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Tuesday, March 24, 2020

पंद्रह अगस्त



बहुत दिनों के बाद फाउंटेनपेन से लिखना कुछ विचित्र लग रहा है, जून के जन्मदिन पर उन्हें यह उपहार में मिला है, पर वह एक दिन भी इससे लिख नहीं पाए, सो उसके पास आ गया है. स्टाइल की बॉडी और सुनहरे निब वाला यह पेन काफी एहतियात मांगता है, इसमें स्याही नहीं भरनी पड़ेगी, बल्कि कार्टिलेज लगेगी. पन्द्रह अगस्त का उत्सव उन्होंने सोल्लास मनाया, सुबह टहलने गए तो आकाश पर इंद्रधनुष का छोटा सा टुकड़ा दिखा, मानो तिरंगा वहां भी फहर रहा हो. बच्चों के स्कूल गयी तो प्रेसीडेंट ने कुछ बोलने को कहा, तिरंगे के महत्व के बारे में कुछ शब्द कहे जो यकीनन पुरे हृदय से कहे गए थे. उसके बाद क्लब की महिलाओं के साथ वे अस्पताल गए, मरीजों को मिठाई के डिब्बे वितरित किये गए, जो उनके परिजन ही खाने वाले हैं. घर आकर आस-पास के बच्चों और महिला-पुरुषों के साथ लॉन में झंडा फहराया, लड्डू बांटे. दोपहर के भोजन में जून ने बहुत सहायता की, उन्होंने दो घंटों में  लगभग सभी कुछ बना लिए, बाद में नैनी ने रोटी और चावल बनाये. एक बजे से मेहमान आने लगे. जून के दफ्तर की दो सहकर्मियों ने मदद की, एक सखी सदा ही सहायता के लिए सदा ही तैयार रहती है. टीवी पर अटलबिहारी बाजपेयी की नाजुक हालत के बारे में बताया जा रहा है, उनके राजनितिक जीवन के बारे में चर्चा हो रही है, भारत की राजनीति में उनका बहुत योगदान है. उनकी खूबी थी सबको सुन्ना, सबको साथ लेकर निर्णय लेते थे , उनके विरोधी भी उनका सम्मान करते हैं. पोखरण का बम विस्फोट उनके कार्यकाल में हुआ था. उनका कोई भाषण सुने ऐसा मन होता है. 

आज दोपहर वे मृणाल ज्योति गए, वहां पीने के पानी की समस्या का जायजा लिया. जून उनकी सहायता करना चाहते हैं, वः कम्पनी को एक प्रस्ताव भेजेंगे. उस पानी में लौहतत्व बहुत ज्यादा है, जो वे लोग ट्यूबवेल से निकालते हैं. उसने सोचा, काश उनकी यह समस्या वर्तमान उच्चाधिकारी के रहते रहते हल हो जाये. आज सुबह ड्राइविंग स्कूल गयी, लाइसेंस के लिए अगले हफ्ते फार्म भरना है, फिर जाना होगा. आज सुबह उठने से पूर्व एक स्वप्न चल रहा था, फिर उसी जन्म का स्वप्न, जिसके कारण बचपन से ही वैसी परिस्थितियां जीवन में आयीं. किसी एक जन्म में जो भक्त होता है, दूसरे में डाकू भी हो सकता है. उनके भीतर हर तरह के संस्कार मौजूद हैं, वे किसे प्रश्रय देते हैं यह उनके ऊपर है. आत्मा दोनों की साक्षी है. इस समय मौसम ठंडा हुआ है, दोपहर को बहुत गर्मी थी. कल दिन भर अटलजी के बारे में समाचार सुने, उनकी अंतिम यात्रा टीवी पर देखी. उनकी भाषण देने की कला अद्वितीय थी, सोच अद्धभुत थी. उन्हीं से सीखकर नरेंद्र मोदी देश का नेतृत्व कर रहे हैं. विपक्ष में रहकर भी उन्होंने बहुत योगदान दिया. कल तिनसुकिया जाते व आते समय उनके जीवन पर आधारित कार्यक्रम  देखा. सुबह उनके बारे में लिखा. उसे लगता है अगले चुनाव में बीजेपी पुनः जीतकर आएगी और उसमें अटलजी का भी हाथ होगा, लोग उन्हें भूल नहीं सकते ! कल इतवार है, वे राखियाँ बनाएंगे. 

दोपहर बाद का समय है, तापमान सैंतीस डिग्री पहुँच गया है, जून को इतनी धूप में फील्ड जाना था, वह पूरे उत्साह से गए. सुबह स्कूल में भी तेज धूप के कारण योग का अभ्यास कम समय के लिए करवाया. आज फेसबुक पर राखी बनाते हुए व झंडा लिए बच्चों के चित्र पोस्ट किये, अच्छा काम , अच्छा लगता है सभी को ! 

Friday, June 8, 2018

इमर्सन के अनमोल वचन


कल कुछ नहीं लिखा, दोपहर को जून चेन्नई के लिए रवाना हो गये, उसके बाद सिर में दर्द के कारण सो गयी, उठी तो तीन बजे थे, भूख तब भी नहीं लगी थी. रात्रि को योग कक्षा के बाद ही भोजन किया. पित्त बढ़ने के कारण ही ऐसा हुआ होगा. नींद से उठाने के लिए एक स्वप्न आया, महिला क्लब की मीटिंग उनके यहाँ है, पर उसने उनके लिए भोजन आदि की कोई व्यवस्था नहीं की है. उसी स्वप्न में माँ-पिताजी को भी देखा. बाद में पिताजी से फोन पर बात की, वह अपने भोजन के लिए कहने दुकान पर गये थे, होटल वाला सुबह शाम घर पर ही टिफिन दे जायेगा. भाभी कुछ दिनों के लिए मायके गयी हैं, उनकी माँ का स्वास्थ्य ठीक नहीं है. वह बड़ी बेटी हैं और अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा रही हैं

आज सुबह स्कूल गयी, खड़े होकर करने वाला ध्यान कराया, अच्छा रहा. उसका मौन ही उन्हें कुछ दे सकता है, उसके भीतर का मौन ! ध्यान साक्षी में टिकना ही है. भीतर जो सन्नाटा है, स्थिरता है, एकरसता है, वही साक्षी है. जो सबकुछ देखता रहता है, पर अचल रहता है. आज सिर में दर्द नहीं है, यह भी वह देख रहा है, दर्द के कारण भीतर गहराई में जाने का अवसर मिला. पुराने संस्कार से मुक्ति का अवसर भी मिला. सद्गुरू से वार्तालाप करने का भी ! शाम को एक घंटा कैसे बीता, पता ही नहीं चला. ज्ञान के पथ पर चलना सचमुच तलवार की धार पर चलने जैसा है, पर एक बार जिसे साक्षी में टिकना आ जाये, उसके लिए यह श्वास लेने जितना सहज है.

