Friday, May 13, 2016

दिल का रास्ता


तुम जमाने की राह से आए
वरना सीधा था दिल का रास्ता”

नजरें झुकाईं और नमन हो गया, पलक झपकने से भी कम समय में दिल में बैठे परमात्मा से मुलाकात हो सकती है पर उनकी आदत है लम्बे रास्तों से चलकर आने की. वे किताबें पढ़ते हैं, ध्यान की नई-नई विधियाँ सीखते हैं. पूजा-अर्चना करते हैं और न जाने क्या-क्या करते रहते हैं. परमात्मा उस सारे वक्त उन्हें देखता रहता है, वे उसके सामने से गुजर जाते हैं, बार-बार उसे अनदेखा कर उसी को खोजने का दम भरते हैं. वे प्रेम को छोड़कर ईर्ष्या को चुनते हैं ! प्रशंसा को छोड़ निंदा को चुनते हैं. सहानुभूति को छोड़ क्रोध को चुनते हैं, शांति को छोड़ शोर को चुनते हैं, वे एकांत को छोड़ भीड़ को चुनते हैं, सहजता को छोड़ दिखावे को चुनते हैं ! वह सब करते हैं जो परमात्मा से दूर ले जाता है और उम्मीद करते हैं कि उनका पाठ, जप-तप परमात्मा के निकट ले जायेगा, ये तो ऊपरी वस्तुएं हैं. परमात्मा को जिस मन से पाना है जहाँ उसका आगमन होना है, उस मन में सब नकारात्मक है, ‘नहीं’ है, निषेध है, उसमें स्वार्थ है, नकार है तो वहाँ वह कैस आएगा, जो सबसे बड़ी ‘हाँ’ है, जो है, जो वास्तविक है, सत्य है, प्रेम है, शांति है, आनंद है. उनका चुनाव ही भटकाता है. जीवन हर कदम पर उन्हें निमन्त्रण देता है, झूमने का, गाने का और प्रसन्नता बिखराने का, सहज होकर रहने का, पर वे उसे गंवाने की कसम खा कर बैठे हैं !

पिछले दिनों मन बिखरा-बिखरा सा रहा, अभी नया-नया केन्द्रित हुआ है, थोड़ी सी प्रवृत्ति उसे हिला देती है. मन को पहचानना उसकी आदतों को जानना कितना कठिन है, कभी-कभी लगता है सब कुछ हाथ पर रखे आंवले की भांति  स्पष्ट है पर जब आशा के विपरीत कुछ घट जाता है तो भीतर कैसा द्वंद्व मच जाता है. जब उसके मन की यह हालत है तो जून के मन की क्या होती होगी, वह कल्पना ही कर सकती है. मृणाल ज्योति गयी थी, उन्होंने बच्चों के कुछ फोटो खींचने को कहा, जो उससे नहीं हो सका, सो दुबारा आने की बात कह कर लौट आई, पर दुबारा इतनी जल्दी जाना सम्भव नहीं था. सो मन पर जैसे कोई बोझ था. सेवा का कार्य भी पीड़ा का कारण बन सकता है, आश्चर्य हुआ. जागृति भी हुई कि सेवा का कार्य जब तक आनंद का सुख का कारण बना रहेगा तब तक दुःख की गुंजाइश बनी ही रहेगी. सेवा भी अनासक्त होकर करनी है ऐसे कि उसमें कर्ताभाव ही न रहे. सेवा से अहंकार की पुष्टि होती हो तो न करना ही ठीक होगा. अहंकार न जाने कितने रूपों में भीतर छिपा रहता है. स्वयं को शुद्ध चैतन्य जानना ही शांति का एकमात्र उपाय है. मन तब केन्द्रित रहता है, उसकी धारा एक ओर बहती है, मन अनुशासित रहता है. तमोगुण से मुक्त हुआ मन रजोगुण से भी मुक्त हो रहा है पर सतोगुण की अदृश्य जंजीरें उसे बांधे हुए हैं ! अभी उन्हें भी तोड़ना है कुछ न होना ही साधक का लक्ष्य है, दुःख से पूर्ण मुक्ति तभी सम्भव है. परमात्मा के प्रति प्रेम तो गौण हो जाता है सभी दुखों से मुक्त होना चाहते हैं.


