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Monday, September 23, 2013

काले चने की सूखी सब्जी



थोड़ा सा वक्त था, सोचा कल दोपहर से जो बातें मन में उमड़ रही हैं उनको अपनी डायरी से साझा कर ले, “ख़ामोशी” जैसी फिल्म सदियों में एक बार बनती है, पूरी फिल्म एक कविता सी  लगती है, मन को गहरे तक छू जाने वाली कविता. नन्हा और जून दोनों मन के और करीब हो गये, मन में गहराई तक सिर्फ प्यार भर गया, सारी दुनिया के लिए, ऐसी अच्छे भाव जगाने वाली फिल्म को अच्छा न कहे तो क्या कहे. रात को मिली का कुछ भाग देखा, वह भी अच्छी फिल्म है पर इतने विज्ञापनों की वजह से वे पूरी नहीं देख पाए. आज भी नन्हे का स्कूल बंद है, कल ‘असम बंद’ के कारण जून का दफ्तर भी बंद रहा, शाम को वे एक मित्र के यहाँ गये, जहाँ उसके कम्प्यूटर शिक्षा प्राप्त करने की बात हुई, जून NIIT के बारे में विस्तार से जानकारी पता करके आएंगे.

पीटीवी पर पुराने वक्तों के फ़िल्मी गाने आ रहे हैं, शायद तब के जब दोनों मुल्कों का फिल्म  संगीत एक था, कितने अपने से जाने-पहचाने लगते हैं ये गीत. नूरजहाँ और के.एल. सहगल के जमाने के. हिंदी के कितने शब्द वहाँ भी हैं, जैसे उर्दू के यहाँ, आखिर स्रोत तो दोनों का एक ही है. पता नहीं कब उसका यह ख्वाब पूरा होगा.. या नहीं कि दोनों मुल्क दोस्ती की राह पर चलेंगे. परसों यानि सोमवार को उसने एक सखी को लंच पर बुलाया था, वह अपने पुत्र के साथ आई जो नन्हे का मित्र भी है. शाम तक वे सब साथ रहे. कुछ मन की बातें कहीं-सुनीं, उसने अपनी एक दो कविताएं भी सुनायीं. कल ‘विश्वकर्मा पूजा’ थी, जून के दफ्तर में पूजा के बाद भोजन का भी प्रबंध था. कल से उसने चश्मा लगाना शुरू किया है, जून ने कहा उसके सर दर्द का कारण चश्मा न लगाना भी हो सकता है. आश्चर्य की बात तो यह कि दर्द ठीक भी हो गया.

मौसम आज भी मेहरबान है. कल रात की वर्षा के बाद सब कुछ हरा-भरा और धुला–धुला लग रहा है. बाहर झांकने पर, कल शाम उन्होंने दूब घास की कटिंग भी की. इस वक्त मन में (जैसे कोई संकरी गली का रास्ता बंद कर दे) एक ठहराव या घुटन सी महसूस हो रही है, कारण कोई एक नहीं है. सुबह देर से उठी और रात्रि को बिना शुभरात्रि किये ही सो गयी थी., कल खतों के जवाब भी दिए पर मन खोल कर रख दें ऐसे नहीं. कुछ देर पूर्व एक ड्रामा देखा उससे पहले एक पुराना गीत EL पर देखा, ‘महलों का राजा मिला, तुम्हारी बेटी राज करेगी...’, अच्छा लगा यह गीत, जाहिरा जो इसे गा रही थी कितनी उदास थी, शायद वही उदासी मन में कहीं से घुस गयी है.. नन्हा आज रोज से जल्दी उठा और फरमाइश की, कि काले चने की सूखी सब्जी ले जायेगा टिफिन में, रात को बिना भिगोये चने आखिर उसके स्कूल जाने तक तीन बार उबालने पर तैयार हुए. आज उसका टेस्ट है, पर वह निश्चिन्त था, टेस्ट में ग्रेड मिलने वाला है मार्क्स नहीं.

सुबह से कई बार लिखने की बात सोच चुकी है वह, पर हर बार किसी न किसी काम में उलझ कर रह गयी. पर मन में हर वक्त यह विचार रहा कि कुछ लिखना है. आँखों की चुभन या कहें चुनचुनाहट अभी भी बरकरार है. ऐसा लग रहा है कि सुबह से कुछ किया ही नहीं, जून आज दिगबोई गये थे, लंच उसने अकेले ही खाया. सुबह दो सखियों से फोन पर भी बात की, पर न जाने क्यों एक अकेलेपन का अहसास( शायद आँख की तकलीफ की वजह से) है. स्वामी रामतीर्थ की पुस्तक में पढ़ा कि, काम करना, बस काम करने के लिए काम करना, सच्चे वेदांती की निशानी है. तो उसे मुक्ति काम में ही मिल सकती है आराम में नहीं, दूसरी बात थी उसमें, त्याग की और आत्म निरीक्षण की, सो त्याग करना होगा अकर्मण्यता का और निरीक्षण करना होगा अपनी कमियों का. कल शाम क्लब में टीटी खेलते वक्त कैसे सब कुछ भूलकर बस टीटी खेल रही थी, इसी तरह किसी काम में इस कदर लीन हो जाना कि स्वयं को भुला देना पड़े वेदांती का लक्षण है. भुलाना मात्र ईगो को है, कि वह यह करने वाली है, she is the doer ! सुबह से वर्षा तो नहीं हुई है पर बादल बने हुए हैं, वे भी अपने बने रहने का काम कर रहे हैं.