शाम के पौने छह बजने को हैं, कुछ देर पहले लाइब्रेरी से पुस्तकें लेने गयी, आज शुक्रवार है, सो लाइब्रेरी बंद थी. जून वापस आकर क्लब में चल रही एक सरकारी मीटिंग में चले गये हैं. ढेर सारे फल लाये हैं और मेवे भी, कई तरह की चाय भी. आज सुबह ध्यान में एक दृश्य देखा, प्लेट में चाय डालकर कोई दे रहा है. बचपन में सुबह का नाश्ता होता था चाय के साथ तिकोना परांठा. तब से कितने गहरे संस्कार मन पर पड़ गये हैं, पर इनसे मुक्त होना ही है. इस समय कितनी शांति प्रतीत हो रही है. जब कोई इच्छा नहीं रह जाती, तब ऊर्जा स्वयं पर लौट आती है. स्वयं से मिलन होता है और तब परमात्मा के सम्मुख जाने लायक वे होते हैं. आज भी पिताजी से बात की, उन्होंने कहा, ओशो की एक किताब में पढ़ा, अंग्रेजी के लेखक इमर्सन ने कहा है, शिक्षा का अर्थ शाब्दिक ज्ञान नहीं है, वह ज्ञान जो व्यक्त्तित्व से झलकता है, वही शिक्षा है. जो किसी के होने मात्र से झलकती है, व्यवहार से झलकती है, वही शिक्षा है. आत्मा के बारे में कोई कितना भी ज्ञान सुन-पढ़ ले, जब तक निरंतर आत्मा में स्थिति नहीं हो जाती, तब तक लक्ष्य से दूरी बनी ही हुई है.

साढ़े नौ बजे हैं रात्रि के, जून अभी तक क्लब से नहीं आये हैं, दस बजे तक आयेंगे सम्भवतः. मन आज कितना हल्का है, जैसे हो ही न. शाम को लाइब्रेरी से हिंदी की दो किताबें लायी, निराला की कहानियाँ और बच्चन की कविताएँ. सेक्रेटरी का फोन आया, कल मीटिंग है और कल ही शाम को क्लब में ‘’नीरजा’ फिल्म है. नन्हे से बात की, वह घर का काम करवा रहा है, काफी कुछ खराब था, विशेष तौर से नल आदि, जो बदलवाने पड़े हैं, इसी माह में वह शिफ्ट हो जायेगा. सुबह घर का साप्ताहिक सफाई का दिन था, हीटर व ब्लोअर अब पैक करके रख दिए हैं, रजाई भी वापस अपने स्थान पर चली गयी है. कल फरवरी का अंतिम दिन है. आज इस मौसम में पहली बार सुबह से स्वेटर नहीं पहना है. आम के पेड़ पर बौर आ गया है और कंचन भी खिल गया है, हालाँकि बहुत अधिक फूल अभी नहीं आये हैं. मालिन ने बताया, माली सुबह से पीकर पड़ा है, दोपहर को उसने भोजन भी नहीं किया. आदमी कितना बेसमझ है, कितना दुखी भी, अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारता है. आज कई दिनों के अख़बार खंगाले. उनके अनुसार देश के हालात कुछ ठीक नजर नहीं आते. देशभक्ति के नाम पर कुछ लोग बवाल कर रहे हैं और कुछ लोग देशद्रोह को अपना रहे हैं. समाज में एकरसता की जो धारा थी वह सूखती जा रही है. भारत को जोड़ने वाला जो एक सूत्र था वह कहीं खो गया सा लगता है !  


Saturday, September 9, 2017

नदी और मौसम


सुबह आठ बजे से नौ बजे तक, दोपहर ढाई से साढ़े तीन बजे तक तथा शाम छह से सात बजे तक सामूहिक साधना होती थी. जिसमें सभी साधकों का पूरे वक्त उपस्थित रहना आवश्यक था. शेष समय में कभी–कभी पुराने साधकों को अपने निवास स्थान पर ध्यान करने के लिए कहा जाता था और कभी-कभी कुछ नये और पुराने साधकों को शून्यागारों में ध्यान करने के लिए कहा जाता था. गोल पगोड़ा में स्थित शून्यागार एक विशिष्ट आकार के छोटे-छोटे ध्यान कक्ष थे, जिनमें अकेले बैठकर ध्यान करना होता था. एक दिन शून्यागार में ध्यान करते हुए अनोखा अनुभव हुआ, जिसमें एक क्षण के लिए स्वयं को देह से अलग देखा, जैसे वह पृथक है और देह बैठकर ध्यान कर रही है. जैसे ही इस बात का बोध हुआ, अनुभव जा चुका था.

विपश्यना आरम्भ होने पर चौथे दिन के उत्तरार्ध से गुरूजी ने शरीर में होने वाली संवेदनाओं पर ध्यान देने को कहा. पहले दिन केवल नाक के छल्लों तथा ऊपर वाले होंठ के ऊपर वाले भाग पर ही, बाद में सिर से लेकर पैर तक एक-एक अंग पर कुछ क्षण रुकते हुए वहाँ होने वाली किसी भी तरह की संवेदना को देखना था. यह संवेदना किसी भी प्रकार की हो सकती थी, दर्द, कसाव, खिंचाव, सिहरन, खुजली, फड़कन या अन्य किसी भी प्रकार का शरीर पर होने वाला अनुभव. मुख्य बात यह थी कि संवेदना चाहे सुखद हो या दुखद, उसके प्रति किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं करनी थी. वे सभी संवेदनाएं स्वतः ही उत्पन्न होकर नष्ट हो जाती हैं, साक्षी भाव से इस अनित्यता के नियम का दर्शन करना था. उनका अंतर्मन न जाने कितने संस्कार छिपाए है और हर पल वे नये संस्कार बनाते चल रहे हैं. उनसे जाने-अनजाने जो भी गलत-सही हुआ है, उसका हिसाब तो चुकाना ही होगा. औरों को देखकर जो द्वेष का भाव मन में जगता है वह भीतर गाँठ बनकर टिक जाता है. प्रकृति का नियम है विकार जगाया तो व्याकुल तो होना ही पड़ेगा. अतीत में जगाये विकार समय आने पर देह पर किसी न किसी रोग के रूप में आकर प्रकट हो सकते हैं. साक्षी का अनुभव होने के बाद राग, द्वेष व मोह के बंधन नहीं बंधते.

आठवां दिन आते आते तो मन भी जैसे दूर खो गया लगता था, देह पर होने वाले सुख-दुःख जैसे किसी और को हो रहे हैं. मन एक असीम मौन में डूबा हुआ है. लगा, सारा विश्व जैसे एक ही सूत्र में पिरोया हुआ है और वह सूत्र उस से होकर भी जाता है, सदा से ऐसा ही था और सदा ऐसा ही रहेगा, यह देह एक दिन गिर जायेगी फिर भी यह चेतना किसी न किसी रूप में तो रहेगी ही. एक दिन गोयनका जी ने कहा, मन और देह दोनों एक नदी की तरह हैं. मौसम बदलते हैं तो नदी भी बदलती है वैसे ही मन और देह के भी मौसम होते हैं. देह का आधार अन्न है और मन का आधार संस्कार हैं जो हर पल बनते-मिटते रहते हैं. मन के किनारे बैठकर जो इसे देखना सीख जाता है वह इससे प्रभावित नहीं होता. 