Wednesday, May 11, 2016

मेले में स्टाल


कल मृणाल ज्योति जाना है. वहाँ एग्जीक्यूटिव मीटिंग है. नये वर्ष से उसने वहाँ नियमित जाना आरम्भ किया है. पूरी जानकारी लेनी है यदि उनके लिए कोई सार्थक काम करना है. एक सखी भी उसके साथ जाने वाली है. पड़ोसिन सखी ने बास्केटबाल का नेट भिजवाया है, शायद वहाँ बच्चों के काम आ सके. जून को उसने मिठाई लाने को कहा है, क्लब की सेक्रेटरी को गाड़ी के लिए. एक छोटे से कार्य के लिए कितने लोगों का सहयोग चाहिए होता है. यह संसार एक संयुक्त इकाई की तरह कार्य करता है. यह माया नहीं है, क्षण भंगुर अवश्य है. इसका उपयोग अपने विकास के लिए करना ही उनका उद्देश्य होना चाहिए. वे इसमें फंसे नहीं, इससे कुछ पाने की आशा भी न करें. लोभ मिटाना है, मोह, मान, क्रोध और स्वार्थ के फंदों को काटना है. तभी वे अपनी पूर्णता को प्राप्त कर सकेंगे. यह जगत एक विद्यालय है, यहाँ उन्हें अपनी शक्तियों का विकास करना है. यहाँ पर एक चौराहा उन्हें हर कदम पर मिलता है, वे चाहें तो नीचे गिरें, चाहें तो ऊपर जाएँ, चाहें तो दाएँ या बाएँ जाएँ. इस दुनिया में वे क्यों आये हैं यह स्पष्ट हो जाये तो वे उस पथ पर चल सकते हैं जो उन्हें लक्ष्य की ओर ले जाये. मानव के भीतर अपार सम्भावनाएं हैं, वह देवता भी हो सकता है और यदि सोया रहे तो पशु भी हो सकता है. उसे सद्गुरु का ज्ञान मिला है, उसका उपयोग करते हुए अपने भीतर को शुद्धतम करते जाना है. शुद्ध मन ही खाली मन है, वहीँ फिर ईश्वर अपनी शक्तियों को भरने का काम शुरू करता है !
आज सुबह आचार्य रामदेव जी का ओजस्वी वक्तृत्व सुना, भीतर जोश भर गया है. शब्दों में ताकत होती है. तेजस्वी विचार उन्हें तेज से भर देते हैं. भीतर जो शक्ति ध्यान से जगी है, उसका उपयोग करने का अब वक्त आ गया है. व्यक्तिगत साधना से साधक पहले आत्मा फिर परमात्मा को पहचानता है. इस जगत की वास्तविकता का जब ज्ञान होता है तो पता चलता है यह सारा जगत एक ही सत्ता का विस्तार है. हरेक के भीतर उसी की ज्योति है, उसी का प्रकाश है. वे उससे पृथक नहीं हैं, वे किसी से भी पृथक नहीं हैं, एक ही सत्ता भिन्न-भिन्न रूपों में दिखाई दे रही है. वही सत्ता उसकी छात्रा के रूप में अपनी अज्ञता को दिखा रही है, वही सत्ता रामदेव जी के रूप में अपनी विद्वता दिखा रही है ! और वही सत्ता वह है ! सद्गुरु के रूप में वही सत्ता अपने पूरे ऐश्वर्य के साथ प्रकट हुई है. इतना ज्ञान जिसे हो जाये उसे न मृत्यु का डर रहता है न अपमान का, न मान की चिंता रहती है न अन्य कोई लोभ ! ऐसा व्यक्ति तो जीवन मुक्त हो जाता है. उन सभी के भीतर इसकी सम्भावना है, वे सभी बुद्ध हो सकते हैं, उन सभी के भीतर अकूत शक्ति है पर उन्हें इसका पता ही नहीं है. एक असीम खजाना उनके भीतर है पर वे भिखारी की तरह व्यवहार करते हैं. वे चाहें तो सारे ब्रह्मांड को अपने इशारे पर चला सकते हैं, जब वे उस सत्ता के साथ स्वयं को जोड़ लेते हैं. जब उसके हाथों में स्वयं को सौंप देते हैं, तब वह उनके द्वारा काम लेने लगता है. वे अपने भीतर की शक्तियों को सुलाए रखते हैं, शेर के वंशज होकर गीदड़ की भांति व्यवहार करते हैं, अमृत पुत्र हैं पर मरने से डरते हैं, जब बाबा जैसे लोग जगाते हैं तब उन्हें चेत होता है !
अगले हफ्ते fete है, उन्हें भी एक स्टाल लगाना है. एक मेज पर किताबें, कैसेट्स, सीडी और दूसरे पर खाने का सामान. अभी तक कुछ तैयारी नहीं की है, समय आने पर अर्थात दो-तीन दिन पहले ही शुरू कर देनी होगी.   


