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Thursday, August 22, 2019

बैलीनो कार ड्राइव



आज भी दिन भर व्यस्तता बनी रही. सुबह उठी तो सिर की चोटी पर हल्का सा दर्द था, पर देह पर सभी जगह सहजता थी, सो ध्यान वहीं ले गयी और दर्द का ख्याल जाता रहा. दोपहर को डिब्रूगढ़ में ब्रह्मपुत्र पर बने नये पुल को देखने वे गये. यात्रा अच्छी रही. वापसी में छोटे भाई का फोन आया, बुआ जी कोमा में चली गयी हैं, उन्हें मृत समझकर एक बार नीचे लिटा दिया गया था पर डाक्टर ने कहा, नब्ज अभी चल रही है. जीवन का अंत भी कितने विचित्र तरीकों से होता है. लौटकर वे तैयार हुए और एक परिचिता के यहाँ भोज आमन्त्रण में गये. उसकी माँ से खूब बातें हुईं, उसके पिताजी नब्बे वर्ष के हैं और उम्र के हिसाब से काफ़ी ठीक हैं. 

सुबह नींद देर से खुली, रात्रि को घर आते-आते साढ़े दस बज गये थे. मौसम गर्म था, और कमरे में एक मच्छर भी आ गया था, सो नींद आती-जाती रही. सुबह की दिनचर्या को नियमित रखा, रविवार होने के कारण जल्दी नहीं थी. नाश्ते में अखरोट, भीगे बादाम, खुबानी, और च्यवनप्राश के रूप में पौष्टिक आहार भी था. जून को बैलीनो कार की टेस्ट ड्राइव पर जाना था, जो वह बंगलूरू जाकर खरीदना चाहते हैं. वह अपनी पिछली यात्रा के दौरान ही खरीदना चाहते थे पर नन्हे ने मना कर दिया. आर्ट ऑफ़ लिविंग के दो टीचर मिलने आये तब वह वापस आ चुके थे. उन मित्र के घर गये जिनका सामान ट्रक में लोड हो रहा था, उसे भविष्य का वह दिन कल्पित हो आया जब उनका सामान भी इसी तरह चढ़ाया जा रहा होगा. तीन दशक के असम प्रवास के बाद वे जब यहाँ से जायेंगे तो कितनी स्मृतियाँ साथ ले जायेंगे. दोपहर को बच्चों की योग कक्षा थी, वे उत्साह से भरे थे, दो घंटे कैसे बीत गये पता ही नहीं चला. रात को सहजन के फूलों की सब्जी बनाई उसने. 

सवा दस बजे हैं सुबह के यानि प्रथम प्रहर बीत चुका है. सुबह अलार्म सुनाई दिया, पर बंद कर दिया, कुछ देर बाद कोई आवाज सुनाई दी, फिर दोबारा सुनाई दी और नींद खुल गयी. परमात्मा उनसे अकारण प्रेम करता है, प्रेम उसका स्वभाव है, उसके प्रति हृदय कृतज्ञता से भर गया. घूमने गये, सड़क भीगी हुई थी, रात को कभी पानी बरसा होगा. स्कूल से वापसी में उस सखी से मिलने गयी शाम को वे लोग जा रहे हैं, शाम को फिर उनसे मिलने जायेंगे, उसकी माँ के लिए खाना बनाकर ले जाना है. बाहर बिजली की तार बिछाने का कोई काम चल रहा है, नैनी की आवाज भी आ रही है, जितना धीरे वह यहाँ बोलती है उतना ही तेज घर पर बोलती है. कल शाम को घर में झगड़ा कर रही थी, मारपीट पर भी उतर आते हैं ये लोग, बाद में उसे बुलाकर समझाया और सबके लिए चाय बनाकर ले जाने को कहा. उनके जीवन में शांति और प्रेम के कुछ क्षण आएं, ऐसा उसका मन सदा ही रहता है. फोन नहीं चल रहा है कल से सो वाई फाई भी नहीं चल रहा है. फोन पर डाटा है सो ठीक है. अभी-अभी बुआजी को स्काइप पर देखा, वह शांत भाव से लेटी हैं, इस दुनिया में होकर भी यहाँ नहीं हैं जैसे. एक बार आवाज निकाली और मुंह बंद किया, उनकी श्वास चल रही है पर न बोल रही हैं, न ही सुन रही हैं. मृत्यु के कितने नये-नये ढंग हैं इस दुनिया से ले जाने के. शाम की योग कक्षा में आर्ट ऑफ़ लिविंग टीचर आई थी, कोर्स में भाग लेने के लिए कहने पर सभी साधिकाओं के साथ कोई न कोई समस्या है. जीवन उन्हें अवसर देता है पर वे व्यस्त होते हैं, उसने भी न जाने कितने अवसर गंवा दिए हैं. शायद जब तक सारे संयोग न मिलें, कोई कृत्य नहीं हो पाता. दोपहर को बहुत दिनों बाद ब्लॉग पर लिखा.


