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Wednesday, September 16, 2026

मेरी माटी मेरा देश

मेरी माटी मेरा देश

आज सुबह का आरंभ ‘ध्यान’ से हुआ।देह से बाहर अनंत आकाश में विचरने का अनुभव! आत्मा रूपी हंस देह रूपी पिंजरे से ध्यान में ऊपर उड़ जाता है। संभवत: इसी को संतों ने गाया है, “चल हंसा उस पार”। उसके बाद वे टहलने गये। रास्ते में ही समाचार सुने, फिर कल के “मन की बात” की रिकार्डिंग। मोदी जी ने कई जानकारियाँ दीं, पंद्रह अगस्त की तैयारी के लिए, प्रेरित किया। ‘मेरी माटी मेरा देश' अभियान में भाग लेने को कहा। जिसका उद्देश्य वीर शहीदों को श्रद्धांजलि देना है। आज़ादी के अमृत महोत्सव के समापन कार्यक्रम के रूप में इसमें देश के कोने-कोने से सात हज़ार पाँच सौ कलशों में मिट्टी और पौधे लाये गये हैं।हर ग्राम पंचायत में अमृत वाटिका भी लगाई गई है। लोकसभा में अभी भी गतिरोध बना हुआ है। इतना अवश्य हुआ है कि जो अविश्वास प्रस्ताव आने वाला था, वापस ले लिया गया है। 

जून ने सुबह के नाश्ते में आज बिना किसी तरह की मदद लिए अकेले ‘दोसा’ बनाया, नारियल की चटनी व सांबर भी !  उन्हें दक्षिण भारतीय भोजन खाना और बनाना दोनों समान रूप से पसंद है। दोपहर को उसने मानव कौल की एक पुस्तक पढ़ी, जिसका नाम भी “तुम्हारे बारे में” है।अच्छी है, छोटी-छोटी यादें हैं, विचार हैं, जो विभिन्न यात्राओं के दौरान लेखक की कलम से उतरे। वह सच को कितनी आसानी से व्यक्त कर देते हैं।लेखक ने एक अन्य लेखक विनोद शुक्ला की तारीफ़ की है, मौक़ा मिलने पर उन्हें पढ़ेगी। पापा जी से बात हुई, उन्होंने भी गुरुजी की तरह कहा, ध्यान में कुछ करना नहीं है, बस चुप होकर बैठ जाना है। वह ओशो को सुनते हैं और सुनते-सुनते आत्मभाव में दृढ़ होते जा रहे हैं।उन्हें अपने वृद्ध होने का जरा भी अहसास नहीं होता।बानवे वर्ष की उम्र में वह स्वस्थ हैं और मानसिक रूप से सबल भी। उसकी कविता की तारीफ़ की उन्होंने। 

कल उसकी एक लंबी-चौड़ी, अच्छे-ख़ासे डील-डौल वाली महिला से मुलाक़ात हुई, जो पहले पार्लर चलाती थी। कोविड के दौरान बंद कर दिया। अब बुलाने पर लोगों के घर जाती है। दो भारी बैग उसके पास थे, एक हाथ में दूसरा पीठ पर। घर बैठे सैलून जैसी सुविधा देनी हो तो सारा सामान चाहिए। उसने बड़े गर्व से बताया, बेटे का नाम संमित विहान है, जो पढ़ाई में होशियार है। वह भक्तिभाव से भरी हुई थी। हनुमान जी पर गहरी श्रद्धा है और देवी को भी मानती है। उसकी बातें सुनकर अच्छा लगा। प्रभु की कृपा ही माननी चाहिए यदि किसी के अंदर भक्ति का भाव जगा है।  

आज पूर्णिमा है, अभी-अभी आकाश में चन्द्र दर्शन हुए, तस्वीरें भी उतारीं। शाम को वे आश्रम गये थे, राधा कुंज में बैठे, जहाँ बहुत सी नयी वस्तुएँ आ गई हैं। कुछ नये फ़व्वारे, नयी बेंच और नयी  मूर्तियाँ भी। हवा शीतल व तेज थी। झील में कुछ पक्षी बैठे थे, जो उनके जाते ही उड़ गये। वहाँ से वे शिव मंदिर गये। कुछ देर बैठकर ध्यान किया, गुरुजी की आवाज़ में शिव मंत्र का जाप चल रहा था। शिव की उपस्थिति चाहे अदृश्य हो पर आश्रम में हर पल गुरुजी की उपस्थिति का अहसास हो रहा था।वह हर पत्ते, हर सरंचना पर, हर कहीं मौजूद थे।लग रहा था, जैसे उनके क्षेत्र में वे अनाधिकार तो प्रवेश नहीं कर रहे। उन्होंने ऐसे कौन से पुण्य कर्म किए थे, जो इस पवित्र आश्रम में जब चाहें जा सकते हैं। 

