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Tuesday, November 17, 2020

शिव सूत्र

 

नैनी का बेटा आज जामुन के वृक्ष पर लकड़ी फेंक कर जामुन गिराने का प्रयास कर रहा था, इसका अर्थ है कुछ ही दिनों में जामुन पकने और स्वयं गिरने आरंभ हो जाएंगे। जून कुछ  समय पहले पैदल ही क्लब चले गए हैं। एक्सेंच्योर कंपनी का एक प्रेजेंटेशन है जो कंपनी को डिजिटल करने की दिशा में सहायता करने वाली है। वर्षा होने लगी है, वापसी में उन्हें किसी से लिफ्ट लेनी होगी। अब लगभग दो माह और रह गए हैं उनके कार्यकाल में। आज से छत्तीस वर्ष पूर्व वे उत्तर प्रदेश से असम आए थे, और जीवन का अगला पड़ाव कर्नाटक में बनेगा। आज प्रधानमंत्री ने राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर जवाब दिया, विरोधी पार्टियां उनकी बातों को समझने में ज्यादा रुचि नहीं दिखाती हैं, ऐसा लगता है मात्र विरोध करना ही उनका ध्येय है।अमित शाह  कश्मीर गए हैं, वहाँ अमरनाथ यात्रा शुरू होने वाली है। हज यात्रा में भी इस वर्ष काफी यात्री जाएंगे, महिलाएं भी काफी संख्या में अकेले जा रही हैं।  योग कक्षा  में एक साधिका ने कहा, उसका दस वर्षीय पुत्र बहुत चंचल है और उसकी बात नहीं सुनता। उसने कहा, बच्चे हों या बड़े, कोई भी जन आदेश लेना नहीं चाहते, देह छोटी हो पर आत्मा तो सबके भीतर समान है, उसे भी अपनी स्वतंत्रता और आत्मसम्मान उतना ही प्रिय है जितना किसी वयस्क को। उससे अनुरोध तो किया जा सकता है पर माने या न माने इसका फैसला उस पर ही छोड़ना होगा। माता-पिता को उसे यह तो बताना  होगा कि क्या करने से उसका लाभ है और किस काम से उसे ही हानि होगी, बाकी उसकी बुद्धि पर छोड़ देना चाहिए। वह यह सब बताती रही पर याद ही नहीं रहा, कि  जून को जाना है। उन्होंने शिकायत की तो उसने कहा, एक माँ को समझा रही थी। वह उस समय तो चुप हो गए पर अवश्य नाराजगी भीतर ही रह गई होगी। ऊर्जा एक बार कोई रूप धारण कर लेती है तो जब तक उसे निष्कासन का मार्ग न मिले नष्ट नहीं होती। साक्षी भाव से उसे देखना पहला तरीका है और झट स्वयं में लौट जाना दूसरा।  

 

आज सुबह तेज बारिश हो रही थी, वे बरामदे में ही टहलते रहे, फिर वहीं चटाई बिछाकर सूर्य नमस्कार व आसन किए। सुबह का योग दिन भर मन को  ऊर्जा से ताजा रखता है। एक अनुपम गंध जाने कहाँ से आ रही है, परमात्मा की शक्ति व कृपा अपार है व उसका रहस्य कोई नहीं जान सकता। परमात्मा ने उसे साम, दाम, दंड, भेद हर तरह से समझाया है कि वह हर तरह की आसक्ति का त्याग कर दे।  छोटी बहन कनाडा में है, सुंदर तस्वीर भेजी है। दीदी ने उसकी रचनाओं पर टिप्पणी की है, वह सदा उन्हें पढ़ती हैं। आज ‘शिव सूत्र’ पढ़े। मातृका के बारे में जानकर बहुत अच्छा लगा। संस्कृत के बावन अक्षर ही बावन शक्ति पीठ हैं। अघोरा , घोरा और महाघोरा  तथा बैखरी, मध्यमा, पश्यन्ति और परा वाणी के संबंध में भी। ज्ञात हुआ साधना के द्वारा उन्हें शब्दों के पार जाकर उस स्रोत तक पहुंचना है जहाँ से शब्द निकलते हैं। उस योग साधिका ने आकर कहा, उसे एक ही दिन में अपने पुत्र में परिवर्तन दिखाई दिया है, उसका खुद का हाथ का दर्द भी आसन करने से ठीक हो गया है। योग का ऐसा परिणाम देखकर बाकी सबको भी अच्छा लगता है। 

 

आज दोपहर को तेज गर्मी के बावजूद बच्चों ने पूरे मन से सुंदर चित्र बनाए। क्रिकेट विश्व कप में भारत का मैच इंग्लैंड के साथ है, जो बहुत अच्छा खेल रहा है। भारत अब तक एक भी मैच नहीं हारा है, कहीं उसकी यह विजय यात्रा थम न जाए। आज चार  महीनों के बाद मोदी जी का सम्बोधन ‘मन की बात’ में सुना, जिसमें वह सभी देशवासियों को प्रेरित करते हैं, आज जल संरक्षण पर बात की, अपनी केदारनाथ यात्रा का जिक्र किया और भी कई मुद्दों पर बात की, पर सबसे अच्छी बात थी, उनकी भावनाएं इतनी पवित्र हैं और वह एक राजनीतिज्ञ से अधिक एक लेखक, कवि या दार्शनिक लगते हैं, वह सुधारक भी हैं और प्रेरक भी। उन्हें पत्र लिखकर यह सब बताने का मन हुआ, आज कई बार उनकी बातें सुनकर हृदय छलक आया। उनके हृदय में इतनी करुणा और इतना विश्वास है कि भारत जैसे विशाल देश के सुदूर गावों में रहने वाले लोग भी उनसे एक जुड़ाव महसूस करते हैं। सुबह सभी परिवार जनों से भी फोन पर साप्ताहिक  बातचीत हुई। छोटी भतीजी एओल का बेसिक कोर्स कर रही है, वह घर से बहुत दूर जॉब करने जाती है, भाई को उसकी सुरक्षा की चिंता के कारण कुछ तनाव तो होता होगा । माँ-पिता दोनों का ही रोल उन्हें निभाना है । सुबह अमलतास की कुछ और तस्वीरें उतारीं।   

 

वर्षों पूर्व..  उस दिन लिखा था, जीवन क्या है ? क्या मात्र सुख या आनंद का स्रोत ! क्या  सुख प्राप्त करने का प्रयत्न  ही जीवन का मात्र लक्ष्य है ? क्या खुश रहना ही अपने आप में एक महत कार्य है ? क्या भविष्य की योजनाएं बनाना और कठिन परिश्रम करके उन्हें सफल करने का प्रयत्न करना महत्वपूर्ण है या कि .. शायद महत्व इस बात का है कि  किसी का जीवन दूसरों की कुछ भलाई कर सकता है या नहीं । फिर यदि वे सुंदर भविष्य के लिए कुछ करते हैं तो वह उचित ही है। किन्तु वह जो अपना बहुमूल्य समय व्यर्थ कर रही है इसके लिए उसे  ग्लानि भी नहीं होती, होती भी है तो न के बराबर। यद्यपि वह अच्छी तरह जानती है कि  उसका कर्तव्य क्या है, पर भीतर ही कोई भावना है जो कहती है, बस प्रसन्न रहो ! उसके आसपास के लोगों में कोई नहीं कहता कि  यह ठीक नहीं, या  ठीक है पर यह सब कुछ नहीं, यदि वह अपने आपको चमकाएगी नहीं, पॉलिश नहीं करेगी, ज्ञान प्राप्त  नहीं करेगी, जो पढ़ा है उसे दोहराएगी नहीं तो कुंद हो जाएगी पत्थर की तरह। तब कोई महत्व नहीं होगा, सब एक तरफ कर देंगे, छाँट देंगे या वह पीछे रह जाएगी। जीवन काम है सँवारने का,  पॉलिश करने का टेढ़े-मेढ़े पत्थर को सुडौल बनाने का ! 

 


Tuesday, April 17, 2018

मेथी की बड़ियाँ



नये वर्ष का प्रथम दिन अरुणाचल में आरम्भ हुआ और असम में समाप्त. बोलेरो में की यादगार यात्रा  में चालक ने सावधानीपूर्वक गाड़ी चलाते उन्हें सुरक्षित घर पहुंचा दिया. पत्थरों, कच्चे रास्तों और नदियों को पार करते हुए वे दोपहर तक घर पहुंचे. नये वर्ष की पूर्व संध्या पर नये लोगों से मुलाकात हुई. वह मोटी सी अरुणाचली महिला जो पीकर चहक रही थी और वह शांत सी महिला जो  अपने पुत्र को गोदी में सुलाए बैठी थी. अरुणाचल के वर्तमान संसद सदस्य और भूतपूर्व मुख्यमंत्री से बातचीत, सभी कुछ स्मृतियों में कैद हो गया है. वापस आकर बंगाली सखी से फोन पर बात की. पिछले हफ्ते तोड़ कर रखे  केले, जो सभी पक गये थे, बाँट दिए. कुछ अभी भी शेष हैं. जो आनंद बाँट कर खाने में है, वह स्वयं खाने में कहाँ ? कुछ वस्त्र भी निकले हैं, जो दे देने हैं.   

शाम को ध्यान करने बैठी तो मन तंद्रा में चला गया. चौंक कर उठी, मुख पर शीतल जल के छींटे मारे. ध्यान और नींद में एक समानता है. दोनों में चेतन मन शांत हो जाता है और बातें अचेतन मन में चली जाती हैं. सब काम करते हुए भी सजगता कायम रहे इसका ध्यान रखना है, व्यर्थ के संकल्प ही व्यर्थ कर्मों को जन्म देते हैं. कर्मों से सुख पाने की इच्छा भी बांधती है. पानी जैसा मन स्वयं को नीचे बनाये रखने के लिए कई जाल फैलाता है, पर उन्हें आत्मा रूपी अग्नि बनकर ऊपर ही जाना है.