Wednesday, June 14, 2017

झील में कमल


कर्तापन का दंश लगा है जीव को, साक्षी इसका इलाज है. वास्तव में आत्मा न करता है न भोक्ता. स्वयं का पता नहीं है सो कभी देह, कभी मन के साथ स्वयं को जोड़कर देखता है, वही मान लेता है खुद को और उनके द्वारा किये कर्मों को स्वयं द्वारा किया मानेगा ही. वे तो प्रारब्ध वश अथवा तो संस्कारों वश अपना काम करते हैं और आत्मा यदि अपने-आप में रहे तो मन, बुद्धि में कभी कुछ इधर-उधर हुआ भी तो वह स्वयं को उसका कर्ता नहीं मानेगा. आज बहुत दिनों के बाद सद्गुरू की वाणी सुनी, जैसे तन को रोज विश्राम और भोजन की आवश्यकता होती है, वैसे ही मन को भी नियमित विश्राम व भोजन चाहिए. मन का भोजन है सत्संग और मन का विश्राम है ध्यान, सो आज से पुनः ध्यान, योग और सत्संग आरम्भ किया है. जीवन को यदि सुंदर बनाना है तो ये सभी आवश्यक हैं. ‘पाठ’ भी नियमित करना होगा. पुरानी दिनचर्या को अपनाना होगा, जिसमें विविध रंग हैं.

बहुत दिनों पूर्व यह इच्छा मन में जगी थी कि बड़े घर के बगीचे में पेड़ के तने से सटकर बैठेगी और कुछ लिखेगी. आज जामुन के पेड़ के नीचे है.

मन की झील में आत्मा का कमल खिलाना है
संस्कारों की मिट्टी है जहाँ
वहीं से रंगो-खुशबू को बाहर लाना है
क्योंकि छिपा है एक स्रोत शुद्ध जल का
मिट्टी की गहराई में
माना चट्टानें भी होंगी मध्य में
कठिन होगी यात्रा
पर जीवन को यदि सचमुच पाना है
तो.. मन की झील में आत्मा का कमल खिलाना है


धूप तेज लग रही है सो लगता है छायादार वृक्ष खोजना होगा. यह सफेद फूलों वाला वृक्ष छाया में है पर यहाँ आस-पास एक अजीब सी गंध है. शायद बाहर से आ रही है या इस वृक्ष की ही गंध है. बिन पत्तों की इसकी शाखाएं कैसी कलाकृति का निर्माण कर रही हैं, एक डाली पर तीन फूल खिले हैं, जिनमें मध्य भाग पीत है. आज उन्हें तिनसुकिया भी जाना है, जीवन वैसे ही चलता रहता है, बाहर कुछ भी नहीं बदलता पर भीतर सब कुछ बदल जाता है. अब भीतर कोई ज्वर नहीं है, सब कुछ स्पष्ट दिखाई देता है. कब विकार जगा, कब कामना उठी, कब मन भूतकल में गया, कब भविष्य की कल्पना में. आत्मा शुद्ध चेतन है, जो प्रकाशक है, जो जानता है, जो देखता है. जब मन शांत होता है तब केवल शुद्ध चेतन ही शेष रहता है. उसे अब पढ़ते व लिखते समय चश्मा लगाना पड़ता है, आँखों की रोशनी कम हो रही है, उम्र बढने के साथ देह में ये परिवर्तन स्वाभाविक हैं. धरती पर बैठकर लिखना अच्छा लग रहा है, पर उसे फोन अपने साथ रखने चाहिए, शायद फोन की घंटी बज रही है. नैनी लैंड लाइन तो उठा सकती है पर मोबाइल उसे रिसीव करना नहीं आता. अब अंदर जाना चाहिये, उसने सोचा.

आज मृणाल ज्योति जाना हुआ, दो अन्य महिलाएं भी थीं. विश्व विकंलाग दिवस के लिए निमन्त्रण पत्र भी मिले, जो सभी के यहाँ भिजवाने हैं. आज दोपहर के भोजन में सलाद, सूप व फल लिए, काफी हल्का लग रहा है. शाम को वे जल्दी ही रात्रि भोजन करेंगे और बाद में टहलने जायेंगे. अभी कुछ देर पूर्व बच्चे पढ़कर गये हैं. उस दिन नैनी के ससुर की हालत पर तरस खाकर जो भाव मन में उठा था, वह सत्य होता नजर आ रहा है. कुदरत किस तरह उनकी हर बात सुनती है. मन का छोटे सा छोटा विचार भी उसकी नजर से बच नहीं सकता. परमात्मा की महिमा का जितना बखान करे, कम है. जो जीवन अपना ही अहित कर रहा हो, जिसके आगे बढने की कोई गुंजाईश ही नजर न आती हो, उसे बदलना होगा, ताकि एक नया कोरा जीवन पुनः आरम्भ हो. सम्भव है नये परिवेश में वह नये ढंग से जीये. एक मशीन की तरह जिए चले जाना अपने व औरों के दुःख का कारण बनना कहाँ तक उचित है ? ईश्वर ही उसका मार्गदर्शक है, वही प्रेरणा देता है, उसके सिवा और कुछ नहीं. यह देह जब तक रहे, स्वस्थ रहे, मन सजग रहे, बुद्धि भी जगी रहे ताकि न अपने लिए न औरों के लिए दुःख का कारण बने. अनंत सुख की राशि परमात्मा चरों और बिखरा हुआ है, उससे जुड़कर ही मानव के भीतर पड़ा वह बीज खिल सकता है, जिसे आत्मा कहते हैं.   



Saturday, March 25, 2017

नीला आकाश सफेद बादल


कल दिन भर व्यस्तता बनी रही. सुबह वे बाजार गये, जून उसके लिए कोलकाता से एक साड़ी और एक कुर्ती लाये हैं, वह उसे सजे-धजे देखना चाहते हैं. उनका प्रेम उसके लिए अपरिमित है. वे लोग दिसम्बर में बंगलुरू जा रहे हैं, तब यह वस्त्र काम आयेंगे. सद्गुरू के लिए भी वह इस बार एक सुंदर भेंट लेकर जाएगी, कोई बहुत ही सुंदर वस्त्र ! आज पिताजी का अख़बार नहीं आया है, टीवी भी नहीं चलाया है, बैठ-बैठे जाने क्या सोचते रहते हैं. उसका ध्यान पहले से बेहतर हुआ है. कल सुबह कितना विचित्र स्वप्न देखा था और कल रात को भी एक सुंदर मन्दिर देखा, विशाल मन्दिर है लेकिन मुख्य मूर्ति के नीचे लिखा है किसी अभिनेत्री का नाम लेकर कि वह फिर आ रही है. कल के स्वप्न में ऊंची छत पर रखा गोबर की खाद का एक ड्रम नीचे गिर जाता है और सड़क पर जाकर देखा तो वहाँ से गायब है, अर्थात कूड़ा-करकट दिमाग से विदा हो गया है, फिर जो शेष बचा उसका दर्शन हुआ. वह अपने घर के द्वार पर है, ध्यानस्थ, भीतर सारा आकाश और सुंदर बगीचा देख रही है. हरे-हरे पेड़ जो आकाश तक ऊंचे हैं. नीला व सफेद बादलों वाला आकाश है. वह उड़ सकती है, मन के सोचने मात्र से पल में जहाँ-तहाँ विचरण कर रही है, शायद ऐसे ही स्वर्ग का दर्शन ध्यान में ऋषियों ने किया होगा. स्वप्न ही तो था वह, टूट गया तो सब तिरोहित हो गया, लेकिन अपने आप में टिकने की कला तो स्वप्न नहीं है, वही तो सत्य है. मन भी तो चेतना में उठी लहर ही है पर पागल यह नहीं समझता कि क्रोध करेगा तो खुद पर ही करेगा, यहाँ कोई दूसरा है ही नहीं ! दूसरे को दूसरा समझना ही तो सबसे मूल हिंसा है.

