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Tuesday, May 5, 2026

स्पंद कारिका


स्पंद कारिका 


आज समाचारों में सुना राष्ट्रपति पद के लिए भाजपा की उम्मीदवार श्रीमती द्रौपदी मुर्मु जी हैं। पहली आदिवासी महिला, जो इतने बड़े पद तक पहुँचेंगीं। वह झारखंड की राज्यपाल रहा चुकी हैं और उड़ीसा विधान सभा में कई बार मंत्री पद भी संभाल चुकी हैं।छोटी बहन ने वापस जाकर आर्ट ऑफ़ लिविंग का पहला बेसिक कोर्स करवाने के लिए काम करना अभी से शुरू कर दिया है। पहले वह सहायक शिक्षिका के रूप में कोर्स करवाएगी, फिर कोड मिल जाने के बाद स्वतंत्र रूप से। दोपहर को उन्होंने यू ट्यूब पर एक आध्यात्मिक फ़िल्म देखी, जो अनोखे जीवों व प्राणियों से परिचय करवाती है। देह में आत्मा की उपस्थिति को सिद्ध करने के लिए बहुत अच्छी दलीलें देती है।शाम को वे सब एपिक रॉक गये, कुछ देर वहाँ बैठे जहाँ एक झरना बह रहा था। वर्षा के मौसम में झरनों में एकाएक पानी बढ़ जाता है।कल नन्हा सभी को मैसूर ले जाने वाला है।जहाँ छोटी बहन दो दिन अपने जेठ-जेठानी के पास रहकर वापस आएगी। 


आज बहुत दिनों के बाद अपने पुराने समय पर डायरी उठायी है। परसों की रात मैसूर के निकट स्थित एक हरे-भरे फ़ार्म हाउस ‘कैरिस ब्रुक’ में बिताकर, कल दोपहर का लंच मैसूर में करने के बाद वे शाम तक घर लौट आये।पापाजी से बात हुई, उसकी एक कविता पढ़कर कह रहे थे, दुनिया में सभी अपने-अपने काम में लगे हैं, भक्त व कवि भी इसी तरह अपने काम में लगे हैं। परमात्मा अनंत रूपों में स्वयं को प्रकट कर रहा है। मन संदेह करता है पर आत्मा सदा एक रस साक्षी मौजूद है, वह प्रेम, शांति व करुणा का सागर है, वही सत्य है।आज भी छात्राएँ हिन्दी पढ़ने आयी थीं, जिनकी मातृ भाषा हिन्दी नहीं है, उन्हें कितनी परेशानी होती है बोलने में, जैसे उसे कन्नड़ बोलने में होती है। 


आज का दिन कुछ अलग बीता, सुबह सब सामान्य था, टहलने गई तो पैरों में भारीपन लगा, शरीर में स्फूर्ति नहीं थी। योगासन भी पूरे नहीं हो पाये। नाश्ते के बाद टाइप करने बैठी तो शरीर अलसा रहा था। भोजन बनाया तो किसी छोटी सी बात पर मन झुंझला गया, कटु तो नहीं एक-दो शब्द तेज आवाज़ में निकले, जैसे कोई भीतर से स्वयं ही निकाल रहा हो। दिन भर कुछ नहीं खाया, रात्रि के समय कुछ भूख का अहसास हुआ। कर्मों के फल के रूप में भी कर्म होते हैं, यह आज जैसे स्पष्ट हो रहा था।जून शांति से सब देख-सुन रहे थे, उन्होंने कुछ प्रतिवाद नहीं किया।


आज दोपहर बारह बजे वे केंगरी रेलवे स्टेशन जाकर छोटी बहन को ले आये।उसने साड़ियाँ, सूट व कुर्ते दिखाये, जो मैसूर से लायी है। शाम को उन्होंने मिलकर बड़ी स्क्रीन पर वे सारे फ़ोटोज  देखे, जो पिछले कई दिनों से खींच रहे थे।उसके बाद सोने से पहले साधना, भजन, भोजन और रात्रि भ्रमण।  


आज जुलाई का प्रथम दिन है। आर्ट ऑफ़ लिविंग की नयी-नयी बनी शिक्षिका मोबाइल पर हैप्पीनेस कोर्स का मैनुअल पढ़ रही है। जून भी मोबाइल पर कुछ देख रहे हैं। शाम को वे नापा के पीछे वाली सड़क पर टहलने गये, जगह-जगह निर्माण कार्य शुरू हो गया है। पहले की सी शांति भी नहीं थी और न ही सफ़ाई! जून ढेर सारे फल लाए थे, ड्रैगन फ़्रूट, लंगड़ा आम और जामुन बहुत मीठे थे। पापा जी ने बताया, छोटा भाई बहरीन से लौट आया है। सुबह वे आश्रम गये थे। हर्बल टी लेने के प्रकरण में जून से उसकी बहस हो गयी, पर जल्दी ही स्मरण आ गया, आश्चर्य हुआ कि अभी भी आग्रह शेष है भीतर ! मन की हज़ार परते हैं, जिन्हें शायद भगवान भी नहीं जानते ! 


आज सुबह टहलने गये तो हवा ठंडी थी और आकाश पर चंद्रमा अपनी आभा बिखेर रहा था।जुलाई का महीना बैंगलोर का सबसे ठंडा महीना कहा जाता है। इसी महीने की तेरह तारीख़ को गुरु पूर्णिमा है।गुरुजी ‘स्पन्द कारिका’ पर बोलने वाले हैं। सोसाइटी में गणेशोत्सव का उद्घाटन समारोह है। दो माह तक ये कार्यक्रम चलेंगे। छोटी बहन को कल वापस जाना है।सुबह उसने साइकिल चलाने का अभ्यास किया।वर्षों पूर्व सेना में काम करते समय उसने साइकिल चलायी थी। पिछले दो हफ़्ते उन्होंने साथ बिताये। अच्छा लगा। शाम को वे नन्हे के यहाँ गये। 


आज से नूना स्वामी रामानन्द जी द्वारा पर दिया गया प्रवचन सुनना शुरू किया है। कुछ-कुछ समझ में आ रहा है।गुरु पूर्णिमा से पहले कुछ भूमिका तो तैयार हो जानी चाहिये मन में।यह नौवीं शताब्दी के कश्मीर शैव दर्शन का एक ग्रंथ है,जो वासुगुप्त द्वारा रचित शिव सूत्रों पर आधारित है । स्पंद का अर्थ है भगवान शिव की शक्ति के दिव्य कंपन, जिससे इस सृष्टि का उदय और विलय होता है। 


इस महीने चार रिश्तेदारों के जन्मदिन पड़ते हैं, वह सभी के लिए कविता लिखेगी। आज ट्रांसक्रिप्शन का कार्य भी आया। पापाजी आज गर्मी या उम्र के कारण थोड़ा सा परेशान थे, जो स्वाभाविक है। मधुमालती में पहली बार फूल लगे देखे। सहजन का पेड़ तेज हवा में गिर गया था, नापा का माली आकर उसे सहारा देकर सीधा कर गया है, पता नहीं बचेगा यह नहीं।जड़ें मज़बूत होंगी तो शायद बच जाये। सुबह छोटी बहन का फ़ोन आया, वह घर पहुँच गई है।वहाँ उसे गर्मी का अहसास हो रहा है, एक महीना वह बैंगलुरु के सुहाने मौसम में रहकर जो गई है। 


कल नन्हे ने बूस्टर वैक्सीन लगवा ली। थोड़ा बहुत साइड इफ़ेक्ट भी हुआ। आज भी ‘स्पन्द  कारिका’ सुना, मन में जैसी भावना होती है, परिणाम भी वैसा ही आता है। आत्मा तो सागर की तरह है, वे अपने मन को चम्मच जितना रखेंगे तो उतना ही समायेगा। यदि विशाल बनाएँगे तो उतना अधिक मिलेगा। यदि क्षीर सागर के साथ एक रूप हो जाएँगे तो वही बन जाएँगे। मानव अपने अनंत स्वरूप को भुलाकर स्वयं को उपाधि से जोड़कर व्यर्थ ही सुखी-दुखी होते रहते हैं। आनंद उनका स्वभाव है  और सत्य उनका स्वरूप ! 


आज भी कल की तरह दिन भर वर्षा होती रही। आज ट्रांसक्रिप्शन का कार्य पूरा हो गया। गुरु पूर्णिमा पर लिए भी एक लेख का अनुवाद करना है। लेखन कार्य में कुछ कमी आई है, पर जीवन जो रंग दिखाए, स्वीकार है। जन्मदिन की दो कविताएँ टाइप कीं।आज पतंजलि योग सूत्र पढ़ते समय कितनी सरलता से स्पष्ट हुआ कि ‘योग’ चित्त वृत्ति का निरोध कैसे है ? और जब ऐसा होता है तब द्रष्टा अपने स्वरूप में कैसे ठहर जाता है। यदि ऐसा नहीं होता अर्थात वृत्ति बनी रहती है तो द्रष्टा उसी वृत्ति का आकार ग्रहण कर लेता है।जैसे ब्रह्मा कुमारी कहती है आत्मा जब सोचती है तब मन बन जाती है। अब मन्त्र जाप का महत्व भी ज्ञात हो रहा है। मन जब एक मन्त्र का आकार ले लेता है, तब दो जाप के मध्य में द्रष्टा का अनुभव होता है। इसीलिए ॐ को परमात्मा का नाम कहा गया है। सारे शब्द ॐ में समा जाते हैं। ॐ के बाद जो मौन है, वही आत्मा का स्वरूप है। उसमें टिक जाना ही योग है। भीतर जितने भी विचार चलते हैं, वे आत्मा से ही उपजे हैं, पर उससे दूर ले जाते हैं। जैसे लहर सागर से ही उपजी है, पर उससे ऊपर उठती है तो दूर चली जाती है। 


