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Wednesday, March 24, 2021

रागी की रोटी

 

आज का दिन भी सद्गुरू की वाणी के साथ प्रारंभ हुआ। गूढ ज्ञान को वह सरल शब्दों में समझाते हैं, बिल्कुल अपना मानकर। गुरू कितना महान होता है, यह कोई-कोई ही जान सकता है। शाम को वे आश्रम गए, सत्संग में भाग लिया। वहाँ भीड़ बहुत थी पर कई लोग इधर-उधर टहल रहे थे, कुछ खरीदारी कर रहे थे। ज्ञान के ग्राहक सब नहीं हो सकते, प्रेम के तो और भी कम ! जीवन का भेद जो जान लेता है वही गुरू की महिमा को जान सकता है। गुरू जीवन से परिचय कराता है ! परमात्मा ही जीवन है और परमात्मा ही गुरु के रूप में प्रकट होता है। उसने गुरू को कोटि-कोटि नमन किया ! रात्रि भोजन भी वहीं अन्नपूर्णा में ग्रहण किया, शुद्ध, सात्विक भोजन ! सुबह भांजा आ गया था, वह भी साथ गया। रास्ते में पौधों के लिए खाद व कुछ फल खरीदे। नन्हे ने फूलों की पौध लगाने के लिए एक किट भिजवाया, बीज डाल दिए हैं, आठ-दस दिनों में निकल आएंगे। बागवानी का काम धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है। आज पड़ोसिन ने भी एक पौधा दिया। दोपहर को एक कविता जैसा कुछ लिखा। अपने आप ही मात्रा आदि ठीक ठाक हो गई। एक अन्य लेखिका की कविता पढ़ी।  


आज पुन: आश्रम गए। वहाँ प्रवेश करते ही मन हल्का हो जाता है। गुरूजी नहीं थे आज, संभवत: अगली बार मिलें। सत्संग चल रहा था। एक स्वामी जी भजन गा रहे थे, सभी तन्मय होकर साथ दे रहे थे। कुछ विदेशी महिलाओं ने नृत्य करना भी आरंभ कर दिया। उसने दो भजनों का वीडियो बनाया, कल व्हाट्सएप पर योग साधिकाओं के ग्रुप में भेजेगी। आज लौटते समय इडली बनाने के लिए बड़ा कुकर खरीदा। आश्रम जाने से पूर्व योग कक्षा में कुछ नए आसन किए। एक घंटा कैसा बीत जाता है पता ही नहीं चलता। कल योग कक्षा में त्राटक ध्यान  किया, अच्छा लगा। उनके साथ एक और महिला आती हैं, वह भी पूरे मनोयोग से आसन करती हैं। आज घर बैठे ही साइकिल की सर्विसिंग करने वाला मकैनिक आ गया। जीवन की धारा मंथर गति से बह रही है। 


पिछले दो दिन रात को सोने में देर हुई, सो लिखने का समय नहीं मिला। आजकल सोने से पूर्व ही डायरी खोलती है वह। दिन भर का लेखा-जोखा लेकर मन जैसे खुल जाता है, खाली हो जाता है और रात्रि की नींद पहले की सी गहरी और विश्राम पूर्ण होती है। यह तमस की अधिकता है या मन का विश्राम में टिकने की कला सीख लेना, जो हो, सभी कुछ स्वीकार करना है। कल नन्हे व सोनू  के लिए साई-भाजी, ढोकला और खीर बनाकर ले गए थे, गुलदाउदी व गुलाब के दो पौधे भी। उनके विवाह की दूसरी सालगिरह थी। अपने काम में दोनों इतने व्यस्त हैं कि उन्हें भविष्य के बारे में या अपने बारे में सोचने का समय ही नहीं मिलता, परिवार बढ़ाने की बात का कोई जवाब नहीं दिया। वक्त को जो मंजूर होगा, वही होगा। अगले हफ्ते वह अपने एक मित्र की बैचलर पार्टी में जा रहा है, उसके बाद उसके विवाह में मध्य प्रदेश। 


पिछले दो दिन भी डायरी नहीं खोली। आजकल दिन, तिथि, महीने, समय आदि सब पहले की तरह याद नहीं रहते, शायद ध्यान हर समय उसी ‘एक’ की तरफ रहता है इसलिए ! आज का दिन कितने नए-नए अनुभवों से भरा हुआ है। सुबह वे टहलने गए, जून अक्सर यहाँ की तीन मुख्य समांतर सड़कों की बात करते हैं, उसने कहा, एक बार एक-एक करके वे उनपर जाएंगे ताकि ठीक से उसे रास्तों का ज्ञान हो जाए, जवाब में उन्होंने कहा, उसे दिशा बोध ही नहीं है। यह आलोचना वह पहले भी कर चुके हैं पर आज मन ने विद्रोह कर दिया, क्रोध किया, बाद में कुछ ही देर में सब शांत हो गया। क्रोध करते समय भीतर कोई देख रहा था कि अब क्या हो रहा है। जून शांत रहे, उनके धैर्य की परीक्षा हो गई। नाश्ते में यहाँ आकर पहली  बार ओट्स उपमा बनायी। अखबार पढ़ते समय जून ने कहा, दीदी-जीजा जी से बात नहीं हुई यात्रा से  वापस आकर, उसने फोन मिलाया तो वे कुछ नाराज लगे। उनका ही एक वाक्य याद आया, ‘जब जब जो-जो होता है, तब तब तब वह वह होना है, फिर किस बात का रोना है ? रात्रि भोजन के लिए वे यहीं की एक निवासी के यहाँ से ‘रागी’ की रोटी लाए, बहुत स्वादिष्ट थी, साथ में टमाटर वाली नारियल की चटनी भी उतनी ही स्वादु थी। महाराष्ट्र में तिकड़ी सरकार बन गई, कब तक चलेगी, कोई नहीं जानता। जीवन विविधरंगी है, शाम को आकाश के नीले रंग कैमरे में कैद किये। 


उस पुरानी डायरी में कुछ सुंदर वाक्य पढ़े -


थोड़ी सी  दर्शनिकता मनुष्य को नास्तिकता की ओर ले जाती है, गंभीर दर्शनिकता धर्म की ओर ले जाती है। 


सार्थक होती हैं वे जिंदगियाँ , जो दरिद्रता, कठिनाइयों और संघर्षों के बीच पलती हैं। ठोकरें और थपेड़े खाते हुए जो लोग मुसीबतों के पहाड़ों को तोड़कर अंतत: एक ऊंचाई पर पहुँच जाते हैं, दूसरों के लिए वे एक मशाल का काम देते हैं। 


हमें कोई देखता हो तो हम बुरा व्यवहार नहीं कर सकते। जब हम मन को अलग होकर देखते हैं तो मन कभी बुरा व्यवहार नहीं करता। 


