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Tuesday, March 12, 2013

ला ओपेला का सेट



गुलदाउदी के पौधे एक-दो दिनों में मिल जायेंगे, फोन उसकी सखी ने ही किया था, सो उसका यह आक्षेप कि सदा उसे ही फोन करना पड़ता है, गलत सिद्ध हो गया जिसकी उसे खुशी है. शाम को असमिया सखी के घर जाना है, उससे भी बात हुई है, वह उसके नए लाल सूट में इंटर लॉकिंग कर के देगी अपनी नई फ्लोरा पर, और आज सुबह से दो बार प्रेम की अधिकता या भावों की अधिकता के कारण उसकी आँखों में अश्रु झलक आये, कल भी ऐसा हुआ था, कहीं यह उस स्वप्न का असर तो नहीं, या सम्भव है सात्विक भाव प्रगट हुए हों. लेकिन मन ने कल एक-दो बार ऐसा सोचा कि उनकी परवाह किसी को नहीं, उन्हें ही सबकी परवाह है - लेकिन यह सत्य नहीं है, और अगर ऐसा हो भी तो इसमें उदास होने की कोई बात नहीं, बल्कि उन्हें किसी से अपेक्षा करने का कोई अधिकार नहीं. जून के दांत का दर्द कम है, कल उन्हें फिर जाना है. नन्हा आज जल्दी उठ गया था, पर तैयार होते-होते उसे पौने नौ बज गए, शायद उसे खांसी फिर से परेशान कर रही है, वैसे वह गंध के प्रति बहुत संवेदन शील है, हल्की सी गंध से खांसने लगता है.

मौसम भीगा-भीगा है, बादल बरस कर अभी-अभी थमे हैं. खिडकी से नजर बाहर डालो तो बस हरियाली ही हरियाली है. जून इस वक्त तिनसुकिया में होंगे. नन्हा कह रहा था आज से उसकी छुट्टी देर से होगी, उसका टाइम टेबिल आज से बदल रहा है. उसकी पुरानी पड़ोसिन का फोन आया तो उसे अच्छा लगा. कल रात को एक बार गर्मी के कारण नींद खुली फिर सुबह ठंड के कारण- एक जमाना था कि नींद आती थी तो सर्दी-गर्मी और मच्छर किसी का पता नहीं चलता था. बेसुध और बेखुद हो जाती थी. रात बचपन को याद करके सोयी थी, बचपन के माँ-पिता को भी. कल उनका पत्र आया था, लिखा है, अगले महीने उनका घर बनना आरम्भ हो जायेगा, जनवरी तक पूरा भी हो जायेगा. कल जून एक महिलाओं की एक अंग्रेजी पत्रिका लाए, इंग्लैण्ड में प्रकाशित, वहाँ कि संस्कृति यहाँ से कितनी अलग है, उसने गार्डनिंग पर एक लेख पढ़ा, फिर पड़ोसिन से हेज के पास खड़े होकर बात करने लगी पता ही नहीं चला सवा घंटा कैसे बीत गया. उसके बेटे को चिकन पॉक्स हो गया है, वह सो रहा था.

  कल उसके जीवन का एक बहुत अच्छा दिन था, शाम को उसकी एक छात्रा अपने माँ-पिता व छोटी बहन के साथ आयी. वे लोग उसके लिए एक उपहार भी लाए. उन्हें उन सबके आने की उम्मीद नहीं थी, उसके पहले एक मित्र परिवार आया था, घर काफी अस्त-व्यस्त सा हो गया था, खैर.. वे लोग अचछे लगे सरल और सहज..और इतना सुंदर ला ओपेला ला का dessert set.

  उसके पैरों में आज वही दर्द है, डायरी उठाई है, दस बजने को हैं अभी..बस..कुछ..भी..ये चारों शब्द उसके मन की अस्थिरता के परिचायक हैं. कल फेमिना में एक बहुत अच्छा लेख पढ़ा. रात को देर तक सोचती रही कि उसे अपने वक्त का सदुपयोग करना चाहिए, कोई न कोई काम करते रहने की वैसे उसकी आदत तो है ही, बस काम थोड़ा उद्देश्यपूर्ण हो इसका ध्यान रखना होगा. लेकिन अब इस दर्द में तो सिर्फ आराम से बैठकर पढ़ा जा सकता है, नहीं जी, अब इतना भी नाजुक नहीं होना चाहिए इंसान को कि जरा सा मौका मिला नहीं कि लम्बी तान ली...मगर वह तो पढ़ने की बात कर रही थी और वह भी विवेकानंद की किताब का तृतीय अध्याय.  