गॉस्पेल ऑफ़ बुद्धा


नये वर्ष में वह पहली बार लाइब्रेरी गयी थी कल. Gospel of Buddha लायी है. बुद्ध कहते हैं आत्मा नहीं है, कोई ऐसी शाश्वत सत्ता भीतर नहीं है. मन है, विचार हैं, भावनाएं हैं ये सब प्रतिपल बदल रहे हैं, एक नदी के प्रवाह की तरह, लेकिन इस प्रवाह को कौन देखता है ? मन क्या स्वयं को देख पाने में सक्षम है, विचारों से परे जो देह व मन को देखता है वह क्या है ? उसे मन कहें या आत्मा क्या फर्क पड़ता है, शब्दों के पार जहाँ केवल शून्य है, कैसी शांति है, जहाँ नाद है, संगीत की लहरियां हैं. जहाँ न जीने की चाह है न मरने की परवाह है. जब कोई विराट शून्य में खड़ा हो जाता है तो दृष्टि अपने पर लौटती है.

आज क्लब की मीटिंग में उसे ‘मृणाल ज्योति’ पर बोलना है. यह बाधाग्रस्त बच्चों के पुनर्वास के लिए समर्पित एक संस्था है जो १९९९ में मात्र दो बच्चों को लेकर शुरू की गयी थी. ऐसे बच्चे जो पूर्ण समर्थ नहीं हैं, मंदबुद्धि हैं अथवा सुनने में अक्षम हैं. उनकी देखभाल शिक्षा तथा उनके इलाज के लिए मृणाल ज्योति जैसे संस्थाएं एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. वह हिंदी में अपने विचार सुचारू रूप से रख सकती है. सभी महिलाएं उस जैसी ही तो होंगी प्रेम से भरी, किन्तु थोड़ी सी नर्वस. उनमें आत्मविश्वास की कमी का कारण है आत्मा की कमी. आत्मा जितनी जितनी प्रखर होती जाएगी अर्थात स्वार्थ जितना-जितना कम होता जायेगा या अहंकार जितना-जितना शून्य होता जायेगा, आत्मा उतनी-उतनी उजागर होती जाएगी. उनके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है क्योंकि वे स्वयं को कभी खो ही नहीं सकते और पाने के लिए सब कुछ है क्योंकि आत्मा अनंत है जितना पा लें प्यास बढ़ती ही जाती है.