सद्गुरू ने आज अष्टावक्र की कथा कही. ध्यान अच्छा रहा, अनंतता का अनुभव हुआ. अभी-अभी क्लब की एक सदस्या से बात की, जो पति के रिटायरमेंट के बाद जा रही हैं. उनका जन्म जोरहाट में हुआ, गणित, सांख्यिकी व अर्थशास्त्र में बीएससी की डिग्री ली. गोहाटी से एमएससी की सांख्यिकी में. एमबीए भी करना चाहा पर विवाह हो गया, फिर बेटी मुन्मा का जन्म हुआ, फिर बेटा भार्गव. टीचर का जॉब किया. बचपन से ही गणित में तेज हैं, पति को भी मदद करती हैं. नृत्य का भी शौक है. इन सब बातों को आधार बनाकर वह उनके लिए विदाई कविता लिखेगी, जो क्लब में पढ़ी जाएगी.

कल रात स्वप्न में दीदी व छोटी भांजी को देखा. कल क्लब में कविता सबको अच्छी लगी. एक महिला ने नृत्य किया व एक ने गायन भी. आज का दिन कुछ अलग लग रहा है, मन बेवजह अपने-आप में नहीं है. इसका अर्थ है, संस्कार सोये पड़े रहते हैं, मिटते नहीं हैं. अभी बहुत मार्ग तय करना है, भीतर नया संस्कार डालना है, जो घट रहा है उसका साक्षी मात्र रहना है. कोई भी विकार देह पर अपना प्रभाव डाले बिना नहीं रहता है. जो कुछ भी शारीरिक कष्ट उसे हो रहा है वह इन्हीं विकारों के कारण है. मन को स्वच्छ करना होगा, अपने ही हाथों अपना नुकसान करना ठीक नहीं है. जीवन को विशाल दृष्टिकोण से देखना होगा, परिपक्वता लानी होगी. इन्सान वृद्ध होने को आये पर अपने संस्कारों से छुटकारा नहीं पाता. उसे इस सत्य को औरों के साथ भी घटता हुआ देखना होगा. सभी अपनी-अपनी सीमाओं में कैद हैं, उसी में दुःख है.

कीचड़ में कमल उगता है, आज यह कहावत अक्षरशः सत्य सिद्ध हुई. ध्यान से पूर्व मन जैसे कीचड़ में सना था पर ध्यान के बाद फूल सा पावन हो गया है. परमात्मा उसके साथ हैं हर पल, यह भाव दृढ़तर हो गया है, न जाने किन अशुभ कर्मों का फल था वह सब जो अब बहुत पीछे छूट गया है. अब तो प्रकाश है, संगीत है और गीत हैं जो बाहर आने को बेचैन हैं. भीतर कितना सुंदर संसार है, अनंत प्रेम से भरा, वे बाहर ही ठोकरें खाते रहते हैं. जब-जब एकांत मिलता है, उसकी साधना बलवती होती है लेकिन व्यस्तता बढ़ने के बाद मन संसार में ही उलझ कर रह जाता है. इस बार ऐसा नहीं होने देगी. परमात्मा ने उसके जीवन की डोर अपने हाथों में थामी है, वह उसे कभी भी गिरने नहीं देंगे.




Monday, February 6, 2017

'बोधगया' में बोध गया


परसों रात एक स्वप्न देखा. कितना जीवंत था, लग रहा था जागकर ही देख रही है. ध्वनि इतनी स्पष्ट थी जैसे जागते में होती है. गाना इतना स्पष्ट था और शब्द भी याद थे. कल फिर एक स्वप्न देखा, ये सारे स्वप्न उसके अवचेतन की खबर रखते हैं, देते हैं. उसने अपने अवचेतन के विचारों का प्रक्षेपण जगत पर किया है और तभी जगत उसे वैसा ही दीखता है. उसने पिछले जन्म में या जन्मों में जो कुछ किया है उसका भय भी अवचेतन में विद्यमान है कि कहीं उसके साथ भी वैसा न हो. उन्हें ध्यान में दबे हुए भावों की निर्जरा करनी है ताकि मुक्त हो सकें. स्वयं को जगत के सामने अच्छा दिखाने की कामना, साधना का फल भी भौतिक जगत में नाम तथा यश के रूप में पाने की कामना अहंकार के ही सूक्ष्म रूप हैं. आत्मा में स्थिति हर क्षण नहीं रहती अन्यथा इतनी भूलें नहीं होतीं. आज पिताजी सुबह से बाहर ही बैठे हैं, सारे संबंधों में सूक्ष्म हिंसा छिपी है, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है उनका माँ से संबंध. एक-दूसरे को जितनी तरह से हो सकता है परेशान करने के उपाय खोजना ही जैसे लक्ष्य हो, उसके बावजूद वे कैसे इतने उत्साहित रहते हैं, आश्चर्य होता है.

कल पुनः उसने स्वप्न में बाबा रामदेव को देखा, वे उनके घर आए हैं और किसी कार्यक्रम की तैयारी कर रहे हैं, उसका नाम लेकर एक बैग लाने को कहते हैं. बाद में एक स्वप्न वह पुनः पुनः देख रही थी, हर बार पूर्व की कमी को दूर करके, यानि वे अपने स्वप्न स्वयं ही गढ़ते हैं. ध्यान में आज एक सुंदर मोती की माला दिखी..मन कितना रहस्यमय है..चेतना में कितने रहस्य छिपे हैं, साक्षी जो भीतर बैठा है कुछ विचार नहीं करता मात्र द्रष्टा है किन्तु उसके होने मात्र से ही मन, बुद्धि अपना कार्य करते हैं. आज शनिवार है, बाहर से बच्चों की आवाजें आ रही हैं और उसके भीतर अनहद का स्वर फूट रहा है, कितना स्पष्ट सुनाई दे रहा है, यह सुनने वाला भी वही है. टीवी पर सारनाथ में दिया बापू का प्रवचन आ रहा है. भीतर जब तक बोध भी टिका है, तब भी बाधा है. बोध भी जाना चाहिए, ‘बोधगया’ ..इसी का प्रतीक है. भोगों की लालसा, आलस्य, प्रमाद, तम ये सब साधना में विघ्न हैं. आलस्य कुशल कर्म में उत्साह को तोड़ता है, जो विषय नहीं चाहिए उसमें लगना प्रमाद है. विषाद व कमजोरी भी भी विघ्न हैं. कुशल प्रवृत्ति में निरंतर उत्साह बना रहे, यह बुद्ध की एषणा है. कितना अद्भुत ज्ञान है यह !