सुबह टहलते समय जून के साथ ध्यान पर कुछ बात हुई। सांसारिक वस्तुओं के अतिरिक्त कोई सुख का स्रोत है तो वह “ध्यान” है। जब एक बार भीतर इसका अनुभव हो जाता है, तब अपने आप ही मन जगत से उपराम होकर भीतर ठहरना सीख जाता है। आज शाम वे इस्कॉन मंदिर गये, राजाधिराज मंदिर, या राधाकृष्ण मंदिर, जो एक पहाड़ी पर बना, एक विशाल भव्य मंदिर है। बड़े लंबे-लंबे गलियारे और और सुंदर मंडप। ऊपर से दूर-दूर तक के नज़ारे और इमारतें दिखायी देती हैं। आरती का समय हो रहा था, सो उन्होंने उसमें भाग लिया, बाद में प्रसाद भी ग्रहण किया। आज नूना ने ओबीए की वरिष्ठ सदस्या के लिए एक कविता लिखी, जो उन्हें लंच पर ले गई थीं। सभी को अच्छी लगी, उनकी बेटी ने अपने पारिवारिक समूह में भी भेज दी है। कुछ पुरानी कविताओं की मात्राएँ दुरस्त कीं। कुछ देर ‘सावित्री’ का अनुवाद सुना।इस महाकाव्य को लिखने के पीछे कितना महान उद्देश्य था श्री अरविंद का। परमशक्ति को धरा पर उतार लाने की कल्पना ही कितनी महान है। मानव तो भगवान को दूर बैठाकर ही प्रसन्न हो जाता है।उपनिषदों में लिखा है, परमात्मा एक था और उसने बहुत होने की इच्छा प्रकट की। मानव जीवन का उद्देश्य है, परमात्मा को अपने माध्यम से व्यक्त होने देना, सदा सजग होकर जीना तथा भगवद् संकल्प को सत्य सिद्ध करना। उसने श्रीमाँ के वचनों पर आधारित एक चर्चा भी सुनी थी। जिसमें बताया गया था, आत्मा किस तरह शरीर और मन से जुड़ती है। कभी-कभी तो मन ही प्रधान होता है, आत्मा जैसी कोई चीज नहीं होती भीतर ! कितनी अनोखी बातें हैं ये। यदि कोई ध्यान से देखे, मन की सारी इच्छाएँ दूसरों को लेकर होती हैं। कभी उन्हें स्वयं को सिद्ध करना है, कभी कुछ दिखाना है अथवा कुछ देना है। गुरुजी कहते हैं, एक क्षण के लिए यदि कोई सोचे, दूसरा कोई है ही नहीं, तो उसे कितनी शांति अनुभव होगी। मन की सारी दौड़ ख़त्म हो जाएगी।  

आज सुबह वे मुख्य सड़क पार करके एक नयी बन रही सोसाइटी में टहलने गये, प्लॉट्स कटे हुए थे और सुंदर बगीचे भी तैयार हो गये हैं। ‘एलिमेंट ऑफ़ अर्थ’ नामकी यह जगह भी उसी समूह की है जिस समूह की उनकी यह सोसाइटी है। शाम को वे पहले एक मित्र दंपत्ति के घर गये, फिर वहाँ से थरालू स्टेट लेक से होते हुए पूरे दो घंटे चलकर वापस आये। रास्ते में कुछ तस्वीरें भी उतारीं। उनके लिए यह रास्ता देखा हुआ था, पर मित्रों के लिए रास्ता बहुत लंबा था। रास्ते में बाइक पर जाते हुए एक-दो परिचित मिले, जो उन्हें घर से इतनी दूर देखकर आश्चर्य व्यक्त कर रहे थे। कल उन्हीं मित्रों के साथ इस्कॉन मंदिर भी जाना है। जून को गाड़ी चलाने में अब जरा भी दिक़्क़त नहीं होती। आज सुबह एक महिला ने उनका फ़्लैट किराए पर लेने के लिए कुछ अग्रिम धनराशि दी, पर शाम को उनका फ़ोन आया, पति का तबादला मुंबई हो गया है, सो वे लोग शीघ्र ही यहाँ से चले जाएँगे। वाक़ई जीवन कितना अनिश्चित है !  

कल शाम वे मंदिर गये थे।उनके मित्रों को भी मंदिर की विशालता तथा भव्यता ने मोह लिया। उन्होंने राधा-कृष्ण के साथ अन्य देवी-देवताओं के विग्रहों के दर्शन किए, दान किया, प्रसाद लिया, लड्डू-पेड़े ख़रीदे और सूर्यास्त के चित्र उतारे।आज शाम एक बिलकुल ही नये रास्ते पर गये। अगरबत्ती फ़ैक्ट्री से होते हुए प्रकृति फार्म पर पहुँचे, एक घंटे में घर वापस आ गये। रास्ता अच्छा था, दो झीलें मिलीं। आजकल उन्हें नये-नये रास्तों पर टहलना अच्छा लगता है। शाम को नन्हे का फ़ोन आया, कल दस बजे तक पहुँच जाएगा। संभवत: वे सब बैंगलोर के प्रसिद्ध विशाल उद्यान लाल बाग जायें।  

Thursday, July 2, 2020

शहीदों का वसंत

आज वसन्त पंचमी है. पूजा कक्ष में माँ सरस्वती की तस्वीर भव्य तरीके सजायी है. दोपहर को कुछ महिलाओं और बच्चों के साथ पूजा की. अभी कुछ देर पहले टीवी पर कुम्भ के दृश्य अनोखे हैं. करोड़ों लोग कुम्भ में आते हैं. सब एक ही लक्ष्य को लेकर, एक ही भाव के साथ. 