सुबह वे टहलने गये तो हल्का अँधेरा था और हल्का कोहरा भी, पर इस वर्ष ज्यादा ठंड नहीं है, सो सुबह के भ्रमण में व्यवधान नहीं आया है. वापस आते समय कम्पनी के मुख्य अधिकारी व उनकी पत्नी मिले, अच्छा लगा. वैसे भी उस समय मिलने वाले लोग बहुत कम होते हैं. आज मंझले भाई व छोटी ननद का जन्मदिन है, उन्हें मुबारकबाद दी. भाई जहाँ है, तापमान शून्य से पन्द्रह डिग्री कम है. कमरे में हीटर जलाने के बाद -२ डिग्री तक आ जाता है. इतनी ठंड में भी वहाँ जीवन चल रहा है. मानव की सहनशीलता व क्षमता की कोई सीमा नहीं है. ननद ने नया दफ्तर ज्वाइन किया है, उसके बैंक में सभी ने मिलकर केक मंगाया व जन्मदिन मनाया. कल वापसी की यात्रा में वे तिनसुकिया होते हुए आये, मेथी लाये. आज सुबह मेथी की बड़ी बनाकर सुखाने के लिए रखी हैं. जून ने ही सारी तैयारी की. मेथी की बड़ी उनकी प्रिय खाद्य वस्तु है. इतवार को अक्सर लंच में इसका मेथी पुलाव बनाते हैं, और इतवार की सुबह यदि दक्षिण भारतीय नाश्ते का मन हो तो वे इडली बनाने में दक्ष हैं. शाम को एक परिचित दम्पति अपने पुत्र के विवाह का निमन्त्रण पत्र देने आये, अगले महीने रिसेप्शन है. गुलाबी रंग का कार्ड बहुत सुंदर है, उनका पुत्र स्कूल में नन्हे का सहपाठी था. नन्हा कूर्ग के पास किसी स्थान पर मित्रों के साथ घूमने गया है. शाम को ‘मृणाल ज्योति’ की मीटिंग थी. दस दिनों बाद कन्या छात्रावास का उद्घाटन है. तीसरे सप्ताह में उत्तर-पूर्व सम्मेलन है, जहाँ अन्य राज्यों से विशेष बच्चों के लिए बनी संस्थाओं के प्रमुख आएंगे.
   

Thursday, December 21, 2017

नया कम्प्यूटर


आज भी मौसम भीगा-भीगा है. लगातार फुहार पड़ रही है. फेसबुक पर आज पिताजी के साथ अंतिम पिकनिक की तस्वीरें पोस्ट कीं, दो वर्ष पहले जनवरी माह की होंगी शायद. शाम को एक पुराने मित्र भोजन के लिए आ रहे हैं. उसके पहले बाजार जाना है, जून उसके लिए साड़ी लाये हैं, उसे पीको आदि के लिए देने. एक नई कविता लिखी, आज वह अनाम बहुत करीब लग रहा है, नयन बंद करते ही अंतर प्रकाशित हो उठता है ! अगले महीने जीजाजी का जन्मदिन है, उनके लिए भी कुछ पंक्तियाँ लिखीं. कम्पनी की तरफ से नया कम्प्यूटर इंस्टाल हुआ है आज. अभी मकैनिक स्कैनर व प्रिंटर को इंस्टाल कर रहे हैं. अब वह कार्ड्स आदि घर पर ही प्रिंट कर सकती है. इसी माह एक सखी का जन्मदिन है पर उससे बहुत दिनों से कोई बात नहीं हुई है. अगले महीने नन्हे का भी जन्मदिन है, उसके अगले जून का और बड़े भांजे का भी. सभी के लिए कुछ न कुछ लिखेगी. दीदी का जवाब भी आया है, उन्हें कविता अच्छी  लगी !

लंच तैयार है, समय हो चुका है, पर जून अभी तक आये नहीं हैं. आज ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ है. उनके दफ्तर में पौधे लगाने का कार्यक्रम है. कल शाम भी एक मीटिंग के कारण सात बजे घर लौटे. थोड़ी देर में ही मेहमान भी आ गये. ढेर सारी बातें कहीं, अपनी पत्नी और बिटिया से नोक-झोंक की बातें. उनकी पत्नी को एक स्वास्थ्य समस्या भी हो गयी है. उसे हाथों व पैरों में कॉर्न हो जाते हैं, जो पेनफुल हैं. उससे बात की तो पता चला शरीर में प्रोटीन की प्रतिक्रिया से ऐसा हो रहा है. नूना के भी बाएं हाथ के दो नाखूनों में सफेदी आ गयी है, शायद किसी तत्व की कमी है. पौने दस बजे वे गये. रात को सोने में देर हो गयी तो जून को देर तक नींद नहीं आई. सुबह उन्होंने जब यह बात कही तो उसके भीतर से किसी ने जवाब देना आरम्भ कर दिया. पता नहीं कहाँ से इतने शब्द निकलते हैं.  


आज असमिया सखी के पुत्र का जन्मदिन है, उससे बात करनी चाही, पर शायद उसका नम्बर बदल गया है, किसी और ने उठाया. आज सुबह उठी तो एक विचित्र अनुभव हुआ, भीतर शब्द लिखे हुए दिखाई दिए, यानि पश्यन्ति वाणी का एक रूप. फिर एक स्वप्न आया, जिसमें छोटी ननद भी थी. जून भी थे. तब जून और उसका संबंध अलग था. कितने सवालों का जवाब मिल जाता है जब पिछले जन्मों की स्मृति आती है. कल सुबह भी एक अनोखा स्वप्न देखा. सद्गुरू को देखा, वह जो उनके सद्वचन सुनती है, शायद उसी का परिणाम था यह स्वप्न. अंततः श्रवण एक मानसिक प्रसन्नता ही तो है यानि सुख की तलाश. ज्ञान सुनने से जो सुख पाना चाहती है उससे और इन्द्रियों से मिलने वाले सुख में क्या अंतर है ? अभी बहुत कुछ है जो ध्यान की गहराई में जाकर मिल सकता है और एक वह है कि संतोष कर बैठी है, शायद यह स्वप्न यही जताने आया था. दोपहर को बहुत गहरी नींद आयी, जैसे बहुत वर्षों पहले आया करती थी. इस समय शाम के सात बजे हैं, जून नये कम्प्यूटर पर काम कर रहे हैं, एक कनिष्ठ अधिकारी उनकी सहायता कर रहे हैं. शाम को उन्होंने स्वयं पेड़ से कटहल तोडा, जिसकी सब्जी उसने आज बनाई है. अब वह ‘भारत एक खोज’ का तीसवां अंक देख रही है. विजयनगर के पतन की कहानी है उसमें. नन्हे को सर्दी लग गयी थी. दोपहर को उससे बात हुई. अब पहले से बेहतर है. दफ्तर आया था, अपना ख्याल रखना जानता है. हरेक को स्वालम्बी होना ही है.      

Monday, February 6, 2017

आकाश में हाथी


आज करवाचौथ है, बड़ी भाभी का फोन आया था, उनका जन्मदिन भी आ रहा है, उन्हें एक कविता लिख भेजनी है, तथा दीवाली कार्ड व भाईदूज का टीका भी. ‘दादीजी’ पर उसने एक स्मृति लेख लिखा है, जून ने उनका फोटो भी स्कैन कर के डाल दिया है. दोपहर को एक पंजाबी सखी के यहाँ जाएगी, नहीं भी जा सकती, मन में एक संदेह ने जन्म लिया है, तो मन अभी तक बचा है, चलो मन तो बचा पर उसमें संदेह भी बचा है, कैसा आश्चर्य है ! सुबह से मन उच्चावस्था में था, संसार की आंच लगते ही निम्न केन्द्रों में चला गया. मन की यही तो विशेषता है, उसे जैसा रंग लगाओ वह उसी में रंग जाता है. परमात्मा की आंच में वह परमात्मा ही हो जाता है. आज सुबह से कितने दोहों का अर्थ स्पष्ट हो रहा है भीतर..लाली मेरे लाल की जित देखूं तित लाल..परमात्मा हर कहीं है जैसे सागर में लहर उठती है वैसे ही प्राणी इस परमात्मा के सागर में उठने वाली लहरे हैं..सभी कोई..इसमें कोई छोटा-बड़ा नहीं है. परमात्मा की नजर में सभी समान हैं एक कीट से ब्रह्मा पर्यन्त ! अब कौन इस परम को अपने भीतर प्रकटने का अवसर देता है इस बात पर उसकी प्रसन्नता टिकी है. कोई जग जाये तो परम उसमें प्रविष्ट हो सकता है. सद्गुरू ऐसे ही होते हैं..वे स्वयं हट जाते हैं और परमात्मा उनमें प्रवेश कर लेता है. भीतर अमृत बह ही रहा है, उसके प्रति सजग भर होना है. जो स्वयं ही भीतर समाया है फिर वहाँ परमात्मा को स्थान कहाँ मिलेगा. यही अज्ञान है, यही मोह है. वे जो स्वयं है वहाँ सिवाय दुःख के कुछ नहीं लाता और जो वह है सिवाय सुख के कुछ नहीं देता..अब उनके हाथ में है कि वे चाहते क्या हैं ?

आज माली ने पौधों के बीज डाल दिए. फूलों के बीज, धनिया, पालक, लाही साग व मूली के बीज भी. कल वह नर्सरी से पिटुनिया, टमाटर, गोभी आदि की पौध लाएगी. और परसों वह भी लगा दी जाएगी. दस बजने को हैं माँ रोज की तरह पिताजी को ढूँढ़ रही हैं. उनकी बातें सुनकर कभी तो वे हँस देते हैं, कभी क्रोध करते हैं जैसा मन हो, मन बदलता रहता है कभी इधर तो कभी उधर..मृणाल ज्योति ने दीवाली के लिए सुंदर दीपक रंगे हैं, परसों शाम कोओपरेटिव में बिक्री करने के लिये आएँगे वे लोग.

कल रात एक अनोखा स्वप्न देखा. नीला आकाश अपनी विशालता व भव्यता के साथ मजूद है और रह रह कर उसका रंग गाढ़ा नीला हो जाता है. चमत्कार जैसा ही लग रहा था. पिताजी भी थे और भी कई लोग थे. स्वप्न में इतने शोख रंग पहले देखे हों याद नहीं आते. बचपन का एक स्वप्न आज तक याद है जिसमें आकाश में चारों दिशाओं में बड़े-बड़े हाथी अपनी सूंड से जल वर्षा कर रहे थे और सारा आकाश फूलों से सजा था..स्वप्न में उनकी चेतना ही कितने रूप धर लेती है. ऐसे ही यह जगत उस परमात्मा का स्वप्न है..कितना अनोखा है यह सब कुछ ...   
  
 ‘गॉड लव्स फन’ ! कल रात को एक अनोखा स्वप्न देखा. बाबा रामदेवजी का फोन आया है उसके लिए. उसने कहा, विश्वास ही नहीं हो रहा कि उनसे बात कह रही है. तब बाबा ने कुछ कहा ..कि ऐसी क्या बात है और हर्षातिरेक में स्वप्न टूट गया. फिर आज सुबह क्रिया के बाद यह अनुभव हुआ की वह ही आत्मा है, अनोखा अनुभव है यह जानना कि वह ही इन्द्रियों के माध्यम से देख, सुन, बोल रही है. बचपन में वे कितने विश्वास से कहते थे कि उनके भीतर जो बोल रहा है वह परमात्मा है, तब ये सामान्य बातें हुआ करती थीं, हर कोई इन्हें जानता था, पर आज के युग में कोई परमात्मा को अपना अनुभव बनाना नहीं चाहता, माया प्रबल है.    

