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Thursday, May 7, 2026

ग्रहों का प्रभाव



कल नन्हे का जन्मदिन था। दोपहर को साढ़े बजे वे लोग आये। सामूहिक लंच लाजवाब था। सोनू की मौसी भी आयी थीं।आज जीजा जी का पचहत्तरवाँ जन्मदिन है।दीदी व सभी बच्चों ने मिलकर शानदार उत्सव मनाया, कुछ देर पहले उनके वीडियो देखे। उन्हें जून के भेजे गुलाब मिल गये हैं। ईश्वर उन्हें दीर्घायु प्रदान करे।आज उसने गुरु पूर्णिमा पर लिखे एक लेख का हिन्दी में अनुवाद किया।पहली बार भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और सलाहकार सुधांशु त्रिवेदी को सुना। भारतीय संस्कृति के बारे में बहुत जानकारी है उन्हें।


आज गुरु पूर्णिमा है। गुरुजी द्वारा ‘स्पंद कारिका’ पर दी जाने वाली प्रवचन माला आज से शुरू हो रही है।उन्होंने बताया, स्पंदन एक दिव्य चेतन ऊर्जा है। यह ऊर्जा महसूस कर सकती है।ईश्वर उन्हें उनसे अधिक जानता है। जो इस सृष्टि का आधार है, उस शिव को महसूस किया जा सकता है। आत्मा बिना इंद्रियों के देख सकती है, सुन सकती है, छू सकती है। ये सभी शक्तियाँ निर्विशेष आत्मा में हैं।मन के भीतर जो विचार आते हैं, वे वहीं से आते हैं। जब विशेष ऊर्जा उस निर्विशेष ऊर्जा में समा जाती है, तो केवल वही शेष रहती है।यह चेतना सभी शक्तियों को धारण करती है। विषयों की स्मृति से इच्छाएँ उत्पन्न होती हैं। इच्छाएँ भविष्य की ओर ले जाती हैं।जब कोई वर्तमान में होता है, तब अपने सच्चे स्वभाव के निकट होता है। जब जाग्रत व स्वप्न अवस्था में इच्छायें जगती हैं, तो व्यक्ति चेतना से दूर चला जाता है। हर इच्छा पूर्ण होने के बाद उसे वहीं लाकर छोड़ देती है। इच्छा सीमित की हो सकती है। 


‘स्पंद कारिका’ का अगला सत्र आरंभ हो गया है। गुरु जी कह रहे हैं, स्वभाव में टिकना ही साधना का लक्ष्य है। नम्रता व सरलता आत्मा के स्वाभाविक गुण हैं।साधक को सबके साथ एकत्व का अनुभव करना है। जैसे तेल के साथ पानी नहीं मिलता, पर दूध के साथ पानी मिल जाता है; बच्चों के साथ सरलता से जुड़ा जा सकता है पर बड़े अपने चारों ओर एक दीवार खड़ी कर लेते हैं।जब कोई ध्यान की गहराई में जाता है, उसे रिक्तता का अनुभव होता है। जब इच्छा का त्याग करता है तब क्षणिक शून्यता का अनुभव होता है, लेकिन उसके बाद आनंद मिलता है। जब कोई सामान्य चेतना के साथ एक हो जाता है, भीतर आनंद का अनुभव होता है। इस अवस्था में कोई अभाव नहीं रहता। समाधि कोई नीरस अवस्था नहीं है। वहाँ जाकर ज्ञात होता है अज्ञान जैसा कुछ भी नहीं है। शून्य से पहले ध्वनि का निर्माण हुआ फिर सृष्टि का।अंतिम स्वतंत्रता का अनुभव तभी होता है, जब कोई ज्ञान का सम्मान करता है, तब वह सजग और सरल हो जाता है।निर्दोष चेतना ही शिव है। 


आज शाम को वे कुछ ही दूरी पर स्थित ‘प्रकृति फार्म’ देखने गये। प्राकृतिक खेती के साथ यह की एक विशेषता है पालतू जानवरों को रखने की सुविधा, हरियाली से भरा हुआ यहाँ का वातावरण लोगों को सप्ताहांत बिताने के लिए आकर्षित करता है।दोपहर को नूना ने एओएल का अनुवाद कार्य किया। इस समय गुरुजी ‘स्पंद कारिका’ पर आगे बोल रहे हैं। प्रकृति प्रेममयी है।सर्दी का अनुभव तभी होता है, जब गर्मी का अनुभव कर चुके हैं। सर्दियों में वृक्ष पत्ते गिरा देते हैं, ताकि धूप का आनंद ले सकें, गर्मियों में धर लेते हैं ताकि तेज धूप से बचे रहें।विरोधी भावनाएँ एक-दूसरे की पूरक हैं। एक ही चेतना अनेक रूपों में प्रकट हो रही है। 