रात्रि के नौ बजे हैं. सरस्वती पूजा के किसी पंडाल से आवाजें आ रही हैं. कल भी देर तक आती रहीं. दिन में तेज आवाज में संगीत बजाते हुए और शोर मचाते हुए लड़कों का एक हुजूम देवी की मूर्ति को विसर्जित करने के लिए ले जा रहा था. शाम को नदी से लौटते समय एक सुंदर मूर्ति को सड़क के किनारे पड़े हुए देखा. पूजा के नाम पर लोग कितना कुछ करते हैं पर वास्तविक पूजा से दूर ही रहते हैं. जून से बात हुई आज उन्होंने प्रधानमंत्री का भाषण सुना बड़े से स्क्रीन पर. लन्च पर एक मित्र परिवार आया जो वर्षों पहले दूसरी जगह चले गए थे. शाम को उन्हें नदी पर ले गयी. चाय बागान भी ले गयी पर तब तक अँधेरा हो गया था. 

हरमन हेस की किताब ‘सिद्धार्थ’ पढ़ रही थी आज, वर्षों पहले पढ़ी थी, पर जरा भी याद नहीं थी. बदली के गरजने की आवाज है या जेट की, रात के सन्नाटे में गूँज रही है. आज बड़े भाई से बात हुई, उनके विवाह की  चालीसवीं वर्षगाँठ होती यदि भाभी होतीं, सुंदर तस्वीरों से एक वीडियो उन्होंने बनाया, वह खुश लग रहे थे. उन्होंने नन्हे के साथ उनकी एक पुरानी तस्वीर भेजी है, शायद उनके घर पर खींची गयी होगी. फेसबुक पर पोस्ट की. आज नैनी ने अपनी सास के बारे में मजेदार बातें बतायीं, वह कभी-कभी सुबह बहुत जल्दी उठ जाती है और अपने आप से बातें करती है. कभी बच्चों की तरह उछलती हैं और खुश रहती हैं. उसके ससुर (जिसको गले का कैंसर है,) का गला अब पहले से ठीक है, तम्बाकू छोड़ नहीं सकता सो वह बीड़ी की जगह सिगरेट पीने लगा है. कितना स्वाधीन है मानव और कितना पराधीन, यह कभी-कभी ज्ञात हो पाता है किसी को जब उसके साथ कुछ ऐसा घटा हो. सामान्य जन के  लिए यह समझना भी कठिन है कि वह इतना परतन्त्र है. 

आज कश्मीर में जो हुआ वह भीषण है, भयानक है और निंदा करने के लायक है. कल तक प्रधानमंत्री कह रहे थे कि कश्मीर में हालात सुधर रहे हैं पर आज दोपहर साढ़े तीन बजे विस्फोटक से भरी एक कार को जवानों से भरी गाड़ी से टकरा दिया, भयानक विस्फोट हुआ और उनतालीस जवान मारे गये. सारा देश स्तब्ध है और सभी के मन में क्रोध और दुःख है. शाम को क्लब में मीटिंग थी शायद वहाँ किसी को इस खबर की जानकारी नहीं थे, वे सामान्य ही रहे. प्रधानमंत्री ने पालम हवाई अड्डे पर श्रद्धांजलि अर्पित की उन शहीदों को, जो पुलवामा में मारे गए हैं. 

आज कम्पनी की हीरक जयंती का समापन समारोह है. जून अभी-अभी घर लौटे हैं. सुबह से वर्षा हो रही है, तापमान गिर गया है. पुलवामा हमले की साजिश रचने वाला कामरान आज मारा गया, चार सैनिकों को और शहादत देनी पड़ी. देश भर में आतंकवाद के खिलाफ क्रोध बढ़ता ही जा रहा है. देश में सभी दल एकमत होकर कार्यवाही करने को कह रहे हैं. चुनावी भाषा की जगह देश के प्रति अपना कर्त्तव्य निभाने की भाषा नेता बोल रहे हैं.  

Tuesday, May 28, 2019

वृद्धा की राम राम



महिला क्लब द्वारा संचालित बच्चों के स्कूल की पत्रिका छप रही है, स्वर्ण जयंती समारोह पर. अभी-अभी उसने एक अंग्रेजी व एक हिंदी लेख की प्रूफ रीडिंग की, सोचा, क्यों न वह भी इसमें अपनी एक कविता दे जो काफी पहले बच्चों पर लिखी थी. ब्लॉग पर कुछ दिन पहले लिखी एक कविता प्रकाशित की. काव्यालय पर उसकी प्रतिक्रिया पसंद आई, ध्यान का ही जादू है, यानि परमात्मा का. उसके मन में कल की बात घूम रही है, देश आगे बढ़े इसके लिए उन्हें भी अपने तौर पर कुछ करना होगा. वह स्वच्छता रखने के लिए क्या कर सकते हैं, इस पर मिलकर चिन्तन करना होगा. स्वच्छता ही सेवा है, इस अभियान को उन्हें सफल बनाना है. बच्चों को भी इस काम में बहुत आनंद आता है.