आज सुबह एक फोन आया. ध्यान में थी सो घंटी जैसे कहीं दूर बजती रही पर उठाने का मन नहीं हुआ. मन धीरे-धीरे उपराम होता जा रहा है, मरता जा रहा है. भीतर प्रकाश बढ़ता जा रहा है. लक्ष्य कुछ-कुछ दीखने लगा है. हर सुबह सद्गुरु से एक सूत्र मिलता है. कितना सुंदर, सरल और सीधा है उनका जीवन, इसकी पवित्रता देखकर आँखों में जल भर आता है, इतना निर्दोष और इतना पावन है उनका सहज स्वभाव. कितना पूर्ण और कितना तृप्ति से भरा है उनका खाली मन, ऐसा मन जो माँगता नहीं, चाहता नहीं, देने की भी चाह नहीं, कुछ करने की भी चाह नहीं. सहज जो होता रहे वही  पर्याप्त है ! करने वाला यदि बचा रहे, देने वाला और देखने वाला जब तक बचा रहे, तब तक भीतर कुछ न कुछ उथल-पुथल मची रहती है. अब कोई है नहीं भीतर, मौन है, सन्नाटा है, जो है बस है, होना नहीं है. कल सुबह एक परिचिता के पास गयी थी उसके इक्कीस वर्ष के भतीजे ने आत्मघात कर कर लिया. उसने प्रार्थना की, उसकी आत्मा को शांति का अनुभव हो वह सही मार्ग पा जाये ! 

Tuesday, May 10, 2016

वाणी का वरदान


संत कहते हैं, पत्थर, वनस्पति, पशुओं की दुनिया को पार कर वे मानव बने हैं. मानव के पास मन है, वाणी है ! वाणी से ही मनुष्य की पहचान होती है. परमात्मा भी शब्द के माध्यम से प्रकट हुआ है. इस शब्द को जब कोई भीतर सुनता है तो मानो परमात्मा के द्वार पर ही पहुंच गया है. संगीतमयी वह धुन अनवरत भीतर गूँज रही है. बाहर का संगीत भी भीतर से ही उपजा है. भीतर अमृत के झरने बह रहे हैं. मनुष्य का जन्म इसी को सुनने के लिए हुआ है. मनुष्य परमात्मा से ही जन्मता है, उसमें ही जीता है व विलीन होता है, लेकिन वह जानता नहीं. वह सोचता है जैसे सांसारिक वस्तुएं बाहर से मिली हैं वैसे ही परमात्मा भी बाहर कहीं मिलेगा. हर मानव एक खजाना अपने भीतर छुपाये है. अभी वह सोया है, स्वप्न में भिखारी हो गया है ! अभी मन का एक हिस्सा जगा है नौ भाग सोया है. जागा हुआ एक भाग हार जाता है नौ भाग जीत जाते हैं. जप करके अपने मन को जगाया जा सकता है. मानव का मन विकसित हुआ है तभी विज्ञान इतना आगे बढ़ा है किन्तु उसका अचेतन मन अभी भी पाशविक वृत्तियों का शिकार बना है. भक्त अपने मन के भीतर परमात्मा को प्रकट करता है. अनगढ़ा मन भगवान नहीं है, जैसे-जैसे मन जगता जायेगा परमात्मा प्रकट होता जायेगा ! जैसे एक संगतराश अनगढ़ पत्थर में से एक सुंदर मूर्ति को गढ़ता है वैसे ही भक्त या साधक अपने मन में से एक प्रकाशपूर्ण ज्योतिस्वरूप परमात्मा को गढ़ता है. मन को मथ कर वह अमृत कुम्भ प्रकट करता है.

