Thursday, July 21, 2016

हिमाचल के बाशिंदे


पिछले दिनों उसने आर्ट ऑफ़ लिविंग से जुड़े स्वामी मधुसूदन(हनी) की कहानी उनकी जुबानी सुनी और फिर शब्दों में उतारी. बहुत रोचक है. वह हिमाचल के बाशिंदे हैं I पिताजी व्यापारी हैं I वे दो भाई हैं I मधु छोटे हैं, उनके अनुसार स्कूल तथा कॉलेज में वह बहुत शरारती छात्र हुआ करते थे I कुछ मित्रों का एक गैंग था, जो धमाचौकड़ी मचाने में सबसे आगे रहता था I अन्य छात्रों की ऐसी परेशानियों को हल करने का भी उन्हें शौक था जिसमें कुछ दादागिरी करने का मौका मिले I बड़े भाई से सदा उनकी स्पर्द्धा चलती रहती थी I वह जो करते वही मधु भी करना चाहते I ऐसे तो अध्यात्म में कोई विशेष रुचि नहीं थी, यहाँ तक कि टीवी पर कोई दाढ़ीवाले बाबाजी प्रवचन दे रहे हों तो वह चैनल बदल देते थे I किसी बाबा की आँखों में नहीं देखते थे इस डर से कि कहीं वह सम्मोहित न कर दें, लेकिन एक बार जब वह कुछ दिनों के लिये बाहर गये, भैया ने ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ का बेसिक कोर्स कर लिया, लौटे तो उन्होंने भी कोर्स करने की जिद की I पिताजी ने कहा तुम अभी छोटे हो, २० वर्ष के होने पर ही कोर्स कर सकोगे पर वह इतनी प्रतीक्षा नहीं कर सकते थे, सो फार्म में अपनी उम्र ज्यादा लिखवा कर चले गये I कोर्स में कुछ समझ में नहीं आता था I हर दिन कुछ गृहकार्य दिया जाता था, वह भी नहीं किया, लेकिन सुदर्शन क्रिया करने के बाद भीतर कुछ ऐसा परिवर्तन हुआ जो शब्दों में कहा नहीं जा सकता I मधु जब छठी-सातवीं का विद्यार्थी था तो अक्सर मन में कई विचार उठते थे..... इस सामान्य से प्रतीत होने वाले जीवन के पीछे अवश्य कुछ और भी है... केवल खाना-पीना, पढ़ना और सो जाना मात्र इतना ही तो जीवन का उद्देश्य नहीं हो सकता..... मन में प्रश्न भी उठते थे कि कौन सी शक्ति इस ब्रह्मांड का नियंत्रण कर रही है? मन में इतने विचार कहाँ से आते हैं? जीवन में एक नियमितता कहाँ से आती है? लगता था कि कई बातें एक अंतराल के बाद पुनः घटित हो रही हैं, लेकिन कारण समझ से बाहर था I इन सवालों का जवाब खोजने निकला तो शिक्षकों व मातापिता दोनों ने कहा इस उम्र में ऐसी बहकी-बहकी बातें क्यों करते हो, पढ़ने में मन लगाओ I धीरे-धीरे मन में सवाल उठने बंद हो गए और वह अपनी सामान्य दिनचर्या में व्यस्त हो गये I