Tuesday, September 11, 2018

ब्रह्मपुत्र का पाट



पूरे पांच दिनों के बाद कलम उठायी है. परसों शाम इस समय वह गोहाटी के आर्ट ऑफ़ लिविंग आश्रम जा रही होगी, या हो सकता है पहुँच ही चुकी हो. तैयारी लगभग हो गयी है. आज ओडोमॉस भी मंगायी, जून ने कल याद दिलाया था. उनकी ट्रेनिंग अच्छी चल रही है. आश्रम का जीवन शांतिदायक होगा, चाहे आरामदायक न हो. अल्प साधनों में रहना सीखना हो तो आश्रम में ही सीखा जा सकता है. बंगलूरु में उनका घर सम्भवतः अगले तीन वर्षों में भी बनकर तैयार न हो सके तो वे आश्रम में ही रहेंगे, अवश्य वहाँ ऐसा कोई स्थान होता होगा, आखिर इतने बड़े आश्रम को चलाने के लिए कितने सारे लोग वहाँ रहते ही होंगे. अभी कुछ देर में सेक्रेटरी आएगी, क्लब का कुछ कार्य है. उसने एक सदस्या के बारे में बताया कि वह दुखी है, एक सीनियर सदस्या ने उसे कड़े शब्द कहे. इंसान का दिल बहुत कोमल होता है, फूल से भी नाजुक, जरा सी बात पर कुम्हला जाता है. आत्मा का अनुभव किये बिना मन को संभालना बहुत मुश्किल है, आत्मा के पास अपार शक्ति है. उस दुखी महिला को समझाना पर आसान नहीं है, वह भावुक है और ज्यादा सकारात्मक भी नहीं, काम बहुत मन से करती है. उसको फोन किया पर उसने उठाया नहीं. वह उसके लिए प्रार्थना ही कर सकती है.

आज दोपहर मृणाल ज्योति गयी, चाइल्ड प्रोटेक्शन कमेटी की मीटिंग थी. वापस आकर क्लब की कुछ सदस्याओं को फोन किये नयी कमेटी के कार्यकर्ताओं के चुनाव के लिए, कुछ मान गयीं, कुछ ने मना कर दिया. सेक्रेटरी भी कल कुछ अन्यों को फोन करेगी. सुबह जगने से पहले विस्मित कर देने वाला अनुभव हुआ, वह जिस वस्तु या जीव की कल्पना करती थी, वह प्रकट हो जाता था जैसे बिलकुल सजीव हो. उनके मन में कितनी शक्ति छुपी है. यह अनुभव रोमांचकारी था, पिछले दिनों और भी कई विचित्र अनुभव हुए, पर लिखे नहीं और अब याद नहीं हैं. बड़े भाई का स्वास्थ्य अब ठीक है, पर उन्हें कमजोरी है. जून अपने प्रशिक्षण से प्रसन्न हैं, नन्हे ने भी एक ट्रेनिंग ली कि लोगों को कैसे नियुक्त किया जाये. बिना ट्रेनिंग के वह कितने ही कालेजों में कम्पनी के लिए छात्रों का इंटरव्यू लेने गया है. कह रहा था, इस ट्रेनिंग से काफी सुझाव मिले हैं. वह भी एक किताब पढ़ रही है जो एक ट्रेनर ने लिखी है, इस तरह वे तीनों ही कुछ नया सीख रहे हैं. अभी वह रसोईघर में गयी और नैनी को फ्रिज में बर्फ की ट्रे रखते देखा, इसका अर्थ हुआ उसने बिना कहे फ्रिज से बर्फ निकाली, अवश्य ही वह अपनापन महसूस करती होगी. उसने सोचा, अच्छा है.

