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Wednesday, March 2, 2016

हिना का रंग


आज सुबह अजीब सा स्वप्न देखा. एक नवजात शिशु का जन्म, जन्म देने वाली माँ को वह जानती है और वह बच्चा जन्मते ही कितना लम्बा था. स्वप्नों की दुनिया कितनी निराली है. देर तक वह स्वप्न चला. जन्म का रहस्य पता चल जाता है एक  बार सद्गुरू ने कहा था. सुबह अभी सवा सात ही बजे थे कि बातूनी सखी का फोन आया, उसने कुछ दिन पहले भी कहा था, मिलने आएगी. उसका गला बैठा हुआ था, उसकी कहानी सुनी जब उसके घर गयी. वह अपने ही मन, अपने व्यवहार, अपनी ही आदतों व अपने ही स्वभाव के कारण इतना दुःख पा रही है, वह इस बात को समझ नहीं पा रही है. नूना ने उसे समझाया तो है पर जब तक वह अपने को परिवर्तित करने की बात स्वयं नहीं सोचेगी, तब तक उसको ख़ुशी मिलना मुश्किल है. मन के हाथों या कहें माया के हाथों, अज्ञान के हाथों, अहंकार के हाथों मानव पिसा जाता है, पर उसे होश नहीं आता. मन, माया, अहंकार, अज्ञान यही तो उस आवरण का नाम है जो उसके और परम के बीच है. आत्मा, ब्रह्म, प्रेम, ज्ञान यही तो उस आनन्द स्वरूप के नाम हैं, जो सदा हाजिर है. परमात्मा उसके भी साथ है. इस समय दोपहर के सवा तीन बजे हैं. उसका पुत्र गणित पढ़ने आता है, इस समय परीक्षा दे रहा है. परिवार के दुःख की छाया उसके चेहरे पर भी झलक रही है. जून परसों मुम्बई जा रहे हैं.

कल ध्यान में उसे पल भर में परमात्मा के आनन्द का अनुभव करने की कुंजी हाथ लग गयी.  एक क्षण के शतांश में वहाँ पहुंचा जा सकता है. वह परम हर पल निमन्त्रण देता है. वह अपना घर है. उनके जन्मों से आहत हुआ मन का अपना घर..वहाँ जाकर मन जैसे खिल जाता है, तृप्त हो जाता है, खो जाता है, समाधि इसी को कहते हैं क्या ? जगती आँखों की समाधि ! बैंगलोर आश्रम में गुरूजी एडवांस कोर्स करा रहे हैं, वह उनकी कृपा का अनुभव यहाँ रहकर कर रही है. भीतर झींगुर की सी ध्वनि इस वक्त भी सुनाई दे रही है, कहाँ से आती है यह ध्वनि, कोई नहीं जानता. उस सखी का फोन आया, आज दिल्ली से आने वाले किसी मेहमान के लिए भोजन बना रही है, कल जो दुःख से दबी जा रही थी. ईश्वर सबको शक्ति देता है, वह उन्हें एक पल के लिए भी अकेला नहीं छोड़ता. वे परमधाम न भी जा सकें वह तो उनके पास आ ही जाता है.
टीवी पर मुरारी बापू राम कथा कह रहे हैं. कितना रस है उनकी कथा में, शेरो-शायरी और पुराने फ़िल्मी गीतों का आध्यात्मिक अर्थ देते हैं.
‘पत्थर के सनम, पत्थर के खुदा ही पाए हैं
लोग शहरे मुहब्बत कहते हैं हम जान बचा के आये हैं’
‘इश्क का जहर पी लिया साकी
अब कौन मसीहा दवा करेगा’ !
‘चंद मासूमों का लहू है
लोग जिसे मुहब्बत की हिना कहते हैं’ !
इस बार उनकी कथा का विषय भगवान नागेश्वर हैं, अर्थात शिव. भगवान महादेव आदिदेव हैं. वही निराकार ब्रह्म हैं, अजन्मा हैं, उनके रूप की कल्पना कर ऋषियों ने जो छवि बनाई है उसका वर्णन हो रहा है. हजारों वर्षों से वह प्रतिमा लोगों के मनों में बसी है. उनका रंग, कुंद, इंद्र तथा शंख के समान श्वेत है, उनकी कृपा असीम है.


जून कल आ गये, वहीं से बड़ी ननद से मिलने भी गये, उसने ढेर सारा सामान भेजा है, कुछ जून ने खरीदा है, उनकी आलमारी का निचला हिस्सा भर गया है, फ्रिज भी भर गया है और तुर्रा यह कि उनका पाचन ठीक नहीं है. इतना गरिष्ठ भोजन खाकर कहीं उसका भी न हो जाये, इस बात का डर है. कल दोपहर बाद से समय कुछ अलग तरह से बीत रहा है. मौन रहने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता. आज एक सखी का जन्मदिन है, शाम को वे जायेंगे. आज भी मौसम भीगा है, सुबह उठे तो मूसलाधार पानी बरस रहा था, अभी पुनः आरम्भ हो गयी है. कल डेंटिस्ट के पास गयी थी. उसने कहा, सुबह हो गयी है, सूरज बादलों के पीछे छिपा है. मौसम की उदासी देखकर मन भी जैसे उदास हो गया है. इस भाव के लिए कोई एक शब्द या कुछ शब्द लिखें. उसका मन भी सम्भवतः इस वक्त उदास है, नन्ही छात्रा उसकी एक भी बात नहीं सुन रही है. बच्चों को पढ़ाना इतना सरल भी नहीं है, वे उनके धैर्य की पूरी परीक्षा लेते हैं. 

Friday, May 18, 2012

नूरजहाँ- मलिकाए तरन्नुम


आज मौसम मेहरबान है, बादलों ने कम से कम अपनी सूरत तो दिखाई है. पाकिस्तान रेडियो से नूरजहाँ का गाया अच्छा सा गाना आ रहा है. “हमारी सांसों में आज तक वह हिना की खुशबू महक रही है...पता नहीं क्यों उसे पकिस्तानी गाने बहुत अच्छे लगते हैं, यही नहीं उनके कई और भी कार्यक्रम उसे बहुत पसंद आते थे. उसने अमृत लाल नगर का उपन्यास 'मानस के हंस' पढ़ना शुरू किया है जो संत तुलसीदास के जीवन पर आधारित है. कल टीवी पर सत्यजित रे द्वारा निर्देशित एक धारावाहिक देखा “कलाकृति” जो बहुत अच्छा था. दो हफ्ते बाद उसका जन्म दिन है और लगभग पचास दिन बाद उसका जो आजकल अपनी उपस्थिति कितनी तीव्रता से व्यक्त करता है.
सुबह उठते ही जून ने उसे याद दिलाया कि आज का दिन कितना विशेष है. आज से चार वर्ष पहले इसी दिन वह उससे मिलने आया था,वह तब हॉस्टल में थी. पूरा दिन उन्हें साथ रहना था. पहली बार वे घूमने गए थे. उसका साथ कैसी अनजानी, उस समय तक बिल्कुल नयी, अछूती अनुभूतियों से भर देता था. पल-पल झिझक भरा स्पर्श, पास-पास आने की चेष्टा करते हुए वह दूर-दूर रहना. वे बहुत खुश थे. एक दूसरे की समीपता में खुश रह सकते हैं ऐसा अहसास हुआ था. उसी का तो परिणाम है यह उनका जीवन भर का अटूट बंधन. जून की बातें उस दिन जितनी मोहक थीं आज उससे कहीं ज्यादा ही हैं. फिर भी उस दिन का महत्व तो है.