सन् २००२ की बात है गुरूजी हिमाचल आ रहे थे, सत्संग स्थल निवास से आधे घंटे की दूरी पर था I जब मित्रों ने कहा सत्संग चलते हैं तो पहले तो मना कर दिया क्योंकि एक तो पिताजी कहीं भी आसानी से जाने नहीं देते थे, दूसरे उन्हें डर था कि सत्संग में जाने से इमेज खराब हो जायेगी, लोग क्या सोचेंगे? कौन उनसे मदद माँगने आयेगा? पर मित्रों ने जोर दिया और किसी तरह पिताजी को राजी कर वहाँ पहुँचे I गुरूजी के आने से पहले मंच पर बायीं ओर बैठ गये बल्कि यह कहना सही होगा कि उन्हें बैठा दिया गया I मन में तर्क-वितर्क चल रहे थे I लोग भजन गा रहे थे और मस्त थे, तार्किक बुद्धि ने सोचा बिना किसी कारण ये इतने प्रसन्न क्योंकर हैं ? तभी गुरूजी का प्रवेश हुआ, वे हाथ में पकड़ी माला को घुमाते हुए लगभग नाचते हुए से आये और आसन पर आराम से बैठ गए I बुद्धि ने कहा कि सत्संग में बड़े-बड़े वीआईपी आये हैं, गुरूजी उनको सम्बोधित करके जरूर कोई गूढ़ ज्ञान की चर्चा करेंगे किन्तु यहाँ तो बात ही कुछ और थी I एकदम अनौपचारिक ढंग से गुरूजी ने पूछा, ‘हाँ, सब कैसे हो? खुश हो? सबने ‘हाँ’ में उत्तर दिया, मन में विचार चलने लगे कैसे गुरु हैं यह?, कि तभी वे मधु की दिशा में पलटे एक पल रुके, फिर सामने देखा.. अगले ही पल फिर पलटे और उंगली से अपनी ओर आने का इशारा किया I सामने जो मित्र था उसे कहा, जाओ गुरूजी तुम्हें बुला रहे हैं, शायद उन्हेँ पानी चाहिए वह गया और लौट आया, गुरूजी ने फिर कहा, नहीँ तुम इधर आओ मेरी बायीं ओर दूसरे मित्र थे उन्हें मंजीरे देकर भेज दिया, पर गुरूजी ने कहा, तुम जो चश्मा लगाये हो इधर आओ, इधर-उधर देखा यकीन नहीं हो रहा था कि उन अनजान को वह क्यों बुला सकते हैं I डरते-डरते उनके पास गया, उन्होंने पूछा, हाँ, हनी कैसे हो? कुछ बोलना चाहा पर जवाब तो कुछ सूझा नहीं, भीतर प्रश्न उठा, आप को मेरा नाम किसने बताया? गुरूजी ने फिर कुछ सामान्य प्रश्न किये, खुश हो? पढ़ रहे हो? बिजनेस भी कर रहे हो? धीरे-धीरे मन संयत हुआ और जवाब दिए पर तार्किक मन भीतर सवाल कर रहा था हजारोँ लोग बैठे हैं और गुरूजी इतनी साधारण बातें कर रहे हैं I अंत में उन्होंने आश्रम आने का निमंत्रण दिया, घबरा कर ‘हाँ’ में सर हिला दिया I अपनी जगह आकर बैठे तो लगा जैसे कोई स्वप्न देखा हो, लेकिन भीतर कुछ बदल गया था I सत्संग के बाद घर पहुँचे तो कितने ही दिनों तक गुरूजी की याद बनी रही फिर अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो गये I

Monday, July 18, 2016

बादलों के पार


पिछले कई दिनों से डायरी नहीं खोली, मेहमान आये और चले गये. बड़े भैया, दोनों-भाभियाँ व दोनों की बेटियां. सभी खुश थे. उन्होंने भी उनके साथ अच्छा समय गुजारा. कल का दिन ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ के स्वामी मधुसूदन के नाम था. वह आजकल पदयात्रा के सिलसिले में यहाँ आए हुए हैं. आज उन्हें निमंत्रित किया था, उन्हें उसने अपनी किताबें दीं, इस समय नेट सर्फिंग कर रहे हैं. दोपहर को वे उनके साथ बच्चों की योग कक्षा में भी जायेंगे. गुरूजी तथा अपने जीवन के बारे में तथा अपनी दीक्षा के बारे में काफी कुछ उन्होंने बताया. गुरूजी से जो जुड़ जाता है, उसका जीवन बदल जाता है. कुछ दिनों पूर्व तक उसने उनका नाम भी नहीं सुना था पर आज से वे फेसबुक पर दिख सकते हैं. नन्हे से मात्र तीन वर्ष बड़े उसके बड़े पुत्र के समान ही हुए. कह रहे थे, गुरूजी सबको उसी तरह जानते हैं, जैसे वे अपने सिर के बालों को जानते हैं, जब किसी एक को खींचो तो दर्द होता है. उनके चारों ओर चेतना का महासमुद्र है, वे उसकी जानकारी में हैं.