आज भीतर एक गहरा सन्नाटा है, साक्षी भाव उदित हुआ है, कोई कर्ता नहीं दिखाई पड़ता. नाश्ता ले कर बाहर बगीचे में गई, ठंड शुरू हो गयी है. धूप भली लगती है तन को. वहाँ बैठकर लग रहा था जैसे वह भी अन्य पेड़-पौधों की तरह एक जीव है, देह व आत्मा के बीच का जो सेतु था, जो अहंकार था, वह क्षीण हुआ है शायद गिर ही गया है, इतनी गहन शांति है भीतर, कुछ भी करने का भाव नहीं रह गया है, सब कुछ हो रहा है. सद्गुरू के सम्मुख होती तो वह पहचान लेते..वह कहते यह भी एक अनुभव है, आज से पूर्व न जाने कितने अनुभव आए, एक से बढ़कर एक, सारे खो गये..यह कब तक टिकेगा. वे इतने बड़े महारथी हैं कि सारे अनुभवों को पचा गये..डकार तक नहीं लेते वे. जो करने योग्य है वह प्रकृति करवाए ही जा रही है, पहले डर था कि यदि वे ही नहीं रहे तो उनका काम कैसे चलेगा ! परसों एक सखी का जन्मदिन है उसके लिए अंतिम कविता लिखनी है ! वे लोग यहाँ से जाने वाले हैं.

‘उसने देखते ही मुझको दुआओं से भर दिया
मैंने तो अभी सजदे में सर झुकाया भी नहीं था’


साक्षी भाव कितना मधुर है. कितने अनुभव हुए उसे आजतक लेकिन सब आकर जाने के लिए. यह टिकेगा ऐसा लगता है. भीतर एक शीतलता का अनुभव होता है, जैसे बाहर का मौसम है ठंडा सा, भीतर एक सन्नाटा है जो मिटने वाला नहीं है ऐसा लगता है. उन्हें आज विशेष बच्चों के स्कूल जाना है. जब तक गाड़ी आती है उसे पाठ कर लेना चाहिए.

Tuesday, October 18, 2016

जला हुआ दूध


फिर एक अन्तराल ! सुबह चार बजे ही अलार्म सुनकर नींद खुल गयी, न बजे तो पता नहीं कितनी देर से खुले. दिन ऐसे बेहोशी में बीत रहे हैं. आज दूध देर से आया था, दोपहर को गैस पर रख कर भूल गयी. जून को लंच के बाद बाहर तक छोड़कर आई तो दूध चूल्हे से उतारने के बजाय कम्प्यूटर के सामने बैठ गयी और पतीला बुरी तरह से जल गया. देखें कितना साफ होता है, नैनी को कहा है कि रगड़-रगड़ कर साफ करे. सारे घर में जले हुए दूध की गंध फ़ैल गयी है. ब्लॉग पर ‘गंगा’ कविता डाली, तस्वीर नहीं आ पाई, स्पीड बहुत कम थी. जून ने दोपहर को पपीते के परांठे की तारीफ़ क्या कर दी, सब भूल गयी. दुःख में मानव सजग रहता है, सुख उसे बेहोश कर देता है, पर उन्हें तो दोनों का साक्षी होकर रहना है. सजग होकर रहना ही आत्मा में रहना है. विचार सदा भूत या भविष्य के होते हैं, वर्तमान में कोई विचार नहीं होता, वर्तमान का पल इतना सूक्ष्म होता है कि बस वह होता है. पिछले दिनों जो पुस्तक पढ़ती रही उसने भी मन पर जैसे पर्दा डाल दिया था. खैर, ठोकर लगकर ही इन्सान सुधरता है. भीतर जो साक्षी है, वह तो अब भी वैसा ही है, निर्विकार और स्थितप्रज्ञ, यह जो उथल-पुथल मची है, यह अहंकार को ही सता रही है.

कल से एक नई किताब पढ़नी शुरू की है, जो कोलकाता यात्रा के दौरान खरीदी थी पर अभी तक पढ़ी नहीं थी. इसके अनुसार सबसे अच्छा ध्यान है कुछ भी न किया जाये, साक्षी भाव में रहा जाये. जब जरूरत हो तभी मन से काम लेना है, अन्यथा उसे शांत रहने दें. अपने आप आकाश में बादलों की तरह कोई विचार आये तो उसे गुजर जाने दें, बिना कोई टिप्पणी किये क्योंकि टिप्पणी करके भी क्या होगा, व्यर्थ ऊर्जा नष्ट होगी. जीवन में भी इसी सिद्धांत को अपनाना होगा तथा ध्यान में भी. हर समय इसी को पक्का करना होगा तब न अहंकार रहेगा न दुःख ! साक्षी भाव इतना सूक्ष्म है कि मन, बुद्धि की पकड़ में नहीं आता, जब कुछ न करें तो बस वही होता है लेकिन जैसे ही भीतर कोई स्फुरणा हुई वह लोप हो जाता है, बड़ा शर्मीला है ! अंतर के आकाश में जब वर्तमान का सूरज खिलता है तो अतीत के बादल छंट जाते हैं.

आज विश्व महिला दिवस है, उसे अपने भीतर अनंत शक्ति का उदय होता दिखाई दे रहा है. कल शाम को क्लब में पहली बार बिलियर्ड खेला. q तथा v का भेद जाना, अच्छा लगा. कोच अच्छी तरह सिखा रहे हैं. कुछ न कुछ नया सीखते रहना चाहिए. होली का उत्सव आने वाला है. होली का उद्देश्य है सारे मतभेद भुलाकर मस्त हो जाना, अद्वैत का संदेश देती है होली..एकता का, प्रेम का, मिठास का, मधुरता का..जब आम पर बौर छा जाते हैं और पलाश के फूलों से वृक्ष सज जाते हैं. भंवरे और तितलियाँ गुंजन करती हैं, जब हवा में मदमस्त करने वाली सुगंध भर जाती है. जब महुआ फूलों से लद जाता है. गाँव-देहात में फागुनी बयार की मस्ती में लोग फागुन गाते हैं और जब बच्चों की परीक्षाएं होने वाली होती हैं, तब होली आती है. रंगों की बातें करे तो हर रंग सुंदर है. सतरंगी यह जगत और सुंदर बन जाता है, तो होली पर कविता लिखी जा सकती है..


