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Saturday, May 2, 2015

जयंत विष्णु नार्लीकर का भाषण


पिछले तीन दिन डायरी नहीं खोली. शुक्रवार को सद्गुरु की पावन वाणी सुनी. ‘नारद भक्ति सूत्र’ पर उनकी चर्चा aol के टीचर ने सुनवाई, वे तीन घंटे बैठे रहे और भगवद चर्चा सुनते रहे. अगले दिन दोपहर से किचन व स्टोर की सफाई सफेदी आदि हो रही थी, उसी दिन शाम को वैज्ञानिक जयंत विष्णु नार्लीकर का भाषण भी था क्लब में, अच्छा लगा. वे एक भौतिकीय वैज्ञानिक हैं, और विज्ञान कथाएं लिखते हैं. उन्होंने कहा, भारतीयों को अपना दृष्टिकोण अधिक वैज्ञानिक बनाना चाहिए, अंधविश्वासों के चंगुल से निकल कर नई सोच को अपनाना चाहिए. ब्रह्मांड के बनने की बिग बैंग थ्योरी में उनका विश्वास नहीं है. इतवार को भी दिन भर रंग-रोगन का कार्य चलता रहा. सोमवार यानि कल सुबह थोडा देर से उठे, सो सारी सुबह सभी आवश्यक कार्यों में ही निकल गयी. आज सुबह  अपने सही समय पर शुरू हुई, सो अभी पौने आठ ही बजे हैं. जून आज शिवसागर जाने वाले हैं, शाम को सात बजे तक आएंगे.

आज सुबह से ही झड़ी लगी है वर्षा की, सर्दियों में जब बरसात होती है तो उसका अलग ही रूप होता है. सभी कुछ शीतल है, फर्श, हवा, दीवारें और..टमाटर के पौधे लुढ़क गये हैं, उनमें लकड़ी लगाकर सहारा दिया. कल माली ने गमलों के लिए नई मिट्टी तैयार की थी, उसे भी ढका. अब बरसात रुकने पर ही दो-तीन दिन धूप लगेगी तभी वह मिट्टी भरने लायक होगी. मिट्टी में कितनी उर्वरता छुपी होती है, सारे फूल जो उन्हें मिलते हैं उसी में तो छुपे होते हैं. नन्हे को आज स्कूल नहीं जाना था सो सुबह आरामदेह थी. उसके स्कूल में आजकल पढ़ाई कम और रिहर्सल ज्यादा हो रही है. दो दिन बाद इंटर हाउस मीट है. कल उसका फिजिक्स प्रैक्टिकल है और परसों साइबर ओलम्पियाड है. जून इस इतवार को मुम्बई जा रहे हैं. ईश्वर उन सभी के साथ हर क्षण है, वह है तो वे हैं !

आज सद्गुरु ने आठ लक्ष्मियों का वर्णन किया, विद्या, धन, धैर्य, धन्य, राज, साहस, संकल्प और भाग्य लक्ष्मियों का. सभी के पास उन सभी का कुछ न कुछ अंश रहता ही है. लक्ष्मी नारायण तक पहुंचने का साधन है. धर्म का पालन करने के लिए भी धन, धैर्य और विद्या की आवश्यकता होती है. धर्म कहें या सत्य वही तो नारायण है, और वह पूर्ण है, पूर्ण की पूजा पूर्ण हुए बिना नहीं हो सकती, अर्थात सहज स्वरूप में स्थित हुए बिना पूजा नहीं हो सकती. इसका अर्थ हुआ की जो कुछ प्राप्त करना है आत्मा के पास ही है, वह उसका ही प्रकाश है.

आज जागरण में अवतारों पर सुना. पहला है मत्स्यावतार, मछली एक ऐसा प्राणी है जो कभी आंख बंद नहीं करता. अर्थात सदा जाग्रत, उन्हें भी ज्ञान रूपी जागरण में स्थित रहना है. निद्रा अज्ञान का प्रतीक है. दूसरा है कूर्मावतार, जो स्थिरता का प्रतीक है. ज्ञान को स्थिर करना है तभी उसका लाभ मिलेगा. ज्ञान में स्थिर होकर ही मन में चलने वाले सुरों और असुरों के मध्य होने वाले मंथन को सह सकते हैं. तीसरा है वराहवतार, जो स्वच्छता फैलाता है. चित्त की शुद्धि के लिए इसकी आवश्यकता है. नरसिंह अवतार जोश और संवेदनशीलता का समन्वय है, विकारों से लड़ने के लिए कठोर होने की भी जरूरत है और साथ ही संवेदनशील होने की भी. इसके बाद ही जीवन में आह्लाद की उत्पत्ति होगी. सद्गुरु की बातें अनोखी हैं, उनका कहने का अंदाज अनोखा है. नारायण ॐ का उनका उच्चारण भी अनोखे नृत्य की भाव-भंगिमाओं से पूर्ण था. उन्हें देखते व सुनते समय उसके भीतर-बाहर एक अनोखा उल्लास छा जाता है. ईश्वर उसके बिलकुल निकट आ जाता है. वह कहते हैं ईश्वर को देखना या पाना नहीं है बल्कि उसमें होना है...उसे अपने भीतर-बाहर समोना है !     



