Sunday, November 16, 2014

रेगिस्तान का एकांत


उठ जाग मुसाफिर भोर भयी, अब रैन कहाँ जो सोवत है, जो जागत है सो पावत है जो सोवत है सो खोवत है ! यह निद्रा अज्ञान की है जिससे जितनी शीघ्र जागे उतना ही अच्छा. हृदय में शुद्ध प्रेम जगे तभी यह अज्ञान मिटता है और अज्ञान मिटे तो प्रेम अपने आप उपजता है ! वस्तुओं या व्यक्तियों में यदि आसक्ति हो तो शरीर नष्ट हो जाने के बाद भी आसक्ति का नाश नहीं होता, प्राप्ति होने पर बल का नाश होता है, न मिलने पर दुःख होता है. ऐसा कोई सुख भोग नहीं जिसके पीछे भय-रोग नहीं ! सुख और मान लेने की वस्तु है ही नहीं देने की वस्तु है. किन्तु यही आसक्ति यदि सत्पुरुषों और सद्विचारों के प्रति हो तो यह कटती है और धीरे-धीरे शुद्ध प्रेम में बदल जाती है. परमात्मा में विश्वास ही उसमें आसक्ति है और उसकी प्राप्ति ही अंतर में जगा शुद्ध प्रेम है. शुद्ध प्रेम मुक्त रखता है, मुक्त होता है. आज बाबाजी प्रवचन देते-देते मौन हो गये, ईश्वर की असीम करुणा का वर्णन करते हुए कहा जो भी विपत्तियाँ ईश्वर देता है वह नश्वर से शाश्वत की तरफ मोड़ने के लिए ही देता है, अपने भीतर की शक्ति को पहचानने के लिए ही देता है. कल दोपहर उसकी आँख लग गयी, एक भव्य मकान में घूम रही थी, पर वे उसमें किराये पर रहते हैं. आलीशान संगमरमर का मकान है जो कई भागों में बंटा है, पहले भी कई बार इसी तरह का स्वप्न देख चुकी है. सीढ़ियों से नीचे उतरने के कई रास्ते हैं, वह सदा भूल जाती है, कौन सा रास्ता उनके घर की तरफ ले जाता है. कल ‘सरसों’ वाले आलू बनाये, आज भी एक नई डिश बनानी है, ‘तोरई’ की जिसकी रेसिपी जून इंटरनेट से लाये हैं. कल शाम एक सखी ने ढेर सारे नींबू भिजवाये, दो सखियों से फोन पर बात की अच्छा लगा, एक के लिए आम तोड़े, अभी भिजवाने हैं.

आज बहुत दिनों के बाद सम्भवतः एक वर्ष के बाद वह संगीत अध्यापिका के घर गयी, सचमुच गुरू की बेहद-बेहद आवश्यकता है. सुबह-सुबह जागरण में भी बाबाजी गुरू की आवश्यकता पर बल देते हैं. आज अमृत कलश में एक पत्रकार, जो मुस्लिम थे पर जिनकी भाषा शुद्ध हिंदी थी, को सुना. बहुत सी नई बातों का इल्म हुआ. रेगिस्तान में पनपे धर्मों का रूप वहाँ की भौगोलोक स्थिति की देन है और नदियों के किनारे पनपे धर्मों का रूप जुदा है. यहाँ लकड़ी की बहुतायत थी सो लोग मृतक के शरीर को जलाने लगे और रेगिस्तान में मीलों तक फैली जमीन थी एक तिनके का भी पता नहीं मिलता था सो दफनाने लगे. धीरे-धीरे वह धर्म का रूप लेता गया और कट्टरवाद को जन्म मिला. भौगोलिक और ऐतिहासिक जरूरतों की वजह से पनपा धर्म बंधन बनकर इन्सान के पैरों में लिपट गया. कल्चर और संस्कृति का भेद भी उन्होंने स्पष्ट किया.