आज जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे की नारा शहर में चुनावी भाषण देते समय मृत्यु हो गयी, उन पर एक व्यक्ति ने गोली चलायी थी। चीन में इस बात की ख़ुशी मनायी गई। गुरुजी ने भी ट्वीट किया, वह उनसे जुड़े हुए थे।  


Tuesday, January 2, 2024

जूलियस सीज़र का कैलेंडर

रात्रि के पौने नौ बजे हैं। वैसे तो चारों ओर शांति है, पर कहीं दूर से किसी के घर कोई मशीन चलने की आवाज़ आ रही है। यहाँ दाँये-बायें, आगे-पीछे कोई न कोई घर बनता ही रहता है, फिर उसमें इंटीरियर का काम शुरू हो जाता है। यह तो अच्छा है कि शाम को छह बजे के बाद शोर नहीं कर सकते, शायद किसी ने विशेष अनुमति ली होगी। मौसम आज ज़्यादा ठंडा नहीं है। बहुत दिनों बाद पंखा चलाया है। रात्रि भ्रमण के समय देखा, आकाश पर चाँद खिला था, कल पूर्णिमा है, आकाश निर्मल था और हवा सुखदायी। उधर उत्तर भारत में कड़ाके की ठंड पड़ रही है, और हो भी क्यों न, दिसंबर का अंतिम सप्ताह है।आज हज़रत यूसुफ़ के बारे में एक वीडियो देखा, मिस्र की पुरानी सभ्यता के बारे में रोचक जानकारी मिलती है। उन्हें कितनी तकलीफ़ें सहनी पड़ीं, पर ईश्वर पर उनका भरोसा अटूट था। परमात्मा सभी के भीतर चेतना और संकल्प शक्ति के रूप में मौजूद है। इच्छा, क्रिया व ज्ञान की शक्तियाँ जो मानव के भीतर हैं, परमात्मा की देन हैं। मन जो भी सोचता है, बुद्धि उसे साकार करके दिखाती है। 


नन्हे ने कहा है नये वर्ष के दिन वे सभी पिकनिक के लिए पिरामिड वैली जाएँगे। आज किसानों की सरकार से हुई बातचीत का क्या नतीजा निकाला, पता नहीं है। ईश्वर करे, नया साल शुरू होने से पहले ही किसान अपना आंदोलन वापस ले लें। आज जून एक पेंटर को लाये थे, बेंत व लकड़ी के फ़र्नीचर पर उसने टचवुड लगाया। लगभग हर साल दिसम्बर में वह ऐसा करवाते हैं, इसीलिए वर्षों बाद भी फ़र्नीचर चमकता रहता है। आज सोसाइटी की तरफ़ से पानी डालने वाला आदमी आया तो धनिये की नन्ही पौध पर तेज बौछार कर उसे छितरा दिया। उसने ग़ुस्से का अभिनय किया ताकि वह आगे ऐसा न करे। नाटक ही करना है तो पूरे जज्बे के साथ करना चाहिए, वरना ज़िंदगी एक ख़्वाब से ज़्यादा तो नहीं ! 


वर्ष का अंतिम दिन ! बाहर बच्चों के खेलने की आवाज़ें आ रही हैं। आज संभवतः देर तक जागकर वे नव वर्ष का स्वागत करेंगे। उन दोनों का तो वही प्रतिदिन का सा कार्यक्रम है। यह समय कुछ लिखने-पढ़ने का है। वर्षों पहले टीवी पर ढेर सारे कार्यक्रम देखते थे, अब इच्छा नहीं होती। उसे याद आया, हज़रत यूसुफ़ की कहानी में देखा था, अब्राहम को जब अपने पुत्र इस्माइल को बलिदान करने को कहा गया तो वह राज़ी हो गये। उन्हें अपना पुत्र वापस मिल गया जब वे उसे छोड़ने को राज़ी थे। जब कोई जगत से चिपका रहता है तो जगत उसे नहीं मिलता। जब त्याग देता है तो वह पीछे-पीछे आता है। ‘तेन त्यक्तेन भुंजीथा’ का यही तत्पर्य है। वे श्वास छोड़ते हैं तो अगली श्वास भीतर भर जाती है। जब रिश्तों पर पकड़ ढीली हो तो वे अपने आप ही क़रीब होने का अहसास करा देते हैं। नन्हे ने बताया, सोनू को दो दिन से सर्दी लगी हुई थी। उसकी माँ को भी आँख में कुछ समस्या का पता चला है, डाक्टर ने आँख का व्यायाम करने को कहा है। वे लोग कल सुबह आयेंगे और सब मिलकर घूमने जाएँगे। आज जून के पुराने अधिकारी का फ़ोन आया, उन्हें कोरोना हो गया था, उनके पुत्र को भी।उन्होंने अपने दो अन्य मित्रों से भी बात की, नये साल में कुछ दिनों तक यह आदान-प्रदान चलता रहेगा। उसने नेट पर पढ़ा, चार हज़ार साल पहले भी नया साल मनाने की प्रथा बेबीलोन में थी। पर उस समय यह वसंत के आगमन पर २१ मार्च को मनाया जाता था। जूलियस सीजर ने ईसा पूर्व पैंतालीसवें वर्ष में पहली बार प्रथम जनवरी को नया वर्ष मनाने की प्रथा की शुरुआत की। 


Monday, December 26, 2022

होप और हम

सुबह उठे आकाश में तारे चमक रहे थे। दिन में धूप भी तेज थी। शाम को माली आया , एक सवा घंटे में सारे गमलों की निराई-कुड़ाई कर दी। बालसम में फूल आ रहे हैं। बगीचे में ही थे कि पड़ोसी छड़ी लेकर टहलते हुए दिखे, कहने लगे, पीछे की लाइन में एक व्यक्ति गिर गया, अस्पताल ले जाना पड़ा है, फ़ालिज का अटैक पड़ा है, उमर भी ज़्यादा नहीं है। सभी को स्वास्थ्य का ध्यान रखना कितना आवश्यक है। कोरोना काल में जीवन कितना क्षण-भंगुर हो गया है । सुबह देखा, गेस्ट रूम में कमांड टेप से लगायी पेंटिंग गिरी हुई थी, शायद तस्वीर वजन के हिसाब से टेप की शक्ति कम थी । शीशा टूट गया, नैनी ने बिना किसी भय के सफ़ाई कर दी। दीदी का फ़ोन आया दोपहर को, बच्चों की बातें बतायीं। बड़ी बिटिया अपनी वेबसाइट खोल रही है, छोटी ने बच्चे के पालन-पोषण के लिए जॉब छोड़ दी है। बड़ा भांजा अपनी कंपनी बंद कर के जॉब लेगा। छोटे की कम्पनी ठीक चल रही है। छोटी बहन और बहनोई आर्ट ऑफ़ लिविंग के स्वयंसेवक बन गए हैं। मृणालज्योति की एक अध्यापिका से फ़ोन पर बात की, स्कूल बंद है, ऑन लाइन क्लासेज़ हो रही हैं। आज एक नया स्थानीय गेम खेला, लकड़ी का बना आधार है और कौड़ियों से खेलते हैं, बहुत रोचक लगा। लाओत्से की पुस्तक भी बहुत ज्ञानवर्धक और रोचक है, उपनिषदों से कम नहीं था उनका ज्ञान। 


रात्रि के नौ बजने को हैं। आज का इतवार काफ़ी अलग था अन्य दिनों की अपेक्षा। नसीरूद्दीन शाह की फ़िल्म ‘होप और हम’ देखी। बहुत अच्छी फ़िल्म है, एक परिवार के सपनों की कहानी, जिसमें एक पुरानी जर्मन फ़ोटो कॉपी मशीन का भी रोल है। शाम को चौलाई, जिसे यहाँ अमरनाथ का साग कहते हैं, दक्षिण भारतीय तरीक़े से बनाया। बहुत अच्छा बना है। कल इसे फ़ोटो सहित छोटी भाभी के फ़ेसबुक पेज पर प्रकाशित करेगी। नन्हे ने एक नया की बोर्ड, माउस तथा पैड लाकर दिया है, अब लिखने का काम करना सरल हो गया है। गुरुजी के श्राद्ध के बारे में लिखे लेख का अनुवाद किया। जून नियमित ध्यान करने लगे हैं तो भीतर की हलचल समझ में आने लगी है। उनके पैरों के तलवों में जलन हो रही थी, शाम को वे हरी घास पर नंगे पैर चलते रहे। सूर्यास्त के बाद आकाश का रंग ग़हरा लाल हो गया था।   


आज शिव सूत्र में घोरा, महाघोरा और अघोरा शक्ति के बारे में पढ़ा। घोरा मातृका शक्ति के कारण व्यक्ति ज़्यादा वाचाल हो जाता है, वह दूसरों को सलाह देता है, क्रोध करता है। महा घोरा के कारण जगत का चिंतन और उन्हीं के बारे में जानने की इच्छा जगती है अघोरा के कारण स्वयं के भीतर प्रवेश होता है, स्वाध्याय तथा साधना की तरफ़ मन जाता है। यदि कोई मातृका शक्ति के स्रोत की तरफ़ जाता है तो अघोरा अपना काम कर रही है। उसकी वाणी में अभी भी कितने दोष हैं। दोष दृष्टि तथा स्वयं को सही मानना, कटाक्ष करना आदि दोषों को अब तो त्याग देना चाहिए। परमात्मा की इतनी महान कृपा के बाद भी यदि कोई अपने संस्कारों को दग्ध नहीं करता तो उसको क्या कहा जाएगा। प्रधानमंत्री ने कल ‘मन की बात’ में खिलौनों की बात की तो कुछ युवकों ने शिकायत की। नीट व ज़ेईई परीक्षाओं की तिथि अभी तक तय नहीं हुई है।कोरोना के मरीज़ों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। 


कल जून की सेवनिवृत्ति को पूरा एक साल हो जाएगा। तीन दशकों से भी अधिक समय उन्होंने असम में गुज़ारा पर ईश्वर की कृपा से उन्हें यहाँ भी हरियाली और वर्षा भरा माहौल मिल गया है। सुबह उठे तो तेज वर्षा हो रही थी, जब कुछ हल्की हुई तो वे छाता लेकर टहलने गए। 

गगन में वायु, 

वायु में अगन, 

अगन में नीर, 

नीर में धरा ! 