कल रात बड़ी भाभी ने फोन पर कहा, जब वे हवाई जहाज से गोहाटी से दिल्ली जा रही थीं तो ऊपर नीला आकाश तथा नीचे श्वेत मेघ देखकर उन्हें उसकी स्मृति हो आयी, कि यदि वह इस स्वर्गिक दृश्य को देखती तो कविता लिखती. उसने उनसे कहा कल्पना में वह बादल देखकर भी कुछ लिख सकती है, सो प्रयत्न किया-
     
धरा से ऊपर, नीचे नभ से
तैरे हवा में यान हमारा,
श्वेत बादलों की शैया पर
ज्यों अटका हो एक सितारा !
निर्मल नील गगन का साया
श्वेत मेघ तिरते अम्बर में,
मानो बिखरी हो कपास शुभ्र
या बगुलों की पांत  उड़ी हो !
दूर कहीं है गंध धरा की
स्वर्णिम क्षण यह दृश्य अनोखा,
ढका हुआ बादल से सब कुछ
देखो, कहीं न एक झरोखा  !
उठा धरा से पहुँचा नभ में
हम बादल के पार आ गए
छोड़ के भेदों की दुनिया
एक का ही आधार पा गए  !


Sunday, July 17, 2016

बनारसी नाश्ता


मन में कितने विचार आजकल आते हैं कि भैया-भाभी के आने पर वे क्या-क्या करेंगे. उन्हें सिलसिलेवार लिख लेना ठीक होगा. मंगल की शाम उन्हें चिड़वा-मटर व मिठाई के बनारसी नाश्ते से स्वागत कर रोज गार्डन में सांध्य भ्रमण के लिए ले जायेंगे. बुधवार सुबह दलिए, परांठे व खीर के उत्तर भारतीय नाश्ते के बाद तैयार होकर सब दिगबोई जायेंगे. शाम को लौटकर कुछ आराम के बाद कोई बोर्ड गेम खेलेंगे. गुरुवार को सुबह किसी दक्षिण भारतीय नाश्ते के बाद वे फोटो सेशन करेंगे, फोटो देखना व खींचना. दोपहर का भोजन व आराम के बाद तेल का कुआं, चाय बागान, काली बाड़ी  तथा ट्रेनिंग सेंटर दिखाने ले जायेंगे. उसी शाम को एक घंटा भजन गायन व नृत्य. शुक्रवार सुबह चायनीज नाश्ते के बाद बाजार, दोपहर बाद एक पुरानी हिंदी फिल्म देखेंगे फिर जल्दी, कुछ विशेष पर हल्का भोजन करके उन्हें छोड़ने स्टेशन जायेंगे. यदि सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो ऐसा ही होगा. पीछे वाले घर में रहने वाली नैनी की लड़की की शादी है. शोर आ रहा है, काफी इंतजाम चल रहे हैं. कभी लगता है कि यह फिजूलखर्ची है, उधार लेकर खर्चा करना कहाँ की अक्लमंदी है फिर लगता है कि इसी बहाने परिवार एकत्र होता है. विवाह की अहमियत पता चलती है, खुशियाँ बढती हैं. पिछले दो-तीन सालों से उसकी बात पक्की थी पर लगन मुहूर्त ठीक नहीं मिलता रहा होगा. उसे उसके लिए उपहार निकाल कर रखना है. ध्यान में स्मरण आया कि उन्हें डाइनिंग टेबल के लिए रनर की जरूरत है. ध्यान में खाली होना होता है, उस शून्य में न जाने कहाँ से कोई ख्याल आ जाता है, धीरे-धीरे ध्यान की समझ बढ़ने लगी है. सबसे जरूरी है श्रद्धा तथा विश्वास उस सुहृद के प्रति, शेष सब अपने आप होने लगता है. उसकी कृपा तो प्रतिक्षण बरस रही है वह मन चाहिए जो सुमन हो ! जिसमें स्वयं के उद्धार की कामना जग गयी हो. जून आज जल्दी आने वाले हैं. कल रात उन्होंने कितनी सुंदर बात कही कि कहीं वही तो उसकी आत्मा नहीं है ? वह भी बदल रहे हैं, भक्ति का रंग उन पर भी चढ़ रहा है. सद्गुरु से दृष्टि मिली या नहीं पर उनकी कृपा अवश्य हो रही है. उसकी प्रार्थनाओं का असर भी..
दो बजे हैं दोपहर के, भैया-भाभी की फ्लाइट डिब्रूगढ़ में उतर चुकी होगी, और एक-डेढ़ घंटे में वे यहाँ पहुंच जायेंगे ! वे कितने दिनों से उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं. रिश्तों की मिठास अनोखी होती है. उसने उनके स्वागत के लिए तिलक व आरती का प्रबंध किया है. आज मौसम भी खुशनुमा है, चैत का पहला नवरात्र भी है. आज सुबह-सुबह एक नवरात्र अच्छी कविता पढ़ने को मिली. शायद तभी शब्द सहज ही उतर रहे हैं डायरी में-
भैया-भाभी आ रहे, बिटियों के संग आज
दिल में उठी उमंग का, एक यही तो राज !
छोटी भाभी साथ है, दुगना है उल्लास
पलक पांवड़े बिछ रहे, वन में खिला पलास !
दिल्ली व आसाम का, हुआ मिलन है आज,
शुभ दिन आया शुभ घड़ी, हुआ चैत आगाज !
सुमन खिले चहुँ दिशा में, ऋतु नरेश का राज
हर्षित है आराधिका, रेखा क्षितिज की लाल !

