Thursday, June 1, 2017

पैशन फ्रूट का जूस


रात को तंद्रा में दीपक जलते देखे, देखे कितने चेहरे जैसे कोई स्क्रीन हो सामने, जिसपर चित्र बदल रहे हों. उनके भीतर न जाने कितना बड़ा एक संसार छिपा है. कल स्वप्न में स्वच्छ जल से भरी नदी देखी थी, जिसमें तलहटी में मछलियाँ स्पष्ट दिख रही थीं. सुबह उठे तो पानी बरस रहा था. बगीचे में एक लता गिर गयी, एक गमला टूट गया, घर के सामने पानी भर जाता है, शायद नाला आगे जाकर बंद है अथवा तो मिट्टी डलवानी होगी, जून ने उसके निराकरण के लिए दफ्तर में कह दिया है. दोपहर को ‘बाल्मीकि रामायण’ का अगला अध्याय लिखा, एक दिन तो पूरा हो जायेगा यह महाकाव्य. आज ही ‘महादेव’ में राम-लक्ष्मण का वही प्रसंग देखा था जो लिखा. राम महादेव के भक्त हैं और महादेव राम के, कितना अनोखा रिश्ता है दोनों का. दोनों एकदूसरे के पूरक हैं. उनके भीतर भी पालन कर्ता और विनाश कर्ता दोनों साथ-साथ रहते हैं. ‘पिको आयर’ की जो किताब जो उसने पढ़नी शुरू की थी, रोचक होती जा रही है, जिसने यह किताब उसे दी है क्या वास्तव में उसने इसे पढ़ा होगा, तब तो वह बहुत गहराई में जीने वाली लड़की है. दोपहर को दोनों छात्राएं आयीं, एक अपने घर में उगाये ‘पैशन फ्रूट’ का जूस लाई थी. दूसरी ने परीक्षा की तैयारी ही नहीं की थी, उसे जरा भी भय नहीं है, स्कूल में हिंदी के अध्यापक भी नहीं हैं.

अभी-अभी बगीचे में एक काली तितली दिखी, बड़ी व सुंदर ! जून ने फोटो लिया है उसका. आज सुबह अलार्म बजने से पहले ही उसे पता चल गया कि अब वह बजने वाला है, यहाँ तक कि उसकी आवाज भी उसने अपने भीतर पेट के नीचे से आती हुई अनुभव की, कितना विचित्र अनुभव था. बाद में ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ के एक स्वामी से, जो पास ही एक सखी के यहाँ ठहरे हुए हैं, मिलने गयी. उन्हें अपने कुछ अनुभव बताये, अच्छे लगे उन्हें भी. गुरूजी के सारे शिष्य उन्हीं के जैसे हैं, सभी को अपना मानते हैं, हर घर को अपना घर भी. अगले महीने DSN कोर्स होने वाला है, उसे करने को कहा है. आज बगीचे से पांच नारियल तोड़े, पानी बहुत मीठा था.

कल दिन भर डायरी नहीं खोली, परसों शाम को क्लब में मीटिंग थी, जून पुस्तकालय में बैठे इंतजार कर रहे थे, बीच में ही फोन करके उसे बुला लिया. रात को उसे नींद नहीं आ रही थी, तो वह ध्यान करने बैठ गयी, जो उन्हें अच्छा नहीं लगा. सुबह उठे तब भी सहज नहीं थे. आज तक जो बात उसने इशारों में कही थी, स्पष्ट कह दी कि अब उन्हें परिपक्व होना चाहिए, रूठना आदि कब तक चलेगा. उसे लगता है, हर उम्र का एक तकाजा होता है. इन्सान इस दुनिया से जाते-जाते तक वही हरकतें करता रहेगा तो बड़ा कब होगा. खैर..वह भी अपने तौर पर प्रयत्न तो करते होंगे, हर कोई अपनी क्षमता के अनुसार चलता है पर अस्तित्त्व ने ही उसके द्वारा वे शब्द कहे हैं वरना आज तक वह क्यों नहीं कह पायी. सत्य के पथ पर चलने का कर्म पुराने जन्मों के कर्मों का फल ही होता है शायद, किसी ने सच कहा है भगवान स्वयं भी धरती पर उतर जाएँ तो भी उनको न पहचानने का निश्चय करे जो बैठा हो, उसके लिए वह भी कुछ नहीं कर सकते. हरेक को अपनी यात्रा स्वयं ही करनी है, बस दूसरे कुछ दूर तक साथ दे सकते हैं और कुछ नहीं कर सकते. कल दोपहर तक वह सहज हो गये थे. शाम को उन्होंने एक तमिल फिल्म देखी ‘थ्री’, जिसमें कोलेवारी वाला गाना है. 