Wednesday, June 22, 2016

हिन्दयुग्म में कविताएँ


कामना संसार की होगी तो कभी पूर्ण नहीं होगी, राम की होगी तो पूर्ण हुए बिना रह नहीं सकती. राम तो मिलेगा ही संसार भी पीछे-पीछे आएगा. जीवन में कितनी बार इस बात का अनुभव हुआ है जब भी उसने अपना सुख संसार पर निर्भर किया, धोखा ही मिला, जैसा चाहा वैसा नहीं हुआ, आशा कितनी बार निराशा में बदली. इस सत्य को यदि वे सदा याद रख सकें और किसी से कोई अपेक्षा न रखें तो मुक्त रह सकते हैं. अपने भीतर ही सुख की खोज करें जो बिखरा ही हुआ है, जो अनंत है. जो असीम है, जो सहज ही प्राप्त है ! उसने सोचा, यदि मानव को वह मिल जाये तो उसका जीवन क्या रुक नहीं जायेगा ? यदि उनकी लालसा सुख की है और सुख उन्हें बिना कुछ किये यूँ ही मिल जाये तो वे कुछ करना ही क्यों चाहेंगे, तो इसका उत्तर भी भीतर से आया कि जिस तरह सुख सहज प्राप्त है, कर्म करने की इच्छा भी स्वाभाविक है, उस स्थिति में उनके कर्म तो होंगे पर वे स्वार्थ से भरे नहीं होंगे, वे बांधने वाले नहीं होंगे, वे उन्हें कष्ट नहीं देंगे, वे भी आनंद को बढ़ाने वाले होंगे. यदि ऐसा है तो क्यों नहीं हर कोई अपने भीतर जाकर उस सुख राशि को खोज लेता ? हर कोई स्थिर बैठना नहीं जानता, भीतर जाना नहीं सीखता, बाहर ही बाहर उसे इस तरह बांधे रखता है कि कोई भीतर है भी इसका भी उसे भरोसा नहीं होता, दिन-रात जो बाहर ही रहता है, उसे पता ही नहीं चलता कि उसके भीतर भी एक आकाश है, जहाँ सूरज उगता है. वह अपने भीतर के हिरण्यमय कोष से अनजान ही रह जाता है. भीतर की दुनिया उसे दूर की, रहस्यमयी सी प्रतीत होती है, जबकि बाहर से उसका दिन-रात का नाता होता है. बुद्धि की सीमा जहाँ समाप्त होती है, हृदय का आरम्भ होता है ! लेकिन वे अपनी बुद्धि पर हद से ज्यादा भरोसा करते हैं. हर कोई दूसरे को मूर्ख तथा स्वयं को बुद्धिमान समझता है. छोटी से छोटी बात में भी वे अपने अहम की पुष्टि चाहते हैं. अहंकार की जड़ इस बुद्धि में ही है, जो उन्हें पश्चाताप के सिवा कुछ देकर नहीं जाती. हृदय में प्रवेश होते ही बुद्धि का चश्मा उतर जाता है. तब कोई छोटा-बड़ा नहीं रहता.   

आज नन्हा आने वाला है, उसने पिछली बार उन्हें स्मरण दिलाया था कि इतने सालों में वे आगे नहीं बढ़े हैं, उनके विवादों का कारण भी वही है और डायलाग भी वही हैं. इस बार भी वह किसी कटु सत्य की ओर इशारा करेगा. बच्चे माता-पिता को बारीकी से परखते हैं. वह स्वयं की कमियों को नहीं देख पायेगा, जैसे वे स्वयं को पूर्ण मानने की गलती कर बैठते हैं. नये वर्ष का आरम्भ हो चुका है, उसकी नये वर्ष की कविता कितने लोगों ने पढ़ी, नेट के माध्यम से उसे कितने पाठक मिले हैं. कितना कुछ लिखना अभी शेष है. यूनिकोड में लिखना भी सीख लिया है, जरा भी कठिन नहीं है. अभी लोहरी व गणतन्त्र दिवस की कविता लिख सकती है तथा विवाह की वर्षगांठ के लिए भी. ‘हिन्दयुग्म’ में कितनी कविताएँ पढने को भी मिलती हैं. हजारों लोग लिख रहे हैं. प्रभु ने उसे भी लेखन की शक्ति दी है, जिसे निखारना, संवारना उसका कर्त्तव्य है, अन्यथा यह उसका अपमान होगा. हर दिन कुछ न कुछ लिख सके ऐसा प्रयास इस नये वर्ष में होना चाहिए, और नहीं तो डायरी ही रोज लिखे, पत्र लिखे चाहे भेजे नहीं. गुरूजी को पत्र लिखने का कार्य भी आजकल छूट गया है. अपनी आध्यात्मिक प्रगति का लेखा-जोखा भी इसलिए रुक गया है, जो यह मान लेता है कि पा लिया है, जान लिया है उसका ज्ञान चक्षु बंद हो जाता है !



Tuesday, June 21, 2016

टैगोर की गीतांजलि



नन्हे से बात करके हमेशा बहुत अच्छा लगता है. उसकी कम्पनी तरक्की कर रही है. nabbo solutions नाम है उसका, तथा turbodor.in उसके वेबसाइट का नाम है. अगले वर्ष तक सम्भवतः वे संख्या में बढ़ जायेंगे, अभी कुल ७-८ लोग हैं और काम बढ़ेगा तो लोग भी चाहिए. वह जनवरी में आयेगा तब विस्तार से बतायेगा, अभी तो फोन पर हर दिन कोई न कोई बात बताता है. मार्च-अप्रैल में वे उसके पास जायेंगे, जब माँ-पिताजी घर जायेंगे. माँ की सेहत पहले से ठीक है, बस मानसिक रूप से वह कुछ असुरक्षित महसूस करती हैं. पिताजी अपने को व्यस्त रखते हैं और खुश भी !

कितना कुछ पढ़ने को एकत्र हो गया है, ढेर सारी पत्रिकाएँ हैं ही. नेहरू की ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’, चित्रा बनर्जी की ‘illusions of palace’, रवीन्द्र नाथ टैगोर की ‘गीतांजलि’ भी लाइब्रेरी से लायी है. हिंदी पुस्तकालय से लायी आठ पुस्तकों में से ‘मीरा’ पर आधारित उपन्यास पढ़ना आरम्भ किया है. दिसम्बर का आरम्भ हो गया है. अभी-अभी एक बुजुर्ग परिचिता का फोन आया, वह अपनी बहू के व्यवहार से दुखी हैं, वह भी उनके व्यवहार से दुखी होगी. कल दोपहर को नैनी आई थी, वह अपनी नई मालकिन के बर्ताव से दुखी थी, यकीनन मालकिन उसके आचरण से दुखी रही होगी. यहाँ उनके घर में काम करने वाली नैनी भी दुखी है अपने पति से, जो उससे नाराज है. इस जगत में सभी तो दुखी दिखायी देते हैं. कोई एक-दूसरे को नहीं समझता. लेकिन यही तो होना ही चाहिए. जब सभी की बुद्धि पर मोह का पर्दा पड़ा हो तो कोई खुश कैसे रह सकता है. उनका मन ही दुःख का जनक है और मन नाम है अहंकार का, अहंकार पुष्ट होता है अपनी छवि को पुष्ट करने से, छवि पुष्ट होती है अपने बारे में सत्य-असत्य धारणाएं पालने से. इच्छाओं की पूर्ति होती रहे तो भी ‘मैं’ पुष्ट होता है. अपने में कोई सद्गुण हो या न हो पर होने का वहम हो तो भी अहम पुष्ट होता है और यह अहंकार दुःख का भोजन करता है. जब वे अपने ही बनाये भ्रम को टूटते देखते हैं तो भीतर छटपटाहट होती है, यह सब सूक्ष्म स्तर पर होता है इसलिए कोई इसे समझ नहीं पाता. वही समझता है जो अपने भीतर गया हो जिसने मन का असली चेहरा भली-भांति देखा हो, जो मन को ही स्वयं मानता हो वह कैसे इसे पहचानेगा. इसलिए जगत में कोई दोषी नहीं है अथवा तो सभी दोषी हैं. संतजन यही तो कहते आए हैं, जो जगा नहीं है, वह दुःख पाने ही वाला है !


लगभग दो हफ्ते पहले जो स्वप्न देखा था आज वह सत्य हो गया. सुबह छह बजे छोटे भाई का फोन आया कि बड़े चाचाजी का कल रात को देहांत हो गया. उनके पुत्र से बात हई तो उसने कहा, रात को बारह बजे उठकर उसने देखा तो उनके हाथ-पाँव ठंडे थे तथा आँख नहीं खोल रहे थे, पता नहीं कब उनके प्राण निकल गये थे. रात को ही एक बुजुर्ग महिला को वह ले आया था जो रिश्ते में स्वर्गीया चाचीजी की मामी हैं. आस-पास की महिलाएं भी आ गयी हैं तथा छोटी बहन को सांत्वना दे रही हैं. उसके पति भी आ गये हैं. 

Saturday, June 18, 2016

हरियाली और हवा की गुपचुप


अभी दो नहीं बजे हैं, आकाश बादलों से घिरा है, ठंड भी बढ़ गयी है. उसने लंच के बाद जून के जाने पर कम्प्यूटर ऑन किया. छोटी व बड़ी बहन के मेल थे. सद्गुरु का विस्डम संदेश भी था. दिनोंदिन जिसकी भाषा परिष्कृत होती जा रही है या वह ज्यादा गहराई से समझने लगी है, कितने कम शब्दों में कितना सटीक उत्तर वे देते हैं, अद्भुत है उनका ज्ञान, अद्भुत हैं वे ! परसों एक बुजुर्ग परिचिता का जन्मदिन है, उनके लिए कविता लिखी है. परसों ही सत्संग भी है, जून को उसका वहाँ जाना पसंद नहीं है और उनकी इच्छा के खिलाफ कुछ करने का अर्थ है घर में अशांति का पदार्पण ! उसका मन (आश्चर्य है कि अभी तक वह बचा है) विद्रोह कर रहा है. आज सुबह सुना था “इच्छा शक्ति उमा कुमारी” इच्छा कभी पूर्ण नहीं होती, यही तो विडम्बना है. इच्छा से मुक्त होना हो तो उसे समर्पित कर देना चाहिए ! जहाँ कामना है वहाँ सुख नहीं, वहाँ आनंद नहीं, वह भी अपनी सत्संग में जाने की कामना ईश्वर को समर्पित करती है, आगे वही जानें !