सत्ता एक की है, जैसे आकाश एक है, घड़े अनेक हैं ! यह ज्ञान नहीं है इसलिए भेद दिखता है. जैसे कमरे में समान पड़ा हो, अँधेरे में वहाँ जाने पर टकराने की सम्भावना रहती ही है, इसी तरह हृदय में अज्ञान का अंधकार हो तो कुछ स्पष्ट नहीं दीखता, ठोकरें ही मिलती हैं. ईर्ष्या, जलन, डाह, हीन भावना ये सभी ठोकरें ही तो हैं. ज्ञान हो तो इनमें से एक की भी सत्ता नहीं रहेगी. इस जगत में न जाने कितने जीव वास करते हैं. इसकी गति को सिवाय ईश्वर के और कोई नहीं जान सकता. सुबह उठी तो रात्रि में देखा कोई स्वप्न याद नहीं था पर देखे थे इतना याद था. जैसे स्वप्न में सब सत्य प्रतीत होता है लेकिन होता वहाँ कुछ भी नहीं है, उसी तरह यह संसार भी स्वप्नवत् है. कल जो था  वह आज नहीं है, आज जो होने वाला है कल नहीं रहेगा. जीवन का क्रम यूँही चलता चला जायेगा. दीदी व छोटे भाई का मेल आया है. सुबह बड़ी ननद से बात की, आज एक सखी आने वाली है पता चला है उनकी ट्रेन लेट है. आज गोयनका जी भी आये थे, बड़ी सरल भाषा में विपासना की विधि समझाते चलते हैं, देह एक पाँचों तत्वों को किस तरह अनुभूति के स्तर पर जाना जा सकता है, आज बताया. उनकी बातें वैज्ञानिक होती हैं और बाबाजी की भक्तिभाव से परिपूर्ण !   

Saturday, November 15, 2014

गॉल ब्लैडर में स्टोन



मन की वृत्ति ऐसी हो कि इस जग को रैन बसेरा ही समझे, जिस तरह पंछी आते हैं, एक-एक तिनका चुनकर लाते हैं और नीड़ बनाते हैं, फिर कुछ दिन रहकर निर्मोही होकर उड़ जाते हैं. वे संग्रह पर विश्वास नहीं करते, अपने कर्मों के भरोसे रहते हैं, पर इन्सान के पास जोड़ने का, संग्रह का व्यसन है. जबकि उसे पता नहीं कि जिन वस्तुओं को वह संभाल कर रख रहा है वे उसकी हैं ही नहीं ! उसकी तो यह देह भी नहीं, पंचतत्वों से बनी यह देह तो प्रकृति की है. साधन रूप में मिली है”. बाबाजी ने आज ये वचन कहे थे सुबह. लेकिन जब तक देह है तब तक तो इसके प्रति कर्त्तव्य का पालन करना होगा. सुबह छोटी बहन का मेल पढ़ा, जून ने जवाब भी दे दिया है. कल दोपहर उसने ‘वनिता’ के लिए दो कविताएँ भेजीं. कल दोपहर लिखने का प्रयास किया पर बात बनी नहीं, कई दिनों से नया कुछ लिखा नहीं, जैसे स्रोत के इर्दगिर्द खरपतवार उग आये हैं अथवा काई जम गयी है. पहले उसे साफ करना होगा, तभी धारा फूटेगी. मन को ऊंचे केन्द्रों में ले जाना होगा, निस्वार्थता का पालन करना होगा. वाणी पर संयम और हृदय में प्रेम, अपने आप में आना होगा जो हम वास्तव में हैं. निर्मुक्त, शुद्ध, समर्थ, पूर्ण आत्मा..जिसे कुछ पाने की चाह शेष नहीं, जो झूठे अहम् का शिकार नहीं, जो परहित के लिए ही जीता है क्योंकि उसका हित इसी में है, जो बांटना चाहता है.

एक सखी की बेटी का बुखार अभी तक ठीक नहीं हुआ है, आज पूरे बाईस दिन हो गये  हैं, उससे बात की, वह फोन पर ही रुआंसी हो गयी. उसने तय किया, कल दोपहर या हो सके तो आज ही वह उससे मिलने जाएगी. शाम को क्लब की मीटिंग है, जाना है, कहीं दबी-छिपी यह इच्छा भी है कि कोई नाटक में उसके अभिनय की तारीफ करेगा. अभी तक कई लोग कह चुके हैं, शायद इसी के पीछे नेता और अभिनेता भागते हैं, खैर, वैसे भी उसे जाना था, क्लब की सदस्यता ली है तो सभा में जाना भी एक कर्त्तव्य है. आज बाबाजी को नहीं सुन पायी, मंझली भाभी को फोन किया, वह भी भाई के गॉल ब्लैडर में स्टोन के आपरेशन को लेकर थोड़ी परेशान थी. कल रात को भाई ने बताया था और रात भर वह डरावने सपने देखती रही, अचेतन मन कैसे भयभीत हो जाता है. समाचारों में हिंदुस्तान, पाकिस्तान के अच्छे संबंधों के बारे में आशान्वित लोगों के विचार सुनकर अच्छा लगता है, भविष्य में वह भी कभी पाकिस्तान जा पायेगी अगर ऐसा हो गया तो !