ओत-प्रोत हैं सब आपस में 

जैसे मन रहता है उसमें ! 

जो बसा सृष्टि में वैसे ही 

ज्यों गंध धरा में 

ज्योति अगन में 

स्वाद नीर में 

छुवन वायु में 

वह उसमें है जैसे कोई 

लहर सिंधु में !


Saturday, March 21, 2020

नीम का दातुन


जून आज फिर गोहाटी जा रहे हैं, वहीं से दिल्ली जायेंगे.  सुबह वे जल्दी उठे, नाश्ते में अप्पम बनाये. दूर रहने वाले सभी परिवार जनों से फोन पर साप्ताहिक बात भी हो गयी. उन्होंने पिछले पांच दिनों से एक नए दूध वाले से दूध लेना शुरू किया है, आज पुराने वाले को पैसे देकर विदा कर दिया. उसे अच्छा नहीं लगा इसके पीछे राग ही तो है. एक दिन तो उन्हें भी यहां से जाना ही है तब सभी छूट जायेंगे. आत्मा अपने स्वरूप में टिकी रहे तो वहाँ कोई हलचल होती ही नहीं। उनके हर भाव, विचार और हर कर्म का फल उन्हें प्राप्त होने ही वाला है.अब इस बात का ध्यान रखना है कि भीतर व्यर्थ के संकल्प न जगें, वे किसी के भी निर्णायक न बनें. उनकी वाणी कठोर न हो, आवाज ऊंची न हो, उसमें शिकायत का स्वर न हो. उसने ड्राइविंग ट्रेनर से फोन पर शिकायत की  की और उसने सिखाते समय डांटकर उसका प्रतिदान दे दिया, यहां सभी कुछ लौटकर आने ही वाला है। देते समय ही उन्हें ध्यान रखना होगा. अपने भाग्य के निर्माता वे स्वयं ही हैं. जीवन में हर कदम पर न्याय है, एक महान शक्ति इसके पीछे कार्य कर रही है, यहां भूल-चूक होने का सवाल ही नहीं है. अभी-अभी नन्हे से बात की, उसने बताया पहले जिस कंपनी को इंटीरियर का काम दिया था, उन्हें मना कर दिया है, अब उनकी पहचान की एक दूसरी डेकोरेटर को नए घर का कार्य दिया है. 

दोपहर के साढ़े बारह बजे हैं, बाहर तेज धूप है. पिछले दिनों धूप में गाड़ी चलाने के कारण पसीना निकलने से घमौरी निकल आयी थी, अब काफी आराम है. कल शाम नीम की एक टहनी तोड़कर नीम के दातुन बनाये, उसके पत्ते भी चबाये. एलोवेरा का एक पत्ता भी तोड़कर रखा है. घर में जड़ी-बूटी होते हुए भी वे उसका लाभ नहीं उठा पाते. भोजन में भी मिर्च-मसाले बंद हैं. कल शाम योग-कक्षा में तीन-चार साधिकाओं ने अपनी स्वास्थ्य संबंधित समस्याओं के बारे में बात की. उसे तो पूर्ण स्वस्थ होना ही पड़ेगा ताकि वह उन्हें कुछ सलाह दे सके. शरीर स्वस्थ रहे इसके लिए नियमित दिनचर्या पहली आवश्यकता है . अभी-अभी वजन घटाने के कुछ वीडियो देखे, डाउनलोड कर लिए, ये उसके भी काम के हैं औरों के भी. आज दोपहर की कक्षा में ये आसन करवाये जा सकते हैं, कमर की चर्बी से तो सभी परेशान हैं. कल रात को एक दुःस्वप्न देखा, आग भी थी और भोजन के प्रति आसक्ति का जिक्र भी. धृति शक्ति को उपयोग में लाना होगा, धृति वह शक्ति है जो उनके भीतर समस्त धैर्य चुक जाने के बाद भी रहती है. वैसे उसने तो कभी आने धैर्य के भंडार को पूरा कभी खर्च किया ही नहीं. स्वयं को स्वतन्त्र मानने का भ्रम  ही है जब तक मन आसक्त है. जून का जन्मदिन आने वाला है, उनके लिए कविता लिखनी है, छोटे भाई का जन्मदिन भी इसी महीने है. मृणाल ज्योति का वार्षिक अधिवेशन भी आने वाला है, हर साल की तरह इस बार भी एक कविता लिखेगी. कल दोपहर मृणाल ज्योति में हिंदी कक्षा लेने जाना है. साइन लैंगुएज में हिंदी सिखाने का पहला अनुभव, नेट पर कितने लोगों ने उपयोगी वीडियो बनाकर पोस्ट किया है, जो भी जानकारी चाहिए ली जा सकती है. 

शाम के चार बज कर पचपन मिनट हुए हैं. आज सुबह उठी तो वर्षा हो रही थी. बगीचे से कटहल के बीज उठाये फिर छाता लेकर टहलने गयी. साढ़े सात बजे कर का अभ्यास, ट्रेनर ने कहा, अभी बहुत सीखना होगा, दो-तीन जगह गलतियां कीं. वर्षा के कारण भी कुछ असुविधा महसूस की. दीदी से बात करे ऐसा मन हुआ फिर याद आया जीजा जी का जन्मदिन आने वाला है, उसी दिन करेगी. आज बाबा रामदेव जी ने कहा, मन में कोई कामना उठे तो कभी भी राजसिक अथवा तामसिक आलंबन नहीं लेना चाहिए , सात्विक ही लेना चाहिए. दोपहर को देर तक कम्प्यूटर पर बैठने के बाद थकान लगी तो ध्यान का आश्रय लिया. कल शाम को योग कक्षा में कमरा पूरा भर गया था, एक साधिका अपनी बेटी व माँ को लेकर आयी, सभी ने एडजस्ट कर लिया. ज्ञान और प्रेम जहाँ हों वहां कोई कमी नहीं रह सकती. सद्गुरु कहते हैं, हर घटना के पीछे ज्ञान है, हर वस्तु के पीछे अनन्त और हर व्यक्ति के पीछे प्रेम है.  यदि कोई ऐसा अनुभव करे तो उसे कुछ भी  प्रभावित नहीं कर सकता.  



Thursday, August 30, 2018

आठ शक्तियाँ




नन्हा कल वापस चला गया. एक हफ्ता उसके रहने से घर का माहौल ही बदल गया था. पता ही नहीं चला एक हफ्ता कैसे बीत गया. मित्र के विवाह में वह आया तो अपने साथ एक मित्र को भी ले आया, दोनों ने ड्रोन उड़ाया और वह खो गया. उसे यकीन है कि एक न एक दिन वह मिल जायेगा. उसकी मित्र भी पहली बार घर आई, पता नहीं भविष्य में क्या लिखा है. नन्हे ने पूसी के लिए जो घर बनाया उसमें रेशमी वस्त्र बिछाया, काफी आरामदेह है, वह रात को उसमें सो भी सकती है. अगले हफ्ते मृणाल ज्योति में वार्षिक सभा है. जिसके लिए उसे एक कविता लिखनी है. जून कल चार दिनों के लिए शिलांग व गोहाटी जा रहे हैं. इस दौरान उसे एक जन्मदिन की पार्टी में जाना है और उसी दिन महिला क्लब की थैंक्स गिविंग पार्टी भी होने वाली है. अगले दो दिन घर की सफाई में लगने वाले हैं, पिछले हफ्ते इसकी तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दिया.

सुबह टीवी पर एक ब्रह्मकुमारी बहन आठ शक्तियों के विषय में बता रही थीं. हर आत्मा में ये आठ शक्तियाँ हैं. पहली है सिकोड़ने और फ़ैलाने की शक्ति, कछुए की तरह विपत्ति आने पर स्वयं को सिकोड़ लेना और सामान्य काल में विस्तार कर लेना यदि वे सीख जाते हैं तो हर परिस्थिति का सामना कर सकते हैं. दूसरी है समेटने की शक्ति, जो भी विस्तार उन्होंने जगत में किया है, अंत में एक क्षण में उसे छोड़ कर जाना होगा. यदि जीवन काल में भी समय-समय पर सब प्रवृत्ति त्याग कर गहन ध्यान में जाने की क्षमता है तो मोह से मुक्ति सहज ही मिल जाती है. मन की समता बनाये रखने के लिए सहन शक्ति या तितिक्षा का भी सबको अभ्यास करना है. यदि मन में सबके प्रति शुभभावना होगी तो किसी की बात बुरी नहीं लगेगी और सबके साथ निभाना सरल हो जायेगा. किसी भी बात को अपने भीतर समाने की शक्ति को भी पोषित करना है, जो विशाल बुद्धि से आती है, जीवन जितना मर्यादित होगा, अनुशासन का पालन सहज होगा उतना ही विपरीत को समाना आसान होगा. सार-असार, नित्य-अनित्य को परखने की शक्ति भी हर आत्मा में छुपी है. ज्ञान को अपने भीतर धारण करने से ही यह पोषित होती है. किसी भी विषय में शीघ्र निर्णय लेने की क्षमता भी हरेक के भीतर है पर वे कई बार गलत निर्णय ले लेते हैं या निर्णय को टालते रहते हैं और समय निकल जाता है. सांतवी शक्ति है सामना करने की, जीवन में किसी भी परिस्थिति का बहादुरी से सामना करने की शक्ति भी जगानी होगी. अंतिम लेकिन एक महत्वपूर्ण शक्ति है सहयोग करने की शक्ति, जगत म,एन सभी को किसी न किसी का सहयोग चाहिए, जो सबके साथ मिलकर काम करना जानता है, वह कभी अकेला नहीं होता.