शरीर का सुख प्रकृति को अपने अनुकूल बनाने करने पर निर्भर करता है पर मन की शांति बाहरी पदार्थों पर निर्भर नहीं कर सकती ! मन तो तभी आनंदित होता है जब वह स्वयं को परमात्मा के अनुकूल बना लेता है, अर्थात अपने स्वभाव में टिकता है. निज स्वभाव में रहना मानो धर्म को धारण करना है. मन ही जीवन का आधार है, मन के स्वास्थ्य पर ही तन का स्वास्थ्य टिका है. मन की पवित्रता पर ही आत्मा की सबलता निर्भर करती है. मन यदि शांत है तो कर्म भी पुण्यशाली होंगे, स्थिर है तो संबंध भी दृढ़ होंगे, समता में है तो उसकी शक्तियों का उपयोग जगत के लाभ के लिए होगा और परमात्मा को उसके माध्यम से प्रकट होने का अवसर मिलेगा. परमात्मा को उन हाथों की तलाश है जो उसका काम करें, उन पावों की तलाश है जो उसके पाँव बनें !


आज मौसम बहुत ठंडा है, परमात्मा का जहाँ वास हो वह स्थान बहुत मनोरम हो जाता है. टीवी पर राम कथा आ रही है, कई बार सुनी है पर हर बार नई लगती है. वह रसपूर्ण परमात्मा भी तो नित नूतन रस बरसाता है. वह अनंत है, अपार है ! जिस दिन कोई आँख उठाकर परमात्मा को देखता है तो अपने को ही देखना होता है. बुद्धि जब थक कर चुप हो जाती है तो भीतर की शांति प्रकट होती है. एकांत में उसके पास एक गहन शांति के अलावा कोई दूसरा नहीं होता, भीड़ में वह कभी इधर-उधर हो जाती है और जिस क्षण मन किसी कामना से भर जाता है या बुद्धि वाद-विवाद में उलझ जाती है तो शांति कहीं छिप जाती है. परमात्मा एकछत्र राज्य करता है, उसके सामने कोई अन्य नहीं रह सकता. ‘प्रेम गली अति सांकरी, जामें दो न समायें’   

Monday, May 2, 2016

योग गुरू बाबा रामदेव


परसों शाम जून ने कहा कि उनके जीवन का लक्ष्य है मन को विचारों से मुक्त करना, जगा हुआ व्यक्ति अपने साथ जागरण की खबर लिए चलता है. रामदेव जी को रोज-रोज सुनने का इतना तो असर होना ही था. परमात्मा ने उनके लिए कितना सुंदर आयोजन किया है, नया वर्ष आने में मात्र दो दिन शेष रह गये हैं, एक कविता लिखनी है जो वह सभी को भेजने वाली है. एक परिचिता की बेटी ने पुत्र को जन्म दिया है, उसके लिए भी एक कविता लिखनी है !

आज वर्ष का अंतिम से पूर्व का दिन है, कल दोपहर लिखी कविता कई जगह भेजी, आज भी भेजनी है. नये वर्ष में वे अपने जीवन में कई परिवर्तन करने वाले हैं. वे नियमित लिखकर अपने मानसिक, शारीरिक व आत्मिक स्वास्थ्य का जायजा लेंगे. एक वर्ष में उन्होंने कितनी उन्नति की, क्या-क्या उपयोग किया, क्या दिया, सभी की सूची बनायेंगे. नये वर्ष में हर रविवार को सुबह वे टहलने जायेंगे, बगीचे को और सुंदर बनायेंगे. उनके सारे संकल्प पूर्ण हों, केवल संकल्प मात्र न रह जाएँ इसका भी पूरा ध्यान रखेंगे. वह एक नई किताब भी लिखेगी तथा यहाँ के स्कूलों की लाइब्रेरी में अपनी किताब भी भिजवायेगी. नये वर्ष में बहुत कुछ नया होगा.