  दोपहर के पौने दो बजे हैं. किसी परिचिता ने बताया कि नन्हे को कल बस में किसी बच्चे ने मारा था, उसने उन्हें बताया नहीं, शायद इसका कारण यह तो नहीं कि वे उसे कमजोर कहते हैं, मार खाकर आने पर, इस तरह तो वह अपनी समस्या बताएगा नहीं, उसने मन ही मन तय किया, अब से वह ऐसा नहीं करेगी. वह आजकल सुबह सब काम समय पर कर लेता है, पहले की तरह बार-बार नहीं कहना पड़ता. नन्हे से पूछने पर उसने इंकार कर दिया कि बस में किसी से झगड़ा हुआ था, इसका अर्थ हुआ कि सूचना सही नहीं थी. उसका गणित का टेस्ट कल फिर नहीं हुआ. कल ड्राइंग प्रतियोगिता है, पिछले दो-तीन दिनों से उसके मित्र शाम को खेलने आ जाते हैं. वे सब अँधेरा होने तक खेलते रहते हैं, उसे अपने बचपन के दिन याद आ जाते हैं, जब माँ भीतर से आवाज देती थीं और वह अपनी सहेलियों के साथ रस्सी कूदने, गेंद गिट्टी खेलन में व्यस्त रहती थी.

Tuesday, January 15, 2013

हम दीवानों की क्या हस्ती



उल्फा लीडर भारत सरकार से बात करने के पक्ष में नहीं हैं, भगवान जाने असम का भविष्य क्या होगा. कल सूजी व नारियल के लड्डुओं के कारण वह कुछ ज्यादा नहीं लिख सकी, सो दिन भर बेचैनी सी रही, अजीब सी बेचैनी, जैसे हरारत हो गयी हो. दोपहर को जून अभी घर पर ही थे, वह सो गयी, नन्हे ने सब कुछ अपने आप किया, वह अब सचमुच बड़ा हो गया है, बहुत समझदार और बहुत प्यारी बातें करता है. अपने आप होमवर्क करके खाना खाकर सोने चला गया.
कल शाम जून एक फिल्म का कैसेट लाए थे, Hook  इंडिया टुडे में सुबह ही पढ़ा था उसके बारे में, कल्पना की उड़ान है पूरी फिल्म, अजीब-अजीब से दृश्य जादू लोक में ले जाते हैं. अभी पूरी नहीं देखी उन्होंने, नन्हे को बहुत अच्छी लग रही थी, पर सुबह स्कूल जाने से पहले बोला, उसे अंग्रेजी फिल्मों में या तो कॉमेडी अच्छी लगती है या जेम्स बॉण्ड की फिल्म. बच्चे पिता को अपना आदर्श मानते हैं, उसका अच्छा उदाहरण आजकल देखने को मिल रहा है, जून ने कुछ दिन पूर्व कहा कि वह हर सब्जी में आलू क्यों डालती है, उसे आलू अच्छे नहीं लगते, और दो दिन बाद नन्हा भी वही बात कह रहा है, जबकि आलू उसे बहुत पसंद थे. घर से पत्र आया है सासु माँ ने ननद के लिए तकिये के गिलाफ, टीवी कवर, और मेजपोश बनाने के लिए कहा है, कल वे तिनसुकिया जाकर कपड़ा लायेंगे, कल ही बाजार से  वह लक्ष्मी, उनकी नौकरानी के लिए ऊन लायी थी, पर पता नहीं उसे स्वेटर बनाना आता भी है या नहीं.