जून इतवार दोपहर को गये, शाम तक शिलांग पहुंच चुके थे, अगले दिन गोहाटी आ गये. सम्भवतः परसों वह लौट आयेंगे. रविवार को उसने बच्चों के साथ गुरूपूर्णिमा का उत्सव मनाया, सोमवार को संध्या के योग सत्र में फिर से महिलाओं के साथ. अगले सप्ताह उन्हें महिला क्लब की मीटिंग में योग पर एक कार्यक्रम प्रस्तुत करना है. इस समय रात्रि के ग्यारह बजने को हैं. शाम को लिखना आरम्भ किया था कि योग कक्षा का समय हो गया. उसके बाद तैयार होकर वह एक नन्ही बच्ची के जन्मदिन की पार्टी स्थल पर गयी, वहाँ होटल के स्टाफ के अतिरिक्त कोई नहीं था. लौट कर उनके घर गयी फिर बच्ची की नानी के संग वहाँ पहुँची. काफी अच्छा इंतजाम था. केक काटा गया और बिना अंडे का केक खाकर वह महिला क्लब की आभार प्रकटीकरण के भोज में आ गयी. जहाँ सभी महिलाएं आ चुकी थीं. मेहमान पौने नौ बजे आने शुरू हुए. दस बजे तक औपचारिक भाषण आदि होते रहे, उसके बाद जूस पव अन्य पेय आदि दिए गये, मेहमानों में कुछ उच्च अधिकारी भी थे. दस बजे वह वापस आ गयी, एक सखी ने रोटी व रायता पैक करके दे दिए, दिन की भिंडी की सब्जी पड़ी थी, सो डिनर घर पर ही खाया. सुखबोधानन्द जी को बहुत दिनों बाद सुना और अब ‘पीस ऑफ़ माइंड’ पर गूढ़ चर्चा चल रही है. वे आत्मायें हैं, हर अपने शुद्ध रूप में आत्मा पवित्र हंस है, देवदूत है, कमल वत है ! कर्मों के द्वारा ही वे आत्मा के शुद्ध स्वरूप से नीचे गिरते हैं और ज्ञान, कर्म व धारणा के द्वारा ही वे पुन शुद्ध स्वरूप को पा सकते हैं. स्वयं को दाता से जोड़कर उन्हें भी कर्मों तथा वाणी के द्वारा जगत को देते ही जाना है. वे जब स्वयं के असली स्वरूप को भूल जाते हैं तो ही द्वंद्व में पड़ते हैं. यदि हर क्षण यह याद रहे कि वे कौन हैं, तो सदा आत्मा में ही रमण करेंगे.  

Friday, March 2, 2018

शक्ति और शक्तिमान



पांच दिनों का अन्तराल ! पिछले दिनों घर में रंग-रोगन का कार्य होता रहा. सारा घर अस्त-व्यस्त सा हो गया था. किचन का सामान बैठक में, इस कमरे का सामान उस कमरे में. पेंट का कार्य पूरा गया है. आज बरामदे के फर्श पर पॉलिश का अंतिम कार्य हो रहा है. नैनी किताबों वाली रैक साफ कर रही है. आज भी दिन भर ही व्यस्तता बनी रही. शाम को योग कक्षा में कुछ नये आसन सिखाने हैं, कुछ पुराने दोहराने हैं. क्लब में पूजा का उत्सव भी है. अब अगले दस दिन सात्विक भोजन ही बनेगा, फिर अष्टमी की पूजा है. उसके पहले व्रत. स्कूल भी बंद है सो सुबह का वक्त उसे लेखन के लिए अधिक मिलेगा. कल तिनसुकिया जाना है. सर्दियों की सब्जियों के लिए बीज लाने हैं. कपड़े सिलने दिए थे वे भी. कल शाम क्लब में ‘तलवार’ दिखाई जाएगी, उसे नहीं देखनी है यह उदास करने वाली फिल्म. दो दिन से पेट कुछ नासाज है, शायद दूध वाली चाय पीने से, आज ग्रीन टी पी है, कहते हैं उसके बड़े फायदे हैं. आज बड़ी भांजी का जन्मदिन है. छोटी ने उसके मेल का अच्छा सा जवाब दिया था कल. तीन दिसम्बर को वह एक और पुत्र की माँ बनने वाली है. विदेश में पहले से ही सब पता चल जाता है, लिंग भी. जून ने कहा वह भी अब क्रोध करने वाले पर करुणा करते हैं. वह अपने विभाग में अनुशासन लाना चाहते हैं. वह एक दृढ़ लीडर की भूमिका निभा रहे हैं. कम्पनी की उन्नति ही उनका एकमात्र लक्ष्य है.

आज साप्ताहिक सफाई का दिन था. जून के दफ्तर में आज प्रधानमन्त्री की ‘स्वच्छ भारत’ योजना के अंतर्गत सफाई अभियान का आयोजन किया गया है. वे लोग डेली बाजार में एक क्षेत्र की सफाई करेंगे और कुछ कूड़े दान लगवाएंगे.

रात्रि के आठ बजने को हैं. टीवी पर भारत-दक्षिण अफ्रीका क्रिकेट मैच आ रहा है. जून भी आज बहुत दिनों बाद लिख रहे हैं. आज शाम उन्होंने सिंधी तरीके से दाल माखनी बनाई, बहुत स्वादिष्ट थी. उसके सिर में हल्का दर्द है, बीच-बीच में बिलकुल गायब हो जाता है, शायद उन क्षणों में उसका साक्षी भाव प्रमुख हो जाता होगा. आज दिन में बगीचे में कुछ देर काम किया. सर्दियों के लिए बगीचा आकार ले रहा है. इस बार वे हैंगिंग गमले भी लाये हैं. उनमें लटकते हुए पिटूनिया के फूल बहुत सुंदर लगेंगे.

शाम के चार बजे हैं. सुबह सामान्य थी. दोपहर को बगीचे में साग के बीज डलवाए. पालक, मेथी, चौलाई, मूली आदि के. दोपहर को कुछ देर सोयी तो स्वप्न में मिट्टी से बनी एक देह को देखा. श्वेत मिटटी की बनी है वह और उसमें चेतना भी है. उठकर ब्लॉग पर बाल्मीकि रामायण की एक छोटी सी पोस्ट लिखी. आज षष्ठी है. दुर्गा माँ की कृपा तो हर पल बनी ही हुई है. प्रकृति ही माँ है. आत्मा की शक्ति ही माँ है. शक्ति और शक्तिमान दो होकर भी एक हैं. भीतर के मौन में जाकर जो शक्ति चेतना में भर जाती है वह माँ की ही शक्ति है. कल दिगबोई जाते समय कम्पनी की एक महिला अधिकारी की मृत्यु हो गयी, दो अन्य घटनाओं में नौ अन्य लोगों की. एक पूरा परिवार तथा उनका एक संबंधी तथा चार एडवोकेट, सभी की मृत्यु सड़क दुर्घटना में हुई. भाग्य कब किस मोड़ पर क्या दिखायेगा, कोई नहीं जानता. कौन सा कर्म कब उदय होगा और कब किस सुख-दुःख का अनुभव होगा, कोई नहीं कह सकता. शुद्ध चेतना सदा सबकी साक्षी रहती है, उसे कुछ भी स्पर्श नहीं करता.  



Monday, January 2, 2017

तरह-तरह के ध्यान


कल कुछ नहीं लिखा, शाम को क्लब गयी थी. लेडीज क्लब की मीटिंग थी. एक सदस्या का विदाई समारोह था, उसने उनके लिए लिखी कविता पढ़ी, उन्हें शायद उम्मीद नहीं थी. लौटकर पद्म साधना की, जैसे आजकल वे रोज करते हैं. आज भी बदली है आकाश में. पिताजी बाहर बरामदे में बैठकर अखबार पढ़ रहे हैं, माँ कमरे में अपनी चिर-परिचित मुद्रा में कुर्सी पर बैठी हैं. कल वे उनका जन्मदिन मनाने वाले हैं, उसने उनके लिए एक कविता लिखी. शाम को नन्हे के बचपन के फोटो चुनने हैं, वे उसके जन्मदिन पर उसे एक कोलाज बनाकर भेजेंगे. आज का ध्यान भी अच्छा था, जब कोई विचार नहीं है और इच्छा नहीं है तब क्या कोई कह सकता है कि ‘वह है’ ? दो श्वासों के बीच जो अन्तराल है, वे वहाँ भी नहीं होते, दो विचारों के बीच भी वे नहीं होते. आकाश में बादलों की तरह विचार आते और चले जाते हैं, उन पर कोई वश भी नहीं है. आत्मा में कोई क्रिया ही नहीं है, क्रिया करने की शक्ति है, जानने की शक्ति है और मानने की शक्ति है, लेकिन वे शक्तिमान हैं, शक्ति नहीं..अपने शुद्ध रूप का एक बार ज्ञान हो जाये तो चाहे वे शक्ति का कितना ही उपयोग करें..गलती तब होती है जब वे स्वयं को शक्ति ही मान लेते हैं और चुक जाते हैं...

दीदी को माँ के लिए लिखी कविता भेजी थी, उनकी यह अच्छी आदत है, फौरन जवाब देती हैं. आज का ध्यान भी अच्छा था. शरीर से बाहर वे कहाँ हैं और देह के भीतर वे कहाँ हैं, इसका अनुभव करना था. वे सब जगह हैं और कहीं भी नहीं है. देह से जब तक तादात्म्य रहता है, वे बंधन महसूस करते हैं, शरीर से जब तादात्म्य टूट जाता है तब वे पहली बार मुक्ति का अनुभव करते हैं..और मुक्ति ही आनंद है. उस आनन्द में किसी को अपना भागीदार बनाने के लिए फिर वे परमात्मा की भक्ति करते हैं, प्रेम बांटते हैं और सारा जगत उन्हें अपना ही रूप नजर आता है. आज छोटी बुआ पर संस्मरण लिखा.

