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Friday, November 9, 2012

अँधेरा...कोई है...



सवा छह हुए हैं, छह बजे वह उठी, उसके पूर्व एक स्वप्न देख रही थी. अद्भुत स्वप्न था, वह  ऊँची-ऊँची और चौड़ी सीढ़ियों पर चढकर छत पर जाती है. बाजार से वापस आयी है, छत पर एक परिचित लड़की उसे दो चिट्ठियाँ देती है. एक तो साधारण अंतर्देशीय है, जो उनका है भी नहीं, मुगलसराय से रिडायरेक्ट होकर आया है. दूसरा खत खोल कर पढ़ती है, लिखाई से उसकी चचेरी बहन का लगता है पर बातें ऐसी हैं कि..उसी में एक लम्बी सी वस्तु है जैसे किसी कीमती या खतरनाक वस्तु पर मोटा, नक्काशीदार कवर चढ़ा होता है, वैसा ही गोल सिलिंडर के आकार का. एक और से बंद है पर एक ओर से खुला है, जून घर पर नहीं हैं, अपने मित्र के यहाँ गए हैं. माँ-पिता, बड़ी बहन सभी हैं. वह उस वस्तु को सहलाती है तो ऊपर से एक पक्षी का मुँह निकलता है. पक्षी भी किसी कठोर वस्तु का बना है, जो बहुत सुंदर है और वास्तविक लग रहा है. नीचे से उसके पंख निकल आते हैं, वह उसे सबको दिखाती है,  पक्षी उन्हें देखकर मुस्काता है. तभी जून आ जाते हैं उनका मन उदास है क्योंकि उनके किसी मित्र का मकान गिर जाने से काफी नुकसान हो गया है. वह उसे दिखाती है तो वह कहता है यह सी. टी. है, इसे चलाना मुझे आता है.  फिर वह उसे अपने हाथ में ले लेते हैं और फिर कोई बटन दबाते हैं, उसमें से एक लम्बी सी तार निकलती है जिसमें कई जगह ..एक नाटक, शेर और ..

सुबह यह स्वप्न लिख रही थी कि याद आया नन्हे को उठाना है, उसका टेस्ट था सो लिखना वहीं छूट गया और अब कुछ याद नहीं. अब दोपहर है, नन्हा सोया है, उसक टेस्ट ठीक हुआ है. कल उन्हें पता चल जायेगा कि उसका दाखिला अगली कक्षा में हो गया है. उसको स्कूल ले जाने व लाने के लिए एक रिक्शावाला बुलाया है.

नन्हे का रिजल्ट ठीक रहा. पर आज स्कूल जाने से पहले वह एक बार बोला, आज नहीं जाऊंगा, बस आज, जबकि वह जानता है कि जायेगा जरूर..रिक्शा में बैठा तो रुंआँसा था, शायद रास्ते में उसका मन ठीक हो गया हो. कल रात तेज हवा चलने से दरवाजा अपने आप खुल गया, जैसे फिल्मों में होता है, आवाज से नींद खुल गयी, फिर देर तक नहीं आयी. रात का अपना एक वजूद होता है, उसमें डर ज्यादा लगता है. अँधेरा डर का नाम है शायद. अजीब-अजीब स्वप्न आते रहे बाद में. पेपर वाला अखबार दे के गया तो वह पढ़ने लगी दुनिया भर की खबरें पढ़कर कैसा मोद उठता है मन में. जून तिनसुकिया जायेंगे कार की वाशिंग करने. कल उसे एक महीना होगया पढ़ाते हुआ, मेहनताना देखकर कुछ अलग सा लगा. 

Friday, June 29, 2012

यह दिल दीवाना है


अंततः वह दिन आ ही गया, जून की परीक्षा का दिन. कल इंटरव्यू है आज लिखित परीक्षा है. पिछले कई हफ्तों से वह तैयारी कर रहा था. उसे अवश्य ही सफलता मिलेगी, विभाग में पदोन्नति होगी. सुबह का पहला पहर है, नन्हा उठकर फिर सो गया है, कल रात उसे नींद नहीं आ रही थी, नूना कब सो गयी उसे भान नहीं, जून ने ही फिर उसे  संभाला. ज्यादातर ऐसा ही होता है शाम को घर आने के बाद दोनों का साथ छूटता ही नहीं. उन्होंने जो तस्वीरें उतारी थीं, कुछ बहुत अच्छी आयी हैं, कुछ सामान्य, पहली बार खीचीं थी शायद इसीलिये, छत का पंखा कितना गंदा हो गया है, उसकी नजर ऊपर की ओर गयी तो आभास हुआ. पूरा घर ही एक बार सफाई मांगता है, सफेदी भी होनी चाहिए अब. कुर्सियों के कवर भी धोने चाहिए, पिछले दो महीनों से इस ओर नजर ही नहीं गयी. अब अगले महीने पूजा की छुट्टियाँ है, तभी यह काम होंगे उसने मन ही मन निश्चय किया. तब नन्हा भी तीन माह का हो जायेगा. पाकशाला में भोजन बनाते हुए वह ट्रांजिस्टर पर भारत-आस्ट्रेलिया क्रिकेट मैच का आँखों देखा हाल सुन रही थी कि  उसके कुनमुनाने की आवाज आयी, वह सब काम छोड़ कर कमरे में गयी.

मन में कितनी ही बातें आती हैं पर उसकी समझ में नहीं आता कैसे कहे और किससे ? पता ही नहीं चलता, दिन कैसे बीत जाता है, समय जैसे पंख लगाकर उड़ रहा है हर रोज वही दिनचर्या, सुबह, शाम, रात. आज सुबह जून की बस छूट ही जाती उसकी बातों में, पता नहीं क्यों वह बार-बार उसे उन दिनों की याद दिलाती है जब वे मुक्त होकर शाम को दूर तक घूमने जाया करते थे, कभी मन होने पर कोई फिल्म ही देख आते थे, या यूँही आराम से लेटे रहते थे घंटों...क्यों नहीं वह समझ लेती कि वह कल था और आज, आज है, इस परिवर्तन को स्वीकार करना ही होगा, और बदलाव ही तो जीवन में रंग भरता है. यूँ ऊपर से देखा जाये तो ये कोई आवश्यक कार्य नहीं, जिनके पूरे न होने से कोई शिकायत होनी चाहिए. पर मन तो मन है कुछ भी सोचता है. उसे परेशान किए बिना कहीं नहीं लगता है, बेचैनी का दूसरा नाम ही मन है. एक चिंता और है मन में अगले सप्ताह डॉक्टर के पास जाना है जिसके निवारण के लिये.