आज पूरा दिन व्यवस्तता में बीता. सुबह उसकी मित्र का फोन आया उनकी कार का छोटा सा एक्सीडेंट हो गया है, तिनसुकिया जाकर विंड स्क्रीन बदलवानी पड़ेगी. दोपहर के भोजन के बाद वे तिनसुकिया गए, लौट कर टीवी पर पहले बजट देखा, फिर शाम की फिल्म. डॉ मनमोहन सिंह ने कुशलता के साथ बजट पढ़ा बीच-बीच में हँसाते भी रहे, पीवी नरसिंहाराव को एक अच्छे वित्त मंत्री मिल गये हैं. उसने आज अपने केश भी कटवाए, जून को स्टाइल पसंद नहीं आया, चिढ़ाने लगे, कल फिर जाना होगा, टीवी देखते-देखते और दिन में जरा भी आराम न होने के कारण वह थकी हुई तो थी ही, उसे क्रोध  आ गया पर हमेशा की तरह उनका स्नेह, उनकी उदारता और मीठी-मीठी बातें..वह जल्दी ही हँसने लगी.
कल दोपहर उसकी असमिया सखी अपने बेटे को जो नन्हे का हमउम्र है, छोड़ गयी फिर शाम को वे लोग उसे लेने आये. दोनों बच्चों में बहुत दोस्ती है, मनोयोग से खेल खेलते हैं, कभी  कुछ योजनायें बनाते हैं. शाम को वे सब क्लब गए, टीटी खेला, पहले अभ्यास फिर दो गेम खेले.

आज भी आधा दिन टीवी के नाम, “चाणक्य” और विश्वकप श्रंखला में भारत और आस्ट्रेलिया के बीच मैच देखने में, भारत जीतते-जीतते... मात्र एक रन से हार गया. उसका मन उदासी से भर गया यह सोचकर कि पूरे भारत में कितने ही व्यक्ति जो मैच देख रहे होंगे बेहद उदास महसूस कर रहे होंगे. अब पाकिस्तान के साथ होगा अगला मैच उसे तो जीतना ही होगा. शाम को उन्हें पड़ोसी के बेटे के जन्मदिन की पार्टी में जाना था, वहाँ कई लोगो से मुलाकत हुई कुछ परिचित कुछ अपरिचित..रात को सोने की तैयारी करते-करते टीवी पर “मधुरिमा” देखा, भगवतीचरण वर्मा के गीत तो बहुत सुंदर थे पर छायांकन अच्छा नहीं लगा सिर्फ एक गीत छोड़कर...’वह एक छोटा सा विहग...अपनी उमंग में उमग’. ‘हम दीवानों की क्या हस्ती, मस्ती का आलम छोड़ चले’...भी बहुत अच्छा गीत है, बहुत पहले उनके स्वर्गवास पर धर्मयुग में पढा था उसने.
नन्हे का स्कूल शिवरात्रि के कारण बंद था, उसके साथ क्रिकेट खेला, पहले क्लब, फिर उसके मित्र के यहाँ ले गयी उसे. शाम को वे अपने एक परिचित परिवार में गए, शिवरात्रि का व्रत रखा था उन्होंने, छोटा सा आपरेशन होना है पेट का गृहणी का, वैसे तो जरा-जरा सी बात पर घबरा जाती है पर आज निर्भय लगी. घर आयी तो उसके पेट में हल्का दर्द हो रहा था, खाना बनाने का भी मन नहीं कर रहा था, खिचड़ी बना दी उसने जो नन्हे और जून दोनों को पसंद है. फिर चुपचाप बिस्तर में लेट कर ‘सरिता’ पढ़ती रही, सरिता के कुछ पुराने अंक पंजाबी दीदी ने दिए हैं.





Friday, September 21, 2012

गहराई कितनी गहरी...



कल रात वर्षा ने आंखमिचौली खेली, दो बार बिस्तर ऊपर-नीचे हुआ, फिर उन्हें नीचे कमरे में सोना पड़ा, इतनी घुटन, इतनी बंद हवा कि अभी तक सिर भारी लग रहा है, और नींद भी कैसी स्वप्नों भरी थी. इस समय भी मौसम बेहद गर्म है. नन्हा इन सारी परेशानियों के बीच कैसे आराम से सोया है, बच्चे आखिर बच्चे ही होते हैं, बादशाह अपने मन के. दिन में जब वह सोया न हो, उसके हाथ, पैर तथा मुंह चलते ही हैं, न चलते-चलते थकता है न बोलते-बोलते. जून को पत्र लिखते समय वह हर बात लिख देती है, छोटी-बड़ी अपने मन की, और उसके बाद एक अजीब सा खालीपन महसूस होता है, यह अपना आप उड़ेंल देना, अपने को निर्वस्त्र कर देने सा ही है न, कहीं कुछ तो बचा कर रखना ही चाहिए, भले ही जून उसका ‘स्वयं’ ही क्यों न हो, स्वयं से भी कुछ बातें छिपी रहें तो रहस्य बना रहता है, कौतूहल भी. कल रात से उसे खत लिखने के बाद से ही एक रीतापन सा महसूस हो रहा है अब उसका अगला पत्र आने तक ऐसा ही रहेगा.