अब एक ही श्वास में पूल की चौड़ाई पार हो जाती है, जब सहज होकर तैरती है तो पता ही नहीं चलता और दूसरा किनारा आ जाता है. कई बार इधर से उधर चक्कर लगाये. आज गहराई वाले स्थान पर भी गयी. सीढ़ी से पूरा नीचे तक, जहाँ फर्श है पूल का. पानी ने पल भर में ऊपर ला दिया. पानी उनका मित्र है, वह देव है, वह डुबाता नहीं है, यदि वे सहज रहें. तभी बच्चे शीघ्र सीख लेते हैं, आज श्वास का अभ्यास किया, एक हाथ पर देह को पानी में संतुलित रखना है, पर अभी तक मुँह ऊपर उठाकर श्वास लेना नहीं आया है. जैसे यहाँ तक पहुंची है, एक दिन वहाँ भी पहुँच जाएगी. तैरना एक सुखद अनुभव है. नाक से पानी गिर रहा है रह-रह कर, कल भी ऐसा हुआ फिर अपने आप ही ठीक हो गया.

आज सुना, धी, धृति और स्मृति बुद्धि के ये तीन रूप हैं. 'धी' समझने की शक्ति है, 'धृति' संयम करने की और  स्मृति याद रखने की शक्ति है. जो हिंसा नहीं करता, उसकी धृति शक्ति बढ़ती है. धृति ही मन का नियमन करती है, मन नियंत्रित रहता है. जहाँ सुख दिखाई देता है, मन उधर जाता है. यदि धृति भंश हुई है तो अहितकर विषयों से स्वयं को रोकने में समर्थ नहीं हो पाता मन. जिस वस्तु से हटना है, धृति यदि प्रबल हो तो हटने में देर नहीं लगती. अहितकर चीजों को भी करता रहता है. हितकारी प्रवृत्ति को धृति नहीं रोकती.

शनि और इतवार पलक झपकते बीत गये. इतवार को बच्चों ने 'शिक्षक दिवस' मनाया. बरामदे में झालर, गुब्बारे आदि लगाकर सजाया. शनिवार को वे डिब्रूगढ़ गये. कुछ देर ब्रह्मपुत्र के किनारे बैठे. जून ने एक तस्वीर उतारी जो एक सुंदर स्मृति बन गयी है. आज ब्लॉग पर कुछ विशेष पोस्ट नहीं कर पायी. हिंदी फॉण्ट को लेकर कुछ समस्या आ रही थी. उस दिन प्रिंटिंग को लेकर जो समस्या थी, उसका हल करने के लिए कम्प्यूटर इंजीनियर आया था, कल फिर आएगा. कल उन्हें मृणाल ज्योति जाना है. शिक्षक दिवस के लिए उपहार लेकर. एक नई कविता भी लिखेगी.

सुबह समय से उठे, हल्का अँधेरा था, आकाश में छाये बादलों की वजह से शायद. सुबह कई बार बल्कि रोज ही एक वृद्ध महिला ( लाठी लेकर चलती हुई )मिलती है. हर मौसम में उसकी भ्रमण के प्रति निष्ठा देखकर एक दिन उसे 'नमस्ते' कह दिया था, अब वह दूर से उन्हें देखकर ही हाथ जोड़कर 'राम राम' कहना नहीं भूलती. सुबह मृणाल ज्योति में 'शिक्षक दिवस' मनाया. दोपहर को सफाई का काम आगे बढ़ा. तीन बजने वाले हैं एक घंटे के लिए पुनः क्लब के काम से बाहर जाना है. आज अभी तक तो चाय पीने के संस्कार को हावी होने नहीं दिया है. 'व्यसन' की परिभाषा एक बार सुनी थी. जिसको पूरा करने से नुकसान होता हो और न करने से चाह बनी रहती हो, अर्थात जो आरम्भ से लेकर अंत तक दुख देने वाला है, केवल मध्य में सुखी होने का भ्रम पैदा करता है.

Tuesday, December 2, 2014

प्रयोगात्मक रेकी

praktikal 

जीवन होश से जीयें, मन में यदि प्रेम का बीज उगे तो उसकी रक्षा करनी पडती है, लोक व्यवहार की चिंता करते रहे तो भगवद् भक्ति टिकेगी नहीं. मन को गहराई से जानना होगा, जागृत अवस्था में ही नहीं, स्वप्नावस्था में भी सचेत रहना होगा. अपने स्वप्नों की समीक्षा करते हुए पता चलेगा की गाँठ कहाँ बंधी है”. आज गुरू माँ ने उपरोक्त वचन अपने प्रवचन के दौरान कहे. उसके जीवन में प्रेम है, जून, नन्हा, भाई-बहन, पिता, ससुराल के सभी लोग, चचेरे-ममेरे भाई-बहन, मित्रगण के परिवार, पड़ोसी, पेड़-पौधे, जीव-जन्तु, प्रकृति, उनका देश, यह ग्रह, यह ब्रह्मांड.. सबके लिए प्रेम है. यह प्रेम भी आसक्ति रहित होना चाहिए, निष्काम होना चाहिए, इन सब से उसे क्या मिलने वाला है इसकी रत्तीमात्र भी परवाह न करते हुए वह इनके लिए क्या कर सकती है यही भाव रहना चाहिए. मन हल्का रहेगा. यूँ भी जीवन का कोई भरोसा नहीं, कब किस वक्त क्या देखना पड़ सकता है कोई कुछ नहीं कह सकता. अब बाबाजी आ गये हैं, उनकी शांत मुद्रा हृदय में शांति उत्पन्न करती है, नश्वर वस्तुओं के ध्यान से मति भ्रमित हो जाती है और कोई अपने वास्तविक रूप को जान नहीं पाता, लेकिन जब सुख की चाह वस्तुओं से नहीं होती, विचार पावन होते हैं. आत्मबल बढ़ता है. सत्संग सर्वश्रेष्ठ फल देने वाला है. संग दोष से बल घटता है.

