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Thursday, July 21, 2016

हिमाचल के बाशिंदे


पिछले दिनों उसने आर्ट ऑफ़ लिविंग से जुड़े स्वामी मधुसूदन(हनी) की कहानी उनकी जुबानी सुनी और फिर शब्दों में उतारी. बहुत रोचक है. वह हिमाचल के बाशिंदे हैं I पिताजी व्यापारी हैं I वे दो भाई हैं I मधु छोटे हैं, उनके अनुसार स्कूल तथा कॉलेज में वह बहुत शरारती छात्र हुआ करते थे I कुछ मित्रों का एक गैंग था, जो धमाचौकड़ी मचाने में सबसे आगे रहता था I अन्य छात्रों की ऐसी परेशानियों को हल करने का भी उन्हें शौक था जिसमें कुछ दादागिरी करने का मौका मिले I बड़े भाई से सदा उनकी स्पर्द्धा चलती रहती थी I वह जो करते वही मधु भी करना चाहते I ऐसे तो अध्यात्म में कोई विशेष रुचि नहीं थी, यहाँ तक कि टीवी पर कोई दाढ़ीवाले बाबाजी प्रवचन दे रहे हों तो वह चैनल बदल देते थे I किसी बाबा की आँखों में नहीं देखते थे इस डर से कि कहीं वह सम्मोहित न कर दें, लेकिन एक बार जब वह कुछ दिनों के लिये बाहर गये, भैया ने ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ का बेसिक कोर्स कर लिया, लौटे तो उन्होंने भी कोर्स करने की जिद की I पिताजी ने कहा तुम अभी छोटे हो, २० वर्ष के होने पर ही कोर्स कर सकोगे पर वह इतनी प्रतीक्षा नहीं कर सकते थे, सो फार्म में अपनी उम्र ज्यादा लिखवा कर चले गये I कोर्स में कुछ समझ में नहीं आता था I हर दिन कुछ गृहकार्य दिया जाता था, वह भी नहीं किया, लेकिन सुदर्शन क्रिया करने के बाद भीतर कुछ ऐसा परिवर्तन हुआ जो शब्दों में कहा नहीं जा सकता I मधु जब छठी-सातवीं का विद्यार्थी था तो अक्सर मन में कई विचार उठते थे..... इस सामान्य से प्रतीत होने वाले जीवन के पीछे अवश्य कुछ और भी है... केवल खाना-पीना, पढ़ना और सो जाना मात्र इतना ही तो जीवन का उद्देश्य नहीं हो सकता..... मन में प्रश्न भी उठते थे कि कौन सी शक्ति इस ब्रह्मांड का नियंत्रण कर रही है? मन में इतने विचार कहाँ से आते हैं? जीवन में एक नियमितता कहाँ से आती है? लगता था कि कई बातें एक अंतराल के बाद पुनः घटित हो रही हैं, लेकिन कारण समझ से बाहर था I इन सवालों का जवाब खोजने निकला तो शिक्षकों व मातापिता दोनों ने कहा इस उम्र में ऐसी बहकी-बहकी बातें क्यों करते हो, पढ़ने में मन लगाओ I धीरे-धीरे मन में सवाल उठने बंद हो गए और वह अपनी सामान्य दिनचर्या में व्यस्त हो गये I

