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Sunday, February 10, 2019

वसंत पंचमी



पिछले चार दिन डायरी नहीं खोली. अद्भुत थे ये चार दिन ! शनिवार को नन्हा अपने मित्रों के साथ आया. इतवार की सुबह सभी पिकनिक पर गये, शाम को भावी वधू के माता-पिता भी आ गये. सोमवार को सभी कोर्ट गये. शाम को घर पर छोटा सा आयोजन किया. सभी कुछ भली प्रकार हो गया. मंगलवार को सब वापस चले गये. कल बुध को सरस्वती पूजा थी, दोनों स्कूलों में होने वाली पूजा में शामिल हुई. इसके बाद दो वर्ष ही और हैं जब वह यहाँ वसंत पंचमी के उत्सव में शामिल हो सकती है. बंगाल और असम के अतिरिक्त भारत के अन्य भागों में पूजा के पंडाल लगाने की प्रथा नहीं है. आज भतीजी का विवाह है और भांजी का जन्मदिन भी ! उसके लिए कविता लिखी. अगले हफ्ते यात्रा पर निकलना है. उसने मन ही मन उपहारों की सूची बनाई, बड़े व छोटे भाई के लिए डायरी व पेन, भतीजी के लिए साड़ी, छोटी भाभी के लिए स्टोल, बड़ी बुआ व चाची जी के लिए शाल, बच्चों के लिए चाकलेट्स, किताबें व पेन, चचेरी बहन के लिए सलवार सूट. अभी कोऑपरेटिव जाना है, एक सखी की बिटिया का कल जन्मदिन है, उसके लिए भी उपहार लेना है.

शाम के सात बजे हैं. अभी कुछ देर पूर्व योग कक्षा समाप्त हुई. जून ‘रईस’ देखने गये थे, पर थोड़ी ही देर में लौट आये. दोपहर बाद उस सखी के घर गयी जिसकी बिटिया का दसवां जन्मदिन है, घर में सजावट चल रही थी. सुबह मृणाल ज्योति में बच्चों को योग कराया, उसके बाद तन-मन बेहद हल्का लग रहा था. कल सुबह एक पल में मन के विचलन को देखा फिर परिवर्तन किया, जादू जैसा लगा. कल रात्रि पल में जीने का सूत्र नींद में भी याद आ रहा था. चेतना कितनी शक्तिशाली है कि एक क्षण में इतने बड़े ब्रह्मांड को एक साथ महसूस कर सकती है. हर क्षण अपने भीतर एक अनंत को छिपाए है. भीतर अनंत शांति है. आजकल साधना का समय घट गया है, पर मन में स्थायी शांति का वास है, जो हर समय एक रस ही लगता है. भतीजी का विवाह व रिसेप्शन कल दोनों हो गये. तस्वीरें देखीं. मार्च में कुछ दिनों के लिये वह विदेश जाएगी.

रात्रि के आठ बजे हैं. मौसम अब ठंडा नहीं रह गया है. कमरे में बिना स्वेटर पहने रहा जा सकता है. टीवी पर उत्तर प्रदेश के चुनावों के समाचार आ रहे हैं. शामली में रेत के अवैधानिक खनन के समाचार बताये जा रहे हैं. आज जया एकादशी है. जून दोपहर को डिब्रूगढ़ गये थे, नन्हे के विवाह का सर्टिफिकेट मिल गया है. समधियों को फोन किया. जून अगले हफ्ते गोहाटी में उनसे मिलने वाले हैं. दोपहर को ब्लॉग पर एक पोस्ट प्रकाशित की, आजकल लेखन बहुत कम हो गया है. यात्रा के दौरान छूट ही जायेगा. परसों वे पड़ोसी के यहाँ गये थे, उनकी बिटिया का विवाह होने वाला है, उनके न रहने पर वे मेहमानों को उनके घर में ठहरा सकते हैं, ऐसा प्रस्ताव भी दिया. कल वह उन्हें बुलाकर मेहमानों का कमरा दिखा देगी, जिससे उन्हें बाद में आसानी हो. परसों उसे यात्रा पर निकलना है. पैकिंग हो गयी है.  