मन से लड़ना नहीं, किन्तु मन को शुभ भावना से देखना चाहिए। 


Friday, January 24, 2020

कर्म का बंधन


 कल दोपहर पहली बार अकेले कार चलायी। सुबह गैराज से गाड़ी निकाली और वापस डाली, पर अभी बहुत अभ्यास करना है. संकरी जगह से कैसे गाड़ी निकाली जाती है, और ट्रैफिक में से कैसे बाहर लायी जाती है, इसे सीखने में काफी समय लगेगा, लेकिन अभ्यास तो जारी रखना होगा. शाम को भजन सन्ध्या थी. उसके पूर्व अस्पताल गयी. एक सखी दो दिनों से एडमिट है. उसका पुत्र युवा हो गया है पर मानसिक रूप से बालक है. शारीरिक रूप से भी आत्मनिर्भर नहीं है. चौबीस घण्टे उसका ध्यान रखना पड़ता है. घर में सास-ससुर भी आये हैं. काम का बोझ ज्यादा है. रात को नींद पूरी न होने के कारण उसका स्वास्थ्य बिगड़ गया. आज गुरू माँ को सुना, पित्त की अधिकता से कितने रोग हो जाते हैं. कफ व वात बिगड़ने से भी षट क्रियाओं को करके शरीर को शुद्ध किया जा सकता है. आज सुबह सुंदर वचन सुने, ‘सुख और दुःख के ताने-बाने से बुना है जीवन, यह जानकर उन्हें दोनों से ऊपर उठना है. राम चाहते तो वन जाने से मन कर सकते थे, पर उन्हें वन जाने में दुःख प्रतीत नहीं होता था. वह राजमहल में रहकर सब सुख भोग चुके थे, वहाँ कोई सार नहीं है, यह जान चुके थे. कर्म का फल सदा के लिए नहीं रहता, कोई भी दुःख आता है जाने के लिए. इसलिए दुःख के कारण आये बुरे वक्त को साधना के द्वारा काट लेना चाहिए.’ जो घट चूका वह खुद के ही कर्मों का फल मिलना था, वर्तमान में भूख-प्यास व नींद के अलावा कोई दुःख है ही नहीं. प्रकृति उनकी परीक्षा लेती है पर श्रद्धा रूपी देन भी उन्हें परमात्मा से मिली है. श्रद्धा को मजबूत करने के लिए ही प्रकृति उनके सामने नयी-नयी परिस्थितियाँ लाती है. जब वे दृढ रहते हैं तो प्रकृति सहायक बन जाती है. शाम के साढ़े छह बजने को हैं. सदगुरू कितनी सरलता से कर्म बंधन से मुक्त होना सिखा रहे हैं. उन्होंने कार्य सिद्धि के तीन उपाय बताये, पहला है प्रयत्न, दूसरा है जो प्राप्त करना है, वह मिला ही हुआ है, यह विश्वास. तीसरा है धैर्य. जैसे बीज हमें मिला है, उसे पोषित करना है. कार्य को सिद्ध करने के लिए, कार्य को सिद्ध हुआ मानकर ही प्रयत्न करने से मन सन्तुष्ट रहता है. यह रहस्य है. परमात्मा को पाना है तो यह मानना है कि वह मेरे पास है, और उसके बाद सत्संग, साधना आदि करना है. सुखी है मानकर जो बढ़ता जाता है, वह सुखी ही रहता है. साधन व साध्य में भेद नहीं मानना है. योगी है मानकर योग करने से योग सिद्ध होता है. मानसिक शांति ज्ञान से ही मिलती है. इसी माह गुरू पूर्णिमा है, गुरूजी के लिए एक कविता लिखेगी. प्रेम, ज्ञान सभी कुछ परमात्मा की देन है, जब कोई यह जान लेता है तो खुद के साथ-साथ समाज के लिए भी उपयोगी बन जाता है. उनके जीवन से एक महक फैलेगी तो वे भी सुखी रहेंगे औरों को भी उनसे सुख मिलेगा ! पिछले दो दिन कुछ नहीं लिखा, इस समय पौने ग्यारह बजे हैं, भोजन बन गया है. जून थोड़ी देर में आने वाले हैं. भागते हुए समय से कुछ मिनट निकाल कर खुद से बात करने का सुअवसर ! आज एक वरिष्ठ रिश्तेदार का जन्मदिन है, पर सुबह भूल ही गयी, उन्होंने स्वयं ही याद दिला दिया, उम्र ने उन्हें परिपक्व बना दिया है. कल क्लब की एक सदस्या से बात की, उनके लिए कुछ लिखा और संबन्धी के लिए भी, उन्होंने वाह ! वाह ! कहकर तारीफ़ की है, पर उसे उसका प्रतिदान लिखने में ही मिल गया. हिंदी लेखन प्रतियोगिता में उसे पुरस्कार मिला है, लिखने वाले कम हैं शायद इसलिए.. उत्सव मनाना अहंकार को पोषित करना ही हुआ न. तारीफ होने पर जो प्रसन्नता का अनुभव करता है वही अपमान होने पर दुःख का भी अनुभव करने वाला है. मन जब इससे ऊपर उठ जाता है, संकल्प रहित हो जाता है. तब संसार नहीं रहता, यानि पल भर में ही इस संसार से मुक्त हुआ जा सकता है. परमात्मा जो अचल, घन, चेतन स्वरूप है, उसमें टिका जा सकता है.


Friday, June 28, 2019

मेजी की आग



रात्रि के पौने आठ बजे हैं. रात्रि भोजन हो चुका है. कल गायत्री समूह की सदस्याएं 'सत्संग पिकनिक' का आयोजन कर रही हैं. उनके लॉन में ही सब मिलेंगे. सभी अपने घर से कोई पकवान बना कर लायेंगी. भजन, नृत्य, 'सूर्य ध्यान' के बाद भोजन, फिर वे मिलकर नन्हे के विवाह की व अन्य तस्वीरें देखेंगे. हाँ, पहले फूलों को निहारने रोज गार्डन भी जायेंगे. आज सुबह वे टहलने गये तो देखा, बच्चों के पुराने स्कूल का कुछ भाग गिरा दिया गया है. नये स्कूल का मुख्य द्वार अब स्पष्ट दिखाई देता है. शाम को स्कूल की मीटिंग में गयी. क्लब की प्रेसिडेंट काफ़ी बदलाव ला रही हैं. कुछ पुराने लोग जा रहे हैं, नये आ रहे हैं. स्कूल का भविष्य अच्छा नजर आ रहा है. सुबह उसकी एक पुरानी हिंदी की छात्रा अपनी माँ के साथ मिलने आई. कोहिमा स्थित अपने गाँव के चावल लायी थी  और स्थानीय कला का एक लकड़ी का कटोरा. उसने भी उसे एक उपहार दिया. अस्तित्त्व की उपस्थिति का अनुभव आज शाम को योग साधना के दौरान हुआ और सुबह ध्यान में भी. परमात्मा उनके कितने करीब है, उन्हें उसकी प्रतीति करनी है प्राप्ति नहीं, वह तो सदा ही सब जगह है !  

आज का दिन स्मृति पटल पर एक सुखद अनुभव बनकर अंकित हो गया है. उन्होंने ढेर सारी तस्वीरें उतारीं. भजन गाए, ध्यान किया, कई खेल खेले. सभी लोग आये और स्वादिष्ट भोज्य पदार्थ लाये. उसने विवाह की तस्वीरें दिखाईं तथा वह कविता भी सुनाई जो नन्हे के विवाह के अवसर पर पढ़ी थी. पिताजी से बात की, धूप में बैठे थे. अब उनका स्वास्थ्य ठीक है पहले की अपेक्षा. आज गुरूजी को सुना, 'भक्ति सूत्रों' पर उनकी व्याख्या पहले भी सुनी है. वह बहुत सरल भाषा में बोलते हैं, अध्यात्म को बिलकुल सहज बना दिया है उन्होंने. जून की फरमाइश पर मूड़ी के लड्डू बनाये आज. कल लोहरी है.

आज पूरे उत्तर भारत में लोहरी का उत्सव मनाया जा रहा है. नये वर्ष का प्रथम उत्सव ! उन्होंने भी अग्नि जलाई, एक मित्र परिवार आया था. मूंगफली, फुल्ले, लड्डू, गजक खाने खिलाने का दिन. कल मकर संक्रांति है, यानि पतंग उड़ाने का दिन. कल इतवार है और परसों जून का अवकाश है, वे डिब्रूगढ़ का जगन्ननाथ मंदिर देखने जायेंगे तथा मन्दिर के निकट स्थित पार्क में भी. आज दोपहर को तिनसुकिया गये थे. सुबह नींद खुली पर दस मिनट तक उठने का मन नहीं हुआ, उस समय मन कितना शांत होता है. जब देह बिलकुल निस्पंद होती है, मन भी रुक जाता है. दोपहर को योग दर्शन पुनः पढ़ना आरम्भ किया. चित्त की अवस्थाओं का वर्णन पढ़ा आज.   