Thursday, September 22, 2016

दीवाली के कार्ड


कोई है जो हर क्षण जागता रहता है, उनके भीतर वह साक्षी ही उनका वास्तविक मित्र है. मन, इन्द्रियों से परे जो एक शांत अवस्था है उसी का नाम है साक्षी भाव ! कल रात ऐसा लगा कि सोते-सोते भी कोई भीतर जगा हुआ था ! कल सत्संग में दो भजन गाने वाली सखियाँ आयीं, गाने की बारी उसकी भी आयी. कल बहुत सी पत्रिकाएँ, किताबें तथा पेपर्स निकाले, घर में सामान जितना कम हो उतना अच्छा है, एक दिन सारे कार्ड्स भी निकाल देने हैं अथवा तो उन्हें रहने देते हैं कितनी यादें जुड़ी हैं उनसे..दीवाली पर सबको कार्ड्स भेजने का उत्साह जगा है, पिताजी, तीनों भाई, चचेरे व फुफेरे भाई सबको भेजेगी बहनों को भी..आज सुबह वेद ज्ञान सुना, कितने अद्भुत श्लोक हैं, आत्मा को बलशाली बनाने की ही सारी प्रार्थनाएं हैं. कल ओशो को सुना हरेक को अपने ईश्वर का निर्माण स्वयं करना है उसकी माँ बनना है. इसका भी अर्थ वही है कि उन्हें स्वयं को शक्ति से भरना है. आत्मा को जागृत करना है. मन, बुद्धि के पार जाकर एक ऐसी शून्यावस्था का अनुभव करना है जो प्रेम, शांति व ज्ञान से ओत-प्रोत है. उनका छोटा मन जब शांत हो जाता है तो आत्मा जो सदा से वहीँ है उजागर हो जाती है, वह आत्मा ही अपने शुद्धतम स्वरूप में परमात्मा है जब वह देह से परे होती है, वासना तथा तृष्णा से मुक्त होती है, उसे भी अपने भीतर उस आत्मशक्ति को परिपक्व करते जाना है, व्यर्थ विचारों से स्वयं को बचाना है, ऊर्जा बचानी है ताकि वह ऊर्जा ध्यान में सहायक हो. लेखन में, पठन में सहायक हो. ऊर्जा को व्यर्थ गंवाया तो भीतर नकारात्मकता छाएगी स्वयं को आत्मा रूप में अनुभव करने के बाद भी यदि कोई उदास रहे तो ...कहीं कुछ धोखा है..हँसी ही उनकी पहचान हो और शांति उनका घर..प्रेम उनका स्वभाव..कल छोटी बहन से बात हुई, वह भी खुद की तलाश में लगी है, यात्रा जारी है, एक दिन मंजिल भी मिल जाएगी. आज देखा, गीतांजलि के भावानुवाद पर कुछ कमेंट आये हैं तथा तीन महिलाएं फ़ॉलो भी कर रही हैं. अभी कितनी कविताएँ ब्लॉग पर डालनी हैं. कल लक्ष्मी पूजा का अवकाश है. जून नयी गाड़ी ले रहे हैं. अपने भोजन का खास ख्याल रखते हैं, दर्द भी कम हो गया है. अगले महीने मेहमान आ रहे हैं घर की सफाई का काम ठीक चल रहा है अब कुछ ही शेष है. बड़ी भांजी को निबन्ध के लिए कुछ जानकारी भेजनी थी, वही काम शेष रह गया है.


होश को कायम रखना तलवार की धार पर चलने जैसा है, बार-बार मन फिसल जाता है, पुराने संस्कारों का शिकार होकर वाद-विवाद में फंस जाता है. अहंकार अपना सिर उठाने लगता है, भीतर कोई देख रहा है, साक्षी है, यह भाव खो जाता है. जाग-जाग कर भी वे सो जाते हैं, लेकिन जैसा कि सद्गुरू कहते हैं पहले तो इतना भी होश नहीं था कि वे अज्ञानी हैं, कम से कम अब अपने अज्ञान का बोध तो होता है ! पांच एम्पीयर का एक स्विचबोर्ड लगाने दो लोग आये हैं, शोर हो रहा है पर बाहर का यह शोर भीतर की शांति को भंग नहीं करता, उसे तो भीतर का शोर ही भंग करता है. अभी एक सखी को फोन किया सुबह उनके यहाँ फूल भिजवाये थे, लगता है वह कुछ परेशान है या व्यस्त है. धीरे-धीरे स्पष्ट होता जा रहा है कि सारे संबंध ओढ़े हुए होते हैं, वे अपनी सुविधा के अनुसार जब चाहे उन्हें उतार देते हैं, जब चाहे पहन लेते हैं ! यहाँ हर कोई अपने आप में एक द्वीप है. उन बुजुर्ग आंटी की शिकायत कम होने में नहीं आती, बढ़ती ही जाती है यहाँ माँ की भी. अभी-अभी उस सखी का फोन आया, उनके यहाँ भी बिजली नहीं है. उनका जीवन जितना सुविधाजनक होता जाता है उतने ही वे बेहोश होते जाते हैं. 

Wednesday, June 1, 2016

नई नवेली कार


जीवन में हजारों, लाखों, करोड़ों, अरबों या कहें अनंत पल खुशियों के आते हैं, बल्कि कहें कि जीवन सुख व आनन्द की एक अनवरत श्रृंखला है. अनगिनत जन्मों को जोड़कर देखें तो न जाने किस अतीत के काल से वे बने हुए हैं. परमात्मा की भांति वे भी अनादि हैं, उसकी भांति वे भी साक्षी हैं, कुछ न करते हुए भी सबका आनन्द लेने वाले, हर श्वास एक आनन्द की लहर की खबर देती है, जो स्वयं ही आनन्द हो उसे भी अपने आनन्द का स्वाद लेने के लिए देह में आना पड़ता है. परमात्मा को मायाविशिष्ट चेतना में आकर लीला का आनन्द लेना पड़ता है तो जीव को स्वप्नविशिष्ट चेतना में ! वे स्वप्न ही तो देख रहे हैं, एक लम्बा स्वप्न जिसमें उन्होंने एक नया रोल धरा है. शरीर, मन व बुद्धि का एक नया संयोग खड़ा किया है. स्वप्न से जागकर ही पता चलता है क उसमें प्रतीत होने वाले सुख-दुःख मिथ्या थे वैसे ही मृत्यु के क्षण में पता चलता है सब कुछ छूट रहा है, एक स्वप्न का अंत हो रहा है. उनका ध्यान यदि मृत्यु से पूर्व इस ओर चला जाये तो सदा के लिए मृत्यु का भय छूट जाये ! जीवन एक खेल ही लगने लगेगा तब !

आज सद्गुरु ने गणेश जन्म का एक नया अर्थ बताया. पर्व के दोष से उत्पन्न आनंद को ज्ञान के द्वारा पावन किया गया. पर्व पार्वती है, मैल दोष है, जिससे आनंद रूपी गणेश उत्पन्न हुआ है, हाथी का सिर ज्ञान है. गणेश को विघ्न हर्ता भी कहते हैं, हाथी के आगे कोई बाधा नहीं टिकती. गणेश का चूहा तर्क का प्रतीक है और बीज मन्त्र का भी. आज छोटे भाई का जन्मदिन है, वह नई कार ले रहा है, blushing red Iten, इत्तेफाक है कि बड़ी ननद भी काली कार ले रही है. आज भी वर्षा थमी नहीं है, पिछले कई हफ्तों से रोज ही बादल बरसते हैं.