साल का अंतिम दिन ! आज सुबह वे जल्दी उठे, धूप आज भी खिली है, सुबह बदली का आभास हुआ था. कल दोपहर उनके बगीचे में सहभोज का आयोजन है. नये साल का पहला दिन सभी मित्रों के साथ मिलकर मनाया जाये तभी अच्छा है न कि अपने-अपने घरों में बैठकर. आज ध्यान को तीक्ष्ण तलवार बनाकर मन के विचारों का भेदन किया, मन कितना हल्का-हल्का सा लग रहा है. यह तो जादू है, बिलकुल चमत्कार हो जैसे. जून को गुरू का महत्व भी एक दिन समझ में आ ही जायेगा, तब वे दोनों मिलकर वे सब कार्य करेंगे जो सद्गुरू चाहते हैं. आने वाला वर्ष बहुत महत्वपूर्ण होने वाला है. उसे सुंदर भविष्य दिखाई दे रहा है. सेवा, सत्संग, साधना और स्वाध्याय करते हुए अपने जीवन को सुंदर बनाने का भविष्य ! सितारों से आगे जहाँ और भी हैं, अभी इश्क के इन्तहां और भी हैं ! अब जीवन के नये-नये रंग सद्गुरू की कृपा से दिखाई दे रहे हैं जैसे आँखों के आगे से कोई पर्दा हटा दे. वे कूप मंडूक की तरह अपने छोटे से जीवन में ही डोलते रहते हैं, लेकिन जीवन तो अनंत है, असीम है, आत्मा की तरह सुंदर है, शिव है और सत्य है, परमात्मा की तरह ! आने वाले वर्ष की ढेरों बधाई !

Sunday, May 1, 2016

झाऊ के वन


मुहब्बत का दिया मद्धम न होगा
उजालों का परचम कभी खम न होगा
अगर अश्कों से दामन नम न होगा
बिछड़ने का हमें क्या गम न होगा
तेरा जलवा यकीनन कम न होगा
मेरी आँखों में लेकिन दम न होगा

ये शेर उसके दिल की हालत की कितनी सही बयानी करते हैं. उसकी आंख्ने भले सूख गयी थीं पर भीतर तड़प थी, ‘उसका’ जलवा तो पहले सा कायम था, वह तो सृष्टि के अस्तित्त्व में आने से पहले भी था और बाद में भी रहेगा. उनकी आँखों में वह शक्ति नहीं होती कि वे उसे देख सकें. वह तो हर क्षण उन्हें संदेश भेजता रहता है. चौबीसों घंटे वह उसके पास ही रहता है. वह उसकी हाजिरी को नजर अंदाज कर जाती थी. आज सुबह अनोखा अनुभव हुआ, अनुभव होना कठिन नहीं पर उसमें टिकना कठिन है. कभी प्रमाद कभी प्रारब्ध उन्हें भटका देता है. साधक के भीतर प्रेम नदिया की धारा की तरह कभी-कभी गुफाओं में छिप जाता है.

आज क्रिसमस है, यानि बड़ा दिन. ईसामसीह का जन्मदिवस. दुनिया के लगभग सभी हिस्सों में लोग इस त्यौहार को मना रहे हैं. उनका भी मन उल्लास से भरा है. सुबह सभी को sms भेजे, कुछ ने जवाब भी दिए. जून का अवकाश है, वे शाम से थोड़ा पहले दिन रहते लम्बी ड्राइव पर जायेंगे. कल शाम क्लब में विशेष सज्जा की गयी थी. एक सखी के यहाँ विवाह की वर्षगांठ की पार्टी भी थी. आज वे अपने मित्रों, संबंधियों की सूची भी बनाने वाले हैं, जिन्हें नये वर्ष के शुभकामना संदेश व कार्ड्स भेजने वाले हैं. कल वे निकट ही स्थित पक्षी विहार जा रहे हैं. आजकल मौसम बहुत अच्छा है. धूप, नीला आकाश, फूल और सूखी हरी घास ! टीवी पर एक व्यक्ति पानी में बड़े, मोटे सर्प के साथ तैर रहा है, खेल रहा है, वे व्यर्थ ही डरते रहते हैं. डर उनके मन की उपज है. प्रकृति के निकट रहकर ही वे अपने सहज रूप में आ सकते हैं. मनुष्यों के निकट वे बनावटी व्यवहार करते हैं.


