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Thursday, April 16, 2020

चश्मे की कमानी


बागवानी का सब साजो-सामान तो आ गया है पर इंद्रदेव ज्यादा ही कृपालु हो रहे हैं आजकल, मौसम जब साफ होगा तभी क्यारियाँ बनेंगी. आज दोपहर एक सखी के यहाँ तीज की पूजा में गयी, प्रसाद बहुत स्वादिष्ट था. उसने बताया वे तीन परिवार भूटान की यात्रा पर जा रहे हैं. आज योग कक्षा में गुरूजी की पुस्तक से उनका सन्देश पढ़ा, “यदि तुम ध्यान नहीं कर सकते तो बेवकूफ हो जाओ “ सुनकर सभी साधिकाएँ हँसने लगीं. क्या इससे गुरूजी का तात्पर्य  है कि इस जगत में दो ही सुखी हैं, एक ध्यानी और दूसरा निपट गंवार. जो बुद्धिमान हैं उन्हें दुःख का अनुभव होगा ही. आज बहुत दिनों बाद छोटी बहन से बात हुई, उसने एक सुंदर गीत गाया व्हाट्सएप पर, सुबह नूना ने नृत्य किया, भीतर प्रसन्नता हो तो किसी न किसी तरह बाहर व्यक्त हो ही जाती है. भीतर स्थिरता का साम्राज्य दृढ हो रहा है, गुरु जी कहते हैं, मौन से ही उत्सव का जन्म होता है ! 

कल दिन भर कुछ नहीं लिखा. अभी सुबह के सवा आठ बजे हैं, जून से फोन पर बात हुई, वह टूर पर हैं. चश्मा टूट जाने की बात उन्हें बतायी। उन्होंने बिलकुल सही कहा, वह चश्मे को सावधानीपूर्वक नहीं रखती है. वह बहुत वस्तुओं का महत्व नहीं समझती है, उन्हें ‘टेकेन फॉर ग्रांटेड’ लेती है, पता नहीं हिंदी में इसे क्या कहेंगे. यह स्वभाव इतना ज्यादा बढ़ गया है कि वह सत्य को, परमात्मा को भी अपना सहज स्वभाव ही मानने लगी है. भीतर जाकर जिस मौन से मुलाकात होती है, आनंद व शांति का अनुभव होता है वह सत्वगुणजनित भी तो सकती है. परमात्मा तो अनंत है, वह इस छोटे से मन में कैसे समायेगा. जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति व तुरीय, इन चारों को देखने वाला जो आत्मा है, द्रष्टा है, उसमें टिकना है. वह इस समय हाथ से लिख रही है, आँख से देख रही है, यह जाग्रत अवस्था है. यदि लिखते-लिखते कोई भूत या भविष्य का कोई विचार आ जाये और वह उसी में खो जाये तो यह जाग्रत स्वप्न होगा. यदि यह कर्म भी न हो, चिंतन भी न हो तब जाग्रत सुषुप्ति भी घट सकती है और मन बिलकुल खाली हो तब चौथी अवस्था. स्वप्न में मन कैसे-कैसे दृश्य दिखाता है, कल रात्रि वह ध्यान करके सोई थी, एक स्वप्न में मछलियाँ व किसी के कटे हाथ देखे. एक दिन मछली का वीडियो देखा था, और उस दिन स्कूल में पढाते समय एक छात्रा के हाथ देखे जिसमें तीन उँगलियाँ जुड़ी थीं, शायद उसी का प्रभाव हो. सुबह टहलकर लौटी तो माली को बगीचे में सफाई करने को कहा, उसने फूलों वाले पेड़ की छंटाई कर दी, उसे डांटा. उस दिन एक सखी को जब अपने घर के भीतर और बाहर पेड़ कटने की बात से दुःख हो रहा था तो वह उसे समझा  रही थी कि चिंता न करे, पुनः डालियाँ हरी हो जाएँगी. ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’. कुछ देर पूर्व ही चश्मे की कमानी उसकी असावधानी से टूट गयी थी, वह पीड़ा शायद  क्रोध भरे शब्दों में व्यक्त हुई हो, ऊर्जा तो एक ही है उससे कोई भी काम लेना उनके हाथ में है. यदि वे जाग्रत हैं तब, स्वप्न में उन्हें अपनी ऊर्जा पर नियंत्रण नहीं रहता. सुषुप्ति में तो खुद का भी भान नहीं रहता. तुरीय में ऊर्जा अपने आप में ही विश्राम करती है. स्वयं को जानती है. 