Thursday, April 30, 2015

क्षेत्रीय अनुसंधान प्रयोगशाला



कल दोपहर डेढ़ बजे वे जोरहाट पहुँचे, नन्हे को(RRL-जोरहाट )रीजनल रिसर्च प्रयोगशाला – जोरहाट में कई स्कूलों के कुछ अन्य विद्यार्थियों के साथ आने का निमन्त्रण मिला था. इन सभी बच्चों ने हाई स्कूल की परीक्षा में अच्छे अंक पाए थे. उनके ठहरने का इंतजाम जून के एक परिचित ‘क्षेत्रीय अनुसन्धान प्रयोगशाला’ के एक वैज्ञानिक द्वारा RRL के सामने बने ‘अनुपमा विवाह भवन’ में किया गया है. काफी अच्छी साफ-सुथरी जगह है. सभी तरह का आराम है. नन्हा बेहद खुश है, उसकी कई छात्रों से जान-पहचान भी हो गयी है. कल रात वह दूसरे कमरे में सोया, अब वह अपना ख्याल स्वयं रख सकता है. कहीं से पूजा की घंटियों की आवाज आ रही है. सुबह जून साढ़े पांच बजे उठे, सभी ने स्नान आदि किया, नन्हा चला गया तो उन्होंने क्रिया की. जून को भी उन परिचित से मिलना था, उनके जाने के बाद उसने कुछ देर ‘ध्यान’ किया पर दो बार व्यवधान पड़ा, सो अब प्रयास छोड़कर तैयार हो गयी है. कुछ देर बाद वे बाजार जायेंगे. घर से दूर कुछ समय बेफिक्री से बिताना अच्छा है कभी-कभी. अब श्लोकों क ध्वनि आ रही है, भारत भूमि इतनी पावन है कि इसके हर कण में प्रभु का वास है !

आज उन्हें यहाँ आये तीसरा दिन है. नन्हा प्रसन्न है. कल उन्हें वैज्ञानिकों से मिलने का मौका मिला. प्रयोगशालाओं को देखा. आज प्रैक्टिकल ट्रेनिंग है, शाम को अभिनन्दन व पुरस्कार समारोह है. लगभग साढ़े पांच तक सभी कार्यक्रम सम्पन्न हो जायेंगे. वे उसी समय घर के लिए प्रस्थान करेंगे.

कल रात लगभग सवा नौ बजे वे वापस आये जोरहाट से. जून ने बहुत धीरे-धीरे कार चलायी. रास्ता कुछ जगहों पर काफी खराब था. कुछ जगह काफी अच्छा भी था. वापस आकर भोजन बनाया, सोते-सोते साढ़े दस बज गये, सो सुबह छह बजे उठे. टीवी पर श्री श्री को देखा, कह रहे थे, अभिमान, क्रोध और लोभ अथवा कामना करनी है तो उसी एक की करो, मन के सब भावों को उस एक से जोड़ दो फिर देखो जीवन में भक्ति अपने आप उदित होगी और भक्ति के पीछे-पीछे सुख, शांति, और हृदय की शुद्धता, सौम्यता भी ! उनको सुनकर हृदय स्वर्गिक आनंद का अनुभव करता है, उनकी भाषा सुंदर है, हाव-भाव सुंदर हैं, उनकी आँखों में कितनी गहराई है, समुद्र से गहरी और प्रेम भरी आँखें ! नन्हा कल शाम को वापस आना नहीं चाहता था, जिद कर रहा था सो जून को क्रोध आया, पर थोड़ी देर बाद ही संयत भी हो गये. उनमें एक धैर्य और दृढ़ता है जो दिनों-दिन और तीव्र हो रही है. वह नन्हे और उसका बहुत ख्याल रखते हैं और बहुत गहरे जुड़े हैं. उन्हें अपने कार्य का, अपने लक्ष्यों का, अपने मन का पूरी तरह पता है. वह चाहते हैं कि नन्हा और वह उनकी बात का मान रखें और ऐसा उन्हें करना ही चाहिए. उनके प्रेम का प्रतिदान वे और कैसे दे सकते हैं. उसका मन उनके प्रति पूर्णतया समर्पित है और आत्मा कृष्ण के प्रति. कृष्ण उसका जीवनधन है, उसका सर्वस्व, उसके अस्तित्व का प्रमाण, वह उसका हितैषी है, शुभचिंतक और सुहृदयी, वह उसकी अंतर आत्मा है. उसका नाम उसके पोर-पोर में अंकित है. उसके प्रति वह अपने भीतर इतना प्रेम उमड़ते अनुभव करती है कि उसकी गूँज तक उसे सुनाई देती है. उसका नाम लेते ही आँखें नम हो जाती हैं. वह प्रियतम है, अनुपम है और मधुमय है. वही जानने योग्य है, मानने योग्य है, एक उसी की सत्ता कण-कण में व्याप्त है, वही चैतन्य हर जड़-चेतन में समय है. उसी का प्रकाश सूर्य आदि नक्षत्रों में है. उसी का प्रकाश है जो आँखें बंद करते ही उसे घेर लेता है !
आज ‘जागरण’ में दीपावली के त्योहार का आध्यात्मिक अर्थ बताया गया. मन के विकारों को घर के कूड़े-करकट की तरह निकाल फेंके, ज्ञान के दीपक अपने अंतर में जलाएं. स्वयं प्रसन्नता रूपी प्रसाद ग्रहण करें तथा अन्यों को भी दें. नये विचारों को नये वस्त्रों की तरह धारण करें. उसने प्रार्थना की, दीवाली सबके लिए शुभ हो, उसके अंतर में सभी के लिए प्रेम दिनोंदिन बढ़ता रहे, वह सबमें अपनी आत्मा को व सबकी आत्मा में स्वयं को देखे. कृष्ण उसके आराध्य बनें रहें, उनके चरण कमलों में उसका मस्तक सदा अवनत रहे. सद्गुरु के प्रति उसकी श्रद्धा और भक्ति में विकास हो. सद्गुरु से जो बंधन बंधा है वह अटूट है. अध्यात्म के क्षेत्र में सीमाओं की कोई जगह नहीं है, वहाँ सब कुछ अनंत है...निस्सीम, मुक्त और परम..उनकी कृपा से ही उसे इस अनन्तता का अनुभव हुआ है.