कल जो कविता उसने ब्लॉग पर डाली थी. ध्यान के अनुभव के बाद लिखी थी और जो ध्यान नहीं करते, साधना पथ पर नहीं हैं, उन्हें समझ में नहीं आएगी. आज का ध्यान भी अनूठा था. सभी कुछ ब्रह्म है, इसका अनुभव करना था, पदार्थ का विश्लेषण करते जाएँ तो ऊर्जा मिलती है और ऊर्जा के भी पार चेतना है, जड़ अथवा चेतन सभी के मूल में एक ही तत्व है ! आज सुबह से वर्षा की झड़ी लगी है. शनिवार है सो भोजन में बेसन की कढ़ी बन रही है.

आज ध्यान में विचार शून्यता की अनुभव किया. विचार ही सीमा है. विचार से परे जहाँ केवल चैतन्य है, वहाँ सब एक है. सच्चा संवाद मौन में ही होता है. जब दो मौन मिलते हैं तब एकात्मकता का अनुभव होता है. विचारों में एकता कभी सम्भव नहीं है. मन में जो दिन-रात चटर-पटर चलती रहती है वह ऊर्जा को व्यर्थ नष्ट करती है. वे कभी भी मौन का अनुभव नहीं करते. नींद में लगातार भीतर चलता रहता है एक प्रवाह..उसे जो प्रतीक्षा थी कि विचारों वाली कविता पर कुछ लोग कुछ कहेंगे वह कितनी मूर्खता थी. उस कविता पर टिप्पणी तो मौन रहकर ही की जा सकती है. उनके भीतर मान पाने की इच्छा भी एक विचार ही है और पाकर भीतर जो प्रसन्नता होती है वह भी एक विचार ही है अथवा तो एक संवेदना है जो उन्हें सुखद मालूम पडती है. सुखद संवेदना के प्रति वे राग जगाते हैं, फिर उन्हें बार-बार उस संवेदना की ललक उठती है, जब वह नहीं मिलती तो भीतर दुखद संवेदना जगती है. जिसके प्रति वे द्वेष जगाते हैं, वह भी उन्हें नहीं भाता तो और द्वेष जगाते हैं और इस चक्र में फंस जाते हैं. सारा खेल संवेदनाओं का है. इनका एक नशा होता है. यदि किसी संवेदना को साक्षी भाव से देखें तो कुछ ही देर में नष्ट हो जाती है, वे पुनः पहले की तरह हो जाते हैं.   


Tuesday, October 18, 2016

जला हुआ दूध


फिर एक अन्तराल ! सुबह चार बजे ही अलार्म सुनकर नींद खुल गयी, न बजे तो पता नहीं कितनी देर से खुले. दिन ऐसे बेहोशी में बीत रहे हैं. आज दूध देर से आया था, दोपहर को गैस पर रख कर भूल गयी. जून को लंच के बाद बाहर तक छोड़कर आई तो दूध चूल्हे से उतारने के बजाय कम्प्यूटर के सामने बैठ गयी और पतीला बुरी तरह से जल गया. देखें कितना साफ होता है, नैनी को कहा है कि रगड़-रगड़ कर साफ करे. सारे घर में जले हुए दूध की गंध फ़ैल गयी है. ब्लॉग पर ‘गंगा’ कविता डाली, तस्वीर नहीं आ पाई, स्पीड बहुत कम थी. जून ने दोपहर को पपीते के परांठे की तारीफ़ क्या कर दी, सब भूल गयी. दुःख में मानव सजग रहता है, सुख उसे बेहोश कर देता है, पर उन्हें तो दोनों का साक्षी होकर रहना है. सजग होकर रहना ही आत्मा में रहना है. विचार सदा भूत या भविष्य के होते हैं, वर्तमान में कोई विचार नहीं होता, वर्तमान का पल इतना सूक्ष्म होता है कि बस वह होता है. पिछले दिनों जो पुस्तक पढ़ती रही उसने भी मन पर जैसे पर्दा डाल दिया था. खैर, ठोकर लगकर ही इन्सान सुधरता है. भीतर जो साक्षी है, वह तो अब भी वैसा ही है, निर्विकार और स्थितप्रज्ञ, यह जो उथल-पुथल मची है, यह अहंकार को ही सता रही है.

कल से एक नई किताब पढ़नी शुरू की है, जो कोलकाता यात्रा के दौरान खरीदी थी पर अभी तक पढ़ी नहीं थी. इसके अनुसार सबसे अच्छा ध्यान है कुछ भी न किया जाये, साक्षी भाव में रहा जाये. जब जरूरत हो तभी मन से काम लेना है, अन्यथा उसे शांत रहने दें. अपने आप आकाश में बादलों की तरह कोई विचार आये तो उसे गुजर जाने दें, बिना कोई टिप्पणी किये क्योंकि टिप्पणी करके भी क्या होगा, व्यर्थ ऊर्जा नष्ट होगी. जीवन में भी इसी सिद्धांत को अपनाना होगा तथा ध्यान में भी. हर समय इसी को पक्का करना होगा तब न अहंकार रहेगा न दुःख ! साक्षी भाव इतना सूक्ष्म है कि मन, बुद्धि की पकड़ में नहीं आता, जब कुछ न करें तो बस वही होता है लेकिन जैसे ही भीतर कोई स्फुरणा हुई वह लोप हो जाता है, बड़ा शर्मीला है ! अंतर के आकाश में जब वर्तमान का सूरज खिलता है तो अतीत के बादल छंट जाते हैं.

आज विश्व महिला दिवस है, उसे अपने भीतर अनंत शक्ति का उदय होता दिखाई दे रहा है. कल शाम को क्लब में पहली बार बिलियर्ड खेला. q तथा v का भेद जाना, अच्छा लगा. कोच अच्छी तरह सिखा रहे हैं. कुछ न कुछ नया सीखते रहना चाहिए. होली का उत्सव आने वाला है. होली का उद्देश्य है सारे मतभेद भुलाकर मस्त हो जाना, अद्वैत का संदेश देती है होली..एकता का, प्रेम का, मिठास का, मधुरता का..जब आम पर बौर छा जाते हैं और पलाश के फूलों से वृक्ष सज जाते हैं. भंवरे और तितलियाँ गुंजन करती हैं, जब हवा में मदमस्त करने वाली सुगंध भर जाती है. जब महुआ फूलों से लद जाता है. गाँव-देहात में फागुनी बयार की मस्ती में लोग फागुन गाते हैं और जब बच्चों की परीक्षाएं होने वाली होती हैं, तब होली आती है. रंगों की बातें करे तो हर रंग सुंदर है. सतरंगी यह जगत और सुंदर बन जाता है, तो होली पर कविता लिखी जा सकती है..


Monday, April 25, 2016

मौन का सागर


भीतर मौन छा गया है, आजकल लिखना नियमित नहीं हो पाता, कभी-कभी लगता है कुछ करने को नहीं रहा, परम विश्रांति को पाया मन शायद ऐसा ही होता होगा. कोई चाहत नहीं तो कोई उद्वेग भी नहीं, कुछ पाना नहीं तो कुछ सोचना भी नहीं, इस जगत में जो प्रारब्ध शेष है उसे सहज भाव से स्वीकारना है और जितना सम्भव हो सके जगत को लौटाना है. सद्गुरू कहते हैं जगत और परमात्मा का भेद भी नहीं रहे, सब एक ही है, कोई विरोध नहीं, जब जो जैसी परिस्थिति आये उसमें वैसे ही मस्त रहना, जैसे आज सफाई कर्मचारी नहीं आया है, पर काम हो ही जायेगा.

भिवानी, मुजफ्फरपुर, मोतिहारी, जोधपुर, उपरोक्त शब्दों और फोन पर हुई बात के आधार पर एक कविता लिखनी है एक परिचिता के लिए उनके विवाह की पचीसवीं वर्षगांठ पर ! इस समय दोपहर के एक बजे हैं. पुनः सुंदर वचन सुन रही है, संत कहते हैं कि आनन्द को पाने के लिए आनन्द से होकर ही गुजरना पड़ता है, जीवन को देखने की जैसी किसी की क्षमता होती है, जीवन वैसा ही दिखाई देता है. जीवन से छुटकारा धर्म का लक्ष्य नहीं, परम जीवन ही धर्म का लक्ष्य है. आनन्द के भाव से जीवन, उसका सौन्दर्य, सत्य उपलब्ध होता है. दुःख का भाव हटाकर आनन्द का भाव भीतर समोना होगा. जो जीवन को दुःख के भाव से देखना चाहता है वह गुलाब में कांटे ही देखेगा और जो जीवन को सुख के भाव से देखता है वह काँटों में फूल देखता है. दुखी, निराश व उदास चित्त अँधेरे को ही देखता है, आनन्द से भरा व्यक्ति अंधेरे को भी प्रकाश में बदल सकता है ! संसार और परमात्मा दो नहीं हैं, आनन्द के भाव में देखें तो यही संसार परमात्मा में बदल जाता है.