Saturday, August 1, 2015

सत्तू की कढ़ी



आज वसंत पंचमी है. भीतर गीत गूँज रहा है. सद्गुरू के आने पर कैसे जीवन में बसंत छा जाता है, सुख-दुःख की शीतलता व गर्मी नहीं सताती, सद्विचारों के पुष्प खिल उठते हैं और प्रेम की मंद बयार बहने लगती है. साधक के भीतर सारा वर्ष बसंत ही बसंत छाया रहता है, कैसा अनोखा चमत्कार छिपा रहता है गुरू कृपा में..  पंछियों का कलरव जो बाहर गूँज रहा है वह भीतर भी गूँजने लगता है. मन ठहर जाता है, जैसे वसंत में दिन-रात बराबर होते हैं वैसे ही भीतर हानि-लाभ समान ही हो जाते हैं. आज ध्यान करने बैठी तो जब विधि को याद कर रही थी तो कोई भीतर से बोला, जब मैं तेरे सम्मुख हूँ तो तू विधि के माध्यम से मुझे खोजना क्यों चाहती है”, साध्य यदि सम्मुख हो और कोई साधन के पीछे पड़ा रहे तो मूर्खता ही कही जाएगी, तो ध्यान में जिस परमात्मा तक पहुंचना है, वह यदि आँख मूंदते ही सामने आये तो उसे परे हटाकर कोई विधि का पालन करने बैठ जाये फिर उसका पालन करते-करते तत्व तक पहुंचे तो उसे क्या कहा जायेगा ? परमात्म तत्व तो सहज प्राप्य है, वह तो हर जगह है, वह सर्वसमर्थ है, सर्वज्ञ है, तो उसे कोई जिस भाव से भजता है वह क्या इसे जानता नहीं, वह तो सब जानता है. भीतर जो चेतना है वह उसी का अंश है. सागर क्या जानता नहीं कि बूंद भी जल से ही बनी है. वह तो परम चेतन है, उसे महसूस करना ही काफी है. वह हमें अपने भीतर मिलता है, प्रकाश के रूप में और फिर मात्र बोध के रूप में, उसे पुकारें तो वह झट आता है क्योंकि वह उस पुकार उठने से पूर्व से ही जानता है. वह मन के भावों को जानता है, वह जन्मों का मीत है, वही तो है जो एक से अनेक होकर खेल रहा है !

आज उसे लग रहा है, भीतर एक विरोधाभास है. भावनाओं और कर्मों का मेल नहीं है. भावनाएं पवित्र हैं पर क्रियाएं अशुद्ध हैं. भीतर शांति है पर मन में हलचल है. जो कुछ भी ऊपर हो रहा है, वह उसे छू भी नही सकता. पर जो उसे नहीं छू सकता जरूरी तो नहीं कि वह किसी अन्य को भी न छुए. किसी को दुःख देकर तो उद्धार नहीं हो सकता. आज सुबह सद्गुरु को सुना, सीधे, सरल शब्दों में तथा सहज आनन्द के साथ वह सारे शब्दों के जवाब दे रहे थे. बच्चों जैसा सरल विश्वास और अपनापन, भोलापन और साथ ही अभूतपूर्व ज्ञान.. इन दोनों का अद्भुत सम्मिश्रण है उनमें ! पिछले दो दिनों की तेज धूप के बाद आज धूप बादलों के पीछे छिप गयी है. नन्हे से कल बात हुई, वह बैंगलोर नहीं जा रहा है, पढ़ाई का बोझ ज्यादा है. इसी महीने परीक्षाएं भी हैं. आज उसने पहली बार बेसन की जगह सत्तू डालकर कढ़ी बनाई है, जून को अवश्य पसंद आएगी. कल सासूजी पड़ोस में ‘सरस्वती पूजा’ देखने गयीं, उनकी जान-पहचान यहाँ धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है. उन्हें भी मौन का अभ्यास होता जा रहा है. वह अति आवश्यक होने पर ही शब्दों का प्रयोग करती है. उसके भीतर क्या चल रहा है ध्यान इसी तरफ रहता है. बाहर की तरफ ध्यान ज्यादा जाता नहीं. इसी को अन्तर्मुखता कहते हैं.