मानव का जन्म आत्म वैभव का अनुभव करने के लिए हुआ है न कि निराश होकर जीवन की गाड़ी को घसीटते हुए किसी तरह दिन गुजारने के लिए ! जीवन का लक्ष्य ऊंचा होगा तो साधन अपने आप मिलते जायेंगे, आज बाबाजी ने एक सूत्र और बताया कि माह में दो दिन उपवास रखा तो तन-मन दोनों हल्के रहते हैं. कल उनकी मीटिंग अच्छी रही, कार्यक्रम तथा जलपान दोनों ही बहुत अच्छे थे. एक नई सदस्या ने सम्बोधित किया, धीरे-धीरे ही सही सभी अपने खोलों से बाहर आ रहे हैं. उसके नाटक की तारीफ़ भी दो लोगों ने की पर अब लगता है कितना ओछापन है यह उम्मीद पालना, नीचे गिरना ही है. यह छोटी-मोटी वाह-वाही विनम्र नहीं बनाती बल्कि एक झूठा नशा देती है. बड़े-बड़े कलाकार कितने मजबूत होते होंगे भीतर से कौन जानता है ? कल दोपहर वह उस सखी के यहाँ गयी, बेटी का इलाज ठीक चल रहा है, बस वक्त कुछ ज्यादा लग रहा है. कल रात भाई से बात की, आप्रेशन ठीक हो गया. दीदी को फिर से मेल भेजा है, महीने में दो बार उपवास रखने की बात पर अमल करना ठीक होगा !




Thursday, November 13, 2014

नाटक की रिहर्सल


आज उनके नाटक की ड्रेस रिहर्सल है, बाबाजी आ चुके हैं पर नैनी अपने जीवन की व्यथा सुना रही है. उसके पास कहानियों एक नहीं अनेक हैं, अपने लम्बे-चौड़े भूतपूर्व परिवार की कहानियाँ, उसके पति ने दूसरी शादी कर ली तो वह अपने तीन बच्चों को लेकर घर छोड़कर आ गयी, बर्तन मांजकर गुजारा करने लगी. यह कई साल पहले की बात है फिर उसके पति की दुखद मौत हुई. देवर-जेठ सभी समर्थ थे पर किसी ने सहारा नहीं दिया यहाँ तक कि जायज हक भी नहीं दिया. ननदें भी अचछे घरों में ब्याही हैं, उनके बच्चे भी पढ़लिख रहे हैं पर इसके बच्चे बिन पढ़े ही रह गये अब तो बेटियों की शादियाँ हो गयी हैं. बेटा भी काम तलाश रहा है, कभी मिल जाता है कभी नहीं मिलता. आज भी सर्दी ने उसे परेशान किया हुआ है, विश्वास पूर्ण हृदय ले ईश्वर से शक्ति के लिए प्रार्थना की ताकि आज और कल अपने कर्त्तव्य का पालन कर सके. इतना विश्वास तब तो नहीं होता जब वह स्वस्थ होती है. कबीरदास ने सच ही कहा है- दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोई.. जून आज सुबह समझा कर गये हैं कि वह अपना ख्याल रखे. वह उसका बेहद ख्याल रखते हैं, कल उसके साथ उन्होंने ‘संघर्ष’ फिल्म देखी. फिर वह क्लब गयी. मौसम आजकल ठीकठाक है, न बेहद वर्षा न बेहद गर्मी.

आज शनिवार है, शाम को नाटक है, स्वास्थ्य पूरी तरह तो नहीं सुधरा है पर शेष पात्रों को आभास तक नहीं हुआ सो स्पष्ट है कि आवाज और अभिनय पर पकड़ पूर्ववत् ही है. कल क्लब में तीन घंटे से भी ज्यादा वक्त लग गया, आज भी तीन-चार घंटे तो देने ही होंगे. जून और नन्हे को उसकी अनुपस्थिति का धीरे-धीरे अभ्यास हो रहा है. आज मौसम अच्छा है रात भर वर्षा होती रही. पहले-पहल नींद कुछ अस्त-व्यस्त सी रही पर बाद में आ गयी. काफी देर तक नाटक के संवाद बिन बुलाये मेहमान की तरह चक्कर लगते रहे. स्वप्न में वह घंटों नेपाल के राजा से बातें करती रही, उनके राज्य में विद्रोह करने वाले नेताओं, क्रांतिकारियों से भी मिली. जून ने कल पिता से बात की, उनके घर में नये मालिक आ गये हैं, अब वह उनका कहाँ रहा ?