दोपहर के दो बजे हैं. बगीचे में झूले पर वह बैठी है, धूप और छाँव दोनों ने जिस पर इस समय अपना अधिकार जमा रखा है. उसके पैर धूप में है शेष भाग छाया में है पर सिर की चोटी पर धूप की तपन का अनुभव हो रहा है, हल्की हवा भी बह रही है. सामने मैजंटा रंग के फूल खिले हैं बायीं ओर एक बड़े प्लास्टिक के गमले में साइकस जाति का एक पादप अपने पूरे गौरव के साथ उगा है. उसका सिर  थोडा भारी है और पेट भी, सम्भवतः वस्त्रों के कारण या सर्दियों की शुरुआत में पौष्टिक भोजन के कारण ! कल शाम को सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था, वे संध्या भ्रमण के लिए निकले तो उसने सत्संग में जाने की बात कही, जून ने चुप्पी ओढ़ ली, उसने कहा, उन्हें उसकी जरा भी परवाह नहीं है. पर बाद में लगा यह ठीक नहीं था. उसके भीतर दो व्यक्तित्त्व हैं, एक पूर्ण तृप्त है, वह रहस्यमय है, वह होते हुए भी नहीं के बराबर है, एक दूसरा है जो जग में सबके साथ हिलमिल कर रहना चाहता है. वहाँ जाने अथवा न जाने से उसे कोई हानि या लाभ होगा ऐसा भी नहीं है. हानि-लाभ की अब कोई बात ही शेष नहीं रह गयी है. भजन गाते-गाते भाव में डूबना उसका सहज स्वभाव है, बस इतना ही. सो वह इस नीले आकाश के नीचे चमकते हुए प्रकाश में हरियाली और हवा की इस गुपचुप को सुनते हुए पंछियों के सुर में सुर मिलाकर अपने आप को जीवन की धारा में निर्विरोध बहने के लिए छोड़ देती है ! जो हो सो हो...एक तितली उसके वस्त्रों पर आकर बैठ गयी है, उस पर फूल बने हैं, वह शायद फूल की खोज में ही आई है और रस न मिलने पर भी कैसे आराम से बैठी है.

आज फिर वही कल का सा समय है, झूले पर धूप-छाँव का खेल चल रहा है, जैसे जीवन में प्यार और तकरार का खेल साथ-साथ चला करता है. जून के साथ उसका रिश्ता भी कुछ ऐसा ही है. शाम को चार बजे मृणाल ज्योति जाना है, विश्व विकलांग दिवस के लिए मीटिंग है. उसके बाद वे उन बुजुर्ग महिला से मिलने जायेंगे जिनका जन्मदिन है.


Monday, May 16, 2016

होली की पावन ज्वाला


ध्यान का फल ज्ञान है. कोई जगत में लगाये या परमात्मा में.. संसार में जिसका ज्ञान मिल जाता है, वहाँ से ध्यान हट जाता है क्योंकि ध्यान ज्ञान बन गया है. पदार्थ में जोड़ा ध्यान व्याकुलता को जन्म देता है, क्योंकि जब एक पदार्थ का ज्ञान मिल जाता है, दूसरे को जानने की चाह जग जाती है, पर इतने बड़े जगत में कितना कुछ अनजाना है. अपनी इस व्याकुलता को भूलने के लिए मानव क्या-क्या नहीं करता. वह अपने आप को इतर कामों में लगाकर उस प्रश्न से बचना चाहता है जो उसे व्याकुल कर रहा है. वह जगत को दोनों हाथों से बटोर कर अपनी मुट्ठी में कैद करना चाहता है पर वह भी नहीं कर पाता क्योंकि जगत में सभी कुछ नश्वर है, वह तब भी जगता नहीं बल्कि नींद के उपाय किये जाता है. जब तक कोई मांग है तब तक भीतर की स्थिरता को अनुभव नहीं किया जा सकता. संसार भीतर का प्रतिबिम्ब है. परमात्मा सदा रहस्य बना रहता है. वह हर कदम पर आश्चर्य उत्पन्न होने की स्थिति पैदा कर देता है ! परमात्मा में यदि कोई ध्यान लगाये तो वह ज्ञान होने के बाद भी नहीं हटता क्योंकि परमात्मा का ज्ञान कभी पूरा नहीं होता.

आज भी सुंदर वचन सुने. ध्यान बाहर की तरफ जाए तो केंद्र अहंकार है, ध्यान भीतर जाये तो केंद्र निरंकार है. बाहर जाना सरल है, भीतर जाना कठिन है. अहंकार कानून की पकड़ में नहीं आता, केवल गुरु की शरण में आता है और परमात्मा की पकड़ में आता है. अधूरे मन की पहचान है अशांति तथा चिंता, पूर्ण मन की पहचान है पूर्ण से जुड़ना ! हर सुख की अपनी उमर है, आनंद अमर है. तात्कालिक भय तथा असुरक्षा की भावना जब किसी को घेर लेती है तो बुद्धि काम करना बंद कर देती है. उसे लगता है, खतरा है, पर आत्मा को भय हो ही नहीं सकता, वह अभय, निर्भय तथा अजर, अमर है. भय के पीछे मोह है, मोह के पीछे अज्ञान, अज्ञान ही उन्हें बाहर की घटनाओं से प्रभावित करता है, जबकि बाहर की घटनाओं का मन के विचारों से कोई संबंध नहीं है, वे संबंध जोड़ लेते हैं ! पुराने संस्कारों के कारण अथवा प्रारब्ध के कारण भी मन भय जगाता है, जो बीज पहले बोये थे उनके फल आने लगें तो भी मन विचलित होता है. ज्ञान के बिना इनसे मुक्ति का कोई उपाय नहीं.  

कल होली है, रंगों वाली आज होलिका दहन है. पिछले वर्ष भर में जितने भी मन मैले हुए, कटुता जगी, उन सब अशुद्धियों को जलाकर शुद्ध हो जाने का पर्व ! बीती हुई बातों को भुलाकर बिलकुल नये व्यक्ति की तरह जगत का, लोगों का स्वागत करना होली का त्यौहार सिखाता है ! पिछले हफ्ते वह सत्संग में होली की कविता लेकर गयी थी. जैसे खर-पतवार खेत में अपने आप बिना उगाये उग जाते हैं तथा वे फसल को भी खराब करते हैं वैसे ही मन में व्यर्थ के विचार सद्विचारों को भी प्रभावित करते हैं. इस समय टीवी पर रामकथा आ रही है. टीवी के माध्यम से लाखों व्यक्ति उसकी तरह ज्ञान प्राप्त करते हैं. बापू कह रहे हैं केवल स्मरण मात्र से भी समाधि की अवस्था का अनुभव किया जा सकता है. स्मरण उनकी साधना में आई बाधाओं को दूर करता है. पवित्र मन ही जप करता है और जप करने वाला मन ही पवित्र होता है. भीतर टटोलें तो उनके पास कुछ भी नहीं हैं, जो भी है वह परमात्मा का है. संसार की गति का कारण वह परमात्मा है जो गति नहीं करता.

  

   

Monday, February 1, 2016

तुलसी ममता राम से..समता सब संसार


पिछले दो-तीन दिनों से डायरी नहीं खोली. नीरू माँ कह रही हैं कि पति-पत्नी को आपस में मेल से रहना चाहिए. उसे जून की गम्भीरता को भी सहज स्वीकार करना चाहिए. उनके मुखड़े पर सहज मुस्कान अपने आप भीतर से ही जगेगी. उसकी प्रतीक्षा करनी होगी. क्लेश उदय कर्म नहीं है पर हानि कर्म का फल है. इसलिए हानि होने पर मन में समता बनाये रखना ही पुरुषार्थ है. क्लेश करना अज्ञानता के अधीन है, जो भी कर्म उदय होता है वह अपने ही कर्मों के कारण है. वे अज्ञान के कारण स्वयं अपनी राह में कांटे बिछा लेते हैं और बाद में पछताते हैं. एक व्यक्ति जो सुख की चाह में बाहर भटकता है, दुखी होकर ही लौटता है, क्योंकि वह बाहर मिलता ही नहीं. आज जो सुख है कल वही दुःख में बदल जायेगा. हरेक को अपने भीतर झांकना है.

आज सुबह महीनों बाद एक घटना घटी, होना तो यह चाहिए था कि उस पर इसका जरा भी असर न हो, समता के भाव में रहने का अभ्यास बढ़ जाना चाहिए था, पर कुछ सोचने पर विवश किया ही है इस घटना ने. उसके किसी पूर्वजन्म के कर्म का ( इस जन्म के ही सही, पूर्व कर्म का ) हिसाब भी चुकता हो गया. कल ही उसने लिखा कि क्लेश उदय कर्म नहीं है सो दुःख तो मनाना ही नहीं है. भीतर पूर्ववत् शान्ति है पर बाहर के काम कुछ और ही कहानी कह रहे हैं. कल रात से ही बल्कि पिछले कुछ दिनों से ही तनाव दिख रहा था. कल रात को झलक मिली थी और आज सुबह वह पूर्णतया प्रकट हो गया. एक निमित्त बना उसका वह कृत्य जिसे जैसे किसी ने जानबूझ कर करवाया. वातावरण कितना बोझिल हो जाता है जब कोई तनाव में होता है. इसका मूल कारण भीतरी है, उनके सारे दुःख खुद के ही बुलाये हुए होते हैं. वे स्वयं को ठीक से जानते नहीं, उनकी इच्छाएं ही दुःख को जन्म देती हैं. पिछले कुछ दिनों से उसे देह में कुछ परिवर्तन लग रहा है. आजकल आसन करते समय मध्य में कुछ देर विश्राम करना पड़ता है, भार बढ़ गया है. अहंकार बहुत सूक्ष्म रूप से अपना काम कर जाता है और वे उसके शिकंजे में फंस जाते है. उनकी बुद्धि भ्रमित हो जाती है और वह गलत रास्ते पर ले जाती है. इतना तो सद्गुरु से सीखा है, Accept people as they are accept situation as it is.अपनों का प्रेम जब तक चाहिए तभी तक उनका क्रोध भी प्रभावित करता है. जब ‘चाहिए’ का आग्रह न रहे तब मुक्त ही हैं.

कल शाम सत्संग में जाना नहीं हो सका. घर पर ॐ ध्यान किया. जून ने कल सुबह की बात की और पुनः वातावरण हल्का हो गया. जब मन भारी हो तो उसका असर वातावरण पर पड़ता है. अभी ध्यान कर उठी है. आत्मा में स्थित होने का नाम ही तो ध्यान है. वे जब मन, बुद्धि, चित्त या अहंकार अथवा शरीर या संसार में स्थित होते हैं तो उनके गुणों को ग्रहण करते हैं, जब आत्मा या परमात्मा में स्थित होते हैं तो..