आज नन्हा व सोनू अकेले ही आये थे। इतवार की सुबह माली से बगीचे में काम कराते हुए बीती।दोपहर को लंच नन्हे और सोनू ने मिलकर बनाया। शाम की चाय के बाद वे चले गये। आज के सत्र में ध्यान करवाने के साथ गुरुजी ने नाड़ी विज्ञान, स्थान शुद्धि और ग्रहों के प्रभाव के बारे में भी कुछ जानकारी दी। यह भी कहा कि यदि कोई  किसी पूजा स्थल के पास जाये तो उसकी दोनों नाड़ियाँ चलने लगती हैं। उनके अनुसार किसी के मन के भाव उसकी श्वास में परिलक्षित होते हैं, इसी का आश्रय लेकर कुछ लोग दूसरों के मन के विचार पढ़ लेते हैं। सूर्य गेहूं से जुड़ा है और ह्रदय से, चंद्रमा मन से जुड़ा है और चावल से, मंगल मसूर दाल व रक्त से, बुध हरी मूँग और त्वचा से, बृहस्पति चना दाल और यकृत से, शुक्र चावल और किडनी से, शनि तिल, काली उड़द और दाँतों से, राहु सिर और तिल से, केतु निचले अंगों व जड़ वाली सब्ज़ियों से जुड़ा है।


गुरुजी ने आज कहा, पंछी हर दिन नया गीत नहीं गाते पर वे कभी ऊबते नहीं, उनके लिए हर दिन ही नहीं, हर पल नया है। आत्मा के बारे में बौद्धिक रूप से जानना पर्याप्त नहीं, अस्तित्त्वगत रूप से उसमें टिकना ध्यान है। अनुभव और अनुभवकर्ता जब एक हो जाते हैं, तभी ध्यान घटता है।द्रष्टा ही जब दृश्य बन जाये, तब जगत जैसा भी हो, भाता है। इस जगत में जो कुछ हो रहा है, वह परमात्मा की एक क्रीड़ा है।ज्ञानी ऐसे जीता है जैसे हो ही नहीं, जैसे सारी प्रकृति है, वह वैसे ही हो जाता है। जब किसी को पूर्ण तृप्ति का अनुभव होता है, तभी जीवनमुक्ति का अनुभव कर सकता है। प्रतिदिन की तरह आज भी गुरुजी ने ध्यान कराया। 


आज इस प्रवचन माला का अंतिम सत्र है। स्पंद का अर्थ है तरंग, यह सारा ब्रह्मांड तरंगों से भरा है। कुछ सामान्य तरंगें हैं, कुछ विशेष तरंगें हैं। वस्तुएँ और व्यक्ति विशेष तरंगें हैं। विशेष तरंगें, सामान्य तरंगों से  उत्पन्न होती हैं। अनंत जब सीमित होता है तब जीव बन जाता है। हरेक के भीतर सामान्य स्पंदन है, जो छिपा है।सामान्य स्पंदन न मुक्त है न बंधा है। प्रेम जीवन का स्रोत है।जब शिव अपना नेत्र खोलते हैं, तब सृष्टि का जन्म होता है। जब कोई सार्वभौम को सिर झुकाता है तो वह शिव से जुड़ता है। शिव और उसके मध्य कोई बाधा नहीं है। जो उसे अनुभव कर लेता है, वह समता को प्राप्त करता है। जगत में भिन्नता है पर सभी के भीतर जीवन शक्ति एक है, जो शिव है। पाँच इंद्रियों के द्वारा जीवन शक्ति ही जगत का अनुभव करती है। शिव एक होकर भी, सबका कारण होकर भी सबसे पृथक है। इसका अनुभव होते ही जीव स्थितप्रज्ञ हो जाता है।उस स्थिति में दो नहीं हैं, एक ही सत्ता है। जगत उस पर आरोपित अध्यास मात्र प्रतीत होता है। 