Wednesday, May 31, 2017

पिको आयर की किताब


इतवार की सुबह, जून नहा-धोकर नाश्ता कर पुनः विश्राम कर रहे हैं. अभी सवा दस ही बजे हैं. घर व बगीचे में सफाई का काम चल रहा है. उसने ब्लॉग खोला, कुछ पढ़ा. लग रहा है जैसे कोई काम ही नहीं है, समय ढेर सारा है हाथ में है. आज धूप भी निकली है. दोपहर को बच्चों से मिलना जाना है. उनकी ऊर्जा का, समय का सही उपयोग हो सके इसक लिए निरंतर सजग रहने की आवश्यकता है !

आज जून दिगबोई गये थे, दोपहर लंच पर नहीं आने वाले थे, सो सुबह का काम खत्म होने पर यानि सफाई कर्मचारी व नैनी के जाने के बाद वह भी घर से निकल पड़ी. अपनी लेन, सामने वाली लेन तथा बायीं तरफ वाली लेन में कुल सात घरों में गयी. चार महिलाएं मिलीं, तीन में कोई नहीं था. सभी को कल शाम के सत्संग के लिए निमन्त्रण दिया. एक के यहाँ उनकी माँ व मासी भी थीं, उन्हें भी आने के लिए कहा. तीन अन्य महिलाओं के नाम भी उसे याद आए जिन्हें फोन करना है. आज नन्हे की मित्र की माँ ने उन दोनों व नन्हे के लिए लिखीं कविताएँ भेजीं, सुंदर शब्दों व भावों का प्रयोग किया है. वह हिंदी में एमए हैं. उसे अपनी कविताओं की एक पाठिका मिल गयी हैं तथा एक सखी भी. उनसे बात हुई, वह बहुत आशाजनक दिखीं. वह भी लिख सकती हैं ऐसा विश्वास उनके भीतर जगा है. उसकी मित्र ने दो किताबें भेजी है, PICO IYER की लिखी किताबें, जापान की संस्कृति का चित्रण कराती हैं, वह काफी मुश्किल किताबें पढ़ती है. अच्छा है उसे पढने का इतना शौक है. दीदी से भी बात हुई, उन्होंने बताया, कल वह बेटे बहू व पोती को पिताजी से मिलाने ले जाने वाली हैं. वह उसके जीवन की कहानी पढ़ रही हैं और समझ भी रही हैं, कितना अंतर था तब के मन में और एक है आज का मन..अनंत के साथ एक होता हुआ..
जून आज कोलकाता गये हैं, चौथे दिन लौट आयेंगे. इस बड़े घर में वह पहली बार अकेले रहने वाली है. इस घर में सबसे अच्छी बात यही है कि घर के भीतर से ही पूरा बगीचा नजर आता है. सुबह वर्षा हो रही थी, सो वह भ्रमण के लिए नहीं जा सकी. नैनी की जिठानी सिलाई जानती है, वह खाली पड़े गेस्ट रूम में उसकी मशीन पर कुछ काम कर रही है. उसके जाने की बाद ही वह टहलने जाएगी.
कल रात देर से सोयी, पढ़ती रही, फिर स्वप्न देखे, सुबह उठकर ध्यान किया, आर्ट ऑफ़ लिविंग रेडियो सुना. एक अन्य सदस्या से मिली, उनके लिए कविता लिखी. दोपहर को हिंदी का नया पाठ पढ़ाया. जून का फोन आया दो बार. अखबार में बिहार के बाइस बच्चों के विषाक्त भोजन खाने से हुई मृत्यु के बारे में पढ़ा, कितने लापरवाह हैं लोग, तमिलनाडु में भी एक स्कूल में बच्चे बीमार हुए हैं. देश में मानव संख्या इतनी अधिक है कि जान की कीमत घट गयी है, गरीबों को जीने का अधिकार नहीं है.
परसों यानि शनि की दोपहर जून को आना था, वह इन्तजार करती रही, फिर अकेले ही भोजन किया, वह सवा दो बजे आये. शाम को वे ‘राँझना’ देखने गये, अच्छी फिल्म है. इतवार शाम को वे एक मित्र परिवार से मिलने गये, वे अगले वर्ष अगस्त में रिटायर हो रहे हैं, पर उनका मन अभी से यहाँ से उचट गया है, ऐसा उन्होंने कहा. इस दुनिया से भी तो एक दिन जाना है, लोगों का मन दुनिया से भी तो उचट जाना चाहिए फिर तो..