Saturday, July 16, 2016

गीत का जन्म


आज ध्यान में किसी ने पूछा कि वह ईश्वर को क्यों पाना चाहती है, क्या इसके पीछे यश की कामना है ? ईश्वर को क्या यश का साधन बनाया जा सकता है ? संतों का यश भी तो चारों दिशाओं में फैलता है, पर वे तो परमात्मा ही हो जाते हैं. उसका मन कामनाओं से मुक्त नहीं हुआ है. जो कुछ भी उन्हें इस जीवन में प्राप्त होता है, सब कर्मफल है, फिर उसका उपयोग वे जिस तरह करें वे नये कर्म उनके भविष्य की दिशा निर्देशित करते हैं. आत्मा में रहकर परमात्मा की निकटता का अनुभव करके भी यदि कोई संसार ही पाना चाहता है तो उसे सीधे रास्ते से ही जाना चाहिए. सद्गुरु क्या आये उसका कल्याण कर गये. पल भर के उस हाथ के स्पर्श में पता नहीं क्या था कि उसकी साधना जो बैलगाड़ी की गति से चल रही थी, जेट की गति में आ गयी है. भीतर कितना बदलाव आ गया है. मन अब नन्हे शिशु की तरह निरीह तकता है. बुद्धि अपनी मनमानी नहीं कर पाती. सद्गुरु को कल उलेमा को सम्बोधित करते सुना वे इराक़ गये थे, शिया और सुन्नी में मेल कराने, कल वह सीडी भी देखे, जिनमें यहाँ के उनके कार्यक्रम की रिकार्डिंग है. ‘मेरी दिल्ली मेरी यमुना’ के बारे में नेट पर पढ़ा सुना था, कल उनके मुख से सुना, कैसे एक व्यक्ति आत्मा की शक्ति को जागृत करके परमात्मा के समकक्ष पहुँच सकता है. परमात्मा की तरह प्रेम का सागर बन सकता है. परमात्मा की तरह समता व द्रष्टा भाव में रह सकता है. सत+चित+आनंद की मूर्ति उसके सद्गुरु को कोटि-कोटि प्रणाम !