Tuesday, May 5, 2026

स्पंद कारिका


स्पंद कारिका 


आज समाचारों में सुना राष्ट्रपति पद के लिए भाजपा की उम्मीदवार श्रीमती द्रौपदी मुर्मु जी हैं। पहली आदिवासी महिला, जो इतने बड़े पद तक पहुँचेंगीं। वह झारखंड की राज्यपाल रहा चुकी हैं और उड़ीसा विधान सभा में कई बार मंत्री पद भी संभाल चुकी हैं।छोटी बहन ने वापस जाकर आर्ट ऑफ़ लिविंग का पहला बेसिक कोर्स करवाने के लिए काम करना अभी से शुरू कर दिया है। पहले वह सहायक शिक्षिका के रूप में कोर्स करवाएगी, फिर कोड मिल जाने के बाद स्वतंत्र रूप से। दोपहर को उन्होंने यू ट्यूब पर एक आध्यात्मिक फ़िल्म देखी, जो अनोखे जीवों व प्राणियों से परिचय करवाती है। देह में आत्मा की उपस्थिति को सिद्ध करने के लिए बहुत अच्छी दलीलें देती है।शाम को वे सब एपिक रॉक गये, कुछ देर वहाँ बैठे जहाँ एक झरना बह रहा था। वर्षा के मौसम में झरनों में एकाएक पानी बढ़ जाता है।कल नन्हा सभी को मैसूर ले जाने वाला है।जहाँ छोटी बहन दो दिन अपने जेठ-जेठानी के पास रहकर वापस आएगी। 


आज बहुत दिनों के बाद अपने पुराने समय पर डायरी उठायी है। परसों की रात मैसूर के निकट स्थित एक हरे-भरे फ़ार्म हाउस ‘कैरिस ब्रुक’ में बिताकर, कल दोपहर का लंच मैसूर में करने के बाद वे शाम तक घर लौट आये।पापाजी से बात हुई, उसकी एक कविता पढ़कर कह रहे थे, दुनिया में सभी अपने-अपने काम में लगे हैं, भक्त व कवि भी इसी तरह अपने काम में लगे हैं। परमात्मा अनंत रूपों में स्वयं को प्रकट कर रहा है। मन संदेह करता है पर आत्मा सदा एक रस साक्षी मौजूद है, वह प्रेम, शांति व करुणा का सागर है, वही सत्य है।आज भी छात्राएँ हिन्दी पढ़ने आयी थीं, जिनकी मातृ भाषा हिन्दी नहीं है, उन्हें कितनी परेशानी होती है बोलने में, जैसे उसे कन्नड़ बोलने में होती है। 


आज का दिन कुछ अलग बीता, सुबह सब सामान्य था, टहलने गई तो पैरों में भारीपन लगा, शरीर में स्फूर्ति नहीं थी। योगासन भी पूरे नहीं हो पाये। नाश्ते के बाद टाइप करने बैठी तो शरीर अलसा रहा था। भोजन बनाया तो किसी छोटी सी बात पर मन झुंझला गया, कटु तो नहीं एक-दो शब्द तेज आवाज़ में निकले, जैसे कोई भीतर से स्वयं ही निकाल रहा हो। दिन भर कुछ नहीं खाया, रात्रि के समय कुछ भूख का अहसास हुआ। कर्मों के फल के रूप में भी कर्म होते हैं, यह आज जैसे स्पष्ट हो रहा था।जून शांति से सब देख-सुन रहे थे, उन्होंने कुछ प्रतिवाद नहीं किया।


आज दोपहर बारह बजे वे केंगरी रेलवे स्टेशन जाकर छोटी बहन को ले आये।उसने साड़ियाँ, सूट व कुर्ते दिखाये, जो मैसूर से लायी है। शाम को उन्होंने मिलकर बड़ी स्क्रीन पर वे सारे फ़ोटोज  देखे, जो पिछले कई दिनों से खींच रहे थे।उसके बाद सोने से पहले साधना, भजन, भोजन और रात्रि भ्रमण।  


आज जुलाई का प्रथम दिन है। आर्ट ऑफ़ लिविंग की नयी-नयी बनी शिक्षिका मोबाइल पर हैप्पीनेस कोर्स का मैनुअल पढ़ रही है। जून भी मोबाइल पर कुछ देख रहे हैं। शाम को वे नापा के पीछे वाली सड़क पर टहलने गये, जगह-जगह निर्माण कार्य शुरू हो गया है। पहले की सी शांति भी नहीं थी और न ही सफ़ाई! जून ढेर सारे फल लाए थे, ड्रैगन फ़्रूट, लंगड़ा आम और जामुन बहुत मीठे थे। पापा जी ने बताया, छोटा भाई बहरीन से लौट आया है। सुबह वे आश्रम गये थे। हर्बल टी लेने के प्रकरण में जून से उसकी बहस हो गयी, पर जल्दी ही स्मरण आ गया, आश्चर्य हुआ कि अभी भी आग्रह शेष है भीतर ! मन की हज़ार परते हैं, जिन्हें शायद भगवान भी नहीं जानते ! 


