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Friday, January 30, 2015

गजेन्द्र स्तुति


कल रात वह ग्यारह बजे सोयी. नन्हा बारह बजे तक जगता है, सो उसे लगा कि कुछ देर तो उसके साथ जगा जा सकता है. भागवद् पढ़ती रही, नारद मुनि ने युधिष्ठिर को उपदेश दिए हैं कि ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा सन्यास आश्रम में किस प्रकार आचरण करना चाहिए. अद्भुत उपदेश हैं जो हर युग के लिए अनुकूल हैं. शाब्दिक अर्थ न लेकर यदि यदि भाव को समझकर आज के समय के अनुसार उसे स्वीकारें. कल शाम को क्लब भी गयी. कोरस का अभ्यास किया, आज भी जाना है और कल मीटिंग है जिसके लिए उसे कविताओं का चुनाव करना है. आज ‘जागरण’ में सुना, प्राणायाम, योग साधना, ध्यान आदि करने से आत्मा का विकास होता है, सुप्त शक्तियाँ जागृत होती हैं. आध्यात्मिक केंद्र खुलते हैं, शरीर स्वस्थ होता है, मन बलवान तथा बुद्धि प्रज्ञा में बदलती है. कृष्ण ने भी तो कहा है जो उनकी शरण में जाता है उसे वह बुद्धियोग प्रदान करते हैं. कृष्ण को भजना कितना सहज है जैसे साँस लेना और कितना प्रभावशाली ! अभी-अभी तेजपुर की aol परिवार की सदस्या तथा दीदी से बात की. दोनों यात्रा पर जा रही हैं, पहली ऋषिकेश जा रही हैं वह भी aol की टीचर बनना चाहती हैं, कोर्स के लिए जा रही हैं. दीदी घर जा रही हैं किसी शादी में सम्मिलित होने. दोनों ने सद्गुरु की बात की. अगले महीने में वह देहरादून आ रहे हैं और अप्रैल में इटानगर जायेंगे, उससे पहले गोहाटी भी. सद्गुरु के जीवन में आने से कितना परिवर्तन आ गया है, मन निवृत्ति की ओर जा रहा है और भगवद धाम की ओर प्रवृत्ति हो रही है. जीवन में पुरुषार्थ हो तो भगवान भी दूर नहीं रह सकते.

जो जिसका अंश है वह उससे दूर नहीं रह सकता, जैसे धरती से उत्पन्न वस्तुएं धरती की ओर आकर्षित होती हैं वैसे ही मानव उस चैतन्य का अंश होने के कारण उसी की ओर आकर्षित होते हैं और उस तक पहुंचने में उन्हें कोई प्रयास भी नहीं करना होता, यह उतना ही सरल है जितना ऊपर से गिरायी वस्तु का नीचे गिरना, बल्कि ईश्वर से दूर जाने के लिए हमें अथक प्रयास करना पड़ता है. लेकिन संसार ऐसे ही चलता है यानि विपरीत दिशा में. आज पूर्णिमा है, सुबह ‘क्रिया’ की. जून को उठाने की कोशिश की, पर उनको शिकायत थी कि रात ठीक से सो नहीं पाए. शरीर को इतना आरामपसंद बनाना भी ठीक नहीं है, खैर उसे अपनी कमियों की ओर देखना चाहिए न कि उन्हें अनदेखा करना करना चाहिए, उसे ही पहले उठ जाना होगा, और फिर जून को जगाना. जैसा पिछले कुछ महीनों से वह करते आ रहे थे. नन्हा पढ़ाई में व्यस्त है, शनिवार से उसकी परीक्षाएं आरम्भ हैं सिर्फ दो दिन रह गये हैं. कल शाम वे रिहर्सल के लिए नहीं गये वर्षा होने लगी थी, बाहर बरामदे में बैठकर सफेद फूलों वाले वृक्ष को देखते रहे. रात को भागवद में गजेन्द्र की कथा पढ़ी, कितनी अच्छी स्तुति करता है, उसे तो ऐसी सुंदर स्तुतियाँ नहीं आतीं. ईश्वर के नाम का सुमिरन ही चलता रहे तो संतोष होता है. उसकी कृपा होने पर आँखों में उसकी छवि दिखायी देती है, मन शांत रहता है, बुद्धि प्रज्ञा में बदल जाती है और आत्मा मुखर हो जाती है. आत्मा जो ज्ञान, आनंद, प्रेम और शक्ति का अक्षय भंडार है, ये सब ईश्वर से जुड़े रहने पर है !