आज गोयनकाजी ने महावीर स्वामी और गुरुनानक का उदहारण देते हुए विपासना का महत्व समझाया. महावीर ने कहा है, जो भीतर है वही बाहर है और जो बाहर है वही भीतर है. बाहर की सच्चाई को बुद्धि के स्तर पर समझा जा सकता है पर भीतर के सत्य को अनुभूति के स्तर पर ही समझना होगा. नानक ने कहा है, “थापिया न जाई, कीता न होई, आपे आप निरंजन सोई” भीतर की सच्चाई को देखने के लिए कुछ आरोपित नहीं करना है न ही कुछ करना है, जो अपने आप है वही हरि है !  कबीर ने भी इस प्रश्न के उत्तर में, कि हरि कैसा है ? कहा, जब जैसा तब वैसा रे...जिस क्षण हमारे अंतर की स्थिति जैसी होगी हरि उस क्षण वैसा ही होगा. प्रतिपल अंतर को साक्षी भाव से देखते  रहना ही विपासना है. यदि मन में विकार भी जगा है तो उसे देखना है कि उसके प्रति कैसी संवेदना जगी है. उस संवेदना के मूल का ज्ञान होने से वह स्वतः ही नष्ट हो जाती है और ऐसे धीरे-धीरे विकार जड़ से दूर होते हैं, दमन करने से जड़ भीतर ही रह जाती है और वह विकार पुनः-पुनः सर उठाते हैं. उसे यह सब सुनना अच्छा लगता है, लगता है  अपनी विचार शक्ति को जितना ऊंचा बनाएगी उतना ही जीवन उन्नत होगा. वह कहाँ है और क्या करती है यह उतना महत्व नहीं रखता जितना कि उसका मन कहाँ है और वह कैसी भावना से कर्म करती है, इसका महत्व है.



Wednesday, November 12, 2014

सोलर कुकर का मॉडल


जब चित्त में संसार का कोई भी ख्याल नहीं उठता है तब मन ठहर जाता है, भीतर परम मौन उभरता है और उसी शांति में परमात्मा की झलक दिखाई देती है. ध्यान करते करते जब प्राणायाम की विधि, मन्त्रजप व सारी चेष्टाएँ अपने आप छूट जाएँ तभी ऐसी स्थिति आती है ! जितना सच्चाई भरा व्यवहार होगा उतना अंतःकरण शुद्ध होगा और उतना ही ध्यान टिकेगा, मन में कोई उहापोह न हो कोई द्वेष की भावना न हो, अपने प्रति व दूसरों के प्रति ईमानदार रहें, ईश्वरीय आदर्शों की और जाने की आकांक्षा हो तो जीवन में सहजता आने लगेगी. आज सुबह जो सुना था उसमें से ये बातें उसे याद रह गयी हैं. अभी-अभी छोटी बहन से बात की, कह रही थी सभी को उसकी फ़िक्र है जानकर अच्छा लगा. कल रात को वर्षा हुई सो धूप तो अब नहीं है पर उमस बरकरार है. नन्हा स्कूल से आया तो वह रिहर्सल पर चली गयी वापस आयी तो नन्हा और जून दोनों अपना-अपना कम कर रहे थे. जून का मूड कुछ देर के लिए जरूर बिगड़ा पर उन्होंने अपने को फिर संयत कर लिया. वह चाहे कितनी देर बाहर रहें पर उसका बाहर रहना उन्हें खलता है, इसके पीछे क्या है यह तो वही जानते हैं. दीदी को मेल लिखे चार दिन हो गये हैं पर भेज नहीं पा रही है, जून से कहेगी ऑफिस से ही भेज दें, उन्हें प्रतीक्षा होगी. कल बंगाली सखी का जवाब भी आ गया अभी तक पढ़ा नहीं है.

उसके गले में दर्द है, पिछले दिनों ठंडा पेय पीया, शायद इसी कारण. शनिवार को नाटक है तब तक सभी को सेहत ठीकठाक रखनी है. आज से ठंडा पानी पीना बंद. जब वे स्वस्थ होते हैं तो देह की तरफ ध्यान भी जाता, अस्वस्थता जितनी विवश कर देती है पर बाबाजी के अनुयायियों को विवश होने की क्या आवश्यकता है, वह देह नहीं है, न ही मन या बुद्धि, बल्कि मुक्त, पवित्र, शुद्ध आत्मा है, इन छोटे-छोटे या बड़े भी दुखों का उस पर कोई असर नहीं पड़ने वाला. कल दोपहर बाद तेज वर्षा हुई, बिजली भी चली गयी, उन्होंने अँधेरे में ही भोजन बनाने की तैयारी की तो पता चला अँधेरे में उनके रसोईघर में किन्हीं और प्राणियों का राज है. नन्हे ने कितनों को भगाया, आज नैनी पूरा किचन धो-पोंछकर साफ कर रही है. उसका काम बढ़ गया है, सो उसने कपड़े धोने के लिए मशीन लगाने का निश्चय किया. वाजपेयी जी के घुटने का सफल आपरेशन हो गया है, ईश्वर उन्हें दीर्घायु दे, देश को चलाने का जो बीड़ा उन्होंने उठाया है उसे पूरा कर सकें, पाकिस्तान के साथ समझौता करने में सफल हों ! आज नन्हा प्रोजेक्ट के लिए बनाया ‘सोलर कुकर’ ले गया है.