सन् २००२ की बात है गुरूजी हिमाचल आ रहे थे, सत्संग स्थल निवास से आधे घंटे की दूरी पर था I जब मित्रों ने कहा सत्संग चलते हैं तो पहले तो मना कर दिया क्योंकि एक तो पिताजी कहीं भी आसानी से जाने नहीं देते थे, दूसरे उन्हें डर था कि सत्संग में जाने से इमेज खराब हो जायेगी, लोग क्या सोचेंगे? कौन उनसे मदद माँगने आयेगा? पर मित्रों ने जोर दिया और किसी तरह पिताजी को राजी कर वहाँ पहुँचे I गुरूजी के आने से पहले मंच पर बायीं ओर बैठ गये बल्कि यह कहना सही होगा कि उन्हें बैठा दिया गया I मन में तर्क-वितर्क चल रहे थे I लोग भजन गा रहे थे और मस्त थे, तार्किक बुद्धि ने सोचा बिना किसी कारण ये इतने प्रसन्न क्योंकर हैं ? तभी गुरूजी का प्रवेश हुआ, वे हाथ में पकड़ी माला को घुमाते हुए लगभग नाचते हुए से आये और आसन पर आराम से बैठ गए I बुद्धि ने कहा कि सत्संग में बड़े-बड़े वीआईपी आये हैं, गुरूजी उनको सम्बोधित करके जरूर कोई गूढ़ ज्ञान की चर्चा करेंगे किन्तु यहाँ तो बात ही कुछ और थी I एकदम अनौपचारिक ढंग से गुरूजी ने पूछा, ‘हाँ, सब कैसे हो? खुश हो? सबने ‘हाँ’ में उत्तर दिया, मन में विचार चलने लगे कैसे गुरु हैं यह?, कि तभी वे मधु की दिशा में पलटे एक पल रुके, फिर सामने देखा.. अगले ही पल फिर पलटे और उंगली से अपनी ओर आने का इशारा किया I सामने जो मित्र था उसे कहा, जाओ गुरूजी तुम्हें बुला रहे हैं, शायद उन्हेँ पानी चाहिए वह गया और लौट आया, गुरूजी ने फिर कहा, नहीँ तुम इधर आओ मेरी बायीं ओर दूसरे मित्र थे उन्हें मंजीरे देकर भेज दिया, पर गुरूजी ने कहा, तुम जो चश्मा लगाये हो इधर आओ, इधर-उधर देखा यकीन नहीं हो रहा था कि उन अनजान को वह क्यों बुला सकते हैं I डरते-डरते उनके पास गया, उन्होंने पूछा, हाँ, हनी कैसे हो? कुछ बोलना चाहा पर जवाब तो कुछ सूझा नहीं, भीतर प्रश्न उठा, आप को मेरा नाम किसने बताया? गुरूजी ने फिर कुछ सामान्य प्रश्न किये, खुश हो? पढ़ रहे हो? बिजनेस भी कर रहे हो? धीरे-धीरे मन संयत हुआ और जवाब दिए पर तार्किक मन भीतर सवाल कर रहा था हजारोँ लोग बैठे हैं और गुरूजी इतनी साधारण बातें कर रहे हैं I अंत में उन्होंने आश्रम आने का निमंत्रण दिया, घबरा कर ‘हाँ’ में सर हिला दिया I अपनी जगह आकर बैठे तो लगा जैसे कोई स्वप्न देखा हो, लेकिन भीतर कुछ बदल गया था I सत्संग के बाद घर पहुँचे तो कितने ही दिनों तक गुरूजी की याद बनी रही फिर अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो गये I

Tuesday, January 20, 2015

“निर्भव जपे सकल दुःख मिटे”


जीवन में सरलता, सरसता और मृदुता हो, मन में आनंद और भगवद प्रेम हो ! कृष्ण जीवन का केंद्र हो तो यह सब अपने आप ही होने लगता है. नव वर्ष का शुभारम्भ हो चुका है. कल प्रथम दिन मित्रों के साथ बिताया. परिवारजनों से फोन पर शुभकामनाओं का आदान-प्रदान हुआ. परिवार ने संग-संग खरीदारी की. एक शांत और सुखद दिन के बाद अच्छी गहरी निद्रा और प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर ‘क्रिया’. जीवन में गुरू की उपस्थिति होने से सुख और शांति को कहीं खोजने नहीं जाना पड़ता, वह उसी तरह सहज प्राप्य है जैसे हवा और धूप !  टीवी पर ‘जागरण’ सुना, ज्ञान मन को भावना के स्तर पर ले जाता है और मन अपने आप गुनगुनाने लगता है. अंतर में छिपा वह जादूगर मुखर हो उठता है, जैसे तरंगों का आधार शांत जल है वैसे ही मन में उठने वाले विचारों का आधार वही अचल है. वही जो हमें अभय प्रदान करता है. उसका नाम हर श्वास से जुड़ा है. न मरने का भय हो न जीवन के प्रति आसक्ति हो तो ही कोई सच्चा जीवन जी सकता है. जीने की कला उसी कलाकार से सीखनी है जो चिंतन से परे है लेकिन मन को चिन्तन करना सिखाता है. “निर्भव जपे सकल दुःख मिटे” उस अकाल पुरुष को जपने से जीवन उत्सव बन जाता है, प्रेम रक्त बन कर तन में प्रवाहित होने लगता है. उल्लास के पुष्प हृदय में पल्लवित होते हैं. जीवन में निर्भयता और सत्य हो, अंतर में विश्वास हो तो नित्य नवीन रस का उदय होता है, शुभ व्यक्ति को निर्भीक बनाता है और अशुभ को भयभीत करता है.

