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Thursday, May 25, 2017

अंत और आरम्भ


सुबह-सवेरे खबर मिली, बड़ी भांजी के यहाँ बिटिया का जन्म हुआ है. नार्मल नहीं हुआ यही एक बात अच्छी नहीं है. दीदी अभी वहाँ नहीं गयी हैं, दो दिन उनके बाद बेटे-बहू आ रहे हैं, पर उसे लगता है उन्हें जाना चाहिए, खैर..आज एक परिचिता का फोन भी आया, वह अपनी बेटी को आस्ट्रेलिया छोड़कर आई हैं. वहाँ सभी काम खुद करने होते हैं, अभी विवाह को एक ही वर्ष हुआ है. दो महीने के बच्चे को छोड़कर वह आ गयी हैं, इस भरोसे कि बिटिया की सास पहुंच जाएँगी, पर स्वास्थ्य संबंधी कुछ परेशानी के चलते वह अभी जा नहीं पाएंगी.

कल मामीजी की आर्मी डाक्टर नतिनी अपने पांच वर्ष के पुत्र के साथ आ रही है, पिछले दो वर्ष से यहीं असम के किसी स्थान में पोस्टेड थी, जब जाने का समय निकट आया तो उसने सोचा एक बार मिलकर ही जाये. बड़ी ननद का फोन आया, अगले हफ्ते वे आ रही हैं. जो भी होगा अच्छा ही होगा, जागे हुए के लिए सब शुभ है, हर घड़ी, हर पल शुभ के सिवाय कुछ है ही नहीं. पिताजी की तबियत पूर्ववत् बनी हुई हैं, आज वे नींद में कुछ बोल रहे थे. पहले कहा, ‘नहीं लगा’, फिर कहा, ‘अच्छा हुआ’. आज भी बगीचे में कुछ काम करवाया, इतने बड़े बगीचे में कुछ न कुछ काम निकलता ही रहता है.

मेहमान सुबह-सवेरे पहुंच गयी, वे अभी उठे ही थे. उसका पुत्र बहत ऊर्जावान है, जैसे कि आजकल पांच वर्ष के बच्चे होते हैं. स्वयं भी बहुत बातें करती है. पति से तलाक का केस चल रहा है, कितने आराम से सारी बातें बता रही थी, जैसे किसी और के बारे में हों. जीवन में कितना कुछ घट जाता है जिस पर किसी का बस नहीं होता. वे अस्पताल भी गये पर पिताजी ने आँखें नहीं खोलीं. कल रात एक बहुत अजीब सा स्वप्न देखा, एक नवजात शिशु कन्या को देखा जो उसकी हमशक्ल थी, वह उसकी बेटी थी, वह ही थी या उसकी आत्मा थी. उसका सुंदर चेहरा और काले केश चेहरे के भाव, आँखों का रंग सब कुछ कितना स्पष्ट था स्वप्न में. उसे उसने जन्माया था पर कितने अलग ढंग से, वह श्वेत आवरण से ढकी थी जैसे कोई प्लास्टर लगा हो. ढकी थी कई वस्त्रों से, फिर उसे अनावृत किया. अद्भुत स्वप्न था वह. परमात्मा हर क्षण उसके साथ है, उसकी कृपा ही भीतर उजाला बनकर छा रही है.    

तीन दिनों का अन्तराल.. जिस दिन वे आए थे, उसके अगले दिन मेहमानों को लेकर रोज गार्डन गयी, शाम को पार्क व काली बाड़ी भी. उसी रात को पिताजी की साँस उखड़ने लगी, जो सुबह से ही तेज चल रही थी. एक जीवन का अंत करीब आ गया था, एक नये जीवन की शुरूआत होने वाली थी. रात को बारह बजे जून अस्पताल से लौटे. अगले दिन सुबह साढ़े नौ बजे अंतिम संस्कार के लिए ले जाया गया. दोपहर दो बजे लौटे. शाम तक लोग आते रहे, कल सुबह भी कुछ लोग आये, कल शाम को भी. आज छत पर काम करने वाले मजदूर आ गये हैं. नैनी किचन में काम कर रही है, सफाई कर्मचारी अपना कम कर रहा है, जीवन पहले सा चल रहा है पर एक चेतना अपना रूप बदल चुकी है, एक लहर सागर में समा गयी है एक नई लहर बनकर थिरकने के लिए. जून ने सभी कार्ड्स लिखे, वे लेकर ड्राइवर देने गया है. परसों क्रिया है. मंझला भाई आ रहा है, दोनों ननदें भी कल आ रही हैं. उसके मस्तिष्क में कई उदार कल्पनाएँ आ रही हैं, एक बच्चों का स्कूल खोलने की, एक बड़ों की क्लास लेने की, एक सत्संग करने की, एक मृणाल ज्योति के लिए एक स्कालर शिप देने की, जिसमें कुशाग्र विद्यार्थी को चुना जायेगा. पिताजी के नाम से होगी यह स्कालर शिप. लेडीज क्लब में एक नया प्रोजेक्ट भी खोलना है, योग और ध्यान का, जिसका नाम होगा आह्लाद ! जिसमें वे सप्ताह में एक दिन योग कक्षा चलाएंगे.