आज सुबह टहलने गये तो हर तरफ धुआं था, कोहरा और धुआं मिलकर धुंधलका फैला रहे थे. क्लब में सुबह मेजी जलाई गयी थी, आवाजें आ रही थीं. इस समय शाम के साढ़े पांच बजे हैं. वे भ्रमण पथ पर टहल कर आये हैं. उससे पूर्व गमले से तोड़े एलोवेरा का जूस बनाया लौकी और आंवले के साथ. आधा घंटा बैडमिंटन खेला. नन्हा आज नये घर गया है. दो वर्ष बाद जनवरी तक तो वे वहाँ रह रहे होंगे, यानि बस एक और लोहरी उन्हें असम में मनानी है.  

Saturday, June 15, 2019

ग्लैडियोली के बल्ब



पिछले महीने के दूसरे सप्ताह में उसने इस डायरी में लिखा था, फिर महीना समाप्त होने तक बंगलौर में किसी और कापी में लिखा, पर वे पन्ने कहीं खो गये. इस माह के प्रथम सप्ताह में अस्वस्थता के कारण कुछ नहीं लिखा. जिस दिन बुखार हुआ, उन्हें अगले दिन बंगलूरू से वाराणसी की यात्रा पर निकलना था, वहाँ एक दिन रुके और अगले दिन इलाहाबाद, छोटे भाई की बिटिया का विवाह संस्कार था. छह दिन बाद लौटे, तब भी स्वास्थ्य पूरी तरह ठीक नहीं था. इस समय भी सिर भारी है और खांसी भी पूरी तरह से ठीक नहीं हुई है. उसके ही कृत्यों का फल है यह रोग. मन यदि तनाव से ग्रस्त रहेगा, शंका से ग्रस्त रहेगा तो...साधना और सत्संग से दूर विवाह की गहमा गहमी और चकाचौंध..ऊपर से रोज ही गरिष्ठ भोजन, तीन हफ्तों से बाहर का खाना...आधी-अधूरी नींद..ऊपर-ऊपर से कुछ भी कारण रहा हो, असली कारण तो कर्म फल ही है, यह उसे ज्ञात है. मन में उठा हर नकारात्मक भाव देह पर किसी न किसी रूप में तो प्रकट होगा ही. आज शाम को यहाँ नन्हे के विवाह का स्वागत समारोह है, जिसके लिए कार्ड्स देने में उन्होंने इतने दिन लगाये थे.

आज छोटे भांजे का जन्मदिन है. भोपाल में रहकर वह लॉ कालेज में दाखिले के लिए तैयारी कर रहा है. छोटी ननद ससुराल गयी है, उसके ससुर जी का स्वर्गवास हो गया है. कल उन्हें गोहाटी जाना है, परसों शाम को विवाह का स्वागत समारोह वहाँ भी है.

समारोह अच्छी तरह सम्पन्न हो गया, नन्हा वापस वहीं से वापस बंगलौर चला गया, अब घर पहुंचने वाला होगा. सोनू वहीं रह गयी है, घर में एक और शादी है, उसमें सम्मिलित होगी. आज हफ्तों बाद वे घर पर बैठकर टीवी पर एक धारावाहिक देख रहे हैं. क्लब से गाने की आवाजें आ रही हैं. कल महिला क्लब का वार्षिक उत्सव है, वे शायद ही जाएँ. उसका स्वास्थ्य पूरी तरह ठीक नहीं हुआ है. जून को किसी कांफ्रेंस में भी भाग लेना है. आज पिताजी से बात हुई, उन्हें चार दिन पूर्व हृदय के पास दर्द हुआ, उसके बाद उन्हें डाक्टर के पास ले गये. आज भी सुबह चक्कर आया तो डाक्टर ने दस दिनों की दवा दी है. दीदी व बड़े भाई से बात हुई, डाक्टर ने उन्हें ठंड से बचकर रहने  को कहा है.

पौने छह बजने वाले हैं शाम के, जून अभी तक नहीं आये हैं. वर्ष का अंतिम माह आ गया है, ठंड अभी तक नहीं बढ़ी है. यह पूरा वर्ष नन्हे और सोनू के विवाह की तैयारी में तथा विवाह समारोह मनाने में ही बीत गया. कल यहाँ के क्लब तथा दिगबोई क्लब की वार्षिक पत्रिका के लिए लेख व कविताएँ भेजी हैं. आज तीन पोस्ट्स भी प्रकाशित कीं. गुलदाउदी की तस्वीर फेसबुक पर डाली. सुबह पिताजी से बात हुई. अपने स्वास्थ्य को लेकर वह काफ़ी सकारात्मक लगे.

शाम के सात बजे हैं. सुबह तारों की छाँव में भ्रमण के लिए गये. नाश्ते में बनारसी चिवड़ा-मटर बनाया. साप्ताहिक सफाई का भी दिन होता है शनिवार. दोपहर को तिनसुकिया गये, शेष बची क्यारियों के लिए फूलों की पौध खरीदी, ग्लैडियोली के बल्ब भी. आज बड़े भाई ने पिता जी के लिए व्हाट्स एप पर एक अकाउंट बनाया है, जिसमें सभी परिवार जनों को शामिल किया है, ताकि उनका हालाल सभी को नियमित मिलता रहे. नन्हे से बात की पता चला वे अपने दफ्तर में हैकाथन करवा रहे हैं, वह आज रात भर दफ्तर में ही रुकने वाला है. उसने बताया, सोनू के घर पर मेहमान आने शुरू हो गये हैं, बहुत बड़ा परिवार है उनका.   
 

Tuesday, December 19, 2017

भात करेले की बेल


रात्रि के सवा आठ बजे हैं. जून आईपीएल मैच का फाइनल देख रहे हैं जो चेन्नई और मुम्बई के मध्य खेला जा रहा है. इसके पूर्व ‘पृथ्वीराज चौहान’ पर एक एपिसोड देखा. उसने दिन भर में हुई विशेष बातों को स्मरण किया. आज दोपहर की कक्षा में एक नया बच्चा आया, जिसके पिता उसे खुद छोड़ने आये थे और विशेष ध्यान देने को कह गये हैं. बच्चों ने बहुत सुंदर कला कृतियाँ बनायीं. दोपहर को भात करेला की सूखी सब्जी बनाई थी, जो जरा भी कड़वा नहीं होता. बगीचे में उसकी बेल अपने आप ही हर वर्ष निकल जाती है और सब तरफ फ़ैल जाती है. आज मंझले भाई का फोन आया, वह तबादले पर लेह जा रहा है. जून में वे भी वहाँ जायेंगे.

चार बजने को हैं शाम के. सुबह बिस्तर त्यागने से पूर्व संध्याकाल का अनुभव किया. बाहर वर्षा हो रही थी, बरामदे में ही टहलते रहे कुछ देर. अब जाकर थमी है. आज मंगलवार है, साप्ताहिक भजन का दिन, समूह में सत्संग किये सालों हो गये हैं. जून को पसंद नहीं है पर घर पर करना उन्हें अच्छा लगता है. संस्कार पड़ रहे हैं, एक दिन तो पनपेंगे. आज सुबह मृणाल ज्योति गयी, बच्चों को व्यायाम कराया, उन्हें अच्छा लगा. आज तीनों ब्लॉगस पर पोस्ट प्रकाशित कीं. जीवन में क्या महत्वपूर्ण है, यह समझने में व्यक्ति कितना समय लगा देता है. कल शाम को जून के एक सहकर्मी अपने परिवार के साथ आये थे, उनके साथ फिल्मों की बातें कीं, और पौधों की भी. वे मैकरोनी लाये थे. सालों बाद खायी.