आज वे ‘डिब्रू सैखोवा नेशनल पार्क’ देखने गये. सुबह साढ़े आठ बजे वे निकले और साढ़े नौ बजे पहुंच गये. बनश्री नामका छोटा सा रिजोर्ट रंगीन वस्त्र की झंडियों से सजा हुआ था, आर्मी की एक यूनिट ने उसे शाम तक के लिए लिया हुआ था वे हीरक जयंती मना रहे थे, उन्होंने एक नाव किराये पर ली और डिब्रू नदी के नील स्वच्छ जल में निकल पड़े. हवा ठंडी थी और आकाश नीला था. नाविक एक बूढ़ा व्यक्ति था उसका सहायक एक छोटा बच्चा था. वे उन्हें नदी के दूसरे किनारे पर ले गये, जहाँ हरियाली के मध्य में जगह-जगह श्वेत रेत बिछी थी, जो सुबह की रौशनी में चमचमा रही थी. वे चलते रहे और काफी दूर चलने के बाद झाऊ वन आये, जिसे पार करने के बाद पुनः रेतीले स्थान, जिन्हें पार करने के बाद फिर से वन मिले जहाँ नीचे हरी घास उगी थी. वे कुछ देर के लिए वहाँ बैठ गये, साथ लायी लेमन टी, कॉफ़ी बिस्किट और नमकीन खाकर तरोताजा हो गये. गायों का एक झुण्ड और कुछ भैंसें वहाँ घास चर रही थीं और सफेद बगुले उनके साथी बने साथ साथ चल रहे थे. विशाल नीले गगन के नीचे और कोई मनुष्य उस समय वहाँ नहीं था. उन्होंने विभिन्न प्रकार के पक्षियों को भी आते व जाते समय देखा. वापसी में तिनसुकिया में दोपहर का भोजन करके वे तीन बजे घर लौट आये.

Friday, April 29, 2016

परमाणु ऊर्जा का उपयोग


आज एक भतीजी का जन्मदिन है, उनके परिचितों में भी एक मित्र का. शाम को उन्हें बधाई देने जाना है. पिछले दो-तीन दिनों से ध्यान पर सुना और ध्यान भी किया. बहुत सारे भ्रम टूटे, भीतर प्रकाश हुआ, अनादि काल से मानव इस सृष्टि के रहस्यों को जानने का प्रयास करता आया है लेकिन कोई भी आजतक इसे जानने का दावा नहीं कर पाया है. यह रहस्य उतना गहरा होता जाता है जितना वे इसके निकट जाते हैं. वे कुछ भी नहीं जानते ऐसा भाव दृढ़ होता जाता है. परमात्मा कौन है, कहाँ है, कैसा है, यह सृष्टि क्यों बनी, कैसे बनी, ये सारे अति प्रश्न हैं, आजतक कोई इनका उत्तर नहीं दे पाया. परमात्मा के प्रतीक गढ़ लिए लोगों ने और उन्हें प्रेम करने लगे, प्रेम में आनन्द है, प्रेम ऊपर उठा देता है, प्रतीकों के सम्मुख झुकने से भीतर कुछ हल्का हुआ होगा, मानव ने मान लिया कि कोई परमात्मा है जो उसके साथ है, उसकी रक्षा करता है, यह मानना उनके लिए सही था जो प्रेम से भरे थे पर धीरे-धीरे लोग बिना भाव के ही मूर्तियों के सामने झुकने लगे. परमात्मा को जिसने भी पाया है अपने भीतर ही पाया है, वह मन की गहराई में छिपा है जब शरीर स्थिर हो, मन अडोल हो, शान्त हो और भीतर कोई द्वंद्व न हो तो जिस शांति व आनन्द का अनुभव उन्हें भीतर होता है, वह परमात्मा से ही आयी है.