पिछले पांच दिनों से स्वयं के निकट आने का अवसर नहीं मिला. शनिवार, इतवार को वैसे ही समय नहीं मिलता. एक दिन जुकाम से परेशान थी. कल पन्द्रह अगस्त की पार्टी थी, परसों जून का जन्मदिन था. अभी भी पूरी तरह जुकाम ठीक नहीं हुआ है. आज भी अमृत वचन सुने थे सुबह, कुछ-कुछ याद है, बाबाजी ने कहा, जो अपने साथ ईमानदार नहीं वह किसी के साथ ईमानदार नहीं हो सकता. सहजता जीवन में आ जाती है तो व्यक्ति साधारण हो जाता है, दम्भ नहीं रहता, अभिमान सूक्ष्म रूप में भी हो तो उतना ही हानिप्रद है, उसे अपनी देश भक्ति का अभिमान है, यह भी गलत है, यदि कोई अपने देश से प्रेम करता है तो यह एक सहज, स्वाभाविक बात होनी चाहिए न कि कोई विशेष बात. संत की परिभाषा भी उन्होंने बतायी, वे लोग, जो अपने घर का रास्ता भूल गये हैं, असंत हैं, जिसे अपने घर का रास्ता याद है वह संत है. अभयदान सब दानों में श्रेष्ठ है.

आठ बजने को हैं. कल शाम वे क्लब गये, लाइब्रेरी में क्विज बुक (विज्ञान) के लिए आलमारी खोली तो practical reiki किताब मिली जिसमें step by step स्वयं को व दूसरों को रेकी देने की बात सचित्र समझाई है. उसका गला अभी पूरी तरह ठीक नहीं हुआ है, अध्यापिका को अभी-अभी फोन करके मना किया. स्टार टीवी पर ‘आत्मा’ आ रहा है. “हमारी बुद्धि देहात्म हो गयी है, हम देह के परिचय को स्वयं मान बैठे हैं अर्थात आत्मा मान बैठते हैं”. अभी एक सखी का फोन आया, वह कम्प्यूटर ऑफ करने का तरीका पूछ रही थी. सुबह नन्हे ने इन्टरनेट कनेक्ट किया तो दो-तीन इमेल मिले अभी देख नहीं पाये हैं, सुबह-सुबह इतना वक्त नहीं होता. नन्हा लगभग रोज ही भागते-दौड़ते बस पकड़ता है. आज सुबह जून और वह दोनों उसके बारे में बात कर रहे थे. वह आजकल छोटी-छोटी बात पर चुप हो जाता है, शायद पैर के दर्द की वजह से. जून की तरह उसका भी फ़्लैट फीट है, पैर में दर्द स्वाभाविक है. कुछ व्यायाम जो पैर में कर्व बनाने में सहायक हैं, जून ने सिखाये हैं. कल art of living के बेसिक कोर्स के लिए फार्म भी आ गया है. यकीनन उसे इस कोर्स से लाभ होगा. आज पत्रों के जवाब भी देने हैं. दोपहर को नन्हे का पायजामा सिलना है. कई दिनों से व्यायाम/अभ्यास रुका है. सोमवार से सम्भवतः वह पूर्ण स्वस्थ हो जाएगी.


Tuesday, November 25, 2014

अज्ञेय की कविताएँ


दोनों देशों के विदेश मंत्रियों ने वार्ता को असफल नहीं बताया है, उम्मीद की किरण अभी भी रोशन है. कल रात से वर्षा हो रही है, मौसम कल जितना गर्म था आज उतना ही सुहावना है. बाबाजी आज कीर्तन करवा रहे थे. उससे पहले टैगोर की जापान यात्रा का एक संस्मरण सुनाया. गुरूमाँ ने ऐसे नृत्य का जिक्र किया जो किया नहीं जाता, हो जाता है. बहुत दिनों से उसके साथ ऐसा नहीं हुआ है शायद आज शाम को ही इसका अवसर आए, क्योंकि वर्षा यदि थमी नहीं तो घर पर ही टहलना होगा जो उसके मामले में कैसेट लगाकर थिरकना होता है. कल दोनों पत्र भी लिखे और दीदी को जवाब भी दिया है. कल रात छोटी बहन व पिता से बात हुई. आज दोपहर स्टोर की सफाई करनी-करवानी है.