जून आज दोपहर घर नहीं आये, उसने लंच में दही के साथ दो आलू परांठे बनाये, सिर्फ अपने लिए पूरा भोजन बनाने का उसका कभी मन नहीं होता, अकेले होने पर ज्यादातर खिचड़ी बना लेती है. शाम को एक सखी के यहाँ सत्यनारायण की पूजा में जाना है, फिर बंगाली आंटी के यहाँ और फिर आर्ट ऑफ़ लिविंग सेंटर. आज गुरू पूर्णिमा जो है, शाम को वहाँ गुरू पूजा होगी. रात का भोजन भी बाहर ही है.  

Monday, May 29, 2017

टेबलेट पर कहानी


कल नन्हे की मित्र की माँ से बात की, ये लोग चाहते हैं, अभी कोई भी रस्म कुछ महीने बाद की जाये, वे भी यही चाहते हैं, पिताजी के रहते जो काम नहीं हो सका अब उनके जाने के बाद इतना शीघ्र करना उचित भी नहीं है. वैसे इस महीने वे लोग आ रहे हैं. नन्हे का जन्मदिन वे साथ मनाएंगे, सुबह हवन होगा शाम को चाय-पार्टी. अभी-अभी उसने अपने पिताजी से बात की, छोटी भतीजी का चुनाव AIMS व KGMC में भी हो गया है. उसने मेडिकल के लिए जितने भी इम्तहान दिए थे, लगभग सभी जगह उत्तीर्ण हो जाएगी.  

कल शाम वे एक मित्र परिवार से मिलने गये, वृद्धा आंटी को नन्हे के विवाह की बात सुनकर बहुत ख़ुशी हुई. दो दिन बाद वह आ रहा है, दिन तब व्यस्त हो जायेंगे. आज सुबह सुधांशु जी ने कितनी सुंदर बात कही, उन्हें अपनी कीमत बढ़ानी है न कि घटानी है. उम्र के साथ उनकी समझ भी परिपक्व होनी चाहिए. कल रात वर्षा शुरू हुई जो आज सुबह तक लगातार होती रही. बगीचे में पानी भर गया है, शायद शाम तक सूखेगा, बाहर का नाला भी लबालब भर गया है. इस समय थमी है, बगीचा हरियाली का एक पुंज नजर आ रहा है.

पांच दिनों का अन्तराल ! उस दिन नन्हे के आने की तैयारी, अगले दिन वह आया, उसके दो दिन  बाद बाकी मेहमान आये, पता ही नहीं चला समय कैसे बीत गया. आज सब चले गये हैं, घर में वे दोनों ही रह गये हैं. अब कुछ अन्य कार्य करने का समय आ गया है. पहले घर को पुनः व्यवस्थित करना है, फिर सेवा कार्य शुरू करना है. फ़िलहाल तो दो छात्राएं आ रही हैं, उन्हें पढ़ाना है. नैनी व उसके पति ने, जो एक कुक है, कल खाना बनाया, सबको पसंद आया, उन्हें इनाम देना है. जून ने कितनी अच्छी तरह मेहमानों की देखभाल की, कुल मिलाकर अच्छा रहा यह मिलन समारोह ! परमात्मा की कृपा ही तो है यह ! नन्हे ने भी बहुत सहजता से सभी कार्यों में हिस्सा लिया, सब कुछ ठीक-ठाक हो गया, नन्हा खुश रहेगा क्योंकि खुश रहना उसे आता है. मौसम भी बहुत सुहावना रहा पिछले दिनों..