आज सुबह टहलने गये तो हवा ठंडी थी और आकाश पर चंद्रमा अपनी आभा बिखेर रहा था।जुलाई का महीना बैंगलोर का सबसे ठंडा महीना कहा जाता है। इसी महीने की तेरह तारीख़ को गुरु पूर्णिमा है।गुरुजी ‘स्पन्द कारिका’ पर बोलने वाले हैं। सोसाइटी में गणेशोत्सव का उद्घाटन समारोह है। दो माह तक ये कार्यक्रम चलेंगे। छोटी बहन को कल वापस जाना है।सुबह उसने साइकिल चलाने का अभ्यास किया।वर्षों पूर्व सेना में काम करते समय उसने साइकिल चलायी थी। पिछले दो हफ़्ते उन्होंने साथ बिताये। अच्छा लगा। शाम को वे नन्हे के यहाँ गये। 


आज से नूना स्वामी रामानन्द जी द्वारा पर दिया गया प्रवचन सुनना शुरू किया है। कुछ-कुछ समझ में आ रहा है।गुरु पूर्णिमा से पहले कुछ भूमिका तो तैयार हो जानी चाहिये मन में।यह नौवीं शताब्दी के कश्मीर शैव दर्शन का एक ग्रंथ है,जो वासुगुप्त द्वारा रचित शिव सूत्रों पर आधारित है । स्पंद का अर्थ है भगवान शिव की शक्ति के दिव्य कंपन, जिससे इस सृष्टि का उदय और विलय होता है। 


इस महीने चार रिश्तेदारों के जन्मदिन पड़ते हैं, वह सभी के लिए कविता लिखेगी। आज ट्रांसक्रिप्शन का कार्य भी आया। पापाजी आज गर्मी या उम्र के कारण थोड़ा सा परेशान थे, जो स्वाभाविक है। मधुमालती में पहली बार फूल लगे देखे। सहजन का पेड़ तेज हवा में गिर गया था, नापा का माली आकर उसे सहारा देकर सीधा कर गया है, पता नहीं बचेगा यह नहीं।जड़ें मज़बूत होंगी तो शायद बच जाये। सुबह छोटी बहन का फ़ोन आया, वह घर पहुँच गई है।वहाँ उसे गर्मी का अहसास हो रहा है, एक महीना वह बैंगलुरु के सुहाने मौसम में रहकर जो गई है। 


कल नन्हे ने बूस्टर वैक्सीन लगवा ली। थोड़ा बहुत साइड इफ़ेक्ट भी हुआ। आज भी ‘स्पन्द  कारिका’ सुना, मन में जैसी भावना होती है, परिणाम भी वैसा ही आता है। आत्मा तो सागर की तरह है, वे अपने मन को चम्मच जितना रखेंगे तो उतना ही समायेगा। यदि विशाल बनाएँगे तो उतना अधिक मिलेगा। यदि क्षीर सागर के साथ एक रूप हो जाएँगे तो वही बन जाएँगे। मानव अपने अनंत स्वरूप को भुलाकर स्वयं को उपाधि से जोड़कर व्यर्थ ही सुखी-दुखी होते रहते हैं। आनंद उनका स्वभाव है  और सत्य उनका स्वरूप ! 


आज भी कल की तरह दिन भर वर्षा होती रही। आज ट्रांसक्रिप्शन का कार्य पूरा हो गया। गुरु पूर्णिमा पर लिए भी एक लेख का अनुवाद करना है। लेखन कार्य में कुछ कमी आई है, पर जीवन जो रंग दिखाए, स्वीकार है। जन्मदिन की दो कविताएँ टाइप कीं।आज पतंजलि योग सूत्र पढ़ते समय कितनी सरलता से स्पष्ट हुआ कि ‘योग’ चित्त वृत्ति का निरोध कैसे है ? और जब ऐसा होता है तब द्रष्टा अपने स्वरूप में कैसे ठहर जाता है। यदि ऐसा नहीं होता अर्थात वृत्ति बनी रहती है तो द्रष्टा उसी वृत्ति का आकार ग्रहण कर लेता है।जैसे ब्रह्मा कुमारी कहती है आत्मा जब सोचती है तब मन बन जाती है। अब मन्त्र जाप का महत्व भी ज्ञात हो रहा है। मन जब एक मन्त्र का आकार ले लेता है, तब दो जाप के मध्य में द्रष्टा का अनुभव होता है। इसीलिए ॐ को परमात्मा का नाम कहा गया है। सारे शब्द ॐ में समा जाते हैं। ॐ के बाद जो मौन है, वही आत्मा का स्वरूप है। उसमें टिक जाना ही योग है। भीतर जितने भी विचार चलते हैं, वे आत्मा से ही उपजे हैं, पर उससे दूर ले जाते हैं। जैसे लहर सागर से ही उपजी है, पर उससे ऊपर उठती है तो दूर चली जाती है। 


आज जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे की नारा शहर में चुनावी भाषण देते समय मृत्यु हो गयी, उन पर एक व्यक्ति ने गोली चलायी थी। चीन में इस बात की ख़ुशी मनायी गई। गुरुजी ने भी ट्वीट किया, वह उनसे जुड़े हुए थे।