सुबह-सवेरे भजन जब अपने आप होने लगे, मन परमेश्वर की स्मृति में सहज रूप से लगा रहे, उसे लगाना न पड़े तो ही जानना चाहिए कि प्रेम का अंकुर फूटा है. चारों ओर उसी का वैभव तो बिखरा है, उसी की सृष्टि का उपयोग वे करते हैं पर उसे भुला बैठते हैं. जबकि वह हर क्षण साथ है, दूर नहीं है. बस एक पर्दा है जो उन्हें एक-दसरे से अलग किये हुए है. वह हर क्षण श्रद्धा का केंद्र बना है, हर श्वास उसकी कृपा है. मन यदि हर क्षण उसी को अर्पित रहे तो इसमें कोई विक्षोभ आ भी कैसे सकता है. संसार की बातें उत्पन्न करने वाला भी वही है. यही आराधना ही राधा है, जिसके माध्यम से कृष्ण को पाया जा सकता है. वह आत्मा है, जिसके प्रसाद के बिना मन आधार हीन होता है, बाहर का सुख टिकता नहीं, यह अनुभव बताता है. उस एक से प्रीति हो जाने पर परम सुविधा मिलती है जो कभी छूटती नहीं, अपने उच्च तत्व का साक्षात्कार करना यदि आ जाये तो यह जो गड्डमड्ड, खिचड़ा हो गया है, देह के अस्वस्थ या मन के दुखी होने पर स्वयं को अस्वस्थ या दुखी मानना, छूट जायेगा. जैसी दृष्टि होगी यह जगत वैसा ही दिखेगा. अँधेरी रात में एक ठूँठ को एक व्यक्ति चोर समझता है, दूसरा साधू और तीसरा रौशनी करके उसकी असलियत पहचानता है. उन्हें भी इस जगत की वास्तविकता को पहचानना है. न इससे आकर्षित होना है न ही द्वेष करना है. तभी वे मुक्त हैं.

आज अमावस्या है. सुबह से ही मन में उत्साह है. एक वक्त के भोजन में फलाहार लेना है आज, जितना हो सके उतना व्रत पालना ही चाहिए. कल दोपहर और शाम को अज्ञेय की कविताएँ पढ़ीं, अनुपम हैं और भावना के उस लोक में ले जाती हैं जहाँ प्रेम है, शरद की चाँदनी, टेसू के फूल हैं, जहाँ इष्ट की आराधना है, “मैं संख्यातीत रूपों में तुम्हें याद करता हूँ” अज्ञेय की कविता अंतर को गहरे तक छू जाती है. अभी-अभी गुरू माँ ने कहा ईश्वर को प्रेम करने का अर्थ संसार का विरोधी हो जाना नहीं है. जब जीवन में प्रेम होता है, तब वह सभी के लिए होता है. उसमें समष्टि समा जाती है. ईश्वर, प्रकृति, मानव उससे कुछ भी अछूता नहीं रहता, प्रेम में महान ऊर्जा छुपी है, वह आस-पास की हर वस्तु को एक नये दृष्टिकोण से दिखाती है. उसे लगता है, मन को एकाग्र करना हर वक्त संभव नहीं पर यह सम्भव है कि इस बात का बोध रहे कब मन एकाग्र है और कब एकाग्र नहीं है, और कब एकाग्र नहीं है ? जब मन गुण ग्राही होता है, बुरी से बुरी परिस्थिति में भी कोई न कोई अच्छाई खोज लेता है, तब वह एकाग्र होना सीख लेता है. उसने प्रार्थना की, आज का दिन ईश्वर के प्रति समर्पित हो, दिन भर वह उसकी याद अपने मन में बनाये रखे, सभी के प्रति मंगल कामना से मन युक्त रहे !   



Friday, September 19, 2014

चाणक्य नीति


अभी कुछ देर पूर्व उसके मन में यह विचार आया कि क्यों न अपने नित्य के डायरी लेखन को ऐसा रूप दे जो बाद में पुस्तक रूप में आने के योग्य हो जिसका नाम हो उसकी आध्यात्मिक डायरी और यह उसके उन प्रयासों का लेखा-जोखा हो जो वह एक बेहतर मानवी बनने के लिए करना चाहती है. कभी सफल होती है कभी नहीं भी होती. यह परिवार, समाज, राज्य और देश उससे भी अधिक मानव मात्र के प्रति उसके संबंधों को प्रदर्शित करे जिसमें दिन-प्रतिदिन में (बाहरी तथा आंतरिक दोनों) घटने वाले व्यापारों का निष्पक्ष विवरण हो, जो आज के समय का दर्पण हो, व्यक्तिगत स्तर के साथ साथ देश के स्तर पर भी जो महत्वपूर्ण घटा हो तथा जसका असर किसी न किसी रूप से उन पर पड़ने वाला हो. वह यह लिख रही थी कि नन्हा अस्पताल से चिकन पॉक्स का प्रतिरोधक टीका लगवा कर आ गया. कल ही उसके पापा ने कम्पनी के अस्पताल में बेहद महंगा यह टीका लगवाने का प्रबंध किया था. न जाने क्यों उसे इसके प्रति श्रद्धा नहीं है और उसने देखा कि न ही नन्हे को इसके लग जाने से कोई राहत का अहसास हुआ, भविष्य में क्या होगा कोई नहीं जानता, क्या यह टीका लगवा लेने के बाद कभी भी उसे चिकन पॉक्स नहीं होगा, इसकी गारंटी कोई नहीं दे सकता. जिस देश में आपरेशन करा लेने के बाद भी औरते माँ बन जाती हैं वहाँ ऐसा संदेह होना क्या स्वाभाविक नहीं ? कल नन्हे को दसवीं की किताबें मिल गयीं यह वर्ष उसके जीवन का एक महत्वपूर्ण वर्ष है और उनके पूरे परिवार का भविष्य इससे कहीं न कहीं जुड़ा है.