नन्हा उसके लिए टेबलेट  लाया है. उस पर काम करना सीखना है. किताबें पढनी हैं. उसने सभी के लिए कविताएँ लिखीं, जून ने सभी के फोटो चुनकर लगाये और उन्हें भेज दिया. सुबह धूप निकली थी, पर साढ़े नौ बजते न बजते बदली छा गयी और बरस भी गयी. उन्होंने सारे कारपेट बाहर निकले थे, आज साप्ताहिक सफाई का दिन था. जल्दी-जल्दी सब अन्दर किये, नैनी पूरे मन से काम करती है, सफाई कर्मचारी भी ठीक से काम कर रहा है आजकल. फिर नैनी के पति ने बाहर चारों ओर का जाला साफ किया, गैराज का भी. इतने बड़े घर को साफ-सुथरा रखना अकेले का काम नहीं है. सुबह माली आया था, गुलदाउदी के लिए गमलों की तैयारी शुरू हो गयी है.

नन्हे के लाये टेबलेट पर कहानी पढ़ रही है, शिवा की कहानी, अच्छी लग रही है. परसों स्वप्न में सद्गुरू को देखा था, वह उनसे बात कर रही थी, उनके साथ वही रिश्ता है, जो उसका खुद के साथ है, तभी इतना अपनापन है, कैसा आश्चर्य है वह असीम परमात्मा ससीम देह में प्रकट हो जाता है, वह तो सभी के भीतर है पर किसी-किसी में नजर भी आने लगता है. मन का दर्पण यदि स्वच्छ होगा तो उसमें वह झलक ही जायेगा, उस पर तेल लगा हो या धूल जमी हो तो प्रतिबिम्ब स्वच्छ नजर नहीं आता.  


Friday, May 26, 2017

वेद रहस्य


जुलाई माह का प्रथम दिवस ! पिताजी अब इस दुनिया में नहीं हैं, हैं तो उनकी स्मृतियाँ, किसी और रूप में वे अवश्य कहीं होंगे.

पूर्ण हुई एक जीवन यात्रा
या नवजीवन का आरम्भ
एक आश्रय स्थल होता है पिता
वृक्ष ज्यों विशाल बरगद का
नहीं रह सके माँ के बिना
या रह न सकीं वे  आपके बिना

सो चले गये उसी पथ पर
छोड़ सभी को उनके हाल....
भर गया है शुभ स्मृतियों से
हृदय का प्रांगण
लगाये सभी होड़ आगे आ जायें
लालायित, उपस्थिति निज की जतलायें
उजाला बन कर जो पथ पर
चलेंगी संग-संग वे सब हमारे
बागीचे से फूल चुनते
सर्दियों की धूप में घंटों तक
अख़बार पढ़ते
नैनी के बच्चे को बहलाते
लगन से पूजा की तैयारी करते
जाने कितने पल आपने संवारे....

विदा किया है भरे मन से
काया अशक्त हो चुकी थी
पीड़ा बन गयी थी साथी
सो जाना ही था हंस को
त्याग यह टूटा फूटा बसेरा
नूतन नीड़ की तलाश में
जहाँ मिलेगा इक नया सवेरा...


अब उन्हें अपने जीवन की यात्रा अपने ही भरोसे तय करनी है, परमात्मा के भरोसे भी तय करने का भी तो यही अर्थ है न, वह उनका अपना आप ही तो है ! क्रिया के तीन दिन बाद वे वाराणसी की यात्रा पर निकल गये, पिताजी की अस्थियों का विसर्जन करना था. श्री अरविन्द का वेद रहस्य साथ ले गयी थी. अद्भुत ग्रन्थ है वह, उनके पूर्वजों का इतिहास, उनकी आकांक्षाओं और अभीप्साओं का संग्रह ! वर्षों पूर्व भी पढ़ा था, मन को एक दिव्य लोक में ले जाता है. वर्षा आज भी हो रही है, छत से पानी टपक रहा है, उसका शोर ज्यादा है बनिस्बत वर्षा की बूंदों के शोर के. नाइन ओ क्लॉक के दो गुलाबी फूल बड़े शान से खिले हैं उनके मन व बुद्धि भी इसी तरह खिले रहें, सहज ही आत्मा के गुण उसमें झलकते रहें, कोई आग्रह न रहे, जीवन एक सुमधुर संगीत से आबद्ध रहे, ऐसी ही प्रार्थना, ऐसी ही कामना उसके पोर-पोर से उठ रही है. 