सुंदर वचन सुने आज, ‘सत्य के सूर्य को अस्ताचल ले जाने के लिए संध्या रूपी माया आ जाती है ! कमल को जैसे तुषारापात समाप्त कर देता है वैसे ही सत्य को माया समाप्त कर देती है. ऐसी माया को दूर से ही त्याग देना चाहिए, यही जन्म-मृत्यु का कारण है’. अध्यात्म की साधना का मुख्य उद्देश्य संस्कारों से मुक्ति है. कल रात स्वप्न में एक विकार की ग्रन्थि को पूर्ण रूप से देखा तथा उससे मुक्ति का अनुभव भी किया. पिछले पचीस वर्षों मन न जाने कितनी बार स्वयं व्याकुल हुआ और अन्यों को भी किया. माया के चंगुल में फंसकर कषायों के मल में धंस कर न जाने कितना दुःख वे व्यर्थ ही उठाते रहते हैं. भीतर की ग्रंथियाँ कट रही हैं, मन पावन हो रहा है. परमात्मा को वे अपने भीतर प्रकट  होने से रोकते रहते हैं.अशुद्ध वृत्तियों का पर्दा उन्हें उससे दूर ही रखता है, जबकि वह सहज प्राप्य है.

अज दोपहर से बिजली नहीं है, मौसम अच्छा है सो पंखे के बिना भी ठीक लग रहा है. मृणाल ज्योति के लिए एक कविता लिखी है.शाम को प्रिंट करेगी  कल उन्हें वहाँ जाना है, सम्भव हुआ तो पढ़ भी सकती है. जून अभी तक आये नहीं हैं, उनका गला थोड़ा खराब है. कल वह नाहक ही क्रोधित हो रहे थे. मनुष्य अपने आप को नहीं जानता, इसलिए स्वयं को दुःख दिए जाता है. कृष्ण कहते हैं जो न आकांक्षा करता है न द्वेष करता है, वह मुक्त है.



Friday, April 29, 2016

परमाणु ऊर्जा का उपयोग


आज एक भतीजी का जन्मदिन है, उनके परिचितों में भी एक मित्र का. शाम को उन्हें बधाई देने जाना है. पिछले दो-तीन दिनों से ध्यान पर सुना और ध्यान भी किया. बहुत सारे भ्रम टूटे, भीतर प्रकाश हुआ, अनादि काल से मानव इस सृष्टि के रहस्यों को जानने का प्रयास करता आया है लेकिन कोई भी आजतक इसे जानने का दावा नहीं कर पाया है. यह रहस्य उतना गहरा होता जाता है जितना वे इसके निकट जाते हैं. वे कुछ भी नहीं जानते ऐसा भाव दृढ़ होता जाता है. परमात्मा कौन है, कहाँ है, कैसा है, यह सृष्टि क्यों बनी, कैसे बनी, ये सारे अति प्रश्न हैं, आजतक कोई इनका उत्तर नहीं दे पाया. परमात्मा के प्रतीक गढ़ लिए लोगों ने और उन्हें प्रेम करने लगे, प्रेम में आनन्द है, प्रेम ऊपर उठा देता है, प्रतीकों के सम्मुख झुकने से भीतर कुछ हल्का हुआ होगा, मानव ने मान लिया कि कोई परमात्मा है जो उसके साथ है, उसकी रक्षा करता है, यह मानना उनके लिए सही था जो प्रेम से भरे थे पर धीरे-धीरे लोग बिना भाव के ही मूर्तियों के सामने झुकने लगे. परमात्मा को जिसने भी पाया है अपने भीतर ही पाया है, वह मन की गहराई में छिपा है जब शरीर स्थिर हो, मन अडोल हो, शान्त हो और भीतर कोई द्वंद्व न हो तो जिस शांति व आनन्द का अनुभव उन्हें भीतर होता है, वह परमात्मा से ही आयी है.

जून दोपहर का भोजन करके गये तो वह नेट सर्फिंग करने लगी. पेपर पढ़ा, धरती पर जगमगायेंगे छोटे-छोटे सूर्य, वैज्ञानिक एटोमिक ऊर्जा का उपयोग कर धरती को ऊर्जा की कमी से मुक्त कर देंगे. भारतीय वैज्ञानिक भी जुटे हैं, न्यूक्लियर विघटन की जगह विलयन के द्वारा यह कार्य होगा. सुबह रामदेव जी भी कह रहे थे आगे आने वाले समय में भारत का पुनर्जागरण होगा. कलियुग की समाप्ति और सतयुग का आगमन होने वाला है, यह संधि युग है. न कोई ईमेल भेजा न आया, कम्प्यूटर पर टाइप करने का कार्य भी अभी शुरू नहीं हुआ है. उसके सिर के ऊपरी भाग में हल्का-हल्का सा दर्द है, कल भी था, शायद कोई प्रारब्ध कर्म उदित हुआ है. आज सुबह बाहर लॉन में सूर्य ध्यान किया. इस समय दोपहर को भी धूप-छाँव में बैठी है. शाम को उनके यहाँ सत्संग है, प्रसाद के लिए चिवड़ा-मटर बनाने हैं. माँ बड़ी ननद के पास गुजरात गयी हुई हैं. वहाँ का मौसम ठंडा नहीं है, खुशनुमा है. इस वक्त मन शान्त है, और न भी हो तो क्या फर्क पड़ता है, जो प्रकाश, प्रवृत्ति तथा मोह में भी सम रहता है, वही तो वह है. जो घट रहा है, चाहे वह शरीर में हो अथवा मन में, बदलने ही वाला है, वह साक्षी है, साक्षी रहकर वह इन प्रपंचों से पूर्णतया पृथक है, द्रष्टा है, यह हाथ लिख रहा है, परमात्मा की शक्ति से ही, यदि वह स्वयं को पृथक न जाने तो शरीर व मन के दुःख के साथ स्वयं भी दुखी रहे, लेकिन ऐसा नहीं है, मन कहता है उसे ढेर सारे कार्य करने हैं. कार्य किये बिना वह अपने को अधूरा मानता है, वह महत्वाकांक्षी है, लेकिन वह उसकी इस छटपटाहट को देखती है और मुस्कुराती है !