परसों उसने सौ रुपये के नोट का फुटकर करवाया, दो ही दिन में आधे पैसे खर्च हो गए, जब तक नोट बंद था ठीक था. ननद के पेपर चल रहे हैं. सोनू और वह छत पर हैं, माँ किचन में. बिना प्रेस किये कपड़े पहने हों कभी याद नहीं पड़ता, सातवीं-आठवीं में पढ़ती थी उसके बाद से तो कभी भी नहीं, यहाँ प्रेस खराब है, पैसे देकर कपड़े प्रेस करना खलता है, पर क्या करें. कल शाम को गर्मी ज्यादा थी उसने स्नान किया, बाल पोंछे ही नहीं, देर तक ठंडक साथ रही. अभी फिर रीठा आदि लगाकर बाल धोए हैं, छींके आनी शुरू हो गयी हैं, लगता है सर्दी होगी, वही कॉमन कोल्ड...

जून का खत आया है, सो मन तो खुश है, पंछी की तरह उन्मुक्त खुले-खुले गगन में उड़ता हुआ सा..उसने भी उसे लिखा है, उस भोले, उदार मित्र को, वह स्वयं भी नहीं जानती थी कि उसके लिए इतना प्यार छिपा है उसके मन में , उसके मन में उसके सिवा और कुछ है भी कहाँ. वह खुश रहे, सुखी रहे यही दुआ निकलती है हर पल. उसको खुश रखना उसका सर्वप्रिय कार्य है. आज घर का माहौल हल्का-हल्का है, माँ भी ठीक हैं, पर उनका दुःख कितना गहरा है उसका अनुमान कोई और नहीं लगा सकता. पर फिर भी जीना तो है ही, खुश भी रहना है, क्यों कि जीवन है तो खुश रहने की इच्छा भी है, सुख की आकांक्षा भी है. दुःख को भुला कर मुस्कुराना भी है. समाचारों का समय हो रहा है, जून भी समाचार दख रहे होंगे.

कल रात उसने ‘गहराई’ फिल्म देखी, फिल्म के दृश्य बार-बार स्वप्न में आ रहे थे. पहले कभी इसके बारे में सुना था. आज इतवार है, वह स्नान करके लिखने बैठी है, नन्हा सो रहा है. जून भी शायद चाय की चुस्कियां ले रहे होंगे. आज शाम को उन्हें चाची की लड़की की मंगनी में जाना है. माँ-पापा का खत भी आया है, उसे घर जाना ही चाहिए. उसने सोचा २८ या २९ को जायेगी, रिजर्वेशन के लिए जून के मित्र को कहना होगा.

 



Friday, August 10, 2012

स्वीमिंगपूल में पहला दिन




पिछले तीन दिन वह फिर नहीं लिख सकी, सुबह न लिखे तो दिन भर व्यस्तता में याद ही नही रहता. कल रात जून के सो जाने के बाद वह कुछ देर पढ़ती रही, कल पांच पत्रिकाएँ एक साथ जो आ गयी थीं. परिणाम यह हुआ कि सुबह उसे बेहद नींद आ रही थी, वह तैयार हो रहे हैं यह नींद में कोई खबर तो कर रहा था, पर उठ नहीं पायी. बाद में उसे अच्छा नहीं लगा, खुद से वादा किया कि आगे ऐसा नहीं करेगी. जाने क्यों मन जिसे इतना चाहता है कभी उदासीन भी हो जाता है उसके प्रति, शायद ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, ऐसा कहीं पढ़ा था. उसने माँ को लिखा है कि वहाँ रहकर बी. एड करना चाहती है. उनका जवाब शायद महीने के अंत तक आ जाये.