चार दिनों का अन्तराल..पिछले कई दिनों से लिखने का क्रम छूट सा गया है. आज इस समय दोनों छात्राएं प्रश्न पत्र हल कर रही हैं, सो उसे यह समय मिल गया है. कल शाम वे ऑयल की पचासंवी सालगिरह पर आयोजित कार्यक्रम देखने गये. संगीत, नृत्य तथा गायन का कार्यक्रम..तेज रौशनी, तेज आवाजें, शोर और तड़क-भड़क वाले कपड़े. शास्त्रीय व लोक कला ही उन्हें ज्यादा भाती है बजाय आधुनिक गीत-संगीत के. रात लौटने में देर हो गयी तो बिना भोजन किये सो गये. अब जून भी भोजन पर निर्भरता कम करते जा रहे हैं. परसों शाम आत्मा पर ब्रह्मकुमारी द्वारा बताया गया ज्ञान वह ध्यान से सुन रहे थे. आज सुबह एक पुरानी परिचिता से बात हुई, वह पहले की तरह धीरे-धीरे बोलती हैं. एक अन्य परिचिता से भी बात हुई, वह दवा के सहारे अपनी थॉयराइड की बीमारी पर नियन्त्रण पा चुकी हैं. उसने आज जून को परीक्षाओं के लिए शुभकामना हेतु चार कार्ड लाने को कहा था, उन्होंने भिजवा दिए हैं. सुबह उसकी कविताओं को प्रिंट करके लाये जो ‘कुछ रिश्ते मीठे से’ के नाम से एक फ़ाइल में लगाई हैं ! वह उसका बहुत ध्यान रखते हैं, वह खुद उन्हें कभी-कभी तीखे वचन बोल ही देती है. चाहे उनकी मंशा भली ही क्यों न हो अप्रिय सत्य कभी नही बोलना चाहिए, साधक को तो बिलकुल नहीं. उसे दो जगह अपनी कविताएँ भेजनी हैं, पुस्तकालय जाना है. पूजाकक्ष की अलमारी सहेजनी है. कम्प्यूटर एडिक्शन पर इंटरनेट से कुछ जानकारी भी लानी है. ये सारे कार्य आज व कल दो दिनों में खत्म करने हैं.


Thursday, May 7, 2015

ईसा की वाणी


ईसा ने जगत के लिए अपने प्रेम का प्रदर्शन स्वयं मरकर किया. वह कहना चाहते हैं कि यदि कोई उससे प्रेम करता है तो उसे भी मरना होगा, ध्यान में जो हर दिन मरता है वह आत्मा में जीता है. ईसा भी जी उठे थे इसका अर्थ उसे यही लगता है कि देह की सुख-सुविधाओं को ताक पर रखकर उसे परहित में लगाना है. देह जितना-जितना सधेगी आत्मा उतनी-उतनी जगेगी. ज्यादा सुख भी दुःख का कारण बन जाता है, सुविधा भोगी की आत्मा कभी जागृत नहीं होती. सेवा से ही जीवन का विकास होता है. जीवन में प्रमाद न हो, तंद्रा, निद्रा कम से कम हो, आलस्य न हो, इन्द्रियों की न सुने बल्कि उस चैतन्य की सुने जो भीतर निरंतर देख रहा है, साक्षी है, जो उन्हें चमकाना चाहता है ताकि वे अपना सच्चा स्वरूप देख सकें, जो अनंत है अविनाशी है. ईश्वर से प्रेम है यह सिर्फ होठों से नहीं जीवन से दिखाई पड़ना चाहिए. जीवन तो वैसा ही रहा जैसे पहले था तो सारा प्रेम मात्र मनोधर्म बन कर रह जायेगा !

अभी-अभी पिछले कुछ पन्नों पर लिखे अपने मन के विचार-भाव उसने पढ़े. एक और वर्ष खत्म होने को है. वर्ष के अंतिम माह का दूसरा दिन है. पिछले दो दिन व्यस्त रही, सो कुछ नहीं लिखा. आज भी सुबह ढेर सारे कपड़े प्रेस करने थे, और इस समय यानि दोपहर के एक बजे का कार्य भी तय था, फिर डायरी का ध्यान आया. अध्यात्मिक पथ पर ले जाने वाले अपने सद्गुरु की शिक्षाएं वह इसमें लिखती आ रही है. अपने अनुभव भी और अपने मन के भाव भी. अटूट सम्पत्ति जो इस पथ के राही को मिलती है वह है ज्ञान, धैर्य, संतोष और आनंद. सद्गुरु ने उन्हें आनंद और प्रेम से ओतप्रोत कर दिया है. हृदय न जाने किस लोक में रहता है कि भौतिक बातें अब किसी और ही दुनिया की लगती हैं. ईश्वर को कोई यदि अपने जीवन से जोड़ता है तो व्यर्थ के कार्य-कलाप अपने आप ही छूटते चले जाते हैं. सार को सम्भालने की आदत रहती है तब संसार छूटने लगता है. व्यर्थ का शब्द मुँह से निकले तो मन स्वयं को कचोटता है. कोई गलत कार्य न हो, किसी प्राणी की हिंसा न हो, ये सारी बातें मन सचेत होकर देखता है. आते-जाते, खाते-पीते वह मनमोहन याद आता रहता है, आता ही रहता है, उसे अर्पित करके भोजन किया जाता है, उससे इतनी निकटता का अनुभव होता है कि हर कार्य में उसे शामिल किया जाये ऐसे प्रेरणा होती है. संतों के प्रति कृतज्ञता, सम्मान की भावना और शास्त्रों के स्वाध्याय की प्रेरणा जगती है. ध्यान करना नहीं पड़ता होने लगता है. तन हल्का-हल्का सा रहता है, मन खिला-खिला से, वह कान्हा अगर किसी का मीत बनता है तो वह निर्भार होकर रहता है. उसके संकल्प अपने-आप ही पूर्ण होने लगते हैं, कहीं कोई अभाव नहीं रहता !      



Friday, December 5, 2014

पौधों का घर


आज गणेश चतुर्थी है, यहाँ यह ‘गणेश पूजा’ के रूप में मनायी जाती है. जिसमें सार्वजनिक पंडाल लगाये जाते हैं, कुछ लोग मिलकर किसी के घर में भी मूर्ति की स्थापना करते हैं. आज छोटे भाई का जन्मदिन भी है, पर माँ की स्मृति में वे लोग नहीं मना रहे हैं, माँ जहाँ भी होंगी उनका आशीष भाई के साथ होगा. ‘आत्मा’ में अभी-अभी बताया “जिनकी बुद्धि एकनिष्ठ नहीं होती, अनेक शाखाओं में विभक्त होती है, उन्हें कहीं ठौर नहीं है, और एकनिष्ठ बुद्धि वाले को कहीं भी जाने की आवश्यकता नहीं है”. जून को आज फ़ील्ड जाना है, नन्हा पढ़ने गया है. कल उन्होंने गोभी की पौध के लिए बीज डाले थे. माली को डर था कि तेज वर्षा हुई तो सारे बीज बह जायेंगे सो उसने एक शेड बनाया, सुबह वे उठे तो वाकई तेज वर्षा हो रही थी.

आज नन्हा सुबह छह बजे ही स्कूल चला गया, हिस्ट्री की एक्स्ट्रा क्लास के लिए. वे सभी जल्दी उठे, इसलिए अभी साढ़े सात ही बजे हैं और वह तैयार है. कल वे ‘गणेश पूजा’ देखने गये. शाम को चार पत्र लिखे. बाबाजी ने कहा, साधक के दुःख का कारण राग-द्वेष ही है. उसे लगा वह ठीक कह रहे हैं क्योंकि जब भी वे सांसारिक विषयों के बारे में बात करते हैं तो हानि-लाभ की तराजू में तोलकर करते हैं. अपने विषय में बात करते हैं तो विषाद या आत्मप्रशंसा के भाव के अलावा कोई तीसरा भाव नहीं आता. दूसरों के बारे में बात करते हैं तो निंदा या स्तुति के भाव से घिरे रहते हैं. अर्थात राग-द्वेष कभी पीछा नहीं छोड़ता. सर्वोत्तम यही है कि साधक बातचीत के लिए ऐसे विषयों का चुनाव करे जो भगवद् भाव से जुड़े हों क्योंकि शेष से कोई आत्मिक लाभ नहीं होगा, मात्र क्षणिक सुख की प्राप्ति होती है, वह भी बाद में दुःख का कारण बनती है. मौन रहना असत्य वाचन से श्रेष्ठ है और मन में प्रयोजन हीन विचारों को न उठाना तो अतिश्रेष्ठ है. यह जीवन तो ईश्वर का उपहार है, वही इसे चलाता, पोषता और सम्भालता है, फिर भी कोई कैसे कहता है कि उसके पास साधना के लिए समय नहीं है, सारा समय भी तो उसी का है. पहला अधिकार तो उसी का हुआ न, एकमात्र वही है जो हर पल साथ रहता है.

आज ‘ध्यान’ का एक सूत्र देते हुए गुरू माँ ने कहा कि सत्संग में सुने वचनों पर मनन करते-करते जब मन ठहरने लगे तो मानसिक मौन धारण कर लेना चाहिए या फिर अपने इष्ट की ध्यानस्थ मुर्ति की कल्पना करें और वैसा ही भाव अपने हृदय में लायें, धीरे-धीरे चित्त की वृत्तियाँ शांत होने लगती हैं. तब पिछले कर्म बांध नहीं सकते, बीता हुआ समय, बीते कार्य वर्तमान को प्रभावित नहीं कर सकते. जो बीत गया वह मृत है, अतः मन पर बिना किसी अपराध बोध को रखे नित नये जीवन का स्वागत करना चाहिए !