“ईश्वर का स्मरण करने से अहम् विसर्जित होता जाता है, राग-द्वेष संसार की चर्चा करने से होता है लेकिन ईश्वरीय चर्चा यदि मन में चलती रहे तो ये नष्ट हो जाते हैं तथा मानसिक दुःख से भी निवृत्ति होती है, एहिक सुखों और सुविधाओं में डूबा हुआ मन विपत्ति आने पर तिलमिला उठता है किन्तु ईश्वरीय भाव में युक्त मन चट्टान की तरह दृढ़ होता है, छोटे-मोटे दुःख वह साक्षी भाव से सहता है ऐसे ही सुख भी उसे प्रभावित नहीं करता वह शांत भाव से नश्वर सुख-दुःख को सहता है. ईश्वर असीम बल से परिपूर्ण करता है, क्योंकि वह पूर्णकाम है, कुछ पाना उसे शेष नहीं है. जितना सुखद जीवन है, उतनी ही सुखद मृत्यु भी है. मृत्यु एक पड़ाव है, नये सफर पर जाने से पहले की विश्रांति है. कर्मों का फल हर किसी को भुगतना पड़ता है. नये कर्म करने की आकांक्षा न रहे और पुराने कर्मों के बंधन काटते चलें तो मुक्त कहे जा सकते हैं”. आज बाबाजी ने उपरोक्त विचार कहे. यह बिलकुल सही बात है और उसे कई बार इसका अनुभव भी हुआ है जब वह ईश्वरीय विचार से दूर चली जाती है स्फूर्ति का अनुभव नहीं करती. सत्कर्म करने के लिए सद्प्रेरणा और सद्गुण उसे उन आदर्शों का सदा स्मरण रखने से ही मिल सकती है. संसार नीचे गिराता है और मन नीचे के केन्द्रों में जाकर तामसिक वृत्ति धारण कर लेता है. सात्विक भाव बने रहें इसके लिए प्रतिपल सजग रहना होगा. ईश्वर की अखंड अचल मूर्ति सदा सर्वदा आँखों के सम्मुख रखनी होगी जो प्रेरित करती रहे. उन का बल, शक्ति और आशर्वाद मिलता रहे, उनका स्नेह मिलता रहे और वह तभी सम्भव होगा जब वह उन्हें दिल से चाहेगी !


Monday, November 10, 2014

अनुपम खेर और बच्चे


गुरू एक डाकिया है जो ईश्वर और मानव के बीच एक माध्यम है जो ईश्वर की सत्यता का परिचय मानव से कराता है, ऐसा उसे लगता है, रोज सुबह टीवी के माध्यम से गुरु आते हैं और प्रेरणादायक संदेश देते हैं. आज सुबह दीदी का इमेल आया, छोटी बुआ की तबियत ठीक नहीं है, पिता वहाँ गये हैं. बुआ का जीवन बचपन से बेहद संघर्षमय रहा है, माता-पिता ने बड़ी उम्र में बेटी को जन्म दिया, शिक्षा पर कोई ध्यान नहीं दिया, वही उनकी सेवा में लगी रही. विवाह भी हुआ तो बड़े संयुक्त परिवार में. कुछ वर्ष बाद पति के साथ अलग रहीं पर उन्हें फालिज का अटैक हुआ और पति उन्ही पर निर्भर हो गये. अंततः वे विधवा हो गयीं. नौकरी करके बच्चों को पढ़ा रही हैं पर बेटा दो बार फेल हो गया. इसी गम में शायद अस्वस्थ हो गयी हैं. मनोवैज्ञानिक को दिखाना पड़ा है. उनके बेटे से अभी  फोन पर बात की काफी ठीक-ठाक संयत भाषा में जवाब दिए, बच्चों की अपनी एक दुनिया होती है इस उम्र में, वह माँ-बाप को उसमें एक सीमा तक ही प्रवेश करने देते हैं. कल उसने आम का आचार बनाया, जून और नन्हे ने भी पूरा योगदान दिया.