आज उसका काम जल्दी हो गया, नन्हा अभी उठा नहीं है, कल वे उसे इस वर्ष पहली बार स्वीमिंग पूल ले गए थे. उसे बड़ा आनंद आ रहा था, एक बार तो वह पूरा पानी में ही चला गया था, कितना डर गयी थी वह, और नन्हा भी पानी में तैरने-उतराने लगा था ऊपर आने के लिये. अब वे कभी उसे पानी में अकेले नहीं छोड़ेंगे. कल दोपहर भर भी वह पढ़ती रही, इसी कारण आँख में हल्की पीड़ा थी रात को. टीवी पर ‘जिंदगी’ का अंतिम एपिसोड था, अंत सुखद था पर अप्रत्याशित. शायद इसके सिवा औए कुछ सोच ही नहीं सकते थे वे लोग. दोनों घर से पत्र आये हैं, एक शुभ समाचार मिला मंझले भाई-भाभी माता-पिता बनने वाले हैं, पर अब वे लोग यहाँ नहीं आ पाएंगे.

कल उनके नेपाली पड़ोसी अपना कलर टीवी उनके घर रख गए, घर गए हैं अपने परिवार को लाने. उन्होंने The old fox देखा, कुछ समझ में आया, कुछ नहीं, पर रंगीन टीवी की बात ही और है फिर ओनिडा हो तो और भी अच्छा है, सोने पे सुहागा. कल शाम बहुत दिनों बाद दो परिवार उनसे मिलने आये, अच्छा लगा. आज ईद है, जून के दफ्तर में अवकाश है, सोचा था आराम से उठेंगे, पर सुबह-सुबह बिजली चली गयी, गर्मी से नींद खुल गयी. उन्होंने शाक-वाटिका से भिन्डी व भुट्टे तोड़े, अंगारों की तरह गैस पर ठीक से भुन नही पाते, भीतर से कुछ कच्चे ही रह जाते हैं.

पिछले हफ्ते डायरी नहीं खोली, कई दिनों से उसने कुछ नहीं लिखा है कोई कविता आदि. आलस्य की पराकाष्ठा पर पहुँच गयी है वह, माना कि सुबह जब नन्हा साथ ही उठ जाता है तो संभव नहीं होता पर दोपहर को लिखा जा सकता है, मन भी बस कितना सुविधा-आराम सहित पसंद है. सारे किये-कराये पर इतने दिनों के नियम पर पानी फेर देता है. आज भी उसका मन हुआ वही किताब पढ़ने का, Jean pludiy की Queen Caroline अच्छी किताब है पर इसका मतलब यह तो नहीं कि दिनभर उसे ही लेकर बैठो. कल वह हॉस्पिटल गयी थी, दो परिचित महिलाओं को देखने, एक ने पांच किलो की बेटी को जन्म दिया है, गोल-गोल प्यारी सी. कल छोटे भाई और बड़ी बहन के पत्र भी आये, भाई अभी घर से दूर है, अगले माह घर जायेगा तभी वह उसे जवाब लिखेगी, बहन ने एक और सवाल पूछा है, जवाब के लिये मन में कितने विचार आ रहे हैं.