Thursday, May 25, 2017

अंत और आरम्भ


सुबह-सवेरे खबर मिली, बड़ी भांजी के यहाँ बिटिया का जन्म हुआ है. नार्मल नहीं हुआ यही एक बात अच्छी नहीं है. दीदी अभी वहाँ नहीं गयी हैं, दो दिन उनके बाद बेटे-बहू आ रहे हैं, पर उसे लगता है उन्हें जाना चाहिए, खैर..आज एक परिचिता का फोन भी आया, वह अपनी बेटी को आस्ट्रेलिया छोड़कर आई हैं. वहाँ सभी काम खुद करने होते हैं, अभी विवाह को एक ही वर्ष हुआ है. दो महीने के बच्चे को छोड़कर वह आ गयी हैं, इस भरोसे कि बिटिया की सास पहुंच जाएँगी, पर स्वास्थ्य संबंधी कुछ परेशानी के चलते वह अभी जा नहीं पाएंगी.

कल मामीजी की आर्मी डाक्टर नतिनी अपने पांच वर्ष के पुत्र के साथ आ रही है, पिछले दो वर्ष से यहीं असम के किसी स्थान में पोस्टेड थी, जब जाने का समय निकट आया तो उसने सोचा एक बार मिलकर ही जाये. बड़ी ननद का फोन आया, अगले हफ्ते वे आ रही हैं. जो भी होगा अच्छा ही होगा, जागे हुए के लिए सब शुभ है, हर घड़ी, हर पल शुभ के सिवाय कुछ है ही नहीं. पिताजी की तबियत पूर्ववत् बनी हुई हैं, आज वे नींद में कुछ बोल रहे थे. पहले कहा, ‘नहीं लगा’, फिर कहा, ‘अच्छा हुआ’. आज भी बगीचे में कुछ काम करवाया, इतने बड़े बगीचे में कुछ न कुछ काम निकलता ही रहता है.

मेहमान सुबह-सवेरे पहुंच गयी, वे अभी उठे ही थे. उसका पुत्र बहत ऊर्जावान है, जैसे कि आजकल पांच वर्ष के बच्चे होते हैं. स्वयं भी बहुत बातें करती है. पति से तलाक का केस चल रहा है, कितने आराम से सारी बातें बता रही थी, जैसे किसी और के बारे में हों. जीवन में कितना कुछ घट जाता है जिस पर किसी का बस नहीं होता. वे अस्पताल भी गये पर पिताजी ने आँखें नहीं खोलीं. कल रात एक बहुत अजीब सा स्वप्न देखा, एक नवजात शिशु कन्या को देखा जो उसकी हमशक्ल थी, वह उसकी बेटी थी, वह ही थी या उसकी आत्मा थी. उसका सुंदर चेहरा और काले केश चेहरे के भाव, आँखों का रंग सब कुछ कितना स्पष्ट था स्वप्न में. उसे उसने जन्माया था पर कितने अलग ढंग से, वह श्वेत आवरण से ढकी थी जैसे कोई प्लास्टर लगा हो. ढकी थी कई वस्त्रों से, फिर उसे अनावृत किया. अद्भुत स्वप्न था वह. परमात्मा हर क्षण उसके साथ है, उसकी कृपा ही भीतर उजाला बनकर छा रही है.    

