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Wednesday, May 5, 2021

अंजीर का पेड़

सुबह पाँच बजे के कुछ देर बाद उठे वे। अंगुली में दर्द अब नहीं है। आज सिरके व पानी का इलाज किया, तीन बार, काफी असरकारक है। सूजन अभी भी है, दवा साथ में रखनी होगी जब परसों वे ‘काबिनी वन्‍य-जीव अभयारण्य’ के लिए रवाना होंगे। आज एनी का दूसरा भाग देखा, वह कविता सुनाकर अपनी टिकट के पैसे एकत्र करती है, मारिला उसकी कीमत जानती है तभी उसे वापस बुला लेती है। गाँव के दृश्य भी बहुत सुंदर हैं पर लोगों के दिल कितने कठोर हैं, कैसे अपशब्द वे उसके लिए बोलते हैं। दलितों ने न जाने सदियों तक ऐसे ही कटु वाक्य अपने लिए सुने होंगे भारत  में भी, आज भी उन्हें नीच जाति का कहकर अपमानित किया जाता है, उसे आश्चर्य होता है, ब्राह्मण स्वयं को वेदों का ज्ञाता मानते हुए भी इतना भेदभाव कैसे सहन करते रहे, जबकि वेदों में लिखा है, सभी में एक ही चेतन सत्ता है। आज सुडोकू  शीघ्र हल कर पाई, अभ्यास से कौन सा काम नहीं हो पाता ? परमात्मा की स्मृति जीवन को कैसी सुवास से भर देती है, आश्चर्य होता है कि जिन्हें इसकी खबर नहीं वे कैसे रहते होंगे ! 


आज नैनी ने गमले से कोई स्थानीय साग तोड़ कर दिया, जिसके बीज उसने पालक के बीजों के साथ ही डाले थे. पालक के पत्ते भी अगले हफ्ते तक तोड़ने लायक हो जायेंगे. जून कमरे में तथा सीढ़ियों पर रखे गमलों को बाहर गैरेज में रख रहे हैं, अगले चार दिन वे घर से बाहर रहेंगे तो बंद घर में उन्हें धूप-हवा-पानी नहीं मिल पायेगा. पिटूनिया के नन्हे पौधे भी निकल आये हैं, नैनी को दिन में एक बार आकर पानी डालने को को कहा  है. एनी का तीसरा भाग देखा, स्कूल में उसे कितनी दिक्कत होती है, अब वह पेड़ों-फूलों के साथ समय बिताती है, किताबें पढ़ती है, पर एक दिन उसका झूठ पकड़ा जायेगा. आज दो किताबें आयीं, ओल्ड पाथ विथ क्लाउड्स और द विज़डम ऑफ़ लाओत्से, दोनों ही यात्रा पर साथ ले जाएगी. बुद्ध के जीवन पर आधारित पहली पुस्तक अवश्य ही बहुत अच्छी होगी. लाओत्से का ज्ञान तो अनुपम है ही. आज मंझले भाई-भाभी से बात की, कल वे लोग पिताजी के पास जा रहे हैं, उनका दामाद भी साथ जा रहा है, उनसे मिल लेगा. आज सुबह पुराने हिंदी गीत सुने और शाम को शिव भजन, संगीत अंतर्मन को कितना सुकून देता है, यह जानते हुए भी वह केवल संगीत सुनने के लिए समय बहुत कम ही निकालती है. 


आज सुबह लगभग नौ बजे वे घर से चले थे, दोपहर एक बजे ‘रेड अर्थ रिजॉर्ट’ पहुँच गए. रास्ता बहुत अच्छा था, हरियाली, जंगल, खेत, झीलें और कर्नाटक के गावों से गुजरते हुए, गीत सुनते हुए आराम से कट गया. आते ही स्वादिष्ट भोजन मिल गया. उनकी कॉटेज की छत झोंपड़ी जैसी है भीतर से चटाई, बाहर से पुआल की.बाहर छोटा सा लॉन है तथा एक जाकुजि भी। कमरे में सभी आधुनिक सुविधाएँ हैं. लकड़ी का पुराने ढंग का फर्नीचर है, पीछे बालकनी है, जिसमें दो चमड़े की कुर्सियां रखी हुई हैं. सामने जंगल नुमा फलों का बगीचा है और कुछ ही दूरी पर कपिला नदी है, जिसे काबिनी नदी भी कहते हैं। एक बड़ा सा अंजीर का पेड़ भी है जिसपर सैकड़ों अंजीर के फल लगे हैं। उन्होंने एक घंटा विश्राम किया फिर नदी तक गए। तट पर हरी घास थी, जो दूर तक फैला है।  नन्हा व जून दो साइकिलें लेकर आए, बारी-बारी से सभी ने साइकिल चलायी। नदी की लहरों को देखते रहे जो सागर का सा आभास दे रही थीं। कुछ ही दूर पर बाँध बनाया गया है, इसलिए पानी काफी है और लहरें भी। नदी किनारे एक रेस्तरां है जिसके सामने पेड़ों से लटके कई झूले लगे हैं जिन्हें हेमॉक कहते हैं शायद। शाम की चाय उन्होंने वहीं बैठकर पी। कई तरह के पक्षी भी नदी के जल में मछलियाँ पकड़ने आए थे। हवा ठंडी थी, सो अंधेरा होते ही वे कमरे में आ गए। रात्रि आठ बजे सांस्कृतिक कार्यक्रम है, बोन फायर भी है। 