आज सुबह ध्यान में कृष्ण ने उसे आश्वासन दिया और वह उसके परम हितैषी हैं. उसके अनंत रूप हैं, अनंत नाम हैं और वह अनंत सुख का स्रोत है. वह कहते हैं धर्म की रक्षा करने वाले की रक्षा धर्म करता है. कामना जब हृदय में उठती है तो रिक्त स्थान बन जाता है मानव उसकी पूर्ति करना चाहता है पर यह आवश्यक तो नहीं कि वह रिक्तता भर ही जाये. बाहर से सुख भरने की लालसा ही बताती है कि भीतर रिक्तता है, यदि भीतर का सुख बाहर देने की कला आ जाये तो...ऐसा अद्भुत ज्ञान देने वाला कान्हा, जिसका जन्म और कर्म दिव्य है उसका प्रिय है. कृष्ण ने स्वयं कहा है कि जो उससे प्रेम करता है वह उसे उतना ही प्रेम करता है. उसका प्रेम वह पल-पल महसूस करती है. सारे सुख-दुःख नष्ट हो गये हैं, उहापोह नष्ट हो गया है. उसका नाम कभी भूलता नहीं, मन उसमें रमने लगा है. ‘महासमर’ में कृष्ण का चरित्र अद्भुत है. भीष्म पितामह, युधिष्ठिर, अर्जुन और कुंती सभीके हृदय प्रेम से भर उठते हैं जब कृष्ण उनसे मिलते हैं, बातें करते हैं या उनका जिक्र होता है. गुरुमाँ उसी जादूगर के गीत गाती हैं, ‘जोगिया’ कहकर उसे ही बुलाती हैं. उसने पिछले दिनों नन्हे और जून में भी उसके दर्शन किये यहाँ तक कि कभी-कभी उसकी आँखों में भी उसी की छवि दिखती है. वह अनुपम हैं, सर्वज्ञ हैं, आदि हैं, स्वामी हैं, सूक्ष्मतर हैं, धारक हैं, अचिन्त्य हैं, प्रकाशमान हैं, ज्ञानी हैं. ऐसे भगवान का उन्हें ध्यान करना है, जिससे क्रमशः वे उनके रूप का दर्शन करने में उनके निकट आने में सक्षम हों सकेंगे, वह उनके अंतर में ही हैं पर वे उन्हें देख नहीं पाते, उनकी निकटता भीतर उन्हीं के गुणों को भरने लगेगी लेकिन उन्हें गुणों का नहीं उनका लोभ है !

नित्य सुख, नित्य ज्ञान, नित्य आनंद उनकी मूलभूत आवश्यकता है, जिसकी पूर्ति सत्संग से होती है. अन्य आवश्यकताओं की भांति उन्हें सत्संग की ओर भी वही ले जाता है, वह उन्हें उनसे ज्यादा जानता है. उनकी उन्नति की उसे उनसे अधिक परवाह है. वह जिससे प्रसन्न होता है उसे सांसारिक आकर्षणों से वियुक्त करता है और जिससे रुष्ट होता है उनके तमोगुण व रजोगुण की वृद्धि देता है. वह उसकी कृतज्ञ है, आभारी है वैसे शब्दों से इस भाव को व्यक्त नहीं किया जा सकता जो वह उसके लिए अनुभव करती है कि उसने उसे सात्विक भावों का आदर करने की क्षमता दी. उसे सहज ही सत्य और अहिंसा प्रिय है, यह उसी की कृपा है. महाभारत में कृष्ण अर्जुन के कई प्रश्नों का उत्तर देते हैं. धर्म-अधर्म, नया-अन्याय, कर्म-अकर्म आदि पर आधारित उसकी कई उलझनों को सुलझाते हैं. पढ़ते समय ऐसा प्रतीत होता है कृष्ण उससे ही बातें कर रहे हैं. वह उसे बेहद अपने लगते हैं ऐसा तो इस भौतिक जगत में कोई भी नहीं लगता. बाल्यावस्था से कई बार उसके मन में यह विचार आया है कि इस दुनिया में वह पूर्णत अकेली है कि वह किसी पर भी निर्भर नहीं हो सकती, सिवाय स्वयं के. उसकी अपनी दुनिया थी जो उसने स्वयं ही बनाई थी पर अब उस उस दुनिया में कृष्ण ने अपना अधिकार कर लिया है और इससे उसके सांसारिक संबंध और भी दृढ़ हुए हैं, उनका महत्व समझ में आने लगा है.