तीन दिनों का अन्तराल.. जिस दिन वे आए थे, उसके अगले दिन मेहमानों को लेकर रोज गार्डन गयी, शाम को पार्क व काली बाड़ी भी. उसी रात को पिताजी की साँस उखड़ने लगी, जो सुबह से ही तेज चल रही थी. एक जीवन का अंत करीब आ गया था, एक नये जीवन की शुरूआत होने वाली थी. रात को बारह बजे जून अस्पताल से लौटे. अगले दिन सुबह साढ़े नौ बजे अंतिम संस्कार के लिए ले जाया गया. दोपहर दो बजे लौटे. शाम तक लोग आते रहे, कल सुबह भी कुछ लोग आये, कल शाम को भी. आज छत पर काम करने वाले मजदूर आ गये हैं. नैनी किचन में काम कर रही है, सफाई कर्मचारी अपना कम कर रहा है, जीवन पहले सा चल रहा है पर एक चेतना अपना रूप बदल चुकी है, एक लहर सागर में समा गयी है एक नई लहर बनकर थिरकने के लिए. जून ने सभी कार्ड्स लिखे, वे लेकर ड्राइवर देने गया है. परसों क्रिया है. मंझला भाई आ रहा है, दोनों ननदें भी कल आ रही हैं. उसके मस्तिष्क में कई उदार कल्पनाएँ आ रही हैं, एक बच्चों का स्कूल खोलने की, एक बड़ों की क्लास लेने की, एक सत्संग करने की, एक मृणाल ज्योति के लिए एक स्कालर शिप देने की, जिसमें कुशाग्र विद्यार्थी को चुना जायेगा. पिताजी के नाम से होगी यह स्कालर शिप. लेडीज क्लब में एक नया प्रोजेक्ट भी खोलना है, योग और ध्यान का, जिसका नाम होगा आह्लाद ! जिसमें वे सप्ताह में एक दिन योग कक्षा चलाएंगे.