एक दिन का अन्तराल, आज का दिन कुछ अलग सा बीता, जून को चेन्नई जाना था सो भोजन दस बजे ही कर लिया. उसे भी स्कूल से एक शिक्षिका के साथ अन्य स्कूलों में जाना था, लौटी तो एक बजने को था. वे किशोरियों के एक कार्यक्रम के लिए आमन्त्रण देने कई स्कूलों में गयीं. हिंदी हाई स्कूल, नहोलिया, गोपीनाथ बरदलै हाई स्कूल, लखिमी बरुआ हाई स्कूल, दुलियाजान गर्ल्स कालेज, राष्ट्रभाषा हाई स्कूल और दुलियाजान उच्च विद्यालय. कल एक और स्कूल आशादीप में जाना है. वापस आकर कुछ देर सोने की कोशिश की पर नींद नहीं आई. माली की बेटी कुछ मांगने आयी थी, होते हुए भी उसे नहीं दी, शाम को दी. गधा अपनी मर्जी से ही चलता है. परमात्मा उन्हें बेशर्त हर पल ही दे रहा है पर वे कितने सुविधा लोभी हैं. कुछ देर नेट पर किशोरावस्था के बारे में पढ़ा. वह छात्राओं को कुछ व्यायाम सिखाएगी और प्राणायाम भी. शाम को टहलते हुए उन वृद्ध सज्जन से मिलने गयी. बहुत जिंदादिल हैं, उन्होंने अपना जीवन बहुत सलीके से जीया है. अभी भी सामाजिक कार्यों में व्यस्त रहते हैं. सुबह उठकर योगासन करते हैं. आंटी ने दोनों हाथ फैलाकर घूमकर दिखाया जो वे सुबह इक्कीस बार करती हैं. ज्ञान जीवन को पुष्पित करता है और गुरू का होना कितना अंतर ला देता है किसी के जीवन में. गुह्यतम ज्ञान का खजाना मिल जाता है, भीतर का प्रकाश मिल जाता है. उस प्रकाश के बिना ज्ञान टिकता नहीं. अंकल ने कहा, वह उस प्रकाश को पा चुके हैं इसके बारे में कुछ नहीं कहेंगे. वाकई उसके बारे में क्या कहे कोई. उनसे मिलकर बहुत अच्छा लगा है. नन्हे को भी बताया उनके बारे में. उसने बताया वह एक अच्छे से नये घर में रहने लगा है, पौष्टिक आहार भी लेने लगा है. तैराकी भी शुरू की है. उन्हें वहाँ आने के लिए निमन्त्रण दिया. अगस्त में वे उसके पास जा सकते हैं. जून अभी तक चेन्नई नहीं पहुंचे होंगे, फोन अभी आया नहीं है.

Wednesday, April 26, 2017

तीन गुलाब


आज दोनों बहनों से बात हुई, छोटी बहन दुबई जा रही थी, उसके पतिदेव को ओमान जाना था. इसी महीने उसके विवाह की वर्षगांठ है. बाईस वर्ष हो गये उनके विवाह को, कार्ड भेजा है. बड़ी के यहाँ खूब वर्षा हो रही है. उन्होंने कहा, उसके जीवन की कहानी पढ़कर उनकी उसके बारे में जो धारणा थी वह टूट रही है. वे अपनी कल्पना से ही किसी के बार में धारणाएं बना लेते हैं, सत्य का उससे कोई संबंध नहीं होता, उसने सोचा उन्हें एक पत्र लिखेगी. जून आज लंच पर नहीं आये, सुबह सात बजे गये थे शाम सात बजे ही आएंगे. सुबह कहा, वह जीत गये, कल उन्होंने ऑफिशियल पार्टी में जूस पीया. अब सत्संग का असर हो रहा है, गुरू का रंग चढ़ रहा है. सुबह साधना भी करते हैं. आसक्ति ही दुःख का कारण है. आसक्ति से प्रमाद होता है, प्रमाद से मद, मद से अहंकार और अहंकार दुःख का भोजन है. आसक्ति मिटने के लिए भीतर का आनन्द मिलना ही एकमात्र शर्त है. आसक्ति के कारण ही कामना उपजती है, कामना यदि पूरी हुई तो लोभ पैदा होगा और न हुई तो क्रोध. परमात्मा से मिलने में रुकावट कामना ही तो है. प्रेम के जिस धागे में यह जगत पिरोया हुआ है, उसे ही परमात्मा को प्रकट करने में सहायक बनाना है. आज क्लब की एक सदस्या से मिलने गयी, उनके लिए विदाई कविता लिखनी है.

अभी–अभी पड़ोस में रहने वाले ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ के टीचर से मिलने गयी, आने वाले मंगलवार को गुरुपूजा करवानी है. कुछ लोगों को निमन्त्रण भी देना है. आज ठंड फिर बढ़ गयी है, उत्तर भारत में भी कड़ाके की ठंड पड़ रही है. उसे लगता है वे कुछ नहीं होकर अर्थात खाली होकर ही पूर्णता का अनुभव कर सकते हैं. जीवन की यात्रा में उस परम का अनुभव ही एकमात्र सार्थक अनुभव है, पर उसके लिए मन को छोटे-छोटे स्वार्थों से ऊपर उठाना होगा. अप्रमत्त, अप्रमादी बने बिना साधना में प्रगति नहीं हो सकती. कर्मठ, कर्मशील ही भीतर का राज्य पा सकते हैं. जून आज दिल्ली गये हैं, शाम का वक्त है, उसके पास दो घंटे हैं, कुछ पढ़-लिख कर ध्यान करने वाली है.

कल शाम मन ठहर ही नहीं रहा था, देर तक पढ़ती रही फिर टीवी देखा. वे जो भी चाहते हैं उसका विपरीत साथ चला ही आता है, बिन बुलाये मेहमान की तरह. वे प्रेम तो चाहते हैं पर घृणा को जो साथ ही चली आती है, दबा लेते हैं, वही विकार बनकर प्रकट होती है. इसलिए बुद्ध कहते हैं, इच्छा ही दुःख का कारण है. सम्मान की आशा रखने वाले को अपमान के लिए तैयार रहना ही चाहिए. जीवन दो पर टिका है. महाजीवन दो के पार है. पिताजी ने स्वीपर को सफाई के सिलसिले में कोई बात कहनी चाही तो उसने उन्हें टोक दिया, बाद में लगा ऐसा नहीं करना चाहिए थे. उन्हें बात करने के लिए कोई तो चाहिए. उसका काम तो दिनभर मौन रहकर भी चल जाता है. शब्दों को लिखकर ही जो काम हो जाता है, फिर बोलने से सब गलत हो जाता है. कल गणतन्त्र दिवस है, एक छोटी सी कविता लिखी. सकारात्मक भावनाओं की ज्यादा जरूरत है आज वैसे ही वातावरण इतना बोझिल है..गुलाब के तीन बड़े से फूल खिले हैं, अपनी शान में झूम रहे हैं, वैसे हवा तो नहीं चल रही है, पर अदृश्य गति है उनकी जो दिख रही है. पिताजी ने पूरे बगीचे में पानी डाला है, साफ-सुथरा बगीचा अच्छा लग रहा है. काल चक्र निरंतर बढ़ रहा है, उन्हें उसके साथ चलना है. धर्म की धुरी को पकड़ अर्थात अपने भीतर उस एक शांत सत्ता को पकड़ कर उन्हें इस परिवर्तनशील संसार में विहार करना है. जीवन हर जगह है, परमात्मा कण-कण में है, उसका अनुभव करते हुए निर्भार होकर निष्काम कर्म करना है.  

आज पंचायत के चुनावों के कारण अवकाश है. पिताजी का स्वास्थ्य अब उतना ठीक नहीं है. बड़ी ननद की बेटी की शादी मई में होनी तय हुई है पर वे जा नहीं पाएंगे, ऐसा कह रहे हैं. कल शाम माँ के बारे में बहुत सारी बातें उन्होंने बतायीं, जिन्हें वे रिकार्ड करेंगे.

Friday, February 24, 2017

अंतिम यात्रा


आज सत्संग का दिन है, पिछले हफ्ते की तरह सम्भवतः आज भी उसे सद्गुरू और परमात्मा के साथ भजन गाने हैं. दोपहर को नेहरू मैदान गयी, जहाँ मृणाल ज्योति स्कूल के विशेष बच्चे गणतन्त्र दिवस के लिए नृत्य की रिहर्सल कर रहे थे. एक सहयोगी महिला मिलीं वहाँ, सुंदर गोल गोर चेहरे पर लाल बड़ी सी बिंदी, स्नेह भरी ! एक अन्य परिचिता भी आयीं थीं. जून और माँ-पिता जी डिब्रूगढ़ से कल लौटेंगे. दीदी से बात की, उन्हें भी अपने अनुभव लिखने को कहा है, देखें, कब लिखती हैं. कल छोटी बहन के विवाह की सालगिरह है, उसे कविता भेजनी है. अभी-अभी एक सखी का फोन आया वह शाम को सत्संग में उसका साथ देगी.

