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Sunday, July 1, 2012

प्याज के पकौड़े


चार बज गए हैं, जून अभी तक नहीं आये हैं, कोई काम होगा नहीं तो...दोपहर को आये थे एक बार सामान रखने. नूना दस-पन्द्रह मिनट बाहर बरामदे में खड़ी होकर उनकी राह देख रही थी फिर सोचा इतने समय में कुछ लिख लिया जाये. कितने-कितने दिन निकल जाते हैं हाथ में कलम उठाये. क्या यह वही है जो लेखिका बनने का स्वप्न देखा करती थी. आज उसकी चचेरी बहन का जन्म दिन है पहले याद आया होता तो कार्ड जरूर भेजती और पत्र भी भेजती. उसे याद आया कि इस हफ्ते कोई खत भी नहीं आया है. आज उनका घर फिर से साफ और सुंदर दिख रहा है कल दोनों ने मिलकर सफाई की थी पहले के दिनों की तरह, जब उनकी नई-नई शादी हुई थी. आजकल कितनी जल्दी अँधेरा हो जाता है, जून को पता है कि शाम को नन्हें को घुमाना भी है, वह और तेजी से उसका इंतजार करने लगी. जैसे कि इस तरह वह जल्दी आ जायेंगे. अगले महीने ननद की शादी है पर अभी तक वे निश्चय नहीं कर पाए हैं कि इतने छोटे बच्चे के साथ इतना लम्बा सफर वे कैसे करेंगे, जून के अकेले जाने पर भी तो सभी को निराशा होगी...

उस शाम अचानक बदली घिर आयी थी. कहीं जाने का सवाल ही नहीं था, जून को प्याज के पकौड़े बनाने का जोश सवार हो गया. पहले बोले प्याज कम है, प्याज और डाला तो बेसन कम हो गया, फिर बेसन ज्यादा हो गया तो पानी और डाला. और फिर इतने सारे ...पर बेहद कुरमुरे पकौड़े बने थे. रात का भोजन वैसे ही पड़ा रहा उन्हीं से काम चल गया.