Wednesday, May 24, 2017

बड़ा सा घर


नये घर में उनका तीसरा दिन है. परसों दोपहर बाद वे सभी सामान लेकर यहाँ आ गये थे. पिछले दस दिनों से यानि बुद्ध पूर्णिमा के दिन से उन्होंने शिफ्टिंग का काम शुरू किया. उसी दिन से डायरी के पन्ने कोरे हैं. पहले दिन पूजा का कमरा यानि योग का कमरा ठीक किया. दूसरे दिन किताबें लाये, तीसरे दिन पिताजी के कमरे का सामान. एक दिन छुट्टी की, फिर पांचवें, छठे, सातवें दिन अन्य सामान और अंत में आठवें दिन शेष सारा सामान. अभी तक घर में कुछ न कुछ काम निकल ही आ रहा है, कोई बाथरूम लीक हो रहा था, कोई ट्यूब लाइट काम नहीं कर रही थी. धीरे-धीरे सब ठीक हो जायेगा. आश्चर्य है कि उन्हें एक बार भी वह घर याद नहीं आया, ऐसा लग रहा है जैसे वे इसी घर की प्रतीक्षा कर रहे थे. यह उनके स्वप्नों का घर था, बाहर का लॉन इतना बड़ा है कि आराम से एक विवाह की पार्टी हो सकती है. उनके गमले जो वहाँ सिमटे सकुचाये से थे, यहाँ खिल के अपना वैभव दिखा पा रहे हैं, उनके साज-सज्जा के सामान यहाँ कितनी मुखरता से अपना सौन्दर्य प्रदर्शित कर रहे हैं. इतना बड़ा और इतना सुंदर घर उसे ईश्वर की कृपा का अनुभव करा रहा है. इस घर में यह बाहर का बरामदा बैठने के लिए अच्छी जगह है, ऊपर पंखा भी है, सामने ‘नाइन ओ क्लॉक’ के फूल खिले हैं. कुछ ही दिनों में सामने की लंबी क्यारी में लगे जीनिया के फूल खिल जायेंगे. पिताजी अभी तक अस्पताल में ही हैं, उनका स्वास्थ्य सुधर नहीं रहा है, अब दोनों ननदों के आने की प्रतीक्षा है. लगभग दो हफ्तों बाद वे दोनों आ रही हैं, सम्भवतः उन्हें देखकर उनकी तबियत में कुछ सुधार आये.
कल शाम एक मित्र परिवार आया पहली बार इस घर में. नयी नैनी ने पहले दो गिलास शरबत बनाया फिर दो कप लाल चाय. रोज सुबह भी वह नींबू वाली ग्रीन चाय का एक कप लाती है उसके लिए. आज मौसम अच्छा है भीगा-भीगा सा, महादेव का अंतिम भाग आने वाला है. आज बहुत दिनों बाद वह विद्यार्थी आया अपनी नई साईकिल पर, आखिर वह समर्थ हुआ अपने आप कहीं जाने में. सुबह कितनी ठंडी थी, रात भर वर्षा होती रही. सुबह हरी घास पर टहलते हुए कई सारे स्नेल जीव बाहर किये, नन्हे पौधों को खा लेते हैं ये, आज बगीचे में मिट्टी डाली जा रही है. हेज के किनारे जमीन काफी नीची हो गयी थी. सद्गुरू कहते है, जीवन के अंत में यही पूछा जायेगा कितना ज्ञान प्राप्त किया और कितना प्रेम बांटा...उसके भीतर प्रेम का जो सहज स्रोत था वह आजकल शांत पड़ा है. प्रेम का स्वरूप बदल गया है, वह मौन में ही प्रवाहित होता है. दो महीने हो गये हैं उसे मृणाल ज्योति गये हुए, पिछले दिनों सेवा की भावना जैसे भीतर सिकुड़ गयी थी. पिताजी को इस हालत में देखकर भी कुछ न कर सकने का भाव अजीब सा है. विचित्र है मानव मन, अहंकार भी कितने-कितने रूपों में सम्मुख आता है. उसे कार की आवाज आयी, लगता है जून आ गये.
कल रात तेज वर्षा हुई, बगीचे में हेज के किनारे पानी भर गया है. इस समय धूप निकली है. जून अस्पताल गये हैं पिताजी के लिए दही और दाल के पानी का भोजन लेकर. आजकल उनका यही आहार है. मानव अपने अंतिम काल में कितना बेबस व निरीह हो जाता है, वे पूरी तरह से सोच और समझ तो रहे हैं पर बोल नहीं पाते. डाक्टरों की सहायता से उनके अंतिम समय को कुछ आरामदेह बनाया जा  सकता है, पर कष्ट से उन्हें मुक्ति नहीं दिला सकते. कल शाम जून ने नन्हे से होने वाली दुल्हन के लिए चेन खरीदने के लिए कहा, उसे थोड़ा नहीं काफी अजीब लगा. उसे अपने मन पर कभी-कभी बड़ा आश्चर्य होता है, कब कैसे प्रतिक्रिया व्यक्त करेगा, उसे खुद भी पता नहीं चलता. यह मन नामकी वस्तु दुनिया में सबसे अजूबी है. आज सुबह की साधना में काफी देर मन टिक गया, कितना कुछ दिख रहा था, मन ही रूप धरकर आ रहा था, पर वह साक्षी बनकर देख रही थी. पता नहीं भविष्य में क्या लिखा है, भविष्य नामकी कोई वस्तु होती भी है या सिर्फ कल्पना ही है, हर क्षण जो उनसे मिलता है, वह तो वर्तमान ही बनकर मिलता है. कल जो बीत गया वह भी और कल जो आएगा वह भी.   