कल दोपहर कुछ देर के लिए वर्षा थमी थी, शाम होते-होते बादल फिर घिर आये और इस समय घना घटाकाश छाया है. कल रात एक स्वप्न देखा. पहाड़ी कच्चे रस्ते से किसी के साथ जा रही थी कि पैर फिसलता है और वह नीचे गहरी खाई में जा गिरती है पर भूमि स्पर्श से पूर्व ही जैसे कोई शक्ति उठा लेती है और हवा में तैराते हुए ऊपर ले जाती है. गिरते समय भार की कमी महसूस हो रही थी और गुरुत्व का स्पष्ट अनुभव हुआ था, ऐसे ही चढ़ते समय भी...कितना स्पष्ट अनुभव था. भगवद्गीता में कृष्ण ने कहा है उनके भक्त का पतन नहीं होता. पता नहीं वह भक्त है या नहीं लेकिन वह उनसे प्रेम करती है. आज स्नान के बाद मन नृत्य कर रहा था, भीतर शब्द फूट रहे थे, फिर कदम भी थिरकने लगे, कुछ ऐसी पंक्तियाँ थीं- सद्गुरु का हाथ हो, झुका हुआ माथ हो तो क्या कहने..सद्गुरु का ज्ञान हो, अंतर का ध्यान हो..सद्गुरु का संग हो, उतरे न रंग हो..सद्गुरु की वाणी हो, गा गा के सुनानी हो..सद्गुरु सा मीत हो, उसके ही गीत हों..वह अपना सा लगे, जग सपना सा लगे..इस भजन या गीत की धुन अपने आप ही भीतर से फूट रही थी, जीवन में यदि परमात्मा का प्रेम हो तो जीवन उत्सव बन जाता है, वरना दुःख, चिंता, ईर्ष्या, द्वेष, बेचैनी तथा उलझनों में फंसे ही रहते हैं..एक को पा लें तो सब मिल जाता है. एक खो जाये तो सब कुछ होते हुए भी इन्सान खाली ही रह जाता है, परम ही वह अनमोल खजाना है जिसे हर कोई ढूँढ़ता फिरता है, उससे कम में उसे तृप्ति मिल भी कैसे सकती है..मिलनी भी नहीं चाहिए..

Thursday, July 14, 2016

लिटिल इंडिया - सिंगापुर


एक सुबह पैदल चलते हुए वे होटल से कुछ ही दूर स्थित ‘लिटिल इंडिया’ इलाके में पँहुच गए, जहाँ बड़ी संख्या में तमिल रहते है I अगरबत्ती तथा फूलोँ की सुगंध ने उन्हें मोह लिया I बंदनवार सजे थे, एक विशाल वैन में सीढ़ी पर सवार हो एक व्यक्ति सड़क पर बने द्वार पर तोरण सजा रहा था I भक्ति संगीत हवा में गूंज रहा था, पोंगल की तैयारी जोरशोर से हो रही थी I यहाँ के बाजार बिलकुल भारतीय बाजारों की तरह लग रहे थे I रविवार की संध्या को देखा, लिटिल इंडिया के पार्क तथा सडकों के किनारे के स्थान लोंगो से खचाखच भर गए हैं, पता चला कि सप्ताह में एक बार वे आपस में मिलकर सुख-दुःख बांटते है, तथा भारत आने-जाने वाले लोगों से धन या सामान मंगवाते-भेजते हैं I इसी तरह की भीड़ चाइनाटाउन में चीनी लोगों की होती है I चाइनाटाउन में प्राचीन बौद्ध व चीनी मंदिरों के साथ एक हिंदू मंदिर व मस्जिद भी है, यहाँ पुराने और नए का अद्भुत संगम है. १८२० में यहाँ पहला चीनी व्यापारी आया था, आज यह सिंगापुर का बड़ा व्यापारिक केन्द्र है I

उनकी यात्रा की अंतिम संध्या चायनीज तथा जापानीज़ गार्डन में बीती I यहाँ दो आकर्षक पगोडा तथा एक विशाल झील के चित्र उतारे I पश्चिमी सिंगापुर में स्थित ये विशाल बगीचे बोन्साई तथा सीमेंट के लैम्पों के लिये जाने जाते हैं I ‘चीनी नए वर्ष’ पर चायनीज गार्डन फूलोँ से सजाया जाता है तथा ‘मिड ऑटम फेस्टिवल’ पर सितम्बर में जापानीज़ गार्डन लैम्पों के प्रकाश से जगमगा उठता है I

दुनिया के हर कोने से सिंगापुर आने वाले यात्रियों के साथ गुजारे ये दिन एक सुखद स्मृति बनकर उन्हें जीवन भर गुदगुदाते रहेंगे ! यह शहर जैसे पर्यटकों को ध्यान में रख कर बनाया गया है I वे लौट आये हैं यादों का एक खजाना लेकर और एक सपना लेकर भी कि एक दिन भारत भी अपनी स्वच्छता, पारदर्शिता, ईमानदारी पर गर्व कर सकेगा I