Thursday, July 12, 2012

जाने भी दो यारों


कल वह आगे नहीं लिख पायी, नन्हा उठ गया फिर सारी शाम उसके साथ ही बीती. आज बापू की पुण्यतिथि है, कभी विचारों में बहुत निकट लगते थे, आत्मीय हों जैसे, आजकल तो याद भी करती है तो सिर्फ दो अक्तूबर और तीस जनवरी को. टीवी पर युवामंच में एक कार्यक्रम हुआ था, ‘युवा पीढ़ी और गाँधी’. अच्छा लगा था उस दिन एक युवा, संजना के विचार सुनकर. गांधीजी की आत्मकथा फिर से पढ़नी चाहिए. आज वह गयी थी अपनी दक्षिण भारतीय सखी के यहाँ, वही कल रखकर गयी थी वह पैकेट, उसने घर पर बनायी थीं दोनों चीजें.
कल माह का अंतिम दिन था, एक माह कैसे बीत गया पता ही नहीं चला, समय तो अपनी चाल से ही चलता है. रात को कुंदन शाह की फिल्म देखी, ‘धुंधले साये’ वही जिनकी “जाने भी दो यारों” देखकर कितना हँसे थे वे. आज से उसने नयी महरी को रखा है, पुरानी का नाम मिनी है, जो थोड़ा गर्म दिमाग की है, देखें कल वह क्या कहती है.
कल जून देर से गए सांध्य भ्रमण को, नन्हा उठ गया सो वह कुछ नहीं लिख पायी. वक्त तो सुबह भी था, दोपहर को भी, धर्मयुग पढ़ती रही, इण्डिया टूडे तो अभी पढ़ना आरम्भ ही नही किया और लाइब्रेरी से भी जून उसके लिये दो किताबें लाए थे. सोनू अब अपने आप वाकर में घूमता है, कभी कभी इतनी तेजी से पूरे कमरे में चक्कर लगाता है और किलकारी भरता है, कि उन्हें डर लगता है, पर वह पल भर में पास से गुजर जाता है.
आज दिन भर धूप आती-जाती रही, ज्यादा समय बादलों की चली. इस समय भी बदली बनी है सो शाम कुछ ठंडी हो गयी है. उसकी आँखों में विशेषतया बायीं आँख में हल्का दर्द है, और दायीं ओर सर में भी थोड़ा, जून कहकर गए हैं कि सो जाये वह चुपचाप, पर वह जानती है नींद कहाँ आयेगी...हाँ यूहीं चुपचाप लेटा जा सकता है, ऐसा मौका कम ही मिलता है शामों को कि अपने आप से मिला जा सके. 
आज तीन पत्र आये, वे हर हफ्ते दोनों घरों पर व हर महीने अन्य सभी को पत्र लिखते आये हैं, हर हफ्ते किसी न किसी का पत्र आता ही है, और सबकी खबर लाता है. कुछ देर पहले वे तीनों घर के बाहर ही कुछ देर टहलते रहे, पश्चिम में आकाश गुलाबी था, और उनके सिर के ऊपर नीला आकाश और रुई के फाहों से सफेद बादल. नन्हा सात माह का हो गया, आज वह देदे, देदे तुतलाकर बार-बार  बोलने की कोशिश करता रहा. उसकी हरकतें देख देख कर वे खूब हँसे.  

क्रमशः

Monday, July 9, 2012

नए वर्ष में


नया वर्ष आया और पांच सूरज दिखा भी गया, आज छह तारीख है, दोपहर को सोयी नहीं आज, कितने सारे काम हो गए. कपड़े प्रेस किये, साड़ी को फाल लगायी और अब सोच रही है कि शाम को  नाश्ते में कुछ ऐसा बनाये जो पहले कभी न बनाया हो. नन्हा खेल कर थक कर सो गया है.

दिन की शुरुआत सामान्य ढंग से, मौसम अच्छा था, कल दिन भर छाए बादलों की तुलना में बिल्कुल उल्टा यानि धूप निकली थी. दोपहर का खाना उसने अकेले ही खाया, जून अपने साथ किन्हीं मित्र को लाए थे, उनके जाने के बाद वह नन्हें को सुलाने का प्रयत्न कर रही थी कि पास में रहने वाली एक नवविवाहिता परिचिता आ गयी, उसके ही शहर की रहने वाली है, शायद छोटी बहन के साथ पढ़ी भी हो. पूरी दोपहर उसी के साथ बातें करते बीती, नन्हा खेलने में मग्न हो गया. अब बैठने भी लगा है, कुछ महीनों में चलना भी सीख जायेगा और फिर बोलना भी. उसके जाने के बाद ही सोया. जून के आने पर भी वह सो रहा था. वह घूमने गए हैं. घर से पत्र आया है, छोटा भाई जयपुर चला गया है. पिता जी का भी तबादला पुराने शहर हो गया है.