नन्हा आज बंद के कारण स्कूल नहीं गया, जबकि जून गये हैं. जागरण में सुने वचन हृदय को गहराई तक छू गये हैं. ईश्वर को पाना कितना सरल है, कितना सहज..जैसे श्वास लेना, लेकिन वे सही ढंग से श्वास लेना भी तो नहीं जानते, उथली श्वास लेते हैं जो उथले विचारों की दर्शाती है. श्वास के प्रति जागरूक रहने से कोई वर्तमान में रह सकता है अन्यथा भूत तथा भविष्य की कल्पनाएँ पीछा नहीं छोड़तीं. बाबाजी ने सरल उपाय बताया, ‘प्रतिक्षण श्वास को आते-जाते देखते रहें , सुबह उठकर तन को पहले खींचे फिर ढीला करें. ईश्वर को याद करें और दिन भर के महत्वपूर्ण कार्यों पर नजर डालें, फिर बिस्तर छोड़ें और दिन भर में हर एक घंटे बाद उस परम शक्ति को याद करते हुए दिनचर्या का पालन करें और रात्रि को भी गहरी श्वास लेकर सोयें.’ यह अनुपम जीवन प्रेम की भावना का अनुभव करने के लिए मिला है, अपने सहज रूप में रहते वक्त ही  कोई शांत रहता है, अधरों से गीत अपने आप फूट पड़ता है, जैसे पंछियों के गीत ! कल कविता की डायरी देखी, एक महीने से ज्यादा हो गया है लिखे हुए, उसकी कवितायें वापस आयीं तो लगा स्तरीय नहीं है, लेकिन उनका महत्व उसके स्वयं के लिए तो सदा है, किसी एक दिन स्वतः ही प्रेरणा जगेगी और शुष्क हो गये कविता कूप में फिर से जल छलकेगा. कल दोपहर ‘हंस’ पढ़ती रही, कुछ कहानियाँ बहुत अच्छी थीं. आज सुबह से वर्षा हो रही है. मौसम ठंडा हो गया है. नन्हे के पैर में दर्द अभी ठीक हुआ है.  



Sunday, November 30, 2014

कबीर का दोहा


इस समय एक तरफ तो धूप निकली है दूसरी तरफ बादलों के गरजने की आवाज भी सुनाई दे रही है. सुबह-सवेरे मौसम ठंडा था, जून को सर्दी लग गयी है, सो पहले वह उठी, बाहर गयी तो हवा शीतल थी पर कल सुबह चार बजे की शीतल स्वच्छ हवा का एक झोंका भी कितना प्रफ्फुलित कर गया था. ब्रह्म मुहूर्त में उठने की महिमा यूं ही तो नहीं गयी गयी है धर्म ग्रन्थों में ! अब दोपहर के पौने एक बजे हैं, अभी कुछ देर पहले जून को बाहर तक छोड़कर आने लगी तो उन्होंने पौधों पर पड़ रही धूप की ओर ध्यान दिलाया, पौधों को टोपी से ढका अन्यथा शाम तक कुम्हला जायेंगे. जून ने वह पुस्तक भेज दी है, अगस्त का आरम्भ है यदि वर्ष के अंत तक भी छप जाये तो बड़ी बात होगी. ढेर साडी पत्रिकाएँ पड़ी हैं पढने के लिए, लिखना भी है, पत्र व इमेल भी. एक ड्रेस पर बटन टांकने हैं, अभ्यास करना है, और यह सब करना है इन सवा दो घंटों में. जागरण में आज कर्मवाद पर सुना, मानव कर्म करने के लिए स्वतंत्र है पर फल भोगने के लिए नहीं, वह उसके चाहने अथवा न चाहने पर भोगना ही पड़ेगा, सो कर्म करते समय प्रतिक्षण सजग रहना होगा. उस वक्त वह जीनिया के सूखे फूलों से बीज निकाल कर अलग कर रही थी, इस कर्म का फल तो रंगीन ही होने वाला है. ‘आत्मा’ में गीता के ‘प्रथम अध्याय’ पर चर्चा हुई, मन ज्ञानियों की सी बातें तो बहुत करता है पर ज्ञान उसके भीतर टिकता नहीं है !

‘जब कोई उसे ढूँढ़ता है तो वह उसे नहीं मिलता पर जब वह ढूँढ़ते-ढूँढ़ते खो जाता है तो वह उसे ढूँढ़ता है !’ आज सुबह के समाचारों में जम्मू स्टेशन पर आतंकवादियों द्वारा अँधा-धुंध गोलियां चलाये जाने से दस व्यक्तियों के मरने की खबर सुनी. पिछले एक हफ्ते के अंदर यह तीसरी बड़ी दुर्घटना है जिसमें निर्दोष लोगों की जान जा रही है. सरकार अपने नागरिकों की सुरक्षा करने में असफल है. कुछ दिन पहले लगा था कि इस समस्या का हल शीघ्र निकल आएगा पर अब ऐसा नहीं लगता. कल शाम को बड़ी ननद को पत्र लिखा. तीन इमेल लिखे. पर सर्वर में कुछ खराबी होने के कारण भेज नहीं सकी. जून का स्वास्थ्य अभी भी पूरा ठीक नहीं है पर वह art of living का कोर्स करने के बाद काफी सचेत हो गये हैं. कल शाम से प्राणायाम का अभ्यास भी शुरू कर दिया है. वे दोनों टहलने भी गये. लाइब्रेरी से ‘झुम्पा लाहिरी’ की एक किताब लायी और हैरी पॉटर का एक और भाग. कल रात नन्हे को दस बजे ही सोने को कहा ताकि सुबह वक्त से उठ सके, सुबह उठा, तब तक गुस्सा दिखा रहा था पर स्कूल से आने तक सब भूल जायेगा. उसे इक्यानवे प्रतिशत नम्बर मिले हैं इस परीक्षा में, और पढ़ाई की जरूरत है विशेषतया गणित में.


जैसे धूँए से अग्नि छिप जाये या धूल से दर्पण ढक जाये उसी तरह मन पर अज्ञान का पर्दा पड़ा रहता है. यह अज्ञान तामसिक व राजसिक गुणों का परिणाम है. पिछले दिनों वह रजोगुण के अधीन रही. सात्विकता का भाव टिक नहीं रहा क्योंकि उसको टिकने का स्थान नहीं दिया. मन निर्विचार हो, निर्विकार तभी पवित्र विचारों को प्रश्रय मिल सकता है. जीवन जीते हुए ही जनक की तरह विदेह होना बहुत कठिन है. जीवन की धारा इतनी वेगवती होती है की मन को अपने साथ ले जाती है. बाबाजी ने कहा, “सुख देवे, दुःख को हरे, करे पाप का अंत, कहे कबीर वह कब मिलें, परम सनेही संत” गुरुमाँ ने कहा स्वप्न में भी साधक को सचेत रहना चाहिए, स्वप्न मन की वास्तविक स्थिति का परिचय देते हैं. जून कल तिनसुकिया गये थे, bookcase का आर्डर दे दिया, एक महीने बाद मिलेगा. 

Tuesday, November 25, 2014

अज्ञेय की कविताएँ


दोनों देशों के विदेश मंत्रियों ने वार्ता को असफल नहीं बताया है, उम्मीद की किरण अभी भी रोशन है. कल रात से वर्षा हो रही है, मौसम कल जितना गर्म था आज उतना ही सुहावना है. बाबाजी आज कीर्तन करवा रहे थे. उससे पहले टैगोर की जापान यात्रा का एक संस्मरण सुनाया. गुरूमाँ ने ऐसे नृत्य का जिक्र किया जो किया नहीं जाता, हो जाता है. बहुत दिनों से उसके साथ ऐसा नहीं हुआ है शायद आज शाम को ही इसका अवसर आए, क्योंकि वर्षा यदि थमी नहीं तो घर पर ही टहलना होगा जो उसके मामले में कैसेट लगाकर थिरकना होता है. कल दोनों पत्र भी लिखे और दीदी को जवाब भी दिया है. कल रात छोटी बहन व पिता से बात हुई. आज दोपहर स्टोर की सफाई करनी-करवानी है.

सुबह-सवेरे भजन जब अपने आप होने लगे, मन परमेश्वर की स्मृति में सहज रूप से लगा रहे, उसे लगाना न पड़े तो ही जानना चाहिए कि प्रेम का अंकुर फूटा है. चारों ओर उसी का वैभव तो बिखरा है, उसी की सृष्टि का उपयोग वे करते हैं पर उसे भुला बैठते हैं. जबकि वह हर क्षण साथ है, दूर नहीं है. बस एक पर्दा है जो उन्हें एक-दसरे से अलग किये हुए है. वह हर क्षण श्रद्धा का केंद्र बना है, हर श्वास उसकी कृपा है. मन यदि हर क्षण उसी को अर्पित रहे तो इसमें कोई विक्षोभ आ भी कैसे सकता है. संसार की बातें उत्पन्न करने वाला भी वही है. यही आराधना ही राधा है, जिसके माध्यम से कृष्ण को पाया जा सकता है. वह आत्मा है, जिसके प्रसाद के बिना मन आधार हीन होता है, बाहर का सुख टिकता नहीं, यह अनुभव बताता है. उस एक से प्रीति हो जाने पर परम सुविधा मिलती है जो कभी छूटती नहीं, अपने उच्च तत्व का साक्षात्कार करना यदि आ जाये तो यह जो गड्डमड्ड, खिचड़ा हो गया है, देह के अस्वस्थ या मन के दुखी होने पर स्वयं को अस्वस्थ या दुखी मानना, छूट जायेगा. जैसी दृष्टि होगी यह जगत वैसा ही दिखेगा. अँधेरी रात में एक ठूँठ को एक व्यक्ति चोर समझता है, दूसरा साधू और तीसरा रौशनी करके उसकी असलियत पहचानता है. उन्हें भी इस जगत की वास्तविकता को पहचानना है. न इससे आकर्षित होना है न ही द्वेष करना है. तभी वे मुक्त हैं.

आज अमावस्या है. सुबह से ही मन में उत्साह है. एक वक्त के भोजन में फलाहार लेना है आज, जितना हो सके उतना व्रत पालना ही चाहिए. कल दोपहर और शाम को अज्ञेय की कविताएँ पढ़ीं, अनुपम हैं और भावना के उस लोक में ले जाती हैं जहाँ प्रेम है, शरद की चाँदनी, टेसू के फूल हैं, जहाँ इष्ट की आराधना है, “मैं संख्यातीत रूपों में तुम्हें याद करता हूँ” अज्ञेय की कविता अंतर को गहरे तक छू जाती है. अभी-अभी गुरू माँ ने कहा ईश्वर को प्रेम करने का अर्थ संसार का विरोधी हो जाना नहीं है. जब जीवन में प्रेम होता है, तब वह सभी के लिए होता है. उसमें समष्टि समा जाती है. ईश्वर, प्रकृति, मानव उससे कुछ भी अछूता नहीं रहता, प्रेम में महान ऊर्जा छुपी है, वह आस-पास की हर वस्तु को एक नये दृष्टिकोण से दिखाती है. उसे लगता है, मन को एकाग्र करना हर वक्त संभव नहीं पर यह सम्भव है कि इस बात का बोध रहे कब मन एकाग्र है और कब एकाग्र नहीं है, और कब एकाग्र नहीं है ? जब मन गुण ग्राही होता है, बुरी से बुरी परिस्थिति में भी कोई न कोई अच्छाई खोज लेता है, तब वह एकाग्र होना सीख लेता है. उसने प्रार्थना की, आज का दिन ईश्वर के प्रति समर्पित हो, दिन भर वह उसकी याद अपने मन में बनाये रखे, सभी के प्रति मंगल कामना से मन युक्त रहे !   