उसकी भाषा मधुर नहीं है, कितनी ही बार उसे इस बात का अनुभव हुआ है पर वह स्वयं को सुधारने के लिए कुछ भी नहीं कर रही है. जैसे कोई गंदगी को देखे और बस देखता रहे, झाड़ू लाकर उसे साफ न करे. तब कैसे कमियां उसके भीतर से दूर होंगी और कैसे वह परमात्मा के ज्ञान की अधिकारिणी बनेगी, कैसे वह उस परम आनंद को प्राप्त करेगी जो संतों की धरोहर है. सद्गुरु पुकार- पुकार कर कहते हैं, ‘विनम्र बनो’ पर वह तो अपनी हेकड़ी में ही रहती है. सारी दुनिया का मालिक उसका अपना है इसका घमंड कम तो नहीं होगा, वह एक अख्खड़ मस्ती का अनुभव करती है, अपनी ही मस्ती व खुमारी में खोयी वह अपना ही अनिष्ट कर डालती है ! जीवन के इस नाटक में वह इतनी खो जाती है कि असलियत को ही भूल जाती है. आज जून को दिल्ली जाना है, दो दिनों के लिए.     

Friday, November 22, 2013

वसंत पंचमी


आज ‘सरस्वती पूजा’ है यानि वसंत पंचमी, गुरुदेव रवीन्द्रनाथ के शांति निकेतन में इस दिन को बहुत उल्लास से मनाते हैं, ऐसा उसने कई जगह पढ़ा है, पीले वस्त्रों में सजी बंगाली बालाएं रवीन्द्र संगीत पर नृत्य करतीं व रंग उड़ाती कितनी आकर्षक लगती होगीं. नन्हे का स्कूल आज बंद है, और इस वक्त वह अपने एक सहपाठी ‘लामा’ के साथ ‘सरस्वती पूजा’ देखने गया है, बाहर बच्चों के झुंड, खासतौर से छोटी लडकियां साड़ी, लहंगा पहने पूजा देखने आ जा रही हैं. सुबह एक स्वप्न देख रही थी फिर अलार्म सुनाई पड़ा, आज ‘कुकड़ू कूं’ की जगह ‘धत तेरे की’ सुनाई पड़ रहा था. नन्हे की लापरवाही की वजह से उसे आज डांट खानी पड़ी, वह इतना क्रोध कर सकती है अब सोचकर ही अजीब लग रहा है, उस वक्त भी मन में यह विचार आ गया था कि क्रोध उन दोनों के लिए हानिकारक है, पर कभी-कभी वह इतना नासमझ बन जाता है कि...वैसे आमतौर पर समझदारी भरे काम ही करता है. कल शाम खेलते समय जून भी क्रोधित हो गये थे, जब वह  अच्छा नहीं खेल रही थी, इसका अर्थ यह हुआ, उसे जो मिला उसने आगे बढ़ा दिया, क्या हर बार हमारे क्रोध का कारण यही तो नहीं होता. कल रात जून ने कहा, उन्हें वसंत पंचमी के दिन बचपन में घर पर बनने वाला भोजन खाने का मन है, सो आज उनका मीनू है, चने की दाल की भरवां रोटी, चावल की खीर, साथ में उनके बगीचे में उगी पत्ता गोभी की सब्जी.

कल नन्हा दो बार सरस्वती पूजा देखने गया, तिलक लगाकर लौटा, उसने नहाए बिना ही पूजा भी कर ली, असत्य कहते समय उसे थोड़ी भी हिचकिचाहट नहीं हुई, अपनी सुविधा के लिए छोटे-मोटे झूठ बोल लेने चाहिये, जिससे किसी का कोई नुकसान न हो, ऐसा वह घर में उनसे ही सीखता आया है. आजकल यहाँ आकाश में दिन में कई बार फाइटर प्लेन उड़ते रहते हैं. नन्हा अक्सर बाहर जाकर उन्हें देखने का प्रयत्न करता है, मशीनों से उसका लगाव है. उसने बगीचे में झांककर देख, शाम को पानी देना होगा, माली आज सातवें दिन भी नहीं आया है, उस दिन फूलों के पौधे लाने के लिए पैसे लेकर गया था, शायद वह पैसे उसने कहीं और खर्च कर दिए या फिर बीमार पड़ गया हो.

