ख़ैर, अब करके कुछ पाने का जज़्बा तो रहा नहीं, इसलिए जब जो होता है, उसे स्वीकार करके मन अपने आप में स्थित रहता है। उनका विरोध और उनकी चाह दोनों ही ऊर्जा को खोने का कारण हैं। अब न कुछ पाना है, न कुछ छोड़ना है ! इस अनंत जगत में कोई क्या तो पा सकता है और क्या छोड़ सकता है ?आत्मा को न कुछ चाहिए और न कुछ करना है, वह अपने आप में तृप्त है। जो भी चाहिए वह शरीर के लिए और जगत के लिए। आज एक नयी झील देखी, वदेराहल्ली नाम है उसका, सूर्यास्त के समय वे वहाँ गये थे, झील विशाल और सुंदर है, पर आसपास सफाई नहीं है, उसे देखभाल की ज़रूरत है। आज मिट्टी के दूसरे पात्र को भी रंग दिया, ‘नेटिव विलेज’ की एक स्मृति के रूप में ये उनके पास रहेंगे।
जहाँ शांति है, वहाँ शब्द नहीं हैं। जहाँ शब्द हैं, वहाँ शांति हो सकती है और नहीं भी, यह उनके ऊपर है, पर अब उसे शांति के लिए बस एक हल्का सा स्मरण दिलाना पड़ता है मन को, इतना हल्का कि पलक झपकने से भी कम समय लगता है उसमें! आज भी दिन भर मौसम ठंडा रहा। आज सफ़ाई का काम पूरा हो गया, छत, गैराज, सिटआउट सभी जगह। जून ने आज घर बैठे ही बिगबास्केट से सब्ज़ियाँ व राशन मँगवा लिया। नन्हे का फ़ोन आया, कल उन्हें रजिस्ट्रार के दफ़्तर जाना है, मकान का लोन ख़त्म होने के बाद कुछ कार्यवाही होनी शेष है।