जून दोपहर का भोजन करके गये तो वह नेट सर्फिंग करने लगी. पेपर पढ़ा, धरती पर जगमगायेंगे छोटे-छोटे सूर्य, वैज्ञानिक एटोमिक ऊर्जा का उपयोग कर धरती को ऊर्जा की कमी से मुक्त कर देंगे. भारतीय वैज्ञानिक भी जुटे हैं, न्यूक्लियर विघटन की जगह विलयन के द्वारा यह कार्य होगा. सुबह रामदेव जी भी कह रहे थे आगे आने वाले समय में भारत का पुनर्जागरण होगा. कलियुग की समाप्ति और सतयुग का आगमन होने वाला है, यह संधि युग है. न कोई ईमेल भेजा न आया, कम्प्यूटर पर टाइप करने का कार्य भी अभी शुरू नहीं हुआ है. उसके सिर के ऊपरी भाग में हल्का-हल्का सा दर्द है, कल भी था, शायद कोई प्रारब्ध कर्म उदित हुआ है. आज सुबह बाहर लॉन में सूर्य ध्यान किया. इस समय दोपहर को भी धूप-छाँव में बैठी है. शाम को उनके यहाँ सत्संग है, प्रसाद के लिए चिवड़ा-मटर बनाने हैं. माँ बड़ी ननद के पास गुजरात गयी हुई हैं. वहाँ का मौसम ठंडा नहीं है, खुशनुमा है. इस वक्त मन शान्त है, और न भी हो तो क्या फर्क पड़ता है, जो प्रकाश, प्रवृत्ति तथा मोह में भी सम रहता है, वही तो वह है. जो घट रहा है, चाहे वह शरीर में हो अथवा मन में, बदलने ही वाला है, वह साक्षी है, साक्षी रहकर वह इन प्रपंचों से पूर्णतया पृथक है, द्रष्टा है, यह हाथ लिख रहा है, परमात्मा की शक्ति से ही, यदि वह स्वयं को पृथक न जाने तो शरीर व मन के दुःख के साथ स्वयं भी दुखी रहे, लेकिन ऐसा नहीं है, मन कहता है उसे ढेर सारे कार्य करने हैं. कार्य किये बिना वह अपने को अधूरा मानता है, वह महत्वाकांक्षी है, लेकिन वह उसकी इस छटपटाहट को देखती है और मुस्कुराती है !

आज जून घर पर हैं, साल का अंतिम महीना, धूप गुनगुनी है, छुट्टियाँ शेष हैं सो आज उन्होंने घर के कुछ काम निपटाए. sun meditation किया, आंगन में झूला लगाया, जिस पर बैठकर संतरे खाए. बगीचे में पानी डाला, फ्रेंच बीन्स तोड़े और अब वह पढ़ने आने वाले छात्र की प्रतीक्षा करते हुए लिख रही है. मन को समाधान मिल गया है. आज गुरूजी को भी सुना. कितने सीधे, सरल, निष्पाप तथा सहज लगते हैं, प्रेम से लबालब, जीवन को जैसा है वैसा स्वीकारने वाले. जबकि वे व्यर्थ के विचारों में उलझ कर तन व मन दोनों को बोझिल बना लेते हैं. उसके सर का वह दर्द पित्त की अधिकता से था न कि प्रारब्ध के कारण, बड़े-बड़े शब्द सीख कर वे स्वयं को ज्ञानी समझते हैं, जो सबसे बड़ी भूल है. श्रद्धा, विश्वास को यदि रटते रहे और यूँ ही रटते-रटते स्वयं को श्रद्धालु, विश्वासी मानते रहे तो उनका उद्धार नहीं हो सकता. शब्दों के जाल से मुक्त होकर सहज होकर अपने मन में झाँकने की जरूरत है. मन यदि लोभ, मोह, क्रोध, वासना तथा अहंकार से मुक्त है तो सहज ही विश्वासी होगा, उसे बनाना नहीं होगा, ऐसा मन शरण में होता ही है. मन न रहे अर्थात मन जो विकारी है न रहे तो जो शेष रहता है वही तो आत्मा है. शांति है, वही तो परमात्मा है !