मौसम आज भी खुशगवार, दोपहर पूर्व सोनू को लेकर पार्क में गयी तो धूप बहुत तेज थी. लौटते समय उसकी समान उम्र के दो बच्चों से मिली, रिक्की के सर में दायीं ओर चोट लग गयी है, ऊपर से पता नहीं चलता अंदरूनी चोट है उसकी माँ ने बताया, नन्हा भी दो-तीन बार गिर चुका है, उसका ख्याल रखना होगा, उसने मन में तय किया.   
क्रमशः

Friday, July 6, 2012

दाल का पानी


नन्हा देर से सोया है सो अभी तक जगा नहीं है, नूना के मन का अश्व विचारों की धूल उड़ाता जा रहा है. उसे समझ में नही आता क्या उचित है क्या अनुचित, सब कुछ जैसे अपने आप हो रहा है, उनका कोई अधिकार ही नहीं, वे पर चले जा रहे हैं बस यूँ ही... जैसे बहे जा रहे हों नदी की धारा में. वह पल भर भी बैठ कर सोच नहीं पाती कि क्या करना चाहिए. क्या थे वे और क्या  हो गए हैं, कोई व्यवस्था नहीं रह गयी है. वर्ष समाप्त होने को आया है. अगले महीने उनके विवाह की वर्षगाँठ है, पिछले वर्ष उसने जून से कहा था कि बहुत अच्छी तरह मनाएंगे वे यह दिन पर अब उसे लगता है कि किसी को भी नहीं बुला पाएंगे. मन में बातें उठती ही चली जाती हैं बिन बुलाए मेहमान की तरह या फिर बिन बुलाई नदी की बाढ़ की तरह. उसने सोचा आज दोपहर वह सोयेगी नहीं, बस चुपचाप बैठकर सोचेगी कुछ. आज धूप तेज है मन होता है बाहर धूप में बैठे थोड़ी देर, उसने सोचा जून भी आने वाले होंगे.

कल क्रिसमस है, बचपन में सभी त्योहारों को मनाने का कितना चाव होता है. वे क्रिसमस ट्री सजाया करते थे, और दिन भर यीशू के गीत गाते थे. आज इस समय वह जो डायरी लेकर बैठी है उसका कारण वही यादें हैं. अभी सुबह ही है सोनू खेल रहा है बीच-बीच में शोर मचाता है. रेडियो सीलोन से बौद्ध संदेश सुनाया जा रहा है पर उसे कुछ भी समझ में नहीं अ रहा है. क्योंकि उनका ट्रांजिस्टर थोड़ा अस्वस्थ है. नन्हा अब करवट लेकर सोने लगा है, बड़ा हो रहा है. मैच आरम्भ हो गया है भारत और श्रीलंका के मध्य. उसने खाना तो बना लिया है पर स्नान नहीं किया महरी कपड़े धो रही है. रोज सुबह का वही क्रम है ऐसे जाने कितने दिन गुजर गए और कितने और गुजर जायेंगे. एक दिन वे सोचेंगे कि सारा जीवन बीत गया इसी उहापोह में, कुछ तो किया ही नहीं. सचमुच सिर्फ अपने तन-मन की चिंता ही व्यस्त रखती है हर पल. और कुछ कहाँ सोच पाते हैं, यह जो दुनिया में इतनी बातें होती हैं उन्हें  पता ही नहीं चलता. कितना दुःख है दुनिया में पर साथ में कितनी खुशी भी तो है कहाँ मिलती है उन्हें उसकी झलक भी ज्यादा. हाँ, अपने में व्यस्त तो वे खुश हैं बेहद खुश. जून, नूना और नन्हा बस तीन प्राणी, छोटा सा संसार है उनका. उसे ध्यान आया दाल उतारनी है कहीं कुकर में पानी खत्म ही न हो जाये. 
क्रमशः

खेल-खिलौने


कल जून के साथ एक छोटी सी दुर्घटना घट गयी, उसकी बाइक मोड़ते समय फिसल गयी. जल्दी आ गए थे वे, नूना उस समय बाहर वाले कमरे में कपड़े प्रेस कर रही थी. नन्हा पास ही खेल रहा था कि देखा उसके दायें बाजू में पट्टी बंधी है, पर उसने कहा मामूली खरोंच है और उसके बाद आज सुबह तक रोज की तरह सभी कार्य किये. कल तक तो वे बिल्कुल ठीक हो जायेंगे. कल घर से चिट्ठी आयी, सबसे मीठी चिट्ठी माँ का होती है, अब उनकी यात्रा में केवल पांच दिन रह गए हैं.