‘तहलका डाट कॉम’ नामक कम्पनी ने खोजी पत्रकारिता के द्वारा देश की सत्तारूढ़ पार्टी तथा गठ्बन्धन के दिग्गज नेताओं व रक्षा मंत्रालय के उच्च अधिकारियों को बेनकाब कर  देश में तहलका मचा दिया है. एक काल्पनिक कम्पनी के प्रतिनिधि बन कर कुछ पत्रकार छह महीनों तक नेताओं व अधिकारियों से बेरोक-टोक मिलते रहे, उनको सौदे कराने में सहायता करने के एवज में रिश्वत देते रहे, उनकी तस्वीरें उतारते रहे और किसी को भनक भी नहीं हुई. इससे यही अर्थ निकाला जा सकता है कि रक्षा संबंधी मामलों में पैसों का लेनदेन एक सामान्य घटना है, कि पार्टी फंड के नाम पर ऐसा तो हमेशा से होता आया है. प्रधान मंत्री और रक्षा मंत्री ने अपने टीवी भाषण में देशवासियों को विश्वास में लेने की कोशिश की है पर जनता जो पहले से ही राजनीतिज्ञों को भ्रष्टाचार में लिप्त मानती है, एक और नाटक की साक्षी बनी यह सवाल पूछेगी कि नेताओं का पेट इतना बड़ा क्यों बनाया ईश्वर ने ?

कल शाम कुछ मित्र परिवार मिलने आये, चर्चा का विषय तहलका ही बना रहा. यह भी सम्भव है, सरकार गिर जाये और दुबारा चुनाव हों पर भ्रष्टाचार का अंत तो इससे नहीं हो जायेगा. बातों-बातों में किसी ने कहा, चाणक्य शाम को जब अपने निवास पर लेखन कार्य करता था तो दरबार का कार्य होने पर राज्य की लेखन सामग्री का उपयोग करता था, अपना कार्य अपनी लेखन सामग्री से करता था. आज के मंत्री चाहते हैं, उनके परिवार का ही नहीं आने वाली पीढ़ियों का व्यय भी राज्य वहन करे.

आज नन्हे की नई कक्षा की पहली क्लास होगी, आज पूरे एक महीने की छुट्टियों के बाद  स्कूल खुला है. कल उसकी स्कूल ड्रेस की जाँच की तो पता चला पैंट छोटी हो गयी है और कमीज बेरंग, जून उसी समय नये कपड़े दिलाने ले गये, भाग्यशाली है वह कि आवश्यकता होते ही उसकी पूर्ति का साधन उसके माता-पिता के पास है, ऐसे हजारों-लाखों बच्चे हैं जो धन के अभाव में स्कूल तक नहीं जा पाते हैं. कल वे एक मित्र के यहाँ गये, उनके वृद्ध माता-पिता आये हुए थे. पिता अशक्त हो गये हैं, डायबिटीज के मरीज हैं लेकिन मन उतना ही सशक्त और इच्छालु है. दूसरों की बात समझना ही नहीं चाहते अपनी इच्छा यदाकदा जाहिर कर देते हैं, वरना चुप रहते हैं. माँ सामान्य हैं. पिछले दिनों कई वृद्धजनों से मिलने का अवसर मिला है. अंत समय तक जो समझदारी का परिचय दे, दूसरों की भी सुने, सदा अतीत में ही न विचरे, ऐसे कम ही मिले. उनकी अपनी वृद्धावस्था आदर्श हो ऐसी उसकी कल्पना है. शारीरिक रूप से स्वस्थ रहें इसका प्रयास अभी से करना होगा. आर्थिक रूप से किसी पर बोझ न बनें और ऐसी प्रवृत्तियों को प्रश्रय देना भी त्यागना होगा जो बुढ़ापे में तकलीफदेह होती है जैसे स्वाद के आधार पर भोजन का चुनाव, व्यायाम करने में आलस्य और व्यर्थ ही बोलने की आदत. आज गोयनका जी ने कहा, सम्यक शील और सम्यक समाधि होगी तभी सम्यक प्रज्ञा जागेगी और प्रज्ञा यानि प्रत्यक्ष ज्ञान, अपनी अनुभूतियों पर उतरा ज्ञान ही काम आता है, दूसरों का ज्ञान प्रेरणा भर बन सकता है अपर जीवन दृष्टि नहीं दे सकता.



Monday, August 19, 2013

आचार्य गोयनका जी


“दुनिया को एक बच्चे की निगाह से देखने की कोशिश यानि एक नजर जो कौतूहल से भरी हो और उन छोटी-छोटी बातों और चीजों के लिए तारीफ से भरी हो जिन्हें बड़े नजरंदाज कर जाते हैं”. पीटीवी पर उसने यह टिप ऑफ़ the week सुना, अच्छा है. कल से चुनावों के परिणाम आने का सिलसिला जारी है, कांग्रेस पिछड़ रही है बीजेपी उभर रही है लेकिन यही लग रहा है कोई पार्टी स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं कर पायेगी. कल दोपहर दो बच्चे पढ़ने आये और एक घंटा कैसे बीत गया पता ही नहीं चला, अपने समय और शक्ति का सही उपयोग ! शाम को वापस आकर नन्हे के साथ बैडमिन्टन खेला, फिर वहीं लॉन में ही जून के साथ ठंडी हवा में टहलते हुए दिन भर की बातों का जायजा और अगले दिन की प्लानिंग...