साधक को पग-पग पर अपने व्यवहार को आचरण की कसौटी पर कसना चाहिए. अपने मन के वस्त्र को धोते-धोते कहीं यह और गंदा न हो जाये, अभिमान की धूल न उस पर लग जाये. पानी पीते हुए भी यदि प्यास नहीं बुझती, तो इसका अर्थ है पानी नहीं पीया होगा. इसी तरह मन में ईश्वर को धारण करते हुए भी यदि आनंद नहीं है तो अर्थ है कि...कल सुबह उसकी संगीत अध्यापिका के पतिदेव का फोन आया आठ दिन बाद होने वाले एक हिंदी नाटक में उसे अभिनय के लिए कहा है. जून भी मान गये हैं. कल शाम उसे जाना था पर उसी समय एक मित्र परिवार मिलने आ गया.

आज बाबाजी ने मंत्रों की महत्ता पर प्रकाश डाला. गायत्री मंत्र का महत्व सबसे अधिक है. ‘ओं नमो नारायण’, ‘ओं नमो भगवते वासुदेवाय’ तथा ‘ॐ नमो शांति शन्ति शांति’ का जाप भी फलदायक है. उन्होंने नींद लाने के लिए, पाचन शक्ति के लिए भी मंत्र बताये जो उसे याद नहीं हुए. कल शाम को रिहर्सल ठीक-ठाक ही रही, अभी नाटक प्रारम्भिक स्टेज पर है, सिर्फ एक हफ्ते का समय है. आज पड़ोसी और उनके बेटे को लंच पर बुलाया है, पड़ोसिन नहीं है कुछ दिनों के लिए. कल जून को चेक मिल गया जिसे जमा करके उन्हें मकान के पेपर्स मिल जायेंगे.


आज ग्रीष्मावकाश के बाद नन्हे का स्कूल पुनः खुला है. गर्मी पूर्ववत है, उसने सफाई के कार्य को टाल दिया है, दोपहर को नैनी की साड़ी में पीको करना है. नाटक की रिहर्सल कल भी ठीक रही, उसे डायलाग याद हो गये हैं लेकिन उनमें जान डालनी होगी. ‘जागरण’ में गोयनका जी का प्रवचन सुना, विपासना समझ में तो खूब आती है और जब भी अभ्यास किया है लाभ भी हुआ है लेकिन नियमित नहीं, बाबा जी मंत्रोच्चार पर आज भी जोर दे रहे थे. आज ध्यान से पहले इसे भी करना है लेकिन उसे एक रास्ता पकड़ना चाहिए एक साथ दो नावों में पैर रखने से डूबने का खतरा ही ज्यादा है. धूप धीरे-धीरे कम हो रही है, शायद वर्षा होगी. कल शाम वे एक मित्र की बेटी को देखने गये, जो अस्वस्थ है. वहाँ अनुपम खेर के साथ बच्चों का एक कार्यक्रम देखा, बहुत अच्छा लगा. दीदी को इमेल भेजना था पर सर्वर काम नहीं कर रहा है. 

Saturday, November 8, 2014

रंगरेज का काज



आज बाबाजी का प्रवचन बहुत प्रभावशाली था, सुबह गुरु माँ ने भी वही बात कही थी कि जिस तरह एक के भीतर परमात्मा का नाम है, वह भला बनने की चाह रखता है, किसी के अपशब्द या दिया गया अन्य कोई कष्ट उसे सुख-दुःख का अनुभव कराता है, उसी तरह दूसरा भी (जिससे उसका संबंध है, या व्यवहार है) उसी पथ का राही है. किसी के लिए परायेपन की भावना नहीं आनी चाहिए, जो एक के लिए अप्रिय है वही दूसरे के लिए भी अप्रिय है, जो एक को सुखकर है वही दूसरे के लिए भी सुख का कारण है. एक बात बाबाजी ने जोड़ दी, अपने साथ न्याय का व्यवहार करना चाहिए और दूसरे के साथ उदारता का. आज सुबह वे उठे तो धूप बहुत तेज थी पर अब बादल आ गये हैं. कल सुबह वे चार बजे उठे और पाँच बजे क्लब पहुंच गये पर वहाँ इक्का-दुक्का लोग ही थे. फिर वर्षा भी शुरू हो गयी, कुछ देर और प्रतीक्षा करने के बाद वह वापस आ गयी, रेस देर से शुरू हुई होगी. जून को उसका दुबारा वहाँ जाना पसंद नहीं आया, शायद उसके लिए यही उचित रहा हो.