जून माँ-पिताजी को डिब्रूगढ़ से लाये और यहाँ के अस्पताल में उन्हें छोड़कर सीधा दफ्तर चले गये, वह शाम को जाएगी. उसने सूप की तैयारी कर ली है. कल गाजर का हलवा भी बनाया था, मिठाई भी है, सो शाम का नाश्ता काफी है.
 ‘गणतन्त्र की क्या पहचान
न्याय, समानता, व सम्मान’
कल उसने सभी को गणतन्त्र दिवस पर संदेश भेजे.

कल यहाँ भारत के पूर्व राष्ट्रपति डा. अब्दुल कलाम आये थे, आज भी यहीं हैं. जून इसलिए क्लब गये हैं, जहाँ उनका सम्बोधन होगा. आज बसंत पंचमी भी है. माघ शुक्ल पंचमी, भीतर मौन छाया है. मौन ही सत्य है, शब्द जैसे ही जन्मे, कुछ असत्य भी जन्मा साथ ही, अविद्या यही है, विद्या ही आत्मा है, वही परा है. शेष सब क्रीड़ा है, लीला है. मौन में जितना अधिक देर रहा जाये अच्छा है. टीवी पर बापू की कथा आ रही है. अभी नरेंद्र कोहली अपना मत रख रहे थे.

अगला माह आरम्भ हो गया, दो दिन बीत गये, वह लिखने का समय नहीं निकाल पायी. घर और अस्पताल आते-जाते आजकल दिन कैसे बीत जाते हैं पता ही नहीं चलता. आज एक सखी की बिटिया का जन्मदिन है, उसके लिए अभी तक कुछ नहीं लिखा. कल एक दूसरी सखी की सासुमा से मिली, कह रही थीं, औरत तो सहनशील होती ही है, उसके पास धैर्य होता है. छोटी बहन ने बताया, महिला होने के कारण उसे कम वेतन दिया जा रहा है. एक महिला ब्लॉगर लिखती हैं, औरत जब बेगारी करना नहीं चाहती तो उसे बुरा मान लिया जाता है. उसे लगता है, हरेक का सम्मान उसके अपने हाथ में है, कि वह कितनी समझ से काम लेती है, जीवन को एक विशाल दृष्टिकोण से देखती है. अध्यात्मज्ञान के बिना कोई भी पूर्ण संतुष्ट नहीं हो सकता.

फिर दो दिनों का मौन, आज कई दिनों बाद पुनः बदली छाई है. ठंड बढ़ गयी है. जून देहरादून गये हैं. चार दिन बाद आयेंगे. कुछ देर में ड्राइवर आकर माँ का दोपहर का भोजन ले जायेगा.

कल शाम माँ ने देह त्याग दी. देह जर्जर हो गयी थी. पिताजी बहुत रो रहे हैं कल से. इस समय सभी लोग उन्हें लेकर गये हैं. मिट्टी की देह मिट्टी में ही मिल जाएगी और आत्मा अभी तक यहीं होगी या नई देह भी ले चुकी हो, कौन जानता है ? कल रात सभी लोग अस्पताल पहुंच गये थे. जून के मित्र व दफ्तर के कई लोग. एक सखी रात भर उसके साथ ही रही, वह परिवार के सदस्य की तरह अपना फर्ज निभा रही है. सुबह से ही अन्य सभी सखियाँ कुछ परिचित महिलाएं सभी लोग आये. दुःख के इस क्षण में सभी ध्यान रख रहे हैं. दोपहर तक जून व नन्हा भी आ गये. उसका मन पूर्ववत् शांत है. जो कुछ घट रहा है वह ऐसा ही होना था, एक नाटक को जैसे मंचित किया जा रहा है, ऐसा ही लग रहा है, इससे अधिक कुछ नहीं. जो लोग दूर हैं उन्हें भी ज्यादा अंतर नहीं पड़ रहा होगा. दोनों ननदों के मन जरूर यहीं पर होंगे. समय के साथ सारे दुःख कम होते जाते हैं, आने वाले दस दिन उनके जीवन के एकदम अलग से दिन होंगे.

पिछला एक हफ्ता डायरी को हाथ भी नहीं लगाया, न ही समय था न ही मन हुआ. उस दिन शाम को जून और नन्हा शमशान घाट से लौटे तो साथ में उनके दो मित्र भी थे. एक सखी ने दलिया भेजा था ढेर सारा, दूसरी ने सब्जी.. रात को सबने खाया. अगले दिन दोपहर को उसके दो भाई आ गये और जून के एक ममेरे भाई. गरुड़ पुराण का पाठ चल रहा था. दिन भर लोग आते रहे. दोपहर को माँ की एक सखी ने बहुत कुछ भेज दिया था. शाम को भी भोजन बाहर से आ गया. उसके अगले दिन सुबह नन्हा स्टेशन पर दोनों बुआजी को लेने गया डिब्रूगढ़, कल उन्हें छोड़ने भी गया, आज उसे वापस जाना है. श्राद्ध का सारा इंतजाम आराम से हो गया था, सुबह पंडितजी ने हवन किया, फिर पांच पंडितों का भोजन तथा दोपहर बारह बजे से श्राद्ध भोज आरम्भ हुआ. काफी लोग आये, कुछ नहीं भी आये. भाई लोग अगले दिन चले गये थे. उसका मन अशांत रहा. अचेतन में बैठी प्रवृत्तियां उभर कर ऊपर आ गयीं. साधना कुछ हो नहीं पायी. उनके मन में न जाने कितना कुछ भरा हुआ है. जून भी पता नहीं क्या सोचते होंगे. जीवन में कभी उथल-पुथल होती है तो कभी गहराई में दबा विकार भी ऊपर आ जाता है. खबर देता है कि अभी मंजिल दूर है. नौ बज गये हैं, आज भी अभी तक नन्हा सोकर नहीं उठा है, साढ़े ग्यारह बजे उसे जाना है.

पिछले दो दिन पुनः नहीं लिख सकी. आज जून को यात्रा पर निकलना है. बनारस की यह यात्रा दो उद्देश्यों के लिए है. माँ की अस्थियों के विसर्जन के लिए तथा बीएचयू में एक कांफ्रेंस में शिरकत करनी है. पिताजी का मन अभी तक उदास है.             

   