कृष्ण आदि देव हैं, जगत के आधार हैं, चैतन्य के ऊपर ही जड़ टिका है, सब कुछ प्रकृति के गुणों के अनुसार हो रहा है, जो उनकी अध्यक्षता में काम करती है. वे निमित्त मात्र हैं, कृष्ण की इच्छा से ही सब कुछ होता है., वह उन्हें एक क्षण में मुक्त कर देता है. सब कुछ उस पर छोड़ दें तो योग-क्षेम का निर्वाह करता है. उसके लिए सब कुछ सम्भव है, वही तो है बस एक मात्र स्वयं जैसा, कृष्ण उसके साथ थे कल, और हर क्षण हैं, उन्हीं ने उसे अभय दिया है, इस दुनिया में भय करने का कोई कारण है ही नहीं, चिंता का अथवा दुःख का भी कोई भी वाजिब कारण नहीं है. यह तो उसका ही खेल है, उसकी माया है, उन्हें उसकी माया से मोहित होने की क्या आवश्यकता है, वह स्वयं ही उन्हें भीतर से इस माया से मुक्ति पाने निर्देश देता रहता है. इस खेल के नियम भी तो उसी के बनाये हुए हैं, कृष्ण को अपने जीवन का केंद्र बना लें तो जीवन के सारे शून्यों को अर्थ मिल जाता है. भौतिक सुख भी आध्यात्मिक हो जाते हैं. धन, बुद्धि और मान हजार गुना बढ़ जाते हैं जब उस एक कान्हा को कोई अपना सखा मान लेता है, वह जो अचिन्त्य है, रहस्यमय है, विशाल है, अनंत है, सूक्ष्मतम है, वह अपने को हजारों हजारों रूपों में विस्तारित कर सकता है, वह जिसके वे अंशी हैं, जो उनका अपना आप है, फिर दूरी का, भिन्नता का, डर का कोई प्रश्न ही नहीं उठता. उसके निकट जाना तो सहज है जैसे पंछी का गगन में उड़ना, सूर्य का प्रकश देना और बूंद का सागर में मिलना...उन्हें सहज होकर इस जग में रहना है, सहज होकर कृष्ण से प्रेम करना है.श्वास-श्वास में उसी का नाम लेते हुए, मन उसी के सुंदर रूप में लगाये हुए, बुद्धि को प्रज्ञा में बदलते हुए, तो जीवन एक उपहार बन जाता है और मृत्यु एक वरदान !  