जब तक मन पर रंग नहीं चढ़ा है तब तक ही करना शेष है, रंग मैले कपड़े पर नहीं चढ़ता, गुरु रंगरेज होता है जो मन की चादर को धोकर साफ करता है, फिर प्रेम के रंग से रंगता है. “राम पदार्थ पाय के कबिरा गाँठ न खोल, नहीं पतन नहीं पारखी नहीं ग्राहक नहीं मोल” आज गुरु माँ ने रंगरेज का उदाहरण देते हुए समझाया. उसे लगा यह तो सम्भव जान नहीं पड़ता, वह तो गले तक संसार में डूबी हुई है फिर क्योंकर इससे मुक्त हो सकती है और यही कारण है कि कुछ दिनों तक तो ऐसा लगता है कि आध्यात्मिक ऊँचाई तक पहुंचने के मार्ग पर कदम बढ़ रहे हैं पर फिर दुनियादारी के कार्यों में मन ऐसा रम जाता है कि ईश्वर उससे दूर चला जाता है. आज एक सखी का जन्मदिन है उसने छह बजे बुलाया है, अम्बियाँ मंगाई हैं, सुबह उससे बात करके अच्छा लगा, वह स्वयं तो कभी फोन नहीं करती, बेहद व्यस्त रहती है. आज बाबाजी के प्रवचन में काश्मीर के मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला भी आये हैं, उनके कहने पर सभी काश्मीर की शांति की प्रार्थना कर रहे हैं. अपने दिव्य संकल्प की शक्ति पर उन्हें विश्वास है. कल शाम बहुत दिनों के बाद उसने कुछ नया लिखने का प्रयास किया, कुछ पुरानी कविताएँ पढ़ीं, कुछ अच्छी भी लगीं. उसकी किताब इस माह के अंत तक छप जानी चाहिए थी पर प्रकाशकों के वादों पर भरोसा करना ? उचित नहीं है. अगले हफ्ते नन्हे का स्कूल भी खुल रहा है, उसे लिखने का ज्यादा वक्त मिलेगा, वैसे तो यह पूरा वर्ष ही उन्हें व्यस्त रहना है उसके साथ-साथ.

मन में छोटे-छोटे सुखों-दुखों की कहानी चलती रहती है और प्रेम की आग इन को जलाकर भस्म कर देती है, प्रेम ईश्वर का, सच्चाई का पीड़ा भी देता है पर उस पीड़ा में भी आनंद है, सद्गुरु ही यह आग दिलों में जगाता है, हृदय में श्रद्धा उत्पन्न होती है, मन उड़ना भूल जाता है, स्थिर हो जाता है ! लेकिन सन्त का सान्निध्य इस जन्म में उसे मिलना बहुत कठिन है, निकट भविष्य में यह सम्भव नहीं दीख पड़ता, कुछ वर्षों बाद क्या होता है, कौन कह सकता है ! यह आवश्यक भी नहीं कि मात्र गुरू के दर्शन से ही ज्ञान प्राप्त हो जाता है. आज उन्हें अपना गुरु स्वयं बनना है, उनके भीतर ही ईश्वरीय प्रेरणा विद्यमान है, देर-सबेर जो मंजिल तक पहुंचाएगी ही, कभी-कभी रास्ता भटक गये हैं ऐसा लगता है. कई-कई दिन एक ही जगह खड़े निकल जाते हैं लेकिन उस वक्त भी मन को कोई कचोटता तो रहता है. आज भी पिछले तीन दिनों की तरह तेज धूप निकली है, नैनी ने आम के पेड़ से आम तोड़ दिए हैं, अचार बनाने के लिए जून से मसाले भी मंगाने हैं. कल दीदी व बंगाली सखी को इमेल भेजे. कल उस सखी के यहाँ खाना स्वादिष्ट था, वैसे भी बहुत दिनों के बाद वहाँ जाकर अच्छा लगा.