कल रात सोने से पूर्व नाईट क्वीन फूल की तस्वीरें उतारी थीं, जिन्हें अभी फेसबुक पर पोस्ट किया. लोग इन तस्वीरों को देखकर प्रफ्फुलित हों इतना ही उद्देश्य है इन्हें प्रकाशित करने के पीछे. इसी तरह ब्लॉग्स पर पोस्ट लिखने के पीछे भी. लोगों को योग सिखाने के पीछे भी यही उद्देश्य है कि उनके जीवन में बदलाव आये, वे सकारात्मक बनें. अपनी भूलों को स्वीकारने की क्षमता उन्हें प्रभु दे तो वे भूलें उनके पथ का दीपक बन जाएँगी, वरना बार-बार वे उन्हीं भूलों को दोहराते रहेंगे. इसी लिए सन्त कहते हैं, भूलें तो करो पर नई-नई, पुरानी को ही न दोहराते रहो. कल शाम एओएल सेंटर गयी, अच्छा लगा, गणेश पूजा का उत्सव था, भजन गाये. दोपहर को घर पर उत्सव मनाया था. नैनी ने गणपति की मूर्ति का बहुत सुंदर श्रृंगार किया. बच्चे बहुत खुश थे, उन्हें प्रसन्न देखकर  उसे जो प्रसन्नता हुई, क्या उसके पीछे अहंकार था, नहीं, केवल परमात्मा का आनन्द था ! सुबह स्थानीय पूजा मण्डप में गयी, विशाल मूर्ति लगाई है वहाँ, बड़े-बड़े मोदक भी थे, सारा वातावरण उल्लासमय था, वहीं से उड़िया समाज की पूजा देखने गयी, पण्डित जी मन्त्र जाप कर रहे थे, जिन्हें सुनने वाला कोई नहीं था. कुछ देर बैठकर वह घर आ गयी. आज दस बजे बाजार जाना है, चश्मा बनवाने. आज हिंदी दिवस है. 

Monday, August 26, 2013

देवेगौड़ा जी का शासन



सुबह सोकर उठी तो मन में फिर वही बातें घूम गयीं, समूह गान तथा skit... कल दीदी का खत आया, बहुत अच्छा लगा उसे, बुआ जी के बारे में उनके विचार पढकर और भी अच्छा..बचपन की यादें कभी-कभी वर्तमान पर भी हावी हो जाती हैं.. सुबह गोयनका जी फिर समझा रहे थे, अनुभूति के स्तर पर किया गया दर्शन ही मुक्ति की ओर ले जायेगा. मानव के कर्मों का फल ही उसे निरंतर सुख या दुःख के रूप में मिलता है, दैहिक या वाचिक कर्मों का ही नहीं मानसिक कर्मों का भी क्यों कि हर क्षण मानव जो भी है अपने मन का प्रतिबिम्ब ही है, मन में कोई दूषित विचार आया नहीं कि दुःख का एक बीज रोपित हो गया. हमारे सारे सुख-दुःख परछाई की तरह हमारे साथ चलते हैं और उनका उद्गम है मन. आँखें बंद करती है तो स्वयं को एक उहापोह में घिरा पाती है, एक तनाव भी, जो इस कार्यक्रम की सफलता-असफलता को लेकर है और एक उलझन भी कि इस टीम वर्क में उसका कितना योगदान होना चाहिए. एक क्षण को यही लगता है कि सारी बागडोर अपने हाथों में संभाल लेना ही ठीक है या सिर्फ सुपरविजन ! देखें क्या होता है, मूक भाव से सारी घटनाओं का निरिक्षण व दर्शन करना भी तो उसके मन का काम है.