Thursday, September 22, 2016

दीवाली के कार्ड


कोई है जो हर क्षण जागता रहता है, उनके भीतर वह साक्षी ही उनका वास्तविक मित्र है. मन, इन्द्रियों से परे जो एक शांत अवस्था है उसी का नाम है साक्षी भाव ! कल रात ऐसा लगा कि सोते-सोते भी कोई भीतर जगा हुआ था ! कल सत्संग में दो भजन गाने वाली सखियाँ आयीं, गाने की बारी उसकी भी आयी. कल बहुत सी पत्रिकाएँ, किताबें तथा पेपर्स निकाले, घर में सामान जितना कम हो उतना अच्छा है, एक दिन सारे कार्ड्स भी निकाल देने हैं अथवा तो उन्हें रहने देते हैं कितनी यादें जुड़ी हैं उनसे..दीवाली पर सबको कार्ड्स भेजने का उत्साह जगा है, पिताजी, तीनों भाई, चचेरे व फुफेरे भाई सबको भेजेगी बहनों को भी..आज सुबह वेद ज्ञान सुना, कितने अद्भुत श्लोक हैं, आत्मा को बलशाली बनाने की ही सारी प्रार्थनाएं हैं. कल ओशो को सुना हरेक को अपने ईश्वर का निर्माण स्वयं करना है उसकी माँ बनना है. इसका भी अर्थ वही है कि उन्हें स्वयं को शक्ति से भरना है. आत्मा को जागृत करना है. मन, बुद्धि के पार जाकर एक ऐसी शून्यावस्था का अनुभव करना है जो प्रेम, शांति व ज्ञान से ओत-प्रोत है. उनका छोटा मन जब शांत हो जाता है तो आत्मा जो सदा से वहीँ है उजागर हो जाती है, वह आत्मा ही अपने शुद्धतम स्वरूप में परमात्मा है जब वह देह से परे होती है, वासना तथा तृष्णा से मुक्त होती है, उसे भी अपने भीतर उस आत्मशक्ति को परिपक्व करते जाना है, व्यर्थ विचारों से स्वयं को बचाना है, ऊर्जा बचानी है ताकि वह ऊर्जा ध्यान में सहायक हो. लेखन में, पठन में सहायक हो. ऊर्जा को व्यर्थ गंवाया तो भीतर नकारात्मकता छाएगी स्वयं को आत्मा रूप में अनुभव करने के बाद भी यदि कोई उदास रहे तो ...कहीं कुछ धोखा है..हँसी ही उनकी पहचान हो और शांति उनका घर..प्रेम उनका स्वभाव..कल छोटी बहन से बात हुई, वह भी खुद की तलाश में लगी है, यात्रा जारी है, एक दिन मंजिल भी मिल जाएगी. आज देखा, गीतांजलि के भावानुवाद पर कुछ कमेंट आये हैं तथा तीन महिलाएं फ़ॉलो भी कर रही हैं. अभी कितनी कविताएँ ब्लॉग पर डालनी हैं. कल लक्ष्मी पूजा का अवकाश है. जून नयी गाड़ी ले रहे हैं. अपने भोजन का खास ख्याल रखते हैं, दर्द भी कम हो गया है. अगले महीने मेहमान आ रहे हैं घर की सफाई का काम ठीक चल रहा है अब कुछ ही शेष है. बड़ी भांजी को निबन्ध के लिए कुछ जानकारी भेजनी थी, वही काम शेष रह गया है.


होश को कायम रखना तलवार की धार पर चलने जैसा है, बार-बार मन फिसल जाता है, पुराने संस्कारों का शिकार होकर वाद-विवाद में फंस जाता है. अहंकार अपना सिर उठाने लगता है, भीतर कोई देख रहा है, साक्षी है, यह भाव खो जाता है. जाग-जाग कर भी वे सो जाते हैं, लेकिन जैसा कि सद्गुरू कहते हैं पहले तो इतना भी होश नहीं था कि वे अज्ञानी हैं, कम से कम अब अपने अज्ञान का बोध तो होता है ! पांच एम्पीयर का एक स्विचबोर्ड लगाने दो लोग आये हैं, शोर हो रहा है पर बाहर का यह शोर भीतर की शांति को भंग नहीं करता, उसे तो भीतर का शोर ही भंग करता है. अभी एक सखी को फोन किया सुबह उनके यहाँ फूल भिजवाये थे, लगता है वह कुछ परेशान है या व्यस्त है. धीरे-धीरे स्पष्ट होता जा रहा है कि सारे संबंध ओढ़े हुए होते हैं, वे अपनी सुविधा के अनुसार जब चाहे उन्हें उतार देते हैं, जब चाहे पहन लेते हैं ! यहाँ हर कोई अपने आप में एक द्वीप है. उन बुजुर्ग आंटी की शिकायत कम होने में नहीं आती, बढ़ती ही जाती है यहाँ माँ की भी. अभी-अभी उस सखी का फोन आया, उनके यहाँ भी बिजली नहीं है. उनका जीवन जितना सुविधाजनक होता जाता है उतने ही वे बेहोश होते जाते हैं. 

Friday, September 2, 2016

सुख - दुःख का झूला


दोपहर के ढाई बजे हैं, ध्यान कक्ष में या कहें कम्प्यूटर कक्ष में वह बैठी है, सुबह शाम जो साधना के काम आता है, दोपहर को वहीँ बैठकर वह कम्प्यूटर पर काम करती है. अगस्त माह के लिए हिन्दयुग्म पर नई कविता पोस्ट की. एक ब्लॉग पर भी. पन्द्रह अगस्त के लिए एक पुरानी कविता और मिली. डायरी के पन्नों में न जाने क्या-क्या है. माँ की कहानी लिखनी शुरू की थी, अधूरी ही छोड़ दी है. इंटरनेट एक अच्छा माध्यम है लेकिन उसके पास अन्यों की कविताएँ पढने के लिए समय नहीं मिलता या कहें कि रूचि नहीं है. इसी महीने छोटे भाई का जन्मदिन है क्यों न उसके लिए एक कविता लिखे, सन्यासी हुआ है वह. अगले महीने कृष्ण जन्माष्टमी है, उसके लिए भी लिख सकती है. कल रात जून और सहज हुए और आज सुबह वह अपने सहजतम रूप में थे. उन्हें स्वयं को बदलने में वक्त लगेगा पर यात्रा शुरू हो गयी है तो मंजिल दूर नहीं है. शाम को उनके यहाँ सत्संग है.

आज प्रातः भ्रमण के समय एक परिचित मिले, उसका वजन बढ़ गया है ऐसा उन्होंने कहा, घर आकर देखा तो उनकी बात सही थी. पिछले कुछ दिनों से वे प्रोटीन युक्त भोजन ले रहे हैं. जून आज डिब्रूगढ़ गये थे, डाक्टर से मिलने. अब उनका दर्द ठीक हो जाना चाहिए. आज शाम को वह देर से आने वाले हैं, कम्पनी की पंचवर्षीय योजना के टास्क फ़ोर्स में इस बार उन्हें भी शामिल किया गया है. व्यस्तता उनके लिए ठीक भी है. कल सत्संग में पहली बार एक परिचिता आयीं, जो वर्षों पहले उनकी पहली पड़ोसिन थीं. पंचकोश ध्यान भी किया, साक्षी होकर स्वयं को देखा, ऐसा लगा कितना सहज है सब कुछ, लेकिन जब तक भीतर का पता न था कितना जटिल था. परमात्मा का और उनका सहज स्वभाव कितना मिलता-जुलता है, कितना जटिल बना दिया है शास्त्रों ने, लेकिन अब शास्त्र भी अपना रहस्य खोलते चलते हैं !
वह नन्हीं ही थी अभी, जीवन के चार वसंत भी न देखे थे, किसी वस्तु को पाने की जिद की होगी या किसी के साथ बाहर जाने की, उसे इतना याद है किसी ने जोर से उसे बिस्तर पर पटक दिया..तो सारे दुलार की जो उसने पाया था यह कीमत चुकानी पडती है, यहाँ कोई सुख मुफ्त नहीं मिलता. स्कूल के दिनों की बात है, किसी कारणवश गृहकार्य की जांच समय पर नहीं करवा पायी. डांट के डर से या इस डर से कि कक्षा में जो अपनी प्रतिष्ठा है, वह दांव पर लग जाएगी, अध्यापिका के हस्ताक्षर लाल स्याही से बना लिए. भीतर कुछ टूट गया होगा, आत्मा पर एक धब्बा लग गया होगा, दुःख का एक बीज बो दिया गया होगा. लेकिन कारण था वही कि दुनिया उसे अच्छा समझे. उम्र बढती रही, भीतर नये तरह के स्वप्न जगने लगे. पढ़ाई-लिखाई छोडकर मन कल्पनाओं में गुम हो गया. आदर्श प्रेम को आधार बनाकर न जाने कितने दिवास्वप्न देखे लेकिन तब यह ज्ञान नहीं था कि स्वयं को जाने बिना, स्वयं को प्रेम किये बिना, ईश्वर को प्रेम किये बिना असली प्रेम से पहचान ही नहीं होती. भाई-बहनों के साथ झगड़े किये, दुःख के और बीज बोये. रेडियो पर गाने सुने, कानों को तृप्ति मिले, मन को तृप्ति मिले..उस मन को जिसका स्वभाव ही अतृप्त रहना है. जो कभी संतुष्ट होना जानता ही नहीं. जो सदा रोता ही रहता है, अभाव का रोना..अभी स्कूल में ही थी, एक बार घर में सबके नये वस्त्र सिले, उसके लिए क्यों नहीं आये..भीतर कोई घाव फूट पड़ा हो जैसे..माता-पिता के स्नेह पर इल्जाम लगाया कि उसे छोड़कर सभी प्रिय हैं. दुःख का बीज बोया गया. विवाह हुआ तो भीतर नये स्वप्न करवट लेने लगे..एकाधिकार की भावना ने बहुत दुःख दिया. जिस पर पूर्ण विश्वास किया वही कठोर भी हो सकता है, जो कोमल है वही कठोर भी है, लेकिन यह स्वीकार नहीं था. अहंकार को चोट लगती तो भीतर यह भाव जगा कि क्या इस जगत में बिना दुःख के कोई सुख नहीं है ? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि मन सदा विश्रांति का अनुभव करे. यह सुख-दुःख का झूला बहुत झूल लिया अब तो इसके पार क्या है, यह देखना है. जगत का सत्य सामने आ गया यह ज्ञात हुआ कि जिन संबंधों पर जीवन टिका था, वे कुछ ऐसे तत्वों पर टिके हैं जिनके नीचे आधार नहीं है, रेत का महल है यह संसार, अपने मन के सरे खेल नजर आने लगे !




