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Saturday, September 21, 2013

ब्रोकेन एरो


कल शाम को ‘स्वामी रामतीर्थ’ के भाषण पढ़े और अभी कुछ देर पूर्व भी वही पढ़ रही थी. उनके शब्दों में ओज है और आत्मा को जगाने की शक्ति, कल से कई बार इन्हीं शब्दों के प्रभाव के कारण मन को व्यर्थ के जोड़-तोड़ से बचा पायी है. उसे लगा, वे अपना कितना सारा वक्त यूँही व्यर्थ की बातों में बिता देते हैं और मन की ऊर्जा जिसे किसी अच्छे काम में लगाना चाहिए, इधर-उधर की बातों को सोचने में खर्च कर देते हैं.

आज उनके बगीचे में लगे झूले पर पेंट हो रहा है, हरी-हरी घास में हरा झूला बहुत भला लग रहा है, इस पर बैठ कर नन्हे ने कितनी तस्वीरें खिंचवाई हैं. अचानक उसने आँखें बंद करके भीतर देखा, मन की आवाज के पीछे बुद्धि तक ही जा सकी, यह आत्मा की आवाज कैसी होती होगी, उसे रोमांच हो आया. हरेक में ईश्वर का अंश है, यह बात तो समझ में आती है और इसका जीता-जागता उदाहरण हैं सन्त-महात्मा जो इस अंश को पाकर अपने कार्यों और विचारों से चरितार्थ कर  देते हैं, जो साधारण मानवों की श्रेणी से ऊपर उठ जाते हैं. अभी तो वह यह जान लेने मात्र से ही शांत है कि वह मात्र देह या मन नहीं है, कि वह जिन सुखों-दुखों को शरीर या मन के स्तर पर महसूस करेगी वही उसे व्यापेंगे बाकी नहीं.

ईश्वर उसके साथ है. तभी मन शांत है और इस वक्त कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसकी उसे लालसा हो अपने लिए. देश तरक्की करे, राजनीतिज्ञों के मन पलटें, भ्रष्टाचार का राज खत्म हो, यही प्रार्थना करेगी आज से. आज नन्हे का स्कूल बंद है, सारी सुबह उसके सवालों का जवाब देते-देते गुजरी, उसके बाद से वह अपने मनपसन्द कामों में लगा है. आजादी सभी को प्रिय है, चाहे वह छोटा बच्चा हो या अस्सी वर्ष का बूढ़ा. इस समय वह  हल्की भुनी हुई मूंगफली खा रही है, मीठी-मीठी बहुत स्वादिष्ट लग रही है, यूँ उसे जून की बात भी याद आ रही है, कि भूख लगी हो तो प्याज भी मीठा लगता है. वह आज लंच पर नहीं आयेंगे, उसने भिंडी बनाई है, एक डिश तो नन्हे की फरमाइश पर बनाएगी ही बाद में. आज बहुत दिनों बाद turning point देखा, तिब्बती इलाज की पद्धति में शरीर, मन व् विचार सभी का ध्यान रखा जाता है. गेंदे के फूल का उपयोग मधुमेह के इलाज में कर सकते हैं, यह भी आज सुना.

आज सुबह स्कूल जाने से पहले नन्हा थोड़ा सुस्त लग रहा था, उसे अपना आप भी स्फूर्ति से भरा हुआ नहीं लग रहा, शायद मौसम की बेरहमी के कारण, कितनी उमस है आज, साँस लेने में भी सुकून नहीं मिल रहा है, शायद उसे भी ऐसा ही लगा होगा. यूँ अपने सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती हुई परेशानियों की सूची बनाने के लिए उसने लिखना शुरू नहीं किया था बल्कि अपने करीब आने की परसों से मन में पनप रही ख्वाहिश के लिए. कल शाम और कल सुबह भी वह अपने कार्य-कलापों पर नियन्त्रण नहीं कर पा रही थी, धारा के वेग में बिना पतवार की नाव सी बहती जा रही थी. कभी इसी में अच्छा लगता था पर अब नहीं लगता और तब आवश्यकता होती है आत्म निरीक्षण की. आज सुबह-सुबह एक परिचिता का फोन आया, वह एक दिन, दिन में आएगी और लाटरी के बारे में कुछ बात करना चाहती है ऐसा उसने कहा. पता नहीं कौन सी लाटरी के बारे में, अजीब लडकी है, ख्वाहमखाहमन suspense में डाल दिया है, खैर जो भी. कल माँ-पिता का पत्र आया, दीदी के घर के बारे में बहुत सी बाते लिखी हैं, वे यहाँ नहीं आ रहे हैं, उनकी तरह वे भी सफर से घबरा गये हैं, खास तौर पर बस के सफर से. कल फेमिना में पढ़े एक लेख का असर था कि रात को सपने में एक कमजोर व मासूम सी दिखने वाली लड़की उसे एक गिरोह में फंसा देती है, वह पुलिस-पुलिस पुकारती है और तब नींद खुल जाती है. सपने मन का आईना होते हैं. लिखना शुरू करने से पूर्व जो सुस्ती थी थोड़ी और बढ़ गयी है, चुपचाप सो जाने का मन होता है.