“वैलेंटाइन डे”, सुना और पढ़ा है कि इस नाम के एक सन्त हुए थे, जो राजा क्लाडियस के हुक्म के बावजूद सिपाहियों की शादी करवाया करते थे. जो भी हो यह प्यार की स्मृति दिलाने का दिन है, पति-पत्नी हों या प्रेमी-प्रेमिका. अभी कुछ देर एक साधु बहुत मालाएं वगैरह पहने और एक औरत पड़ोसिन के घर से निकले, उसे लगा कहीं उनके घर न आ जाएँ, पर वे नहीं आये. कल उसने ‘राजा हिन्दुस्तानी’ देखी, अच्छी फिल्म है. आज क्लब में लेडीज क्लब का विशेष कार्यक्रम ‘हसबैंड नाईट’ है पर जून को वहाँ जाना पसंद नहीं है, वैसे ठीक भी है, अगर ख़ुशी न मिले तो जाने में कोई तुक नहीं. आज जून ब्रह्मपुत्र मेल में उनकी टिकट बुक कर आये हैं यानि की यात्रा पर जाने में एक महीना शेष है.

आज धूप ने दर्शन दिए हैं, सुबह गेट का ताला खोलने गयी तो सामने चाय बागान के ऊपर हल्के गुलाबी बादल दिखाई दिए, पतझड़ में झड़ गयी पत्तियों के कारण काले हो गये पेड़ और सलेटी आकाश, एक सुंदर दृश्य था. ‘जीवन यदि कुछ मूल्यों पर आधारित हो तभी सच्चे सुख का अनुभव किया जा सकता है’, कुछ देर पहले टीवी पर ब्रह्मकुमारी प्रजापति ईश्वरीय ज्ञान संस्था की हीरक जयंती के अवसर पर हुए मुख्य कार्यक्रम के कुछ अंश देखे, उसे विवाह पूर्व अपने घर के उस कमरे की याद हो आयी जब मंझला भाई ब्रह्म कुमारी आश्रम जाकर वहाँ से पुस्तकें तथा वहाँ के सिखाये योग, क्रियाओं आदि के बारे में बताता था. सामने एक मोमबत्ती रखकर उसकी ओर देखकर ध्यान करता था. ‘राजयोग’ आदि शब्द सम्भवतः तभी प्रथम बार उसने सुने थे. कल दीदी व काकू से बात की, उन्होंने कल ही उसे पत्र भी लिखा है, टेलीपैथी इसे ही कहते हैं.






Thursday, February 14, 2013

सरस्वती पूजा



ईश्वर उसके साथ है, आज वह ठीक है, अब सोचती है तो लगता है व्यर्थ ही वह अपने को और जून को परेशान कर रही थी. कल रात भी यही चिंता करते-करते कब सो गयी पता नहीं, नन्हा आज फिर सुबह जल्दी में पूरा नाश्ता खाकर नहीं गया, शाम को ही उसे पौष्टिक आहार देना होगा. कल माँ-पिता का पत्र आया था, एक बार फिर पढ़ेगी, कल उदास मनोस्थिति में पढ़ा था, आज उसका रंग ही और होगा. आज उसने नन्हे से पूछा, उसे एक भाई या बहन चाहिए, हमेशा की तरह उसका जवाब नहीं में था, जैसे उसका और जून का होता है. उन तीनों के अलावा किसी की गुंजाईश नहीं उनके छोटे से परिवार में. अब वह जल्दी घर आ जाएँ तो कितना अच्छा हो, वे दोनों साथ-साथ उदास नहीं थे तो क्या, साथ-साथ खुश तो हो लें.