Friday, October 31, 2014

बादल का टुकड़ा


वाणी मधुमंडित, सुवासित हो जिसमें अहंकार की गंध न हो, स्वार्थ की महक न हो. ऐसी वाणी निर्वासनिक मन से ही उपजती है. निष्कपट भक्ति भी ऐसे ही मन में जगती है. प्रार्थना भी ऐसी ही भावदशा में  की जा सकती है. ऐसा मन सभी तरह के विक्षेपों को पचाने योग्य बनता है. कल रात वह प्रार्थना करते-करते सोई. स्वप्न में कन्याकुमारी के दृश्य देखे. सुबह उठी तो मन शांत था. बाबाजी कहते हैं देर सबेर ईश्वर सबके हृदयों में अवश्य प्रकट होगा, उसके स्वागत के लिए मन का दरवाजा हमेशा खुला रखना होगा, मन को निष्कपट, स्वच्छ और कोरा रखना होगा. कामना हर पल नीचे गिराने का प्रयत्न करती है और प्रार्थना ऊपर उठाने का. कल शाम कुछ पुरानी कविताओं को पूर्ण किया. कादम्बिनी को भी दो कविताएँ भेजी हैं, उसके अंतर में कई कविता संग्रह अभी भी दबे हुए पड़े हैं. थोड़ा सा प्रोत्साहन मिले तो बाहर आ जायेंगे, न भी मिले तो कोई हर्ज नहीं, अपने सुख के लिए कविता रचना तो सदा ही जारी रहेगा !

कल अंततः उसकी इच्छा फलवती हुई जून और वह मार्किट गये, उसके जन्मदिवस पर पहनने के लिए हल्के हरे रंग की एक ड्रेस लाये, थोड़ी लम्बी है उसे ठीक किया जा सकता है. आभी आज और कल दो दिन का वक्त शेष है. कल उसने अपना इमेल अकाउंट खोला. आज सुबह हरिद्वार मामीजी के लिए पहले इमेल लिखा, अभी भेजा नहीं है. नन्हे का आज टेस्ट है. गर्मी पूर्ववत है. सुबह नींद खुली तो स्वप्न में कम्प्यूटर, इमेल यही सब देख रही थी, उसके चेतन मन से ज्यादा अवचेतन मन पर इसका प्रभाव पड़ा दीखता है. आज बाबाजी और गोयनका जी दोनों को कपड़े प्रेस करते-करते सुना, एक जो कहता है दूसरा उसका विपरीत कहता हुआ सा लगता है पर दोनों का लक्ष्य एक है. गोयनका जी का मार्ग ज्यादा कठिन है, बाबाजी का बिलकुल सहज ! सहज भाव से अपने भीतर के आत्मदेव पर भरोसा करना है. सुख में ललक पैदा न हो बल्कि सुख बांटने की प्रवृत्ति हो और दुःख में सिकुड़े नहीं, सम भाव रहे यही उनकी शिक्षा का सार है. जैसे-जैसे व्यवहार में समता आती जाएगी, ममता छूटती जाएगी और एक दिन मन सुख-दुःख से ऊपर उठ जायेगा. देह या मन में कोई पीड़ा हो तो यह याद रखना होगा कि यह अनित्य है, सदा रहने वाली नहीं है. परसों उसके जन्मदिन के दिन ही लेडीज क्लब की मीटिंग है, एक सीनियर सदस्या का विदाई दिन भी है. पर वह नहीं जा पायेगी, दो साल पूर्व जब वह जाते-जाते रह गयी थीं, उनके लिए जो लेख लिखा था वह ऐसे ही रखा रह जायेगा. जून और नन्हे को मनाना आसान नहीं होगा, सो जो हो रहा है उसे होने देना चाहिए, वैसे भी इतने वर्षों में कुल मिलाकर दस-पन्द्रह बार से ज्यादा नहीं मिली होगी उनसे, उनके लिए शुभकामनायें घर से ही भेज सकती है.


जो हमारे पास है उसका महत्व जानें और जो नहीं है उसके पीछे न भागें तो जीवन में सुख ही सुख है. लेकिन जो भी है वह सदा के लिए नहीं रहेगा यह भी याद रखना है. लक्ष्मी सदा खड़ी रहती है और सरस्वती सदा बैठी रहती है. ज्ञान कभी साथ नहीं छोड़ता लेकिन धन-दौलत व वस्तुएं साथ छोड़ भी सकती हैं. सत्संग को सुनकर गुनने से ही उसका लाभ मिलता है. “एक बुढ़िया थी वह बचपन में ही मर गयी”. यह कहानी बताती है कि सारी उम्र लोग नादान ही बने रहते हैं. ईश्वर स्मरण बना रहे तो यही नादानी समझदारी में बदल जाती है. कल वह ध्यान में ज्यादा देर तक नहीं बैठी, इतर कार्यों में लग गयी सो रात को मन अशांत था, नींद नहीं आ रही थी, कोई कारण नजर नहीं आ रहा था. आज बाबाजी के संगम तट पर दिए गये प्रवचन की रिकार्डिंग सुनाई गयी. हजारों लोगों को पल में हँसा व रुला सकने की सामर्थ्य है. वह लोगों के मन में स्थित ईश्वर को जगा देते हैं. मन उच्च केन्द्रों की ओर चला जाता है, दुनियावी बातें सारहीन लगती हैं. सभी के प्रति मन प्रेम से भर जाता है. आज सुबह उसने बगीचे में काम करने की इच्छा व्यक्त की पर धूप तेज थी, न जाने कहाँ से बादल का एक टुकड़ा आ गया. हवा भी बहने लगी. आधा घंटा वह काम कर सकी. कल उसके जन्मदिन पर भी मौसम अच्छा हो जायेगा, ऐसा उसका पूर्ण विश्वास है.   

Tuesday, October 28, 2014

सिन्धी पुलाव


मोह सदा दुखदायी होता है, सन्तान के मोह में पड़कर माता-पिता कम संताप नहीं पाते. मोहवश उन्हें अपनी सन्तान में वे कोई दोष देखना ही नहीं चाहते. ऐसे में वे स्वयं के साथ साथ सन्तान को भी दुःख की ओर ले जाते हैं. इस मोह के पीछे होती है आशा, सन्तान से स्नेह और सम्मान पाने की आशा, संसार में भी वे सन्तान द्वारा सम्मानित होना चाहते हैं. यदि निस्वार्थ भाव से सन्तान के प्रति वे अपने कर्त्तव्यों का पालन करें, उसे अपने मार्ग पर जाने की स्वतन्त्रता दें यही दोनों के लिए श्रेष्ठ है. इस जगत में यदि कोई अपना है तो वह है नितांत अपना आप. आत्मा ही अपनी है. सुख-दुःख का केंद्र वही होनी चाहिए. बाहरी वस्तुओं, व्यक्तियों, घटनाओं के द्वारा स्वयं को सुख-दुःख के झूलों में झूलने देना आत्मा या ईश्वर का अपमान है. एक न एक दिन सभी को इस सत्य का सामना करना है, मृत्यु का पल कौन सा होगा कोई नहीं जानता. ये जो थोड़े से दिन एक-दूसरे के साथ बिताने को मिले हैं, वे तप-तप कर नहीं सहज होकर जीने हैं. जो कुछ जैसा है वैसा ही स्वीकारें. मन को बिगड़ने न देना ही समझदारी है. यह दुनिया सिर्फ उनके लिए नहीं बनी है, दिए को तो बुझना ही है, तूफानों का सामना करते हुए वह उतनी देर जला क्या यह आश्चर्य की बात नहीं ! ईश्वर के बिना कोई विश्रांति स्थल नहीं, वही उनकी कामनाओं का, आकांक्षाओं का केंद्र होना चाहिए, मन उसी की शरण ले और किसी का न आश्रित हो न कभी अपने कर्त्तव्य को भूले. हृदय और वाणी जब एक हो तो प्रार्थना सफल होती है. ईश्वर निकटतम है, उससे निकटतम और कोई भी नहीं !

आज ‘अमृत कलश’ में एक हास्य कवि आये थे, उन्होंने कुछ आध्यात्मिक कविताएँ भी सुनायीं, पर उनके पास कहने के लिए कुछ ज्यादा नहीं था, एक ही बात को घुमा-फिरा कर कह रहे था, पर इतना तो सत्य है की ईश्वर प्रेमी थे और जो वास्तव में ईश्वर को चाहता है उसकी बातों में सत्य झलकता है. ईश्वर प्रीति के लिए कर्म करने से मानव स्वस्थ होते जाते हैं क्योंकि तब श्रम किया जाता है विश्राम पाने के लिए ! आज बाबाजी ने कहा, “जीवात्मा को इस शरीर और संसार से सुख ढूँढना व्यर्थ है, उसी तरह जैसे यात्री के लिए अजगर का सिराहना बना कर शैया करना व्यर्थ है.”

आज उनकी नींद देर से खुली, जून और उसके सिर में जो भारीपन कल सुबह से बना हुआ था, आज सुबह उठकर भी बरकरार था. परसों रात उन्होंने देर तक जागकर फिल्म देखी, उसके पूर्व जून ने सिन्धी भोजन खिलाया. पुलाव, भिन्डी और तला हुआ पापड़, दोनों का मिलाजुला असर...और शायद उसके भी पूर्व शाम को रेकी के कोर्स को लेकर उनका गर्मागर्म वार्तालाप...जिसमें कोई तत्व नहीं था या फिर इतवार की सुबह व्यर्थ ही अलसाये हुए देर से उठना. इन सबका असर यही रहा कि मन से सात्विक भाव पूर्णतया जाते रहे और तामसिकता ने अड्डा जमा लिया. कल दो बार वह क्रोध करते-करते भी सजग हुई. आज सुबह भी नन्हे को उठाने के लिए थोड़ा जोर से बोलना पड़ा. पर जगत के व्यवहार के लिए इतना खूँटा तो बांधना ही पड़ेगा. कुछ ही देर में नन्हा पढ़ने जायेगा. उसकी सखी ‘रेकी’ के बारे में विस्तार से बताने वाली था, उसे लगा शायद अब वह न बताये या यह उसके ही मन का भ्रम है. वे अपने आसपास वही देखते हैं जो मन का दर्पण दिखाता है. बहुत दिनों से संगीत अभ्यास भी नहीं किया है, शायद सिर के भारीपन का इलाज संगीत में छुपा हो !