आज जून घर पर हैं, साल का अंतिम महीना, धूप गुनगुनी है, छुट्टियाँ शेष हैं सो आज उन्होंने घर के कुछ काम निपटाए. sun meditation किया, आंगन में झूला लगाया, जिस पर बैठकर संतरे खाए. बगीचे में पानी डाला, फ्रेंच बीन्स तोड़े और अब वह पढ़ने आने वाले छात्र की प्रतीक्षा करते हुए लिख रही है. मन को समाधान मिल गया है. आज गुरूजी को भी सुना. कितने सीधे, सरल, निष्पाप तथा सहज लगते हैं, प्रेम से लबालब, जीवन को जैसा है वैसा स्वीकारने वाले. जबकि वे व्यर्थ के विचारों में उलझ कर तन व मन दोनों को बोझिल बना लेते हैं. उसके सर का वह दर्द पित्त की अधिकता से था न कि प्रारब्ध के कारण, बड़े-बड़े शब्द सीख कर वे स्वयं को ज्ञानी समझते हैं, जो सबसे बड़ी भूल है. श्रद्धा, विश्वास को यदि रटते रहे और यूँ ही रटते-रटते स्वयं को श्रद्धालु, विश्वासी मानते रहे तो उनका उद्धार नहीं हो सकता. शब्दों के जाल से मुक्त होकर सहज होकर अपने मन में झाँकने की जरूरत है. मन यदि लोभ, मोह, क्रोध, वासना तथा अहंकार से मुक्त है तो सहज ही विश्वासी होगा, उसे बनाना नहीं होगा, ऐसा मन शरण में होता ही है. मन न रहे अर्थात मन जो विकारी है न रहे तो जो शेष रहता है वही तो आत्मा है. शांति है, वही तो परमात्मा है !

Thursday, August 29, 2013

बिजली चली गयी


आज उसने सुना, तटस्थ भाव या साक्षी भाव से सुख-दुःख को भोगना ही सम्यक प्रज्ञा है. आरम्भ में बाधाएँ तो आएँगी ही, लेकिन होश सहित श्रद्धा के बल पर और ज्ञान के बल पर इस पथ पर बढ़ा जा सकत है. अनंत मैत्री, अनंत करुणा, अनंत मुदिता, अनंत उपेक्षा, ये चार गुण साथ में लेकर यदि श्रद्धा करें तो ही सच्ची श्रद्धा है, यानि विवेक युक्त श्रद्धा.

आज धूप बहुत तेज है, और अभी-अभी बादल के एक टुकड़े ने सूरज को ढक लिया है, शीतलता यहाँ तक महसूस हो रही है. इस हफ्ते सात पत्र मिले हैं, जवाब देने के लिए कम से कम एक घंटा तो लगेगा.

नन्हे की टेनिस कोचिंग के कारण वह इतनी सुंदर सुबह का आनन्द उठा पा रही है. आज सुबह साढ़े चार बजे ही उठ गया और आधे घंटे में तैयार होकर नन्हा चला गया है. बादल जो कल शाम से बनने शुरू हुए थे, अभी भी है, रात भर बरस चुके हैं सो मौसम में ठंडक है. आज उसकी एक मित्र का जन्मदिन है, कल रात नींद आने तक कुछ पंक्तियाँ उसके लिए मन में गढ़ रही थी-

आँखें हंसती रहें लब मचलते रहें
गीत अधरों से यूँ ही झरते रहें

दुःख की छाया न ही गम अँधेरा कभी
कदम दर कदम फूल खिलते रहें

सुख में शामिल सदा दुःख में भी साथ हों
सिलसिले दोस्ती के यूँ चलते रहें

खुशनुमा ही रहे हर दिवस इस तरह
बरस दर बरस वह चहकते रहें

जिन्दगी का हर इक रुख हो रोशन सदा
दिल में चाहत के दीपक जलते रहें

हमसफर साया बन के सदा साथ हो
चाहे मौसम फिजां के बदलते रहें

आज सुना, “अनित्य के प्रति जो आकर्षण है उसे तोड़ने के लिए उसका दर्शन करते करते ही नित्य तक पहुंचा जा सकता है. देखना जानने की क्षमता पैदा करता है. नित्य अवस्था में न तो उत्पाद होता है न क्षय होता है. स्थूल से सूक्ष्म तक आने के बाद उसका भी अतिक्रमण हो जाये”.

कल आखिर विश्वास मत पारित हो गया और देवेगौडा सरकार ने संसद में पूर्णमत हासिल कर लिया यानि अब हमारी एक अदद सरकार है. आज फिर मौसम बेदर्द होकर तपन बरसा रहा है, वे लोग जो बंद कमरों में पंखों और कूलरों के सामने रहते हैं उन्हें शिकायत करने का क्या हक है, जब हजारों लाखों लोग खुले आसमान के नीचे अपनी रोज़ी कमाने को विवश हैं.

आज उसने सुना, ‘अनुभूतियों से सच्चाई जानना ही धर्म ध्यान है. अपने भीतर उठने वाले विकारों पर तुरंत रोक लगाना और उन्हें जड़ से उखाड़ कर फेंकने को ही उपशमन कहते हैं. दमन नहीं चाहिए. जो क्षण अविद्या में बीतता है, विकारों का संवर्धन होता ही जाता है. मानस में एक विकार जागा तो उसके फल के साथ उस विकार का बीज भी आता है, और अज्ञान के कारण हम उसे सींचते रहते हैं. हमारे विकारों के दो सेनापति हैं, राग और द्वेष जिन्हें खत्म करना है ताकि हम अपने शिव को मंगल को न कुचल डालें. ध्यान जब जागता है तो हमारे पुराने कर्मों का बल समाप्त होता जायेगा और मन करुणा से भर जाता है. पुराने समाप्त हो गये नये बनते नहीं यही तो मुक्त अवस्था है. लेकिन बुद्धि के बल पर इसे समझने से कोई लाभ नहीं, होश में रहकर ही आग का मुकाबला पानी से करते हैं. अंदर तक स्वभाव बदलने के लिए अभ्यास करना होगा, अपने भीतर होने वाली संवेदनाओं के प्रति सजग रहने का अभ्यास नहीं किया तो स्वभाव वैसे का वैसा रहेगा. प्रज्ञ प्रत्यक्ष ज्ञान है”.

पिछले कई दिनों से मौसम बहुत गर्म है, पसीने से तर हैं वे लोग. कल रात बिजली चली गयी थी और इस समय भी वही हाल है, इस खिड़की के पास बैठकर कभी-कभी हवा का एक झोंका आकर गर्दन को छू जाता है. अभी जून को फोन किया तो वह कहने लगे आज दिन में करेंट जायेगा यह तो पता था पर कब आयेगा यह पता नहीं. देखें तब तक उनका क्या हाल होता है, ये नन्हे के शब्द हैं. कल रात वे एक मित्र के यहाँ सोये वहाँ बिजली थी, उनके घर की चाबी उनके पास थी. आज दोपहर को वे “एक बन्दर होटल के अंदर” देखने वाले थे और पीटीवी पर दायरे भी देखना  था पर अब बिजली के बिना सारे कार्यक्रम धरे रह गये हैं. पर उन्हें बिजली पर इतना निर्भर नहीं होना चाहिए, उन लोगों की तरफ देखना चाहिए जिन्हें ये सब सुविधाएँ नहीं मिलती हैं, या फिर बड़े शहरों में जहाँ बिजली अक्सर जाती ही रहती है.