Monday, May 22, 2017

कविता और नृत्य


नन्हा आज चला गया, अभी तो रास्ते में ही होगा, रात तक घर पहुंचेगा. पिताजी को उसके आने से काफी अच्छा लगा, उनके स्वास्थ्य में सुधार हुआ है. उन्हें भी उसके रहने से अस्पताल की ड्यूटी में कुछ राहत मिली. सहायक की अनुपस्थिति में भी जून को रात को वहाँ नहीं सोना पड़ा. इस बार वह काफी शांत लगा. आज से सहायक सोयेगा जब तक उसका कोई अन्य काम नहीं निकल आता.
आज मौसम अच्छा है, मन भी सुवासित है, ऊर्जा का प्रस्फुरण हो रहा है. ऊर्जा का ही खेल है यह जगत. हर पल उनके भीतर से ऊर्जा का संचरण हो रहा है, सकारात्मक भी और नकारात्मक भी...जैसी ऊर्जा वे भीतर निर्मित करते हैं, वैसी ही बाहर भेजते हैं और वही उन्हें पुनः मिलती है. एक चक्र का निर्माण होता है. वे सद्भावनाएँ भेजते हैं तो वही उन्हें मिलती हैं. भीतर कठोर हो जाते हैं तो वही कठोरता कई गुनी होकर उन्हें मिलती है..ऊर्जा का अनंत भंडार उनके चारों और फैला हुआ है, वे चाहे जितनी ऊर्जा उसमें से ले लें. वह कभी समाप्त होने वाली नहीं है..प्रेम अनंत है..आनन्द अनंत है..शांति अनंत है..सुख अनंत है...और ज्ञान अनंत है...लुटा रहा है वह खुले दिल से..जितना भर ले कोई अपनी झोली में..जीवन एक अनमोल उपहार है जो परमात्मा ने स्वयं को व्यक्त करने के लिए उन्हें दिया है. वह प्रकट हो रहा है नृत्य की किसी मुद्रा में..चित्र में..कविता में और प्रकृति के हजार-हजार रूपों में..वह..
आज फिर ‘वर्षा’ रानी अपना जौहर दिखाने आयी है. कल दिन भर पिताजी लगभग सोये ही रहे, आज सुबह-सुबह जगे थे, नाश्ता भी किया, उनका नया घर तैयार हो रहा है. अगले महीने उन्हें वहाँ जाना है, जून का कनाडा का कार्यक्रम स्थगित होने जा रहा है, सम्भवतः उन्हीं दिनों वे शिफ्ट करेंगे. कल रात कोई स्वप्न देखा हो, याद नहीं आता पर वे तो दिन भर में ही न जाने कितने स्वप्न देखते रहते हैं. ‘समाधि’ के अतिरिक्त शेष स्वप्न ही तो है. एक ही सत्ता है जो प्रतिबिम्बित हो रही है भिन्न-भिन्न रूपों में. ‘महादेव’ में पार्वती को समाधि का अनुभव होने वाला है. सद्गुरू की कृपा से उसे भी इसी जन्म में समाधि का अनुभव अवश्य होगा. नैनी की बिटिया यहीं पास में खेल रही है, पूछ रही है कि आप क्या कर रही है !
पिछले दो दिन कुछ नहीं लिखा, आज अभी अस्पताल जाना है, पिताजी पहले से काफी ठीक हैं, उठकर बैठे भी, कहा, पोते की शादी देखनी है, इन्सान की जिजीविषा कितनी प्रबल है, वह हर कठिनाई को पार कर जीना चाहती है, कल नन्हे को कहा तो है कि वह तैयार हो तो जल्दी ही मंगनी की रस्म हो सके. कौन जानता है, भविष्य में क्या लिखा है ? परमात्मा हर वक्त उनके साथ है, बल्कि वही तो है..
पौने तीन बजे हैं, मौसम अच्छा है, ठंडी हवा बह रही है, अभी कुछ देर पहले उसका एक विद्यार्थी पढ़कर गया है. कह रहा था, बहुत दिनों से पापा से मार नहीं खायी, मार खाकर ऊर्जा आती है, अजीब बच्चा है, उसकी लिखाई खराब है, थोडा आलसी है, उसकी माँ ने ज्यादा लाड़-प्यार से उसे ऐसा बना दिया है, और इधर उसका मन भी ज्यादा लाड़-प्यार से उसे ही दिक् कर रहा है. पुराने संस्कार ढीठ बच्चे की तरह होते हैं, कहना ही नहीं मानते, उसे व्यस्त रहकर उनकी उपेक्षा रखनी है और कुछ नहीं हटाने से वे और भी जिद्दी हो सकते हैं. साक्षी भाव से उन्हें देखना भर है, अच्छा ! ऐसा भी होता है, कहकर आश्चर्य व्यक्त करना है..आज पुस्तकालय भी जाना है, बंगाली सखी को अपनी बेटी की किताबें पुस्तकालय में देनी हैं. आज फिर बिजली नहीं है. कल से वे अपने नये घर में कुछ सामान शिफ्ट कर रहे हैं.