लगभग एक माह पश्चात उसने पुनः डायरी खोली है. कुछ दिन यात्रा में निकल गए कुछ उसकी तैयारी में फिर वापस आकर पुनः घर सहेजने में. नन्हा आज पांच माह का हो गया उसे ट्रिपल एंटीजन व पोलियो की तीसरी खुराक देने आज अस्पताल ले गए थे. सुबह जब वापस आया तो ठीक था पर दोपहर से ही बेहद परेशान है. पहली बार इतना रोया है. जून उसे इस हालत में छोड़कर ऑफिस भी नहीं जाना चाहते थे. इस समय सोया है. जो भी घर में आता है उसे देखकर बहुत खुश होता है. सभी के बुलाने पर हंस देता है, अपनी प्यारी सी हँसी. उसे कुछ होता है तो वे दोनों कितने परेशान हो जाते हैं. लगता है उसका पेट भी ठीक नहीं है. कल परसों उसे आलू खिलाया था व बिस्किट भी, शायद इसी का असर होगा, अभी तक तो वह सिर्फ दूध व सेरेलक पर था.

आज नन्हा ठीक है, कल रात वह कई बार उठा पर जल्दी ही सो जाता था. इस समय पेट के बल लेट कर सामने पड़े खिलौने को पकड़ने की कोशिश कर रहा है, इस तरह लेटने से वह जल्दी ही थक जाता है. अब वह सीधा होकर सर्वोत्तम से छीना-झपटी कर रहा है, पढ़ने का या कुछ भी करने का उसका एक ही तरीका है, वस्तु को सीधे मुँह में ले जाना ऐसा न कर पाने पर शोर मचा कर गुस्सा दिखाता है. सोया रहे तो उठते ही खिलौना उठा लेता है. वे यदि दूसरे कमरे में हुए तो उसके खिलौने की आवाज से ही समझ जाते हैं कि वह उठ गया है.
क्रमशः

Thursday, June 21, 2012

अरबी की सब्जी


आज शिक्षक दिवस है. कभी वह भी पढ़ाती थी. पहले स्कूल में, फिर घर पर, और तब कॉलेज में. बचपन से ही वह शिक्षिका होना चाहती थी. वे बचपन में स्कूल-स्कूल खेला करते थे. सब भाई-बहन, जिसमें फुफेरे भाई–बहन भी शामिल होते थे और कुछ आस-पड़ोस के बच्चे. और आज वह इतनी बड़ी हो गयी है कि माँ बन गयी है, उसने सोते हुए शिशु की ओर देखा. तभी तो वह लिख पा रही है. सुबह भी वह सोया था जब जून ऑफिस गया. उसने स्नान किया, खाना बना कर रख दिया. तब जाकर वह उठा. उसके सारे काम करते, नहलाते-खिलाते दो घंटे कैसे बीत गए पता ही नहीं चला, और तब पुनः उसे नींद आने लगी, मालिश-स्नान व आहार पाकर वह अब सुख की नींद सोया है. अब वह स्नान के समय पहले की तरह रोता नहीं है उन्हें हँसते देखकर, कितना प्यारा हँसता है. कल दिन भर बहुत कम सोया, शाम से रात तक बहुत परेशान रहा, जून उसे रोता हुआ नहीं देख पता, घंटा-घंटा भर तक गोद में लेकर झुलाता है जब तक कि वह सो न जाये.

जून को दुबारा बाजार जाना पड़ा, सेब लाया था वह, पूरे चौदह रूपये किलो, पर खराब निकल गए, दुकानदार वापस लौटा तो लेगा. सुबह फिर वह देर से उठा, रात को नींद पूरी नहीं हो पाती, दिन भर भी वह आराम नहीं कर पाता. आज उसके एक सहकर्मी की माँ की मृत्यु हो गयी, वह आंध्रप्रदेश के रहने वाले हैं, उन्हें घर के लिये विदा करने वह उनके घर गया था.

आज नन्हा पूरे दो महीने का हो गया. अभी लिखने के लिए उसने कलम उठाया ही था कि वह जग गया पर जब तक चुपचाप लेटा है, तब तक वह दो चार लाइनें लिख ही पायेगी, उसने सोचा. बाहर मूसलाधार वर्षा हो रही है. अभी शाम है पर रात का आभास हो रहा है.
रात को उन दोनों ने मिलकर इस मौसम में पहली बार अरबी की सब्जी बनायी, नूना के हाथों में अरबी छीलने पर काटती है, इसलिए जून स्वयं ही काट कर देता है, बहुत ख्याल है उसे हर बात का.