Wednesday, November 5, 2014

मिनी मैराथन


परसों ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ था, पर एक बार भी याद नहीं आया न ही टीवी या अख़बार में सुना या पढ़ा, इसका सीधा सादा अर्थ उसने यही लगाया कि आजकल वह आँखें, कान, दिल, दिमाग सभी बंद करके जी रही है. अपने इर्दगिर्द के हालात की, लोगों की, उनके विचारों, भावनाओं तक की कोई खबर नहीं रखती, संवेदना शून्य हो जाना इसीको कहते हैं. आज उन्हीं परिचिता से मिलने जाना है, जिनकी विदाई में वह नहीं जा सकी थी. दो दिन बाद वे लोग यहाँ से जा रहे हैं, नन्हे ने एक कार्ड बनाया उन्हें देने के लिए. बाबाजी टीवी पर आ चुके हैं, उन्होंने बताया, नींद नित्य प्रलय है, इसके अतिरिक्त नैमित्तिक प्रलय, आत्यन्तिक प्रलय तथा महाप्रलय भी होती है. फिर कर्म की महत्ता पर प्रकाश डाला, कर्म चिन्तन पूर्वक होना चाहिए, और चिन्तन शाश्वत हो...पर जिसके मूल में रस नहीं वह फूल खिलेगा कैसे ? जिसके हृदय में स्नेह नहीं, व्यवहार चलेगा कैसे ? जिस दीपक में तेल नहीं वह दीपक जलेगा कैसे ? बाबाजी तो चले गये और उसने उन महिला को फोन किया वह तो मिली नहीं, उनके पतिदेव ने फोन उठाया. आज सुबह इंटरनेट का कनेक्शन नहीं मिला. कल तीन इमेल भेजनी थीं पर सम्भवतः कुछ गड़बड़ है, जून को डर है नहीं पहुँची होंगी. नेपाल में हालात सुधर रहे हैं ऐसा कहना ही पड़ेगा. वाजपेयीजी का आज आपरेशन है, पाकिस्तान के शासक ने शुभकामनायें भजी हैं, इस बार काश्मीर समस्या का स्थायी हल निकल ही जाना चाहिए. रात भर की वर्षा के बाद आज मौसम ठंडा है. उसके अस्थिर मन की तरह लिखाई भी अस्थिर हो रही है ! ईश्वर ही उसकी रक्षा करेंगे !

आज की सुबह भी बादलों से घिरी है, रात को वे जैसे ही सोने के लिए लेटे, नींद से आँखें मुंद गयीं. तिनसुकिया में ‘नन्दन कानन’ में व बाद में बाजार में घूमने से काफी थकान हो गयी थी. खाना भी बाहर ही खाया. साल में दो-एक बार ऐसे घूमना और बाहर खाना अच्छा है पर ज्यादा नहीं. कल सुबह वह उन परिचिता से मिलने गयी, दो दिन बाद ट्रक में उनका सामान लोड होगा. बातचीत में दोनों ने कहा, भविष्य में आज से अठारह-उन्नीस वर्षों बाद वे उनसे मिल सकते हैं रिटायर्मेंट के बाद जब वे भी दिल्ली रहने जायेंगे. दोपहर में नन्हे का एक मित्र आ गया और इधर-उधर की बातें करता रहा, बाद में वे तिनसुकिया गये. नैनी के लिए एक पंखा लाकर दिया है, अगले कुछ महीनों में पैसे चुकाएगी, ऐसा उसने कहा है, ज्यादा काम भी करेगी. आज भी बाबाजी ने सुंदर वचन कहे, ईश्वर तो सदा सर्वदा है, उसे खोजना नहीं है बस पर्दा उठाकर उसे देखना भर है. वह सच्चाई है, अंतरात्मा है, जिसे मानव नकारते रहते हैं. कल उसने उस सखी के लिए एक उपहार भी लिया जिसका जन्मदिन अगले हफ्ते है. दो दिन बाद मैराथन दौड़ भी है पर शायद वह नहीं जा पाए, वे जो चाहते हैं हमेशा वही उनके लिए सही नहीं होता. घर से फोन नहीं आया है न ही मकान के पैसों का चेक, जिसे जमा करके जून नई जमीन के कागजात लेंगे, शायद उन्हें जाना भी पड़े. सिवाय प्रतीक्षा के वे फ़िलहाल कुछ नहीं कर सकते. नन्हा कुछ देर बाद पढने जायेगा, उसका सुबह का काम भी तभी शुरू होगा.

ज्ञान को अपने हृदय कलश में भरने के लिए आवश्यक है कि वे अपने मन को खुला रखें, विचारों को संकीर्ण न बनाएं. बल, बुद्धि, विद्या, धैर्य को यदि अपना मित्र बनाना है तो हृदय को विशाल बनाना होगा. आज बाबाजी बच्चों को सिखा रहे हैं. इस समय आठ बजे हैं, उसका स्नान-ध्यान हो चुका है, नन्हा अभी नाश्ता खा रहा है. सुबह उठकर एक घंटा कम्प्यूटर पर बिताया, न्यूज़ पढ़ीं, एक इमेल भी आया था. दीदी और बंगाली सखी ने उसके मेल का जवाब अभी नहीं दिया है. कल मिनी मैराथन है, सम्भवतः वह जा सकेगी, आज शाम को ही वाकिंग करते समय पता चल जायेगा. पुरस्कार न भी मिले तो भी भाग लेना अपने आप में एक अनुभव होगा and she loves walking and jogging आज धूप तेज है, white snow ball का एक पौधा ज्यादा पानी से मरने की कगार पर है कल उन्होंने उसे ट्रांसप्लांट किया था.