जून आज मोरान गये हैं, सुबह से वर्षा हो रही है. एकबार उसके मन में आया फोन करके पुरानी पड़ोसिन को घर आने को कहे, पर कल शाम ही उससे हिन्दू-मुस्लिम पर बहस हो गयी. कल शाम को जाने क्यों उसे पाक पत्तन, मिंटगुमरी की याद हो आयी, अपने उस सपने की भी जिसमें वह पाकिस्तान गयी है. रात को सपने भी इसी से सम्बन्धित आते रहे, वे एक बड़े हॉल में हैं, आधे में हिन्दू और आधे में मुस्लिम, दोनों एक बड़े तनाव से गुजर रहे हैं. फिर नींद खुल जाती है और दहशत से मुक्ति मिलती है. पता नहीं वह दिन कब आयेगा जब लोगों के दिलों की नफरत दूर होगी. शताब्दियों पूर्व मुस्लिम इस मुल्क में आये और शासक बन कर रहे, यही कारण था कि हिन्दू-मुस्लिम कभी एक नहीं हो पाए. हालाँकि कितने कवियों, शायरों व विद्वानों ने एकता की बात की और किसी हद तक दोनों ने एकदूसरे को अपना लिया पर मनों की मलिनता गयी नहीं है. लेकिन वह शुरू से उस मुल्क से जुड़ी है, एक सपना है कि कभी न कभी वह  वहाँ जाएगी. आज शुक्रवार है यानि बदलते मौसम का दिन. पिता की डायरी में कुछ प्रेरणास्पद बातों को पढ़ा, पूरा खजाना है उसमें ऐसी बातों का जो दिल को गहरे तक छू जाती हैं. उन्हें लिखेगी इसके बारे में. कल जून से क्रोशिये का धागा भी मंगवाया है, टीवी देखते समय हाथ खाली रहें तो कुछ अजीब सा लगता है.

आज महीनों बाद ‘आधा चाँद’ देखा, इतना छोटा सा देश है पर वहाँ इतनी शायराएँ हैं और उन्हें टीवी के जरिये लोगों तक पहुंचाया भी जाता है, डीडी पर ऐसा कार्यक्रम कभी नहीं देखा. आज धूप निकली है, वर्षा में लगातार भीगते पेड़-पौधे धूप का स्पर्श पाकर सूखने का प्रयास कर रहे हैं, उनके भुट्टे भी लगभग तैयार हैं. आज का tip of the day है, दिन भर में कम से कम एक बात को बर्दाश्त करें, यानि आपको वह बात बुरी भी लग रही तो अपना क्रोध जाहिर न करें. कल शाम एक परिचित ने फोन किया children meet के लिए एक skit लिखने को कह रही है, उसने ‘हाँ’ कह दी है, उसे यकीन है, खोजकर या स्वयं लिखकर वह दे देगी. उसे कुछ काम चाहिए.

कल रात जून और नन्हा star trek देख रहे थे और वह पढ़ रही थी, thought verses action, अच्छा लगा. ‘आपकी सरकार’ में कई राजनेताओं के विचार सुने, अभी तक स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाई है कि केंद्र में किसकी सरकार बनेगी.

आज सुबह नींद जल्दी खुली थी पर आलस्य वश (जो चित्त की दुर्बलता है)  नहीं उठी, फिर जून ने उठाया. ‘जागरण’ में आचार्य गोयनका जी ने श्वास को देखते हुए मन को विकारों से मुक्त करने का उपाय विस्तार से बताया, अंत में धर्म की परिभाषा दी-

धर्म न हिन्दू बुद्ध है, धर्म न मुस्लिम जैन
धर्म हृदय की शुद्धता, धर्म हृदय का चैन

जो इतनी सरल है कि कोई भी उसे समझ सकता है, और इतनी कठिन है की उसका सार अंतर में उतारने में किसी को वर्षों लग जाएँ. कल शाम से वर्षा हो रही है, बगीचे में कोई काम नहीं हो पा रहा है. कल जून उन्हें दफ्तर ले गये, कम्प्यूटर पर गेम खेला व पेंटिंग का अनोखा अनुभव लिया, कम्प्यूटर पर काम करते समय लगता है, किसी दूसरी दुनिया में पहुंच गये हैं, जून पिछले कई दिनों से कम्प्यूटर लेने के विषय में जानकारी इक्कट्ठी कर रहे हैं. कल वह वैक्यूम क्लीनर के लिए तिनसुकिया फोन भी करते रहे पर नहीं मिला. दोनों घरों पर फोन करने का प्रयास भी किया पर निराशा ही मिली. उसका ध्यान इन सब बातों की ओर नहीं जाता, उसके भीतर विचारों की एक अनोखी दुनिया है.