Wednesday, January 28, 2015

गुलाब वाटिका




Happy valentine day  जून ने आज सुबह कहा और कहते हुए वह हँस भी रहे थे और वह सोच रही थी कि वह उससे नाराज हैं. मन स्वयं ही अपने मत का शिकार हो जाता है. खुद के बनाये जाल में फंस जाता है. अपनी ही कामना का फंदा उसके गले में पड़ता है, तीनों गुणों के वशीभूत होकर वह संकल्प-विकल्प के चक्रव्यूह में फंस जाता है. सुबह पिता से बात की, छोटे भाई से भी बहुत दिनों के बाद बात हुई. उनकी पीड़ा अभी घटी नहीं है, समय के साथ-साथ सब ठीक हो जायेगा. नन्हे की परीक्षाओं में मात्र दो हफ्तों का समय रह गया है, उसकी पढ़ाई ठीक चल रही है. शाम को जून और वह रोज टहलने जाते हैं, गुलाब वाटिका में नित नये गुलाब खिलने लगे हैं. आज लेडीज क्लब की एक सदस्या से बात की, शनिवार को वह और एक एक सखी उनके साथ ‘मृणाल ज्योति’ जायेंगे, जो विशेष बच्चों का एक स्कूल है. पिछले कई दिनों से सुबह डायरी खोलने का समय नहीं मिल पाता है. भागवद पढ़ रही है, सारा ध्यान कृष्ण की ओर लगा रहता है. नारद जी ने भक्ति पर कितने सुंदर श्लोक कहे हैं जो सभी की समझ में आ सकें ऐसी सरल भाषा में श्री प्रभुपाद जी द्वारा अनुदित हैं. भगवद की इतनी सुंदर टीका और नहीं मिलेगी. यथारूप भगवद गीता भी उसे डाक द्वारा मंगवानी है. जीवन के अनबूझ रहस्य जैसे सुलझते जा रहे हैं, इसमें अद्भुत ज्ञान छिपा है. कृष्ण उनके अंतर में परमात्मा रूप से विद्यमान हैं, यह ज्ञान आश्वस्त करता है. उन्हें मृत्यु से भी भयभीत होने की आवश्यकता नहीं क्योंकि गुणात्मक रूप से जीवात्मा और परमात्मा एक ही हैं, परमात्मा की शक्ति अपार है !

आवश्यकताएं कम हों तो जीवन सरल हो जाता है. आज बाबाजी खुदीराम बोस की बात बता रहे हैं. फांसी की सजा मिलने पर भी उन्होंने अपना पूर्व सहज हास्य स्वभाव नहीं छोड़ा. मान-अपमान, सुख-दुःख, हानि-लाभ के समय मन में समता बनी रहे तभी वे अपने सहज स्वभाव में रह सकते हैं. संसारी रसों का भोग करते-करते तन-मन क्षीण हो जाता है फिर भी वासना बनी रहती है, किन्तु ईश्वरीय रस का पान करने से शक्ति का अनुभव होता है और वासनाओं का नाश होता है. सुबह ‘जागरण’ में एक वेद मन्त्र का भाव सुना, देवताओं का आशीर्वाद उन्हें मिलता है जो सजग हैं, जागृत हैं, सचेत हैं, पल-पल सचेत रहते हैं. संसार की आसक्ति न रहे और ईश्वर के प्रति प्रीति बढ़ती जाये यही उनके जीवन का लक्ष्य होना चाहिए. जीवन भर मानव शरीर की देखभाल करता है पर अस्वस्थता से बचना मुश्किल है, जो वह वास्तव में है चेतन, मुक्त आत्मा..उसे कोई रोग नहीं व्याप्ता.
नुक्ते की हेर फेर से खुदा से जुदा हुआ
नुक्ते को ऊपर रख दें तो जुदा से खुदा हुआ

गुरू कितना अनमोल ज्ञान प्रदान करते हैं, जीवन में सद्गुरू नाव की पतवार की तरह है अन्यथा नाव को डूबने से कोई नहीं बचा सकता. ईश्वर उन्हें सही मार्ग पर लाने के लिए, उनके अहंकार को दूर करने के लिए सुख-दुःख के झूले में झुलाता है. वह जानता है उनके लिए क्या उचित है और क्या अनुचित ! वे अपनी सामान्य बुद्धि से ईश्वर को समझ नहीं पाते पर वह परमात्मा रूप में उनके भीतर है और पल-पल उनकी खबर रखता है ! दुनियादारी में आकंठ डूबा हुआ व्यक्ति यह विचार भी नहींकरता कि एक दिन यह दुनिया उसकी आँखों के सम्मुख नहीं रहेगी, मृत्यु का घना अंधकार जब चारों ओर छा जायेगा, शरीर शक्तिहीन हो जायेगा तब कृष्ण के सिवा और कोई साथ नहीं देगा !