भैया-भाभी के आने में तेरह दिन शेष हैं. वर्षा के कारण सफाई का कार्य रुक गया है, धूप की प्रतीक्षा है. उनका जीवन प्रतीक्षा में ही बीत जाता है. काम ज्यादा वे कर ही नहीं पाते. कल आइन्स्टीन पर लिखी किताब पढ़ी, आज भी पढ़ेगी. ईश्वर ने उसके मस्तिष्क को किसी खास काम के लिए गढ़ा था. ईश्वर हर एक को इस दुनिया में कुछ बनने के लिए भेजता है, उनके भीतर प्रतिभा का बीज छिपा होता है, उसे उगाना उनका काम होता है. वे छोटे-मोटे कामों में ही जीवन गंवा देते हैं, तब किसी काबिल का हाथ उनके सिर पर रुकता है और वे स्वयं को पहचान कर अपने समय का अधिक से अधिक सदुपयोग होने देते हैं, निखारते हैं बुद्धि को, शांत रखते हैं मन को तथा निर्भार होकर सहज कर्म करते हैं. यहाँ सिवाय आत्मा के कुछ भी अपना नहीं है. ये हाथ, पांव, मन, बुद्धि भी साधन  ही हैं तो इनके द्वारा काम भी तभी अच्छे होंगे जब भीतर आत्मा उनकी मालिक बन जाये. मन यदि पवित्र है तो आनंद का अनुभव होता है, यदि अपवित्र है तो दुःख का अनुभव होता है.

डाल्फिन का नृत्य


रात्रि का समय था नाईट सफारी का, सिंगापुर जू से सटा है नाईट सफारी पार्क, जहाँ रात में निकलने वाले जंगली जानवरों को चांदनी का भ्रम देते कृत्रिम प्रकाश में दिखाया गया I रात के अंधेरे में उनकी  ट्राम जंगल के बीच से गुजरते हुए एक रहस्यमय वातावरण का निर्माण कर रही थी I ४० हेक्टेयर के क्षेत्रफल वाला यह पार्क सौ से अधिक जातियों के लगभग एक हजार जंगली जानवरों को संरक्षण देता है I
सिंगापुर जू’ के समान ‘जुरोंग बर्ड पार्क’ भी एक दर्शनीय स्थान है I यहाँ उन्होंने ‘बर्ड्स एंड बडीज’ तथा ‘बर्ड्स ऑफ प्रे’ दो शो देखे, जिनमें कुशल प्रशिक्षक बाज, हॉक, फालकन तथा रंगबिरंगे तोतों द्वारा खेल दिखाते है I पक्षियों को उनके इशारों पर करतब करते देख सभी दर्शक रोमाचिंत थे I एक खास बात थी शो द्वारा दिया गया सन्देश – रीड्यूस, रीयूज, रीसाइकिल अर्थात पर्यावरण को साफ रखने के लिये हमें चीजों का इस्तेमाल कम करना चाहिए, दुबारा इस्तेमाल करना तथा व्यर्थ वस्तुओँ को पुनः इस्तेमाल के योग्य बनाना चाहिए I
‘जुरोंग बर्ड पार्क’ में  ६०० प्रकार के ९००० पक्षी प्राकृतिक वातावारण में रहते हैं I पैनोरेल में बैठकर  विशाल उद्यान देखा I यहाँ रंग बिरंगे तोते, शुतुरमुर्ग, पेलिकेन तथा सैकडों की संख्या में गुलाबी फ्लेमिंगो को झील में एक साथ निहारना सुखद अनुभव था I पेंगुइन के लिये आर्कटिक जैसा वातावारण था I  हमने डॉल्फिन शो का आनंद लिया, जिसमें चार गुलाबी रंग की डाल्फिनों ने नृत्य तथा गेंद के साथ अनोखे करतब दिखाए, दो छोटे काले रंग के ‘सी लायन’ भी प्रशिक्षक के इशारों पर कलाबाजी दिखाकर दर्शकों को अभिभूत कर सके I ‘अंडरवाटर वर्ल्ड’ में पानी के अंदर एक पारदर्शी सुरंग के द्वारा रंगबिरंगे कोरल, शार्क, स्टोन फिश, जेली फिश, ईल, आक्टोपस, समुद्री कछुए, सी लायन तथा अनेकों प्रकार के समुद्री जीव देखना एक रोमांचक अनुभव था I यहाँ दुनिया के सबसे ऊँचे मानव निर्मित झरने के सामने खड़े होकर फोटोग्राफी की I
सिंगापुर नाम है मस्ती का, समृद्धि का, मेहनत का, स्वच्छता और समन्वय का. यहाँ जिधर देखें लोग स्वस्थ, सम्पन्न व सहज नजर आते हैं I सड़कों के किनारे हरी घास के गलीचे हैं, पेड़ हैं, हरियाली हैI कंक्रीट के जंगल के बीच घास के हरे-भरे मैदान हैं I लोग मुस्तैदी से काम पर लगे हैं, थैंक्यू, सॉरी उनकी जबान पर चढ़े हैं I इन्सान की शक्ति की दाद देनी पड़ती है यहाँ के वैभव को देखकर. औरतें हर क्षेत्र में आगे हैं I दुनिया के सामने मेहनत, ईमानदारी व भाईचारे की मिसाल है यह मुल्क I