आज छब्बीस नवम्बर है, पिताजी की शादी की सालगिरह, माँ आज होतीं तो उनकी भी. कल नन्हा आ रहा है, इस समय ट्रेन में बैठा है. कल शाम को वह पब्लिक लाइब्रेरी की fund rasing meeting में गई. अच्छा अनुभव रहा. कल रात ध्यान के रहस्य के बारे में सुना, मन में उठते शब्दों का निरिक्षण करना चाहिए, चेतना जब किसी वस्तु को देख लेती है तो वह वस्तु विलीन हो जाती है, केवल शुद्ध चेतना ही शेष रह जाती है. ऋषिमुख में श्री श्री के विचार पढ़ते-पढ़ते भी ध्यान घटित होने लगता है. वह कहते हैं, चेतना ही निकटस्थ है, मन, बुद्धि व चित्त उसके बहुत बाद है, स्मृति और कल्पना में मन की ऊर्जा व्यर्थ जाती है किन्तु चेतना यदि स्वयं में रहे अर्थात मन चेतना में खो जाये तो ऊर्जा से भर जाता है. वे व्यर्थ ही अपनी शक्ति का अपव्यय करते हैं. जबकि शक्ति बनाने का कार्य उनके ही हाथ में है, कैसा अद्भुत ज्ञान है यह.. जिसे पाकर सारा जगत अपना हो जाता है, सहज समाधि घटित होती है और तब सारे शास्त्र, सारे कर्मकांड, सारी किताबें छोटी पड़ जाती हैं. अनुभव से प्राप्त ज्ञान का एक कण भी उधार के ज्ञान से बड़ा है. उसका मन शांत है क्योंकि इस क्षण वह शांति के उस सागर से जुड़ा है, वह जीवित है, जड़ नहीं है, वह प्रेमपूर्ण है और वह संतुष्ट है, वह है ही नहीं ! 

Sunday, March 27, 2016

गुरु पूर्णिमा का उत्सव


लगता है इस बार ‘गुरु पूर्णिमा’ का उत्सव वे उस स्थान पर नहीं मना पाएंगे जहाँ वह बच्चों को योग सिखाने जाती है. एओल की टीचर ने अभी तक स्वीकृति के लिए फोन नहीं किया है. खैर, जो भी हो, वह लिख रही थी कि जून के दफ्तर के प्रमुख की पत्नी का फोन आया, वह अगले हफ्ते यूएस जा रही हैं अपने बड़े बेटे के पास जिसकी दूसरी सन्तान होने वाली है. भारतीय माता-पिता सहर्ष अपने बच्चों के बुलाने पर चले जाते हैं, पर अमेरिका में जन्मने वाले ये बच्चे भी क्या इसी तरह अपने माता-पिता पर भरोसा कर पाएंगे. आज धूप तेज निकली है, कल दिन भर वर्षा होती रही. उसके स्वास्थ्य में हल्का सुधार है, जून उसका बहुत ध्यान रख रहे हैं. लगता है एक चक्र पूरा हो गया है, अब से कुछ वर्ष पूर्व वह इसी तरह डायरी लिखती थी, जब वह अनुभव नहीं हुआ था. अपने स्वास्थ्य की बातें तथा इधर-उधर की बातें और उसके बाद से...संत वाणी तथा ज्ञान की गहन बातें ! अब भीतर तृप्ति है सो कुछ पाना शेष नहीं है, अपना पता चल गया है तो अपने दोष भी साफ नजर आते हैं. ईर्ष्या का आभास ध्यान के दौरान भी हुआ, अहंकार व क्रोध तो झलक ही जाते हैं पर उस वक्त भी यह अहसास रहता है कि वह ‘वह’ नहीं जो विकारों से ग्रस्त है, वह साक्षी आत्मा है. पीछे के बंगले के सर्वेंट क्वाटर से एक बच्चा आज पढ़ने आया है, ईश्वर ने उसे ऐसा जन्म दिया है कि उसके पढ़ने का कोई प्रबंध नहीं है. इस जगत में न जाने कितने अभागे ऐसे हैं जो अपने जीवन को अर्थ नहीं दे पाते, अपने ही कर्मों का फल वे भोगते हैं पर ऐसे कर्म जो उन्होंने अज्ञानावस्था में किये होते हैं. माया के अदृश्य फंदों में जकड़े ये मानव ये भी नहीं जानते कि ये कैद हैं, क्यों कैद हैं ये तो बाद की बात है. कल शाम छोटी बहन से बात की, वे लोग परसों वापस यूएई जा रहे हैं. चचेरा भाई वहां ठीक है. नन्हा अपने हॉस्टल पहुंच गया है, उसका खर्च बहुत बढ़ा हुआ है, जून कभी-कभी चिंतित होते हैं, पर उसे कुछ कहते नहीं, वह इतने समर्थ हैं कि सहर्ष सब कर रहे हैं.

कल शाम टीचर का प्रतीक्षित सकारात्मक फोन आया, अब उसे अपनी एक सखी के साथ मिलकर सारी व्यवस्था करनी है. कल शाम तथा रात सोते वक्त तक मन में वही विचार आ रहे थे. गुरूजी इतने सारे देशों में इतने सारे आयोजन कर लेते हैं. उनके पास अनंत शक्ति है, वह कितने सहज रहते हैं. परमात्मा न जाने कब से इतने सारे ब्रह्मांडों को चला रहा है और वह उनसे विलग है, जल में कमल की भांति ! वे एक छोटा सा घर भी ठीक से नहीं चला सकते. घर के दो चार लोगों को ही प्यार नहीं दे सकते. उन्हें भी अपनी ऊर्जा का प्रयोग करना है, गुरु पूर्णिमा का उत्सव मनाने का अर्थ है अपने भीतर की अपार सम्भावनाओं को उजागर करना ! उसे सद्गुरु से कितना कुछ मिला है, अपरिमित प्रसन्नता, अनंत ज्ञान तथा सेवा करने की प्रेरणा, सबसे बड़ी बात अपनी पहचान, आत्मसम्मान तथा आत्मविश्वास, ईश्वर की खोज करने की प्रेरणा तथा ऊर्जा ! गुरु का होना जीवन को खिला जाता है, उन्हें अपने होने का अर्थ मिलता है, अब इस गुरु पूर्णिमा को उन्हें सार्थक बनाना है, सफल करना है. आज से ही तैयारी शुरू कर दी है. मन को भी उच्च भावों में स्थित रखना है, देह से ऊपर, छोटे मन व तुच्छ बुद्धि से भी ऊपर..एक उदार चित्त के साथ इस पवित्र आयोजन को करना है. इस दिन वहां जो भी उपस्थित हो उसे गुरु की कृपा का अनुभव हो ऐसा वातावरण उन्हें बनाना है. सद्गुरु इस ईश्वर की कृपा रूप प्राप्त शरीर में सत्यता का बोध कराते हैं. अंतःकरण में व्याप्त चैतन्य तथा सर्वत्र व्याप्त चैतन्य एक ही है यह ज्ञान देते हैं. जो इन्द्रियों का रस, विचार का रस, भावना का रस, आनन्द का रस इन पंच शरीरों से लेता रहता है तो ऐसे ही शरीर उसे मिलते हैं पर जब गुरू साधक को इनसे पार ले जाता है तो वह शांतात्मा हो जाता है. 


Monday, February 8, 2016

दशावतार


सद्गुरु को आज भी सुना. दसों अवतार मानव की चेतना में निरंतर कैसे घट रहे हैं इसके बारे में बता रहे थे. कल्कि का अवतार भीतर ही होगा जब जगत में कोई पराया नहीं रह जायेगा. आज भी सुबह से बादल बरस रहे हैं. सभी देवी-देवता भी चेतना में विद्यमान हैं. आत्मा कितनी पावन है, शुद्ध, शांत, ज्ञानयुक्त, आनन्द और सुख से पूर्ण शक्तिशाली. वे व्यर्थ ही छोटी-छोटी बातों से परेशान होते हैं. जीवन कितना विशाल है और कितने अनोखे रहस्यों से भरा हुआ, उन्हें बस आँख खोलकर देखने की जरूरत है. प्रेम चारों ओर बिखरा है. आज के ध्यान में कमल पर बैठ देवी की हल्की सी झलक मिली.

कल शाम वर्षा की झड़ी लगी थी, क्लब में मीटिंग थी पर वह जा नहीं पाई. परसों घर में ही होली मिलन में महिलाओं की मीटिंग का आनन्द लिया. आज धूप निकली है. गुरू जी आज से दिल्ली में सत्संग, प्राणायाम शिविर कर रहे हैं, रोहिणी सेक्टर-१० में उनका कार्यक्रम है. एक सखी ने फोन करके कहा, इस बार क्लब के वार्षिक उत्सव की थीम ‘लव एंड पीस’ है, उस पर अपने विचार लिखने हैं. प्रेम और शांति तो उनका मूल स्वभाव है, वे बने ही उसी के हैं. प्रकृति के कण-कण में यह प्रेम झलकता है, आकाश की नीलिमा में घोर शांति है, अन्तरिक्ष में गहन शांति है और प्रेम वह शक्ति है जिसके कारण ग्रह सूर्य के चारों ओर एक चक्र में अनवरत घूम रहे हैं, उनका अस्तित्त्व ही इस पर आधारित है. उसके दांत में हल्का दर्द अभी भी हो रहा है, परसों पुनः डेंटिस्ट के पास जाना है. कुछ देर पूर्व दीदी का फोन आया, डाक्टर के कहने पर जीजाजी ने सामिष भोजन लेना शुरू किया है.