कल दोपहर जून उसे प्रसन्न देखकर खुश थे, वह ज्यादा कुछ कहते नहीं हैं, उसे लगता है वह उसके दुःख से उदासीन हैं, पर वे भी गहराई से महसूस करते तो हैं, ऐसा उसे लगा. कल पड़ोस के बच्चे को स्कूल में चोट लग गयी, उसे हॉस्पिटल ले जाना पड़ा. छुट्टी के एक घंटे के बाद नन्हा भी घर नहीं पहुंचा तो उसे चिंता होने लगी, जून से भी सम्पर्क नहीं हो पा रहा था. फिर साढ़े चार बजे वह आया तो मन शांत हुआ, बस आने की वजह से कुछ बच्चे वहीं खेल रहे थे, यहाँ एक विज्ञान कांफ्रेंस चल रही है, उसी वजह से बस देर से पहुंची. उसने नन्हे के एक दूसरे मित्र के यहाँ फोन किया, वह भी पहली बस में आ चुका था, उसकी आवाज में चिंता देखकर मित्र की माँ भी आ गयी.

जून आज जोरहाट गए हैं, लंच पर नहीं आएंगे, पर उनकी याद आयेगी. मन का भी यह कैसा अजीब रंगीन करिश्मा है कि जब तक वह पास रहते हैं वह बेवजह ही रुठ जाती है, उन्हें तंग करती है पर जब दूर होते हैं...कल इतवार था, दूरदर्शन पर उसने एक अच्छी मराठी फिल्म देखी, नन्हा जी.आई.जो. से खेल रहा था, जून सो गए थे. दीदी की बताई एक फिल्म भी उन्होंने देखी, ‘प्राब्लम चाइल्ड’ हल्की-फुल्की हास्य फिल्म है. कल व परसों भी वह अपने एक सहकर्मी को कार चलाना सिखाने गए, मित्रों के काम आते हैं वह, उनमें सभी के सहयोग की बहुत भावना है. पिता ने नए घर का पता लिखा है, अब छोटे भाई व उन्हें अलग-अलग पतों पर खत लिखने होंगे. उनके घर के बायीं ओर का घर कई दिनों से खाली पड़ा था, उसमें शामियाना लग रहा है, अगले हफ्ते कोई शादी है वहाँ.

कल छब्बीस जनवरी थी, आज वसंत पंचमी है. नन्हे का स्कूल बंद है, आज फिर उसने पेन्सिल से बड़े-बड़े शब्दों में लिखा है कुछ- “आज सरस्वती पूजा है, इस डायरी में मैंने पहले लिखा है कि यह माँ की है, पर आज मैं फिर इसमें लिख रहा हूँ,” परसों दोपहर को उसकी बंगाली सखी आयी थी, शाम तक रही, उसकी बहन के तलाक केस के बारे में सुनकर मन बहुत बेचैन रहा. उन लोगों के साथ बहुत सारी दुखद बातें घटी हैं, पर वह बहुत साहसी है. उसने बताया कि उसे लगता है उसे पति वक्त से पहले अपने को प्रौढ़ समझने लगे हैं, जबकि उनका प्रेम विवाह हुआ था. दीवानावर वह छलकता हुआ प्रेम, वह कशिश उनमें नहीं है, उनकी इस स्थिति के लिए वह भी किसी हद तक जिम्मेदार हो सकती है, अगर उसे उनसे पहली की सी मुहब्बत चाहिए तो..

आज सूर्यदेव के दर्शन हो रहे हैं, सुबह जब दरवाजा खोलने गयी तो कोहरा बहुत घना था, बचपन की एक सुबह का स्मरण हो आया, जब आकाश में लाल, बाल सूर्य का गोला घने कोहरे में उसके साथ-साथ चलता प्रतीत हो रहा था. लक्ष्मी छुट्टी पर है, उसने बेटी को जन्म दिया है. कल शाम वे उसके लिए एक फ्रॉक खरीद कर लाए. उसकी जगह जो महरी आयी है, बहुत धीरे हाथ चलाती है. नन्हे का एक मित्र सेंट्रल स्कूल से क्रिश्चियन स्कूल में चला गया है. बहुत दिनों से उसके माता-पिता प्रयास कर रहे थे. कल वह लाइब्रेरी से “पेंटिंग विद वाटर कलर” नामक एक किताब लायी है.