कल शाम वे क्लब गये Broken Arrow देखी, उसे बहुत अच्छी लगी. इस समय पीटीवी पर नुसरत अली शाह का एक गीत बज रहा है. सुगम संगीत के कई कार्यक्रम टीवी पर आते हैं, जिनका उन्हें नाम भी पता नहीं है, ‘सानीधापा’ नाम का एक प्रग्राम देखा. आज उसने त्रिदाली बनाई है, जून को बहुत पसंद है.





Thursday, July 4, 2013

आलू-प्याज की सब्जी


अभी कुछ देर पूर्व बिजली चली गयी, मौसम भी आज अपेक्षाकृत गर्म है, नन्हे का स्कूल २० तक बंद है, आज सोलह तारीख है. जून के जाते ही हमारा नया माली काम करने आ गया, चुपचाप सारे काम कर देता है. वह सोच रही थी कि कुछ देर नन्हे को पढ़ाने का वक्त मिल जायेगा पर उन्होंने अभी फोन करके एक मित्र को भोजन पर साथ लाने की बात कही, एक सब्जी और बनानी थी, पर घर में आलू-प्याज के आलावा कुछ भी नहीं, देखें जून को यह आलू-प्याज की सब्जी पसंद आती है अथवा नहीं. पिछले हफ्ते उसकी पुरानी पड़ोसिन लौट आई, इतवार तक उनके साथ ही वे व्यस्त रहे, सोमवार को जून का जन्मदिन था, नन्हे का स्कूल बाढ़ के कारण बंद चल रहा था, कल उन्होंने पन्द्रह अगस्त मनाया सुबह अपने घर में छोटी सी पार्टी, शाम को एक मित्र के यहाँ गये. अचानक उसे किचन याद आ गया और लिखना छोड़कर वह बाकी काम निपटाने चली गयी.

समाचारों में सुना फिरोजाबाद के पास कालिंदी व पुरुषोत्तम एक्सप्रेस में टक्कर से भयंकर दुर्घटना. उसे ट्रेनों के नाम पर आश्चर्य हुआ, कालिंदी यमुना का नाम है और पुरुषोत्तम कृष्ण का, जैसे यमुना का जल उमड़ आया था कृष्ण के चरण छूने, वैसे ही कहीं..दोनों की टक्कर..

मन एक गाय है जो ‘मैं’ के खूंटे से बंधी
एक संकुचित दायरे में अनवरत घूम रही है
दूर.. जहाँ तक दृष्टि जाती है
नीले पहाड़ों के नीचे
घाटियों में है चाँदी सी चमकती जल धारा
वह उस मीठे पानी की ठंडक महसूस करना चाहता है  
लेकिन अपने अहम् के दायरे में ‘मैं’ के दायरे में बंधे होना उसकी नियति है
उसके इर्दगिर्द की हरियाली सूख गयी है
ऊपर तपता हुआ सूरज है
और सुदूर.. मैदानों में ठंडी छाँव
पर उस छाँव तक पहुंच पाना कितना दुर्लभ है
और ‘मैं’ के खूंटे से बंधे रहना कितना सुलभ....

Yesterday night she was feeling so helpless. She could not sleep much and then she thought above poem. It shows the true state of her mind. Jun has more stable mind. He is so calm and she does,nt know why did she behave so badly. She must be above the mere myness . There are others also beyond ‘me’ and true happiness one can get only when he/she forgets him/herself. She shall always remember this and she knew this yesterday also when she was furious for nothing.