सिंगापुर के दक्षिणी भाग में स्थित ‘सेंटोसा द्वीप’ किसी युग में समुद्री डाकुओं की शरणस्थली हुआ करता था, जो बाद में ब्रिटिश सेना का अड्डा बन गया I आज यह पर्यटकों के लिए एक सुन्दर स्थान है, जहाँ भविष्य में एक थीम पार्क तथा युनिवर्सल स्टूडियो भी बनने वाला है I उन्होंने कई घंटे इस द्वीप पर बिताए I यहाँ भी एक विशाल सफ़ेद मर्लिन है I स्काईटावर पर चढ़ कर दूर तक फैले क्षितिज को देखा I ‘इमेज़ेज ऑफ सिंगापुर’ में पुरानी वस्तुओं तथा ध्वनि व प्रकाश की सहायता से इतिहास की यात्रा की I बच्चों के लिये यहाँ एक तितली पार्क तथा एक कीट पार्क है I यहाँ का मुख्य आकर्षण है ‘सौंग्स ऑफ द सी’ जहाँ अग्नि, जल तथा लेजर किरणों के माध्यम से आकाश में एक अद्भुत दृश्यजाल उत्पन्न कर दिया गया I एक कहानी के इर्दगिर्द बुना प्रकाश, रंगों व संगीत का ताना-बना, समुद्रतट पर बैठे सैकड़ों दर्शकों को एक अनोखे लोक में ले गया I बाद में पूरे कार्यक्रम का एक डीवीडी भी खरीदा I

Wednesday, July 13, 2016

सिंह का पुर - सिंगापुर


भारत में जब लोग सुबह की चाय पी रहे होंगे वे नहा धो कर सिंगापुर का डेढ़ सौ साल पुराना प्रसिद्द बोटैनिकल गार्डन देखने निकल पड़े I होटल से कुछ दूर ही MRT(Mass Rapid Transit)  स्टेशन था, जहाँ से एक मददगार स्थानीय महिला की सहायता से स्वचालित मशीन से जुरोंग ईस्ट की टिकट ली, वहाँ से बस द्वारा अपने गंतव्य पर पहुँचे I यूँ तो ६४ हेक्टेयर में फैला २००० ट्रॉपिकल पौधों का घर, झीलों में तैरते हंसों तथा मूर्तियों से सजा पूरा बगीचा ही दर्शनीय है, उन्हें सबसे अधिक आकर्षित किया ‘नेशनल ऑर्किड गार्डन’ ने, जहाँ रंगों की अनोखी छटा बिखरी हुई थी I कई दशकों से यहाँ ऑर्किड्स की हाइब्रिड किस्में उगायी जाती रही हैं I पीले रंग के हर शेड में, बैंगनी, लाल, गुलाबी, सफ़ेद, यानि कि सभी शोख रंगों में ऑर्किड्स का मानो एक खजाना था, जो मंत्रमुग्ध कर रहा था I यहाँ बच्चों के लिये भी एक आकर्षक पार्क है I जब घूमते-घूमते पैरों ने जवाब दे दिया तो वापस लौटे I उसी दिन कुछ विश्राम के बाद साइंस सिटी देखने निकले, जहाँ विज्ञान के आधुनिकतम विषयों को सैकड़ों नमूनों के द्वारा रोचक ढंग से दर्शाया गया है. जीनोम प्रदर्शनी, माइंड’स आई तथा काइनेटिक गार्डन दर्शनीय हैं I ओमनी थिएटर में सागरीय जीवों पर एक IMAX फिल्म देखी, जिसमें नाचते हुए सर्पों का दृश्य अनोखा था I