Monday, October 27, 2014

सत्यकाम-धर्मेन्द्र की फिल्म


सुख लेने की इच्छा का त्याग कर सुख देने की कला सीख लें तो अंतर से सुख का वास्तविक स्रोत उजागर होगा, जिन वस्तुओं से भौतिक सुख मिलता है उन्हें बांटने से भी आंतरिक सुख मिलेगा. बाबाजी बहुत सरल शब्दों में मन को संयमित करने के उपाय बताते हैं, ऐसे व्यक्ति इस धरा पर हैं तभी यहाँ रौनक है वरना धरती पर सत्य के लिए स्थान कहाँ हैं. कल ‘सत्यकाम’ फिल्म देखी, वर्षों पहले इसका नाम सुना था, धर्मेन्द्र की प्रसिद्ध फिल्म है. रात को देखकर सोयी थी सपने में भी वही देखती रही. सत्य के कारण कितने दुःख उन्हें झेलने पड़े लेकिन सत्य ने ही अंततः उनकी रक्षा की. जून को भी अच्छी लगी, देर रात तक जग कर वह कम ही टीवी देखते हैं. कल गोयनका जी भी आये थे, कहा, “प्रतिक्रिया ही सुख-दुःख का कारण है, यदि पहले क्षण में कोई प्रतिक्रिया न करे तो संवेगों से बच सकता है.”

आध्यात्मिकता आखिर है क्या ? मन को खाली करना ही तो, ऐसा मन फूल की तरह हल्का होगा, निर्झर की तरह निर्मल होगा, स्फटिक के समान चमकीला होगा और ऐसे मन में उठा संकल्प शुद्ध ही होगा और वह पूर्ण भी होगा. धर्म भीतर है, उसमें टिकने की कला भी आध्यात्मिकता है, उसके बाद ही जीवन में उत्सव का आगमन होता है, अपने आसपास के वातावरण को बेहतर बनाने का प्रयत्न होता है.

आज जैन मुनि को सुना, “जीवन रहते ही जीवन का बहीखाता सही कर लेना चाहिए, जीवन का हिसाब-किताब यदि ठीक रहेगा तो मृत्यु के महोत्सव को मनाने की प्रेरणा जगेगी. मरण यदि सजगता में हो तो मन शरीर से अतीत हो जाता है और आत्मा में टिक जाता है. राम को घासफूस की कुटिया में भी चैन था और रावण को स्वर्ण महलों में भी नींद नहीं आती थी. पर न वह कुटिया रही न महल, क्योंकि यहाँ सब नश्वर है. यह मकान भी मरघट है हर क्षण प्राण मर के घट रहे हैं”.  इस समय दोपहर के तीन बजे हैं. सुबह उठे तो पिता को फोन किया. उन्होंने मकान खरीदने वालों के बारे में बातें कीं, अपनी तथा परिवार के अन्य सदस्यों की एक वाक्य में ‘सब ठीक है’ कहकर ही टाल दिया. छोटी बुआ को फोन करने का मन था पर नहीं किया. एक सखी ने कल शाम ‘रेकी’ के कोर्स के लिए पूछा था पर जून साफ मना कर रहे हैं. उसे लगता है वह भी इस वक्त इसके लिए तैयार नहीं है. आज वह पुस्तक फिर से पढ़नी शुरू की है. कल शाम नन्हे के न पढ़ने पर सखी की टिप्पणी ने उसे दो पल के लिए विचलित कर दिया था. पढ़ाई की कोई सीमा नहीं है, दसवीं में तो बिलकुल नहीं. इस वक्त वह टीवी देख रहा है. गणित और हिंदी कुछ देर पढ़ाया पर समय का पूरा उपयोग नहीं हुआ. आज कुछ नया लिखा भी नहीं.

जीवन क्या है ? इसका उत्तर छत्रपति शिवाजी के गुरु समर्थ दास ने दिया – गति और सतर्कता ही जीवन है, प्रवाह में ही मानव प्रगति को पा सकते हैं. जिज्ञासा और जागरूकता भी जीवन है. जिस दिन हृदय में जिज्ञासा न रही वह मृत हो जायेगा. संक्षेप में कहें तो गति, जिज्ञासा और प्रयत्न ही जीवन है. आज भी वही कल का सा मौसम है. कल शाम एक फिल्म देखी, ‘हमारी बहू अलका’. अभी सुबह के आठ बजे हैं पर पंखे से गर्म हवा आ रही है. बाबाजी ने आज कहा कि शीत और ग्रीष्म को सहने की शक्ति भी शरीर में उत्पन्न की जा सकती है. गीता में भी सुख-दुःख के साथ शीत-ग्रीष्म का जिक्र भी आता है. साधक को इन छोटी-मोटी बाधाओं से घबराना नहीं चाहिए, बल्कि मन को सम रखने का प्रयत्न सदा करते रहना चाहिए.


Monday, October 20, 2014

एंथोनी रॉबिन्स की किताब


आज उसने सुना, “मन को बहते हुए पानी सा होना चाहिए, जिसमें निरंतरता हो, सत्य हो, अगर मन रुके हुए पानी सा निष्क्रिय हो जाये तो ऊर्जा चुक जाएगी. जहाँ से तन, मन तथा बुद्धि को सत्ता मिलती है, उस परमेश्वर का स्मरण सदा बना रहे, कर्मों में योगबल बना रहे. कर्म बंधन स्वरूप न हों.” सुबह उठी तो कुछ देर के लिए मन दुखाकार वृत्ति से एकाकार हो गया था पर शीघ्र ही सचेत हो गयी. ईश्वर उसके साथ है. आज भी प्रकाशक महोदय से बात हुई, उन्होंने कविताएँ पढ़ीं, सराहा भी, कुछ नये शीर्षक भी उन्होंने सुझाये, जिनमें से चुनकर दो भेजने हैं. आज भी वर्षा की झड़ी लगी हुई है, रात भर बरसने के बाद भी वर्षा थमी नहीं है. कल दोपहर उनके बाएं तरफ के पड़ोसी के यहाँ एक बीहू नृत्य और गायन मंडली आ गयी थी. शोर बहुत था, बिजली भी नहीं थी, वह कुछ पंक्तियाँ ही लिख पायी. आज से दूसरी किताब के लिए कविताएँ टाइप करने का कार्य आरम्भ करना है. एक सखी के लिए विवाह की वर्षगाँठ का कार्ड बनाना है तथा एक कविता भी उसके लिए लिखनी है. आज नन्हे की सोशल की परीक्षा है जो अंतिम है. हिंदी में वह पेपर समय पर पूरा नहीं कर पाया, उसे इन छुट्टियों में हिंदी तथा गणित नियमित पढ़ाना होगा.

कर्म अपने अहम का पोषण न करे, किसी को दुःख देने वाला न हो तो मुक्ति का कारण हो जाता है अथवा कर्म बंधन में डालने वाला होगा. मनसा, वाचा, कर्मणा जो भी हो अंतरात्मा की प्रसन्नता के लिए हो न कि अहम् को संतुष्ट करने के लिए. जीवन उस महान सूत्रधार का प्रतिबिम्ब हो, जीवन से उसका परिचय मिले, जीवन उसका प्रतिबिम्ब हो. ऐसा करने के लिए मन को संयमित करना होगा. कल शाम को Anthony Robinson की पुस्तक में भी इसी प्रकार के विचार पढ़े. यह सब आचरण में उतरे तो यात्रा पूरी हो सकती है. कलाकार का दिल पाया है तो उसकी कीमत भी चुकानी होगी. अपनी संवेदना को तीव्रतर करना होगा और भावनाओं को पुष्ट. चिन्तन करते हुए दर्शन भी तलाशना होगा और यही अध्यात्म के मार्ग पर ले जायेगा, जो भीतर से उपजेगा वही सार्थक होगा और सुंदर भी, वही शाश्वत भी होगा.

‘बीज बोते हुए सजग रहें तो फल अपने आप सही आयेगा, कर्म  करते समय सजग रहें तो उसका फल अपने आप ही सही आएगा. नीम का बीज लगाकर कोई आम की आशा करे तो मूर्ख ही कहायेगा, ऐसे ही कर्म यदि स्वार्थ हेतु, क्रोध भाव से किया गया हो तो परिणाम दुखद ही होगा.’ आज बहुत दिनों बाद उसने गोयनका जी का प्रवचन सुना. आज नन्हे का स्कूल ‘तिनसुकिया बंद’ के कारण बंद है. तिनसुकिया में सोनिया गाँधी चुनावी दौरे पर आ रही हैं. सुबह-सुबह समाचारों में सुना काश्मीर में हिंसा बढ़ गयी है तथा असम में उल्फा ने नेताओं व कार्यकर्ताओं पर आक्रमण तेज कर दिए हैं. इस बेमकसद हिंसा से किसी का भी लाभ होने वाला नहीं है. श्रीलंका में सैकड़ों सैनिक अपनी जान दे रहे हैं, अंतहीन लड़ाई जो जमीन के एक टुकड़े के लिए अपने ही देश के लोगों से लड़ी जा रही है. कल शाम ‘बंदिनी’ फिल्म देखी. नूतन का अभिनय प्रभावशाली था. वह उसे सदा से अच्छी लगती आयी है. आजकल उसका हृदय अलौकिक आनन्द से ओतप्रोत रहता है, उस ईश्वर की स्मृति बनी रहती है. जिसका स्मरण ही इतना शांतिदायक है उसका साक्षात दर्शन या अनुभव कितना मोहक होगा. लेकिन उस स्थिति को पाने के लिए अभी हृदय को विकारों से पूर्णतया मुक्त करना होगा, शुद्ध, निष्पाप, पवित्र हृदय ही उसका अधिकारी है !


आज सुबह छोटी बहन से बात की वह फिर कुछ परेशान थी, निकट के व्यक्ति को समझ पाना या समझा पाना भी कभी-कभी कितना कठिन हो जाता है. उसने प्रार्थना की, ईश्वर उनके हृदयों में प्रेम उत्पन्न करे. मानव तो निमित्त मात्र हैं, रक्षक तो वही है. वही उसे व उसके परिवार को बुद्धियोग देगा. कल शाम उसने बैक डोर पड़ोसिन को पौधों के लिए फोन किया, वह घर पर नहीं थी पर उसका संदेश उस तक पहुंच गया होगा क्योंकि अभी कुछ देर पूर्व ही उसने माली की बेटी से कुछ पौधे भिजवाये हैं, कैसे न कहे कि वह उसकी सुनता है ! आठ बजने को हैं अभी तक स्नान-ध्यान शेष है. सन्त वाणी में इतना रस आता है कि टीवी के सामने से हटने का मन नहीं होता. मन उद्दात विचारों से भर जाता है, ईश्वर के निकट पहुंच जाता है. नन्हे को कल कई बातें बतायीं, वह सुनता तो  है पर महत्व नहीं समझता. वह भी उसकी उम्र में ऐसी रही होगी. पर ईश्वर तब भी उसके साथ था.