इस आश्रम में यह पहली रात है. पिछले माह जब यहाँ के स्वामीजी उनके स्थान पर गये थे, तब इस कोर्स के बारे में पता चला था, पर अभी तक ज्ञात नहीं है कि कल सुबह कोर्स आरंभ भी हो पायेगा या नहीं. कम से कम बीस प्रतिभागियों के होने पर ही होगा और आज की तिथि में केवल ग्यारह ही हैं. टीचर भी कोलकाता से आई हैं. उसकी पीठ में शायद दिन भर में एक भी बार न लेटने के कारण दर्द हो रहा है. कुछ पंक्तियाँ लिखकर सोना ही अगला कार्य है. सुबह सवा नौ बजे वह घर से निकली थी, दोपहर सवा दो बजे गोहाटी में रहने वाली एक सखी के यहाँ पहुंच गयी, दोपहर का भोजन और कुछ देर विश्राम के बाद पौने चार बजे वहाँ से विदा लेकर इस आश्रम में पहुंची. यहाँ पर सब सुविधाएँ हैं पर गर्मी के कारण तथा उस समय बिजली न होने के कारण कुछ देर परेशानी हुई. आसपास का दृश्य बहुत सुंदर है. कल प्रातःकाल और तस्वीरें लेगी. ब्रह्मपुत्र का चौड़ा पाट सागर सा विस्तीर्ण लगता है. शाम को सभी ने मिलकर गुरूजी का जन्माष्टमी के अवसर पर सीधा प्रसारण देखा, फिर भोजन किया. बाद में मंदिर में कृष्ण पूजा हुई, प्रसाद भी मिला.

सुबह के सात बजे हैं. एक सुहावनी सुबह है. वह आश्रम के कमरे में है. बहर वर्षा हो रही है. सुबह पांच बजे ही नींद खुल गयी. स्नान किया, फिर कुछ देर टहलने गयी. तब वर्षा नहीं थी. कुछ देर नदी की तरफ मुख करके एक कुर्सी पर बैठकर ध्यान किया. बहुत अच्छा अनुभव था. जून से बात की, अब कुछ देर में रूद्र पूजा में भाग लेने मन्दिर जाना है.

Wednesday, March 28, 2018

ब्रह्मपुत्र की कहानी



दोपहर का भोजन आते ही मिल गया, हल्का-फुल्का शाकाहारी भोजन स्वादिष्ट था. उसके बाद उन्होंने स्थानीय दर्शनीय स्थलों के बारे में जानकारी हासिल की, सौभाग्य से यहाँ के वर्तमान संसद सदस्य वहीं थे, वे नये वर्ष पर उसी रिजॉर्ट में पार्टी आयोजन करने के सिलसिले में बात करने आये थे. उन्होंने ‘सैली लेक’ तथा ‘नेहरु उद्यान’ देख आने के लिए कहा. रोइंग से छह किमी दूर स्थित ‘सैली झील’ हरे-भरे वृक्षों तथा पहाड़ियों से घिरी है. झील के चारों ओर सुंदर भ्रमण पथ बने हैं. तस्वीरों में उसकी सुन्दरता को कैद किया और कुछ देर वहाँ रुकने के बाद वे नेहरु उद्यान पहुंचे, जो एक विस्तृत इलाके में फैला है, बच्चों के लिए झूले, ग्रीन हॉउस तथा फूलों के बगीचे और विशाल पेड़ों से सजा यह उद्यान सुबह-शाम घूमने वालों के लिए आदर्श स्थान है. लौटे तो नदी किनारे जाकर कुछ तस्वीरें लीं शाम ढलने को थी, डूबते हुए सूर्य को प्रणाम करते हुए वे कमरे में  लौट आये.