इतिहास बताता है कि युरोपियन सिंगापुर में आये इससे पूर्व यह मलय प्रायद्वीप का भाग था I १८१९ में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने ‘सर स्टैमफोर्ड रैफल्स’ (जिन्हें आधुनिक सिंगापुर का संस्थापक कहा जाता है व जिनकी श्वेत संगमरमर की प्रतिमा उन्होंने सिंगापुर रिवर के तट पर सिटी टूर के दौरान देखी) के नेतृत्व में एक व्यापारिक केन्द्र स्थापित किया, जो बाद में ब्रिटिश हुकूमत का एक प्रमुख आर्थिक तथा सामरिक केन्द्र बन गया I द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कुछ समय के लिये जापानियों के अधिकार में चले जाने के अलावा सिंगापुर १९६३ तक ब्रिटेन का भाग रहा, तब यह मलेशिया में शामिल हो गया, किन्तु दो वर्षों के बाद १९६५ में स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में कॉमनवेल्थ तथा UNO में दाखिल हुआ I आज अमीर देशों की सूची में सिंगापुर का स्थान विश्व में पाचवां तथा एशिया में तीसरा है I दिल्ली की आबादी से तिहाई आबादी वाला तथा क्षेत्रफल में आधे से भी कम वाला यह शहर-राष्ट्र दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बना चुका है I यह ६३ छोटे-छोटे द्वीपों से मिल के  बना है, जुरोंग तथा सेंटोसा द्वीप अपेक्षाकृत बड़े हैं I एक वर्ष में यहाँ लगभग १० मिलियन पर्यटक आते हैं I यहाँ का मुख्य आकर्षण है सुंदरता तथा मेहमाननवाजी I यह पर्यटकों के लिये पूर्णतया सुरक्षित स्थान है I यहाँ चीनी, भारतीय, मलय तथा युरेशियन लोग रहते है, मंडारिन, तमिल, मलय तथा अंगरेजी यहाँ की राष्ट्रीय भाषाएँ है I सिंगापुर में वाहनों की संख्या बहुत अधिक है, इसके बावजूद यहाँ प्रदूषण नहीं है I सारा शहर एक बगीचा नजर आता है, हरा-भरा तथा साफ-सुथरा I

अगले दिन वे सिटी टूर पर निकले I आर्ट हाउस, पार्लियामेंट हाउस, विक्टोरिया थिएटर, फुलर्टन होटल देखते हुए वे मर्लिन पार्क में रुके, जहां अर्धमत्स्य तथा अर्धसिंह के रूप में ८.६ मीटर ऊँचा श्वेत मर्लिन का बुत है I सिंगापुर का अर्थ ही है सिंह का पुर या नगर, सिंह की एक विशाल मूर्ति सेंटोसा द्वीप में भी है I नेशनल म्यूजियम, एस्प्लेनेड पार्क, वार मेमोरियल पार्क, चाइना टाउन, जेम फैक्ट्री अदि दिखाने के बाद फ्रांसिस उन्हें सिंगापुर फ्लायर ले गया, १६५ मीटर ऊँचा यह व्हील लन्दन के व्हील से भी ऊँचा है I ऊँचाई से सागर में लंगर डाले अनेकों जहाज देखे I सिंगापुर पोर्ट दुनिया के व्यस्ततम पोर्ट्स में से एक है I यह विश्व का चौथा विदेशी मुद्रा विनिमय केंद्र है I सिंगापुर रिवर ‘मरीना बे’ में सागर से मिलती है, यहाँ स्थित है आधुनिक वास्तुकला का बेजोड़ नमूना एस्प्लेनेड थिएटर, जिसके विशाल कंसर्ट हॉल में एक शाम पश्चिमी शास्त्रीय संगीत सुना, वह एक अविस्मरणीय अनुभव था I