आज सद्गुरु ने काली के भयंकर रूप की व्याख्या की. शक्ति यदि शांत चेतना से उदित हुई हो तभी कल्याणकारी होती है. ज्ञान शक्ति, क्रिया शक्ति तथा इच्छा शक्ति ! उनके भीतर तीनों शक्तियाँ हैं तथा परम चेतना भी है. उनका जीवन तभी सार्थक होगा जब इन शक्तियों का सदुपयोग वे कर सकें, अन्यथा ये शक्तियाँ विनाशकारी भी हो सकती हैं. अपने भीतर की सौम्यता, सहजता, शांति, सरलता, प्रेम का विनाश तथा अपने बाहर की समरसता का विनाश ! उन्हें हर पल सजग रहने की आवश्यकता है, जीवन का कीमती समय पल-पल कर यूँ ही बीत रहा है, हाथ में कुछ आ नहीं रहा. कभी लगता है कि इस परम खजाने की तलाश थी वह तो यहीं है, पूर्ण तृप्ति का अहसास होता है फिर जरा सा चूके नहीं कि वह तृप्ति कहीं खो जाती है, फिर तलाश..क्या यही साधना की नियति है, अनवरत खोज, मंजिल सदा दूर चली जाती है. यदि खोज समाप्त हो जाये तो वह तृप्ति बासी नहीं लगने लगेगी, शायद इसीलिए प्रकृति उनके मार्ग में नित नए आकर्षण फैलाती है कि बचो इनसे. पिछले कुछ दिनों से पौष्टिक और स्वादिष्ट भोजन के प्रति आकर्षण बढ़ गया था. जब सारी वासनाएं छूट गयीं तो नया  जाल फेंका इंद्र ने और वह उसमें फंसती ही जा रही थी कि कल सचेत हुई. भोजन उन्हें इसलिए चाहिए कि शरीर स्वस्थ रहे न कि स्वाद के लिए. पिछले दिनों होली के उत्साह में आत्मा से दूर चली गयी, मन कितने-कितने रूपों में उन्हें ठगने आता है और वे उसके शिकार हो जाते हैं. पिछले दिनों स्वाध्याय भी कम हुआ, आज सजगता बढ़ी है. तीन दिनों बाद उन्हें एक और यात्रा पर निकलना है. यह जीवन एक यात्रा है और इस विशाल यात्रा में छोटी-छोटी कुछ यात्रायें हैं.   


Monday, January 5, 2015

स्वामी योगानन्द की पुस्तक


कण-कण में ईश्वर व्याप्त है, उसके प्रति भक्ति सदा भीतर है. उस पर कामनाओं और वासनाओं का आवरण चढ़ा होता है. हर पल चेतन रहकर मन को शुद्ध करना है, जैसे-जैसे मन शुद्द होता जायेगा भक्ति अपने आप प्रकट होती जाएगी. कुछ करना नहीं होता अपने आप ही ईश्वर प्रेम प्रकट होता है जब अंतर उसके लायक होता है. अंतर में प्यार छलकता हो असीम शांति हो और परमानन्द का स्रोत मिल जाये तो ईश्वर की शक्ति दिनों-दिन प्रकट होती जाएगी. तब मन संशय मुक्त हो जाता है. सुख-दुःख, गर्मी-सर्दी, मान-अपमान, अच्छा-बुरा के द्वैतों से प्रभावित होना छोड़ देता है. संशय विहीन मन ही श्रद्धावान होता है. श्रद्धा ही परम लक्ष्य तक ले जाती है. ऊंच-नीच, शत्रुता-मित्रता की भावना से रहित होकर यदि मन का एकमात्र लक्ष्य दूसरों की सुख-सुविधा का ध्यान रखते हुए सेवा करना है तो ईश्वर वहाँ प्रकट होता है. परनिंदा और असूया पतन की ओर ले जाने वाली है. यदि हृदय में प्रेम होगा तो वह सूर्य की भांति हर एक पर अपनी ऊष्मा बिखेरेगा. वह हरेक के लिए समान रूप से होगा. विशेष श्रद्धा का पात्र तो मात्र एक वही है और वह तो जड़-चेतन बन हर ओर व्यक्त हो रहा है. उसकी छवि हरेक में देखनी है और उसमें हरेक को देखना है तभी द्वैत भाव मिट जायेगा और उस एक के सिवाय कुछ नजर नहीं आएगा. अज सुबह ध्यान में उसे कुछ पलों के लिए दिव्य अनुभव हुआ, लेकिन वह टिकता नहीं, अभी बहुत दूर जाना है. गुरू उसके पथप्रदर्शक हैं, मंजिल एक न एक दिन मिलेगी !

उन्हें मुक्त होना है और शरण में जाते ही वे एक क्षण में मुक्त हो जाते हैं. जो भी विकार भीतर हैं वे बाह्य हैं, जिन्हें निकाल सकते हैं अथवा आने से रोक सकते हैं. कल शाम को अंततः लाइब्रेरी से वह पुस्तक Man's Eternal Quest जो स्वामी योगानन्द जी की लिखी हुई है मिल ही गयी. पहले दो अध्याय पढ़े और रात भर मन कृष्ण भाव में रहा. ईश्वर उसके अंतर्मन में प्रकट हुए हैं यह भाव ही कितना प्रिय है. आज सुबह खिड़की खोलने का अनुरोध जब जून ने नहीं माना तो थोड़ा सा क्रोध का भाव एकाध क्षण के लिए हफ्तों बाद आया पर सचेत थी. अष्टांग योग के बारे में आत्मा में बताया जा रहा है. कृष्ण ने भगवद गीता में एक श्लोक में ही बहिरंग योग का वर्णन किया है, जिसपर न जाने कितनी कितनी पुस्तकें लिखी गयी हैं. आज भी कल की तरह बदली है, गोभी और टमाटर के पौधे धूप से बच रहे हैं, ईश्वर हर वक्त उनके साथ है. इच्छा, मोह, भय, काम, लोभ को त्याग कर ही वे मुक्त हो सकते हैं. ईश वर्णन वह अमृत है जो मुक्ति के मार्ग पर ले जाता है. मन को शांत रखना योग में आरूढ़ होने के लिए आवश्यक है. आसक्ति के कारण किया गया कर्म बाँधता है, शुद्ध सात्विक कर्म ही मुक्त करते हैं. शांत मन ही शुद्ध कृष्ण प्रेम रूपी प्रकाश फैलाता है. पल-पल सजग रहकर ही अध्यात्म के पथ पर आगे जाया जा सकता है. तब मानसिक सुख व संतोष इतना प्रबल व स्वाभाविक हो जाता है कि साधक क्षण प्रतिक्षण परमात्म भाव में समाहित हो जाता है.

Tuesday, December 9, 2014

पानी बिच मीन पियासी


अहंकार हिंसक पशु से भी अधिक भयावह है, जो मानव को संसार रूपी जंगल में भटका सकता है तो अहंकार से मुक्ति पानी होगी. इस बात का भी अहम् ठीक नहीं कि  ईश्वर ने उस पर विशेष कृपा की है. कल रात ससुराल व मायका दोनों जगह सभी से बात की. छोटी बहन फिर किसी पारिवारिक बात से परेशान है. सुबह संगीत की कक्षा में गयी, अभी कुछ देर पूर्व ही लौटी है, वहाँ भी अहंकार की भावना आ रही थी कि उसकी आवाज थोड़ी मधुर हो गयी है पहले से. ईश्वर की कृपा से ही यह सम्भव हुआ है. अब से हर पल सचेत रहना होगा. कल एक योगी की आत्मकथा पुनः पढ़नी आरम्भ की है, रस आ रहा है. जीवन में रस न हो तो क्या जीना. जून ने कहा उसके जीवन में दैवीय शक्ति का प्रवेश हुआ दीखता है. कल सुमित्रानंदन पन्त की किताब ‘कला और बूढ़ा चाँद’ पढ़ी. उन्हें भी अतीन्द्रिय अनुभव हुआ था. उनका आनंद भी अपरिमित था. उन्हें भी प्रेम व शांति की वैसी ही अनुभूति हुई थी.

आत्मसाक्षात्कार  का अर्थ है, आत्मा को जानना, आत्मा को जानने की क्रिया दो प्रकार से वर्णित की गयी है, एक ज्ञान योग दूसरा भक्ति योग. आत्मसाक्षात्कार ही जीवन का ध्येय है. गुरू को आत्मसमर्पण करने पर परमात्मा उस जीव को शरण में ले लेते हैं. कृष्ण को समर्पित करके यदि सभी कार्य करें तो कार्य पूजा हो जाती है. कल शाम एक मित्र के यहाँ गये. प्राणायाम आदि किया फिर चाय नाश्ता और फिर जो उपस्थित नहीं थे उनकी चर्चा की, जो बेहद बुरी आदत है. अच्छी-भली शाम का बेढंगा सा अंत कर लिया. जून को रात को नींद नहीं आई, उसे एक परेशान करने वाला सपना कि जो भोजन उन्हें मिला है, उसमें रोटियों में बाल हैं. खैर, सुबह सामान्य रही. वह अपना ध्यान भी कर पायी, पर मन में जो हर वक्त छलकता हुआ सा प्रेम, शांति और आनंद का स्रोत था वह जाने कहाँ सूखता जा रहा है. वह है तो उसके ही अंदर, उस दिन वह उजागर हो गया था और कुछ दिन उसे भिगोता रहा पर अब वह उसे इस तरह छोड़कर नहीं जा सकता. उसे अपने भीतर से निकाल लाना ही आत्मसाक्षात्कार है. इसमें सहायक होगी उसकी अपनी सजगता, हृदय का प्रेम और वाणी की मधुरता. यदि गोहाटी जाने का अवसर मिला तो एक बार पुनः मन, प्राण ज्योति से भर उठेगा. आज से नन्हे की परीक्षाएं हैं. इस बार वह शांत है, पता नहीं यह शांति किस बात का प्रतीक है. यह तो समय ही बतायेगा.