Friday, August 19, 2016

फूल-पत्तियों वाले कार्ड


आज अभी कुछ ही देर बाद मेहमान आने वाले हैं. पिताजी को भी उनके आने का इंतजार है, माँ को अब किसी के आने-जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता. मौसम अच्छा है आज भीगा-भीगा सा. उसने सोचा  उनके लिए कुछ लिखे -  
बरस के बादलों ने भी स्वागत किया है
इंतजार क्यों न करे, अति उत्सुक हिया है

दूर देश से उड़ के आये, अधरों पर ओढ़े मुस्कान
दिल्ली में रहे मौज मनाये, अब आये हैं वे आसाम

जून ने अगले कुछ दिनों के लिए अवकाश ले लिया है. आज वे उन्हें लेकर दिगबोई गये. मौसम पहले-पहल अच्छा था, फिर धूप निकल आई. धूप में भी भांजियों ने खूब मस्ती की, विभिन्न पोज देकर तस्वीरें उतारीं. वापसी में मौसम पुनः अच्छा हो गया. वे म्यूजियम भी गये, पार्क में बोटिंग की.

आज दोपहर वे उसके साथ बच्चों की सन्डे योग कक्षा में गये. डाक्टर बहन ने उन्हें स्वच्छता के विषय में जानकारी दी. नाड़ी तथा हृदय के बारे में बताया. चार्ट पेपर पर एक क्रॉसवर्ड बनाकर शरीर के अंगों के नाम सिखाये. लडकियों ने उन्हें प्लास्टिक की बोतल से पेन होल्डर बनाना सिखाया. फूलों और पत्तियों को कागज पर चिपका कर कार्ड बनाना सिखाया. बच्चों को बहुत आनंद आया. रेन क्लैपिंग में तो वाकई उन्हें बहुत खुशी हुई. उनके दिन अच्छे बीत रहे हैं.

कल सुबह छोटी भांजी क्लब में तैरने गयी. वह अच्छी तैराक है. शाम को जून आयल फील्ड दिखाने ले गये, उन्होंने समझाया किस तरह तेल को पानी व गैस से अलग किया जाता है. वापस आकर सभी मिलजुल कर घर का काम करते हैं. छोटी भांजी सलाद सजाती है तो बड़ी टेबल लगा देती है. बीच-बीच में ज्ञान चर्चा भी होती है. माँ-पिताजी को भी उनका साथ भाने लगा है.

कल वे आर्ट ऑफ़ लिविंग के सेंटर गये थे जहाँ साप्ताहिक सत्संग था, उसके पूर्व गुरुद्वारे तथा काली बाड़ी दिखाए. आज वह बहन को मृणाल ज्योति ले गयी, जहाँ उसे एक मीटिंग में भाग लेना था. मीटिंग के दौरान बहन बाहर टहलती रही, उसे अपना वजन घटाना है सो दिन में कई बार टहलने जाती है. वहाँ उसने एक छोटी तिपहिया साइकिल दान में दी.

आज सभी वापस चले गये हैं. रोजाना की सुबह-सुबह की सैर आज नहीं हुई, क्योंकि वर्षा काफी तेज थी. प्राणायाम किया. जून आज पांच दिनों के बाद दफ्तर गये. वह बहन को एक पड़ोसिन से मिलाने ले गयी. तुलसी का एक पौधा वहाँ से लायी जिसे अभी तक लगाया नहीं है. जाते-जाते बच्चों का वीडियो भी लिया जैसा आते वक्त लिया था. बहन अपनी डायरी छोड़ गयी है ताकि उसे पढ़कर वह कोई कहानी लिख दे ! छोटी भांजी ने भी अपनी एक कहानी दी है, हिंदी अनुवाद के लिए. उनके ढेर सारे चित्र हैं और ढेर सारी यादें हैं. उनके साथ बिताये दिन सुखद याद बन गये हैं !


अज गुरु पूर्णिमा है, सुबह वे सेंटर गये थे. दोपहर को पूजा में भाग लिया, एक बार तो लगा कि जैसे तस्वीर में गुरूजी सजीव हो उठे हैं, उनकी मुस्कान कितनी वास्तविक लग रही थी. आज माँ घर से बाहर जाने के लिए कह रही थीं. आजकल उनको खाने-पीने से अरुचि हो गयी है. पिताजी भी उनकी हालत देखकर परेशान हो गये हैं. 

Thursday, July 21, 2016

हिमाचल के बाशिंदे


पिछले दिनों उसने आर्ट ऑफ़ लिविंग से जुड़े स्वामी मधुसूदन(हनी) की कहानी उनकी जुबानी सुनी और फिर शब्दों में उतारी. बहुत रोचक है. वह हिमाचल के बाशिंदे हैं I पिताजी व्यापारी हैं I वे दो भाई हैं I मधु छोटे हैं, उनके अनुसार स्कूल तथा कॉलेज में वह बहुत शरारती छात्र हुआ करते थे I कुछ मित्रों का एक गैंग था, जो धमाचौकड़ी मचाने में सबसे आगे रहता था I अन्य छात्रों की ऐसी परेशानियों को हल करने का भी उन्हें शौक था जिसमें कुछ दादागिरी करने का मौका मिले I बड़े भाई से सदा उनकी स्पर्द्धा चलती रहती थी I वह जो करते वही मधु भी करना चाहते I ऐसे तो अध्यात्म में कोई विशेष रुचि नहीं थी, यहाँ तक कि टीवी पर कोई दाढ़ीवाले बाबाजी प्रवचन दे रहे हों तो वह चैनल बदल देते थे I किसी बाबा की आँखों में नहीं देखते थे इस डर से कि कहीं वह सम्मोहित न कर दें, लेकिन एक बार जब वह कुछ दिनों के लिये बाहर गये, भैया ने ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ का बेसिक कोर्स कर लिया, लौटे तो उन्होंने भी कोर्स करने की जिद की I पिताजी ने कहा तुम अभी छोटे हो, २० वर्ष के होने पर ही कोर्स कर सकोगे पर वह इतनी प्रतीक्षा नहीं कर सकते थे, सो फार्म में अपनी उम्र ज्यादा लिखवा कर चले गये I कोर्स में कुछ समझ में नहीं आता था I हर दिन कुछ गृहकार्य दिया जाता था, वह भी नहीं किया, लेकिन सुदर्शन क्रिया करने के बाद भीतर कुछ ऐसा परिवर्तन हुआ जो शब्दों में कहा नहीं जा सकता I मधु जब छठी-सातवीं का विद्यार्थी था तो अक्सर मन में कई विचार उठते थे..... इस सामान्य से प्रतीत होने वाले जीवन के पीछे अवश्य कुछ और भी है... केवल खाना-पीना, पढ़ना और सो जाना मात्र इतना ही तो जीवन का उद्देश्य नहीं हो सकता..... मन में प्रश्न भी उठते थे कि कौन सी शक्ति इस ब्रह्मांड का नियंत्रण कर रही है? मन में इतने विचार कहाँ से आते हैं? जीवन में एक नियमितता कहाँ से आती है? लगता था कि कई बातें एक अंतराल के बाद पुनः घटित हो रही हैं, लेकिन कारण समझ से बाहर था I इन सवालों का जवाब खोजने निकला तो शिक्षकों व मातापिता दोनों ने कहा इस उम्र में ऐसी बहकी-बहकी बातें क्यों करते हो, पढ़ने में मन लगाओ I धीरे-धीरे मन में सवाल उठने बंद हो गए और वह अपनी सामान्य दिनचर्या में व्यस्त हो गये I