और कल उनकी skit हो गयी, उसकी एक भूल के कारण एक छोटा सा दृश्य नहीं हो पाया, जिसके लिए वह कल शाम से ही परेशान है, लगता है इस बार उन्हें पुरस्कार वितरण समारोह में जाने की जरूरत नहीं है, वैसे भी जून कल शाम को मोरान जा रहे हैं. नन्हा कम्प्यूटर क्लास में गया है. और कल शाम से अचानक शुरू हुई वर्षा के कारण उसका मन भी शांत है, आज से उसने घर की सफाई का काम भी शुरू किया है, खतों के जवाब भी देने हैं, आज बच्चे भी पढ़ने आएंगे यानि सारा दिन व्यस्त रहेगी जो ठीक ही है, जून की कमी उतनी नहीं खलेगी. कल शाम से एक विचार मन में यह भी आ रहा है कि प्रेम उसके जीवन से भाप बनकर उड़ गया है, जून के लिए या संसार में किसी के लिए भी. दो दिनों के लिए जून दूर गये हैं तो इसकी भी परीक्षा हो जाएगी.

जून का फोन आया तो वे सो ही रहे थे, उनके बिना न तो वे खाना ही ठीक से खा सके और नींद भी रात को खुलती रही. कल दिन भर की तरह आज भी टीवी पर अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष और विपक्ष में हुई बहस सुनी. बीजेपी और यूनाइटेड फ्रंट दोनों दो अलग-अलग ध्रुवों पर खड़े हैं और कोई भी दूसरे को समझना नहीं चाहता सिर्फ राजनीति के लिए राजनीति कर रहे हैं ये लोग, देश के लिए क्या अच्छा है यह नहीं सोचते. अब तक तो मतदान भी हो गया होगा और बीजेपी हार गयी होगी. देश में बहुत सारे लोगों के चेहरे उतर गये होंगे. जगजीत सिंह का कैसेट बज रहा है अभी तक एक साथ बैठकर पूरा नहीं सुन पाई है, उसने सोचा अब जून का इंतजार करते-करते सुनना अच्छा लगेगा.


कल जून पूरे छह बजे आये, INSIGHT पूरा सुन लिया सबसे अच्छे लगे दोहे और यह गजल, ‘’बदला न अपने आपको जो थे वही रहे...’’जून आए तो घर जैसे उत्साह से भर गया. आज दोपहर को वह ढेर सारा सामान ले आए उसके जन्मदिन के लिए और कल चप्पल भी लाये थे बहुत सुंदर चप्पल है अब उसके पैर उन निशानों से बच जायेंगे जो हवाई चप्पल पहनने से पड़ने लगे हैं. कल आखिर अटल बिहारी वाजपेयी जी को इस्तीफा देना पड़ा और अब देवगौड़ा जी को सरकार बनाने का निमन्त्रण दिया गिया है. १२ जून तक उन्हें सरकार बनानी है इस बीच में न जाने कितने मतभेद उभरेंगे. धर्मयुग में पढ़ा, इन्सान रोटी, पूजा और प्यार एक साथ चाहता है, सच ही है भोजन इन्सान की सबसे बड़ी जरूरत है और प्यार के बिना वह अधूरा है. श्रद्धा या पूजा इसे आदमी से इन्सान बनती है. श्रद्धा यानि अच्छाई के प्रति आस्था, उस परम शक्ति के प्रति आस्था जिसने इस सुंदर ब्रह्मांड की रचना की है. कल उसका जन्मदिन है पर जाने क्यों इस बार पहले की सी उत्सुकता या उछाह नहीं है, शायद बढ़ती हुई उम्र का तकाजा या..भय. उम्र मन की गिनी जाये तो अभी मन इतना तो बड़ा हुआ नहीं कि जन्मदिन की ख़ुशी मनाना ही भूल जाये.