आज सुबह वे इस सुंदर स्थान में बसने वाले पक्षियों को देखने तथा प्राकृतिक भ्रमण के लिए पूरे समूह के साथ गए। पथ प्रदर्शक को स्थानीय पक्षियों के बारे में जो भी जानकारी थी, सभी के साथ बाँट रहा था। नन्हे ने अपने कैमरे से कई सुंदर पक्षियों की तस्वीरें उतारीं। रंग-बिरंगे पंछियों और नदी के स्वच्छ जल में  सूर्योदय के सुंदर दृश्य का प्रतिबिंब देखकर सभी प्रसन्न थे। वापस आकर नाश्ता किया फिर वहाँ से एक घंटे की दूरी पर स्थित प्राचीन शिव मंदिर देखने गए। पुजारी राघवन एक किसान है और मंदिर में पूजा का काम भी करता है। उसने सबका नाम पूछा, राशि भी, और पूरे भाव से पूजा करवायी। मंदिर का इतिहास बताया। ढाई हजार साल पुराना शिवलिंग है यहाँ, नंदी भी सुंदर काले पत्थर का है। वापस आकर नन्हा व सोनू वापस चले गए, आठ बजे तक घर पहुँच जाएंगे। दो दिन बाद उन्हें लेने आएंगे। शाम को वे पुन नदी के तट पर गए, हवा ठंडी थी और आकाश पर बादल थे। एक घंटा टहल कर वे वापस लौट आए। आज के सांस्कृतिक कार्यक्रम में आदिवासी लोकनृत्य था। श्वेत वस्त्र पहने कई युवा व प्रौढ़ कलाकार बड़ी दक्षता के साथ विभिन्न स्वर निकालते हुए नृत्य कर रहे थे। दो व्यक्ति ढोल बजा रहे थे। नया साल आने में दो दिन शेष हैं, जिसमने उन्हें कर्नाटक के वन्य जीवन को निकट से देखने का अवसर मिलेगा। 

 

Friday, November 9, 2012

अँधेरा...कोई है...



सवा छह हुए हैं, छह बजे वह उठी, उसके पूर्व एक स्वप्न देख रही थी. अद्भुत स्वप्न था, वह  ऊँची-ऊँची और चौड़ी सीढ़ियों पर चढकर छत पर जाती है. बाजार से वापस आयी है, छत पर एक परिचित लड़की उसे दो चिट्ठियाँ देती है. एक तो साधारण अंतर्देशीय है, जो उनका है भी नहीं, मुगलसराय से रिडायरेक्ट होकर आया है. दूसरा खत खोल कर पढ़ती है, लिखाई से उसकी चचेरी बहन का लगता है पर बातें ऐसी हैं कि..उसी में एक लम्बी सी वस्तु है जैसे किसी कीमती या खतरनाक वस्तु पर मोटा, नक्काशीदार कवर चढ़ा होता है, वैसा ही गोल सिलिंडर के आकार का. एक और से बंद है पर एक ओर से खुला है, जून घर पर नहीं हैं, अपने मित्र के यहाँ गए हैं. माँ-पिता, बड़ी बहन सभी हैं. वह उस वस्तु को सहलाती है तो ऊपर से एक पक्षी का मुँह निकलता है. पक्षी भी किसी कठोर वस्तु का बना है, जो बहुत सुंदर है और वास्तविक लग रहा है. नीचे से उसके पंख निकल आते हैं, वह उसे सबको दिखाती है,  पक्षी उन्हें देखकर मुस्काता है. तभी जून आ जाते हैं उनका मन उदास है क्योंकि उनके किसी मित्र का मकान गिर जाने से काफी नुकसान हो गया है. वह उसे दिखाती है तो वह कहता है यह सी. टी. है, इसे चलाना मुझे आता है.  फिर वह उसे अपने हाथ में ले लेते हैं और फिर कोई बटन दबाते हैं, उसमें से एक लम्बी सी तार निकलती है जिसमें कई जगह ..एक नाटक, शेर और ..

सुबह यह स्वप्न लिख रही थी कि याद आया नन्हे को उठाना है, उसका टेस्ट था सो लिखना वहीं छूट गया और अब कुछ याद नहीं. अब दोपहर है, नन्हा सोया है, उसक टेस्ट ठीक हुआ है. कल उन्हें पता चल जायेगा कि उसका दाखिला अगली कक्षा में हो गया है. उसको स्कूल ले जाने व लाने के लिए एक रिक्शावाला बुलाया है.

नन्हे का रिजल्ट ठीक रहा. पर आज स्कूल जाने से पहले वह एक बार बोला, आज नहीं जाऊंगा, बस आज, जबकि वह जानता है कि जायेगा जरूर..रिक्शा में बैठा तो रुंआँसा था, शायद रास्ते में उसका मन ठीक हो गया हो. कल रात तेज हवा चलने से दरवाजा अपने आप खुल गया, जैसे फिल्मों में होता है, आवाज से नींद खुल गयी, फिर देर तक नहीं आयी. रात का अपना एक वजूद होता है, उसमें डर ज्यादा लगता है. अँधेरा डर का नाम है शायद. अजीब-अजीब स्वप्न आते रहे बाद में. पेपर वाला अखबार दे के गया तो वह पढ़ने लगी दुनिया भर की खबरें पढ़कर कैसा मोद उठता है मन में. जून तिनसुकिया जायेंगे कार की वाशिंग करने. कल उसे एक महीना होगया पढ़ाते हुआ, मेहनताना देखकर कुछ अलग सा लगा.