सन् २००२ की बात है गुरूजी हिमाचल आ रहे थे, सत्संग स्थल निवास से आधे घंटे की दूरी पर था I जब मित्रों ने कहा सत्संग चलते हैं तो पहले तो मना कर दिया क्योंकि एक तो पिताजी कहीं भी आसानी से जाने नहीं देते थे, दूसरे उन्हें डर था कि सत्संग में जाने से इमेज खराब हो जायेगी, लोग क्या सोचेंगे? कौन उनसे मदद माँगने आयेगा? पर मित्रों ने जोर दिया और किसी तरह पिताजी को राजी कर वहाँ पहुँचे I गुरूजी के आने से पहले मंच पर बायीं ओर बैठ गये बल्कि यह कहना सही होगा कि उन्हें बैठा दिया गया I मन में तर्क-वितर्क चल रहे थे I लोग भजन गा रहे थे और मस्त थे, तार्किक बुद्धि ने सोचा बिना किसी कारण ये इतने प्रसन्न क्योंकर हैं ? तभी गुरूजी का प्रवेश हुआ, वे हाथ में पकड़ी माला को घुमाते हुए लगभग नाचते हुए से आये और आसन पर आराम से बैठ गए I बुद्धि ने कहा कि सत्संग में बड़े-बड़े वीआईपी आये हैं, गुरूजी उनको सम्बोधित करके जरूर कोई गूढ़ ज्ञान की चर्चा करेंगे किन्तु यहाँ तो बात ही कुछ और थी I एकदम अनौपचारिक ढंग से गुरूजी ने पूछा, ‘हाँ, सब कैसे हो? खुश हो? सबने ‘हाँ’ में उत्तर दिया, मन में विचार चलने लगे कैसे गुरु हैं यह?, कि तभी वे मधु की दिशा में पलटे एक पल रुके, फिर सामने देखा.. अगले ही पल फिर पलटे और उंगली से अपनी ओर आने का इशारा किया I सामने जो मित्र था उसे कहा, जाओ गुरूजी तुम्हें बुला रहे हैं, शायद उन्हेँ पानी चाहिए वह गया और लौट आया, गुरूजी ने फिर कहा, नहीँ तुम इधर आओ मेरी बायीं ओर दूसरे मित्र थे उन्हें मंजीरे देकर भेज दिया, पर गुरूजी ने कहा, तुम जो चश्मा लगाये हो इधर आओ, इधर-उधर देखा यकीन नहीं हो रहा था कि उन अनजान को वह क्यों बुला सकते हैं I डरते-डरते उनके पास गया, उन्होंने पूछा, हाँ, हनी कैसे हो? कुछ बोलना चाहा पर जवाब तो कुछ सूझा नहीं, भीतर प्रश्न उठा, आप को मेरा नाम किसने बताया? गुरूजी ने फिर कुछ सामान्य प्रश्न किये, खुश हो? पढ़ रहे हो? बिजनेस भी कर रहे हो? धीरे-धीरे मन संयत हुआ और जवाब दिए पर तार्किक मन भीतर सवाल कर रहा था हजारोँ लोग बैठे हैं और गुरूजी इतनी साधारण बातें कर रहे हैं I अंत में उन्होंने आश्रम आने का निमंत्रण दिया, घबरा कर ‘हाँ’ में सर हिला दिया I अपनी जगह आकर बैठे तो लगा जैसे कोई स्वप्न देखा हो, लेकिन भीतर कुछ बदल गया था I सत्संग के बाद घर पहुँचे तो कितने ही दिनों तक गुरूजी की याद बनी रही फिर अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो गये I

Thursday, June 23, 2016

पीतल का दीपदान


चार दिनों का अन्तराल ! सुबह एक सखी का फोन आया, वह अब फेसबुक पर नहीं दिखेगी. उसे इस बात का अंदेशा तो था ही. वह हँसते हुए कह रही थी लेकिन उस हँसी के पीछे जरूर थोड़ा सा तो दुःख होगा, चाहे कुछ पलों के लिए ही सही. नये वर्ष पर उसे संदेश भेजने में भी संकोच होगा. वे जीवन को व्यर्थ ही बोझिल बनाये जाते हैं, जबकि जीवन इतना प्रेम, आनंद और सौंदर्य छिपाए है. वह बिखरा है चारों ओर, वे नजर उठाकर देखते भी नहीं ! आज एक और सखी ने कहा उन्हें world space radio लेना चाहिए, गुरूजी की आवाज में रोज सत्संग सुनने को मिलेगा, उसे पता ही नहीं है गुरूजी और वह एक हो गये हैं. अब उनको सुनने के लिए उसे बाहर कुछ भी नहीं करना है. भीतर वही तो बोल रहे हैं. आज सुबह एक फोन आया, पर उठा नहीं पायी, तब वह ध्यान कर रही थी. यूँ भी व्यर्थ की बातचीत से क्या मिलने वाला है. माँ का डर व घबराहट आजकल बढ़ती जा रही है. पिताजी को कुछ देर भी नहीं देखती हैं तो ढूँढने लगती हैं. कल नन्हे से बात की, परसों वह भीग गया था, गला खराब हो गया है.

वर्ष बीतने में मात्र एक दिन रह गया है. पीछे मुड़कर देखे तो सभी कुछ अच्छा रहा, ध्यान में टिकना हुआ, मन विकारों से मुक्त हुआ. आज सभी को नये वर्ष की कविता भेजी. कल फेसबुक पर भी सबको शुभकामना देनी है. मृणाल ज्योति की प्रिंसिपल से बात की, स्कूल के लिए उन्हें दो विशेष कुर्सियां बनवानी हैं, वे विवाह की वर्षगांठ के उपलक्ष में उसके लिए आवश्यक राशि देगें. पीछे वाले  आंगन का हरे बार्डर वाला नया बनवाया सलेटी फर्श बहुत सुंदर लग रहा है. गमले रखने के लिए एक स्टैंड भी वहाँ रखा, सर्दियों भर तो आँगन को साफ-सुथरा रखा जा सकता है. बाहर बैठने के लिए चार बेंत के मूढ़े उन्हें लेने होंगे.

साल का अंतिम दिन ! पिछले कुछ दिनों से एक परिचिता भी उसके साथ योग करने आ रही है, आज भी आई थी. योग सिखाने की उसकी कामना को सफल करने. कल शाम को वे एक मित्र के यहाँ गये, लौटने में देर हुई, कुछ ज्यादा नहीं पर उसका असर अभी तक है. शाम को एक परिचित को जो रिटायर होकर यहाँ से जा रहे हैं, बनारस से लाया पीतल का दीपस्तम्भ, नये वर्ष की कविता तथा कार्ड दिए. उन्होंने कहा, गुरूजी अरुणाचल प्रदेश में आ रहे हैं, यदि वे यानि ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ के लोग उन्हें लाने के लिए कम्पनी द्वारा हेलीकॉप्टर का प्रबंध कर दें तो वे कुछ घंटों के लिए यहाँ भी आ सकते हैं. विचार तो बहुत अच्छा है कि गुरूजी दुलियाजान आयें पर उनके स्वागत के लिए सभी को कई आवश्यक प्रबंध करने होंगे. उसे तो वे हर वक्त निकट ही प्रतीत होते हैं. वह कहते हैं ‘जो मैं हूँ सो तुम हो’ ! इस अभिन्नता को जो महसूस कर ले वह तृप्त हो जाता है !