अभ्यास में और गहराई में उतरना होगा, तभी अनुभव होगा. आज ही निर्वासनिक होना होगा. जीवन अभी है. शरीर आज है कल नहीं रहेगा, जो रहेगा वह वही होगा, उसी का अंश होगा. इस समय मन में क्या चल रहा है, इसका पता पल पल चलता रहे सुख का केंद्र परमात्मा भीतर है. उसी से जुड़ना है, यह जुड़ाव यदि कायम रहे तो दुनिया की कोई वस्तु मिले या न मिले कोई अंतर नहीं पड़ता, तब सारा विषाद न जाने कहाँ चला जाता है. मानव के पास श्रद्धा, ज्ञान और योग की कला है. श्रद्धा के बना मनुष्य यंत्र के समान हो जाता है. श्रद्धा के साथ साथ उत्साही और संयमी होना ही ज्ञान के पथ पर ले जाता है. जीवात्मा स्वयं को परमात्मा से जोड़ सकता है. अव्यक्त को व्यक्त करने की शक्ति मनुष्य में ही है. कबीर ने कहा है कि “मोहे सुन सुन आवे हांसी, पानी विच मीन प्यासी”   


Tuesday, March 4, 2014

चुलबुली सी बालिका


आज वह बेहद हल्का महसूस कर रही है. दादा धर्माधिकारी की पुस्तक में मनुष्यता की परिभाषा पढकर मनुष्य की गरिमा और उसकी शक्ति पर विश्वास और बढ़ गया है. कल का दिन एक भरपूर दिन था. कल दिन भर उसने एक एक पल को पूरे मन से जीया. मानव होना और फिर स्त्री होना, संस्कार युक्त, शिक्षित और स्वस्थ होना, अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है, कुछ न कुछ करते रहने की तीव्र इच्छा, निरंतर कुछ न कुछ सीखने की आकांक्षा, जीवन को कलात्मक रूप से जीने का प्रयास, स्वयं को समाज के प्रति या परिवार के प्रति उत्तरदायी मानते हुए अपने कर्त्तव्यों का निर्वाह करना, ये सारी बातें उसमें किसी हद तक तो हैं न, और हर बात के लिए स्वयं को दोषी मानते रहना अपनी शक्ति पर संदेह करना, अपने आप पर भरोसा न कर पाना ये दोष भी हैं. पर अब उसे भयभीत होकर पीछे-पीछे रहकर चलने की जरूरत नहीं है, उसकी कमियां जो भी हों उन्हें लेकर स्वयं को अपमानित महसूस करने की जरूरत नहीं है. सदा ही तृतीय स्थान पाने की अपनी आदत को जारी रखने की भी नहीं. आज नन्हे का गणित का इम्तहान है जो उसे कठिन लगता है, पर वह जानती है वह बहुत होशियार है, अवश्य अच्छा करेगा. कल शाम वे टहलने गये, हवा ठंडी थी और चेहरे को छूकर सिहरा जाती थी

Today again she is so happy ! yesterday one friend got a prize of 16,000 Rs from the makers of Nyle Shampoo. They went there to celebrate the joy and to eat sweets. Today she rang her to say that they liked it, then she talked to asamiya friend, she is waiting for the D-day, she promised her to be there in the hour of need and it makes her happy that she will be of some use to someone ! Nanha has prepared well for Sanskrit exam. He has learnt twenty shlokas in Sanskrit, when she was of his age she never learned so many shlokas..

पिछले चार दिनों से नहीं लिख पायी, आज उन्हें तिनसुकिया जाना है, लंच भी वहीं खाना है. कल होली मनायी, परसों शाम बड़े भाई भाभी को फोन किया, छोटी बहन को फोन किया कल सुबह -सवेरे दीदी का फोन आया, उन्होंने कहा, बड़ा भांजा और छोटी भांजी शायद यहाँ आयें छुट्टियों में.

आज संगीत कक्षा में ‘काफी’ की तान सिखाई गयी. कल वे तिनसुकिया में ही थे कि पता चला उस सखी ने बिटिया को जन्म दिया है, वापसी में अस्पताल गये, गुलाबी रंग की छोटी सी बच्ची आँखें बंद किये लेटी थी, अभी तक चेहरा स्पष्ट नहीं था कि किस पर गया है, माँ स्वस्थ लगी, साहसी है वह, वैसे भी उम्र के इस मोड़ पर आकर माँ बनने का निश्चय करना ही साहस पूर्ण कदम था जो वह नहीं उठा पायी थी, अपना सब कुछ दे देना पड़ता है न. आज से उसकी छात्रा ने फिर से आना शुरू कर दिया है. कल उसने एक चप्पल ली, एक जोड़ी बुँदे, एक नेल पॉलिश और एक लिपस्टिक यानि अपने ऊपर खर्च ! इस समय तीन बजे हैं, नन्हा एक कहानी लिखते-लिखते बीच में ही टेनिस खेलने गया है. शाम को वे पुनः अस्पताल जायेंगे और बाद में एक मित्र के यहाँ, उनकी छोटी बेटी बहुत प्यारी है उतनी ही चुलबुली भी.   

‘कविता लेखन के सामान्य सिद्धांत’ पढना शुरू किया तो भीतर विचार जगने लगे. उसे लगा, मन जितना संवेदन शील होगा जितना गहराई से सोचेगा जीवन उतना ही अर्थपूर्ण होगा, वे हैं कि उथले-उथले ही जीए जाते हैं, अंतर में झाँकने से डरते हैं खुद के भी और इर्दगिर्द भी, कहीं कुछ ऐसा न दिख जाये जो आँखों में खटक जाये, बस आँखें बंद किये ताउम्र जिए चले जाते हैं, न ही टूटकर प्यार करते हैं न ही नफरत, बस कामचलाऊ जिंदगी जीते हैं, शिद्दत की कमी है अहसासों  में ती जीवन में गहराई कहाँ से आये.

पिछले कई दिनों से, हफ्तों से, महीनों से कुछ नहीं कहा, कविता लिखी नहीं जाती, कही जाती है पहले अपने आप से फिर कागज से, ऐसा तो नहीं कि महसूस करने की शक्ति नहीं रही, अब भी एक मार्मिक शब्द आँखों को धुंधला जाता है, मौसम के बदलते रूप और ढंग अदेखे नहीं रहते, आते-जाते उगता डूबता सूरज और चाँद जब दिखता है तो मन में एक हिलोर सी जगती है, फूल अब भी भाते हैं और दर्द अब भी होता है पर ऐसा भी बहुत कुछ है जो अब नहीं होता जैसे कि अपनी सुविधा-असुविधा की परवाह किये बिना किसी की सहायता करने की ललक. अपना ख्याल पहले आता है जैसे कि इस डर से फोन न पकड़ना कि कहीं पड़ोसिन किसी काम के लिए न बुला ले, अब अपने नियमित रूटीन को तोड़कर उसके लिए समय निकालना जबकि अपना सिर भी दुःख रहा हो, सेवा/सहायता ही कहलायेगा न, पर क्यों कि लोग नितांत अपने लिए जीते हैं ! दूसरों के लिए इसमें जगह कहाँ है ?





Thursday, July 4, 2013

आलू-प्याज की सब्जी


अभी कुछ देर पूर्व बिजली चली गयी, मौसम भी आज अपेक्षाकृत गर्म है, नन्हे का स्कूल २० तक बंद है, आज सोलह तारीख है. जून के जाते ही हमारा नया माली काम करने आ गया, चुपचाप सारे काम कर देता है. वह सोच रही थी कि कुछ देर नन्हे को पढ़ाने का वक्त मिल जायेगा पर उन्होंने अभी फोन करके एक मित्र को भोजन पर साथ लाने की बात कही, एक सब्जी और बनानी थी, पर घर में आलू-प्याज के आलावा कुछ भी नहीं, देखें जून को यह आलू-प्याज की सब्जी पसंद आती है अथवा नहीं. पिछले हफ्ते उसकी पुरानी पड़ोसिन लौट आई, इतवार तक उनके साथ ही वे व्यस्त रहे, सोमवार को जून का जन्मदिन था, नन्हे का स्कूल बाढ़ के कारण बंद चल रहा था, कल उन्होंने पन्द्रह अगस्त मनाया सुबह अपने घर में छोटी सी पार्टी, शाम को एक मित्र के यहाँ गये. अचानक उसे किचन याद आ गया और लिखना छोड़कर वह बाकी काम निपटाने चली गयी.

समाचारों में सुना फिरोजाबाद के पास कालिंदी व पुरुषोत्तम एक्सप्रेस में टक्कर से भयंकर दुर्घटना. उसे ट्रेनों के नाम पर आश्चर्य हुआ, कालिंदी यमुना का नाम है और पुरुषोत्तम कृष्ण का, जैसे यमुना का जल उमड़ आया था कृष्ण के चरण छूने, वैसे ही कहीं..दोनों की टक्कर..

मन एक गाय है जो ‘मैं’ के खूंटे से बंधी
एक संकुचित दायरे में अनवरत घूम रही है
दूर.. जहाँ तक दृष्टि जाती है
नीले पहाड़ों के नीचे
घाटियों में है चाँदी सी चमकती जल धारा
वह उस मीठे पानी की ठंडक महसूस करना चाहता है  
लेकिन अपने अहम् के दायरे में ‘मैं’ के दायरे में बंधे होना उसकी नियति है
उसके इर्दगिर्द की हरियाली सूख गयी है
ऊपर तपता हुआ सूरज है
और सुदूर.. मैदानों में ठंडी छाँव
पर उस छाँव तक पहुंच पाना कितना दुर्लभ है
और ‘मैं’ के खूंटे से बंधे रहना कितना सुलभ....

Yesterday night she was feeling so helpless. She could not sleep much and then she thought above poem. It shows the true state of her mind. Jun has more stable mind. He is so calm and she does,nt know why did she behave so badly. She must be above the mere myness . There are others also beyond me and true happiness one can get only when he/she forgets him/herself. She shall always remember this and she knew this yesterday also when she was furious for nothing.


सुबह की शुरुआत ‘जागरण’ के साथ हुई. अन्तर्मुखी होकर ही अपने अंदर परमात्मा से साक्षात्कार किया जा सकता है. प्रतिदिन आधा घंटा ध्यान का अभ्यास करना होगा. नन्हा आज बहुत दिनों के बाद स्कूल गया है, सो सुबह तैयार होने में नखरे कर रहा था, कहा, ‘अच्छा नहीं लग रहा है’, शायद उसने नूना को ऐसा कहते सुना होगा, बच्चे नकल करने में होशियार होते ही हैं. जून तभी कहते हैं वह उस पर गया है. आजकल वे नियमित खेलने क्लब जाते हैं, अच्छा लगता है, तन-मन दोनों शक्ति से भर जाते हैं.