सुबह की शुरुआत ‘जागरण’ के साथ हुई. अन्तर्मुखी होकर ही अपने अंदर परमात्मा से साक्षात्कार किया जा सकता है. प्रतिदिन आधा घंटा ध्यान का अभ्यास करना होगा. नन्हा आज बहुत दिनों के बाद स्कूल गया है, सो सुबह तैयार होने में नखरे कर रहा था, कहा, ‘अच्छा नहीं लग रहा है’, शायद उसने नूना को ऐसा कहते सुना होगा, बच्चे नकल करने में होशियार होते ही हैं. जून तभी कहते हैं वह उस पर गया है. आजकल वे नियमित खेलने क्लब जाते हैं, अच्छा लगता है, तन-मन दोनों शक्ति से भर जाते हैं.

Sunday, July 1, 2012

प्याज के पकौड़े


चार बज गए हैं, जून अभी तक नहीं आये हैं, कोई काम होगा नहीं तो...दोपहर को आये थे एक बार सामान रखने. नूना दस-पन्द्रह मिनट बाहर बरामदे में खड़ी होकर उनकी राह देख रही थी फिर सोचा इतने समय में कुछ लिख लिया जाये. कितने-कितने दिन निकल जाते हैं हाथ में कलम उठाये. क्या यह वही है जो लेखिका बनने का स्वप्न देखा करती थी. आज उसकी चचेरी बहन का जन्म दिन है पहले याद आया होता तो कार्ड जरूर भेजती और पत्र भी भेजती. उसे याद आया कि इस हफ्ते कोई खत भी नहीं आया है. आज उनका घर फिर से साफ और सुंदर दिख रहा है कल दोनों ने मिलकर सफाई की थी पहले के दिनों की तरह, जब उनकी नई-नई शादी हुई थी. आजकल कितनी जल्दी अँधेरा हो जाता है, जून को पता है कि शाम को नन्हें को घुमाना भी है, वह और तेजी से उसका इंतजार करने लगी. जैसे कि इस तरह वह जल्दी आ जायेंगे. अगले महीने ननद की शादी है पर अभी तक वे निश्चय नहीं कर पाए हैं कि इतने छोटे बच्चे के साथ इतना लम्बा सफर वे कैसे करेंगे, जून के अकेले जाने पर भी तो सभी को निराशा होगी...

उस शाम अचानक बदली घिर आयी थी. कहीं जाने का सवाल ही नहीं था, जून को प्याज के पकौड़े बनाने का जोश सवार हो गया. पहले बोले प्याज कम है, प्याज और डाला तो बेसन कम हो गया, फिर बेसन ज्यादा हो गया तो पानी और डाला. और फिर इतने सारे ...पर बेहद कुरमुरे पकौड़े बने थे. रात का भोजन वैसे ही पड़ा रहा उन्हीं से काम चल गया.  

Friday, May 18, 2012

प्याज की रोटी


कल चचेरे व फुफेरे दोनों भाइयों के पत्र आये, फूफा जी की अस्वस्थता के बारे में लिखा था, उसे याद आया बचपन में बच्चे बुआ के कहने पर उनकी सिगरेट छिपा देते थे, पर वे किसी न किसी तरह ढूँढ ही लेते थे. उसने जून की नीली पैंट ठीक कर दी है, पहले भी एक बार की थी, उसने सोचा कि उसे एक और पैंट जरूर ही सिलवानी चाहिए, आज वह  तिनसुकिया गया है, वाराणसी से सभी जन आ रहे हैं उन्हें लाने. नूना ने कितना कहा कि हेलमेट पहन कर जाओ, रास्ता लम्बा है, मोटरसाइकिल पर तय करना है पर माना ही नहीं, बच्चों की सी जिद करता है कभी कभी. रात बेहद गर्मी थी पर इस वक्त बादल हैं, वह जरूर भीग गया होगा.
घर कितना भरा-भरा सा है, कल वे आ गए थे. ट्रेन सिर्फ ढाई घंटा लेट थी. जून बिल्कुल भीग गया था पर स्टेशन पर पहुंचने के बाद वर्षा रुक गयी थी. दिन भर वह व्यस्त रही न अपनी सुध थी न उसकी. बातों में घूमने में टीवी देखने में समय सबके साथ कैसे बीत जाता है पता ही नहीं चलता. जून को बहुत काम करना पड़ता है पर वह चेहरे पर जरा भी शिकन लाए बिना बिना थके सब करता  है. प्याज की रोटी के लिये माँ प्याज काटते-काटते बातें भी करती जा रही थीं. उनकी तबियत पूरी तरह ठीक नहीं है.