जिस कमरे में बैठकर वह लिख रही है, उसके फर्श पर बेंत से बनी सुंदर चटाई बिछी है. दीवारें तथा छत भी लकड़ी तथा पतले बांस की बनी हैं. लकड़ी की ही शय्या है, दरवाजे से बाहर निकलते ही एक बड़ा सा अहाता है, जिसका फर्श भी लकड़ी का है. कुछ ही दूर पर भोजनालय है और दायीं ओर एक नदी बहती है. सामने ऊंचे पहाड़ हैं. इस कैम्प तक पहुंचने से कुछ कदम पहले ही यहाँ के भूतपूर्व मुख्यमंत्री तथा वर्तमान सांसद श्री मुकुट मिथि का बंगला है, जो शानदार है. अभी कुछ देर पहले वे  उनके निमन्त्रण पर एक कप कॉफ़ी पीने गये. उनकी मेहमाननवाजी का लुत्फ़ उठाया, वे सरल स्वभाव के हैं तथा उन्हीं की तरह उनकी पत्नी भी बहुत गर्मजोशी से मिलीं. वे मिशिमी जन जाति के हैं, इस जाति की भी तीन उपजातियां हैं, जिनके लोगों की पहचान पारंपरिक वस्त्रों के रंगों से होती है. घर की साज-सज्जा पारंपरिक व आधुनिक वास्तुकला का मेल थी. देश के कई भूतपूर्व कांग्रेसी नेताओं के चित्रों को वहाँ देखा. घर के पिछले भाग में एक बड़ा सा हॉल था, जहाँ  बीचोंबीच व्यवस्थित ढंग से आग जल रही थी, छत से लटकता हुआ एक बांस का बना चौकोर तख्ता देखा, जिस पर महीन बेंत की चटाई लगी थी, जो धुंए को अपने में समा लेता है. फर्श पर भी चटाइयां बिछी थीं. कई बेंत के मूढ़े पड़े थे. उन्होंने बताया, उनके गाँव में हर घर में एक ऐसा स्थान होता है, परिवार का मुखिया उस स्थान पर बैठता है. दायीं तरफ पंक्तिबद्ध उसकी घर की महिलाओं के कमरे होते हैं. यहाँ पहले बहुपत्नी प्रथा थी. सभी महिलाएं अपने-अपने यहाँ पकाए भोजन को वहाँ लाकर रख देती हैं तथा सब मिलकर भोजन ग्रहण करते हैं. उन्होंने अरुणाचल के इतिहास व भूगोल के बारे में उनके साथ रोचक वार्तालाप का आनन्द लिया. ब्रह्मपुत्र के जन्म तथा परशुराम कुंड से जुड़ी पौराणिक कथाएँ भी उन्होंने सुनायीं. एक बार ऋषि शांतनु व उनकी पत्नी पुत्र प्राप्ति के लिए तप कर रहे थे, प्रसन्न होकर जब ब्रह्मा जी वर देने आये तो ऋषि वहाँ नहीं थे. उनकी पत्नी ब्रह्मा जी के चार मुख देखकर भयभीत हो गयीं. पुत्र का जन्म हुआ पर वह द्रव रूप में था, जो ब्रह्मपुत्र नद कहलाया. परशुराम ने जब पिता के कहने पर अपनी माता का सर काटा तो परशु उनके हाथ से अलग नहीं हो रहा था, वे इस स्थान पर आये जहाँ ब्रह्पुत्र का बहाव रुक हुआ था, उस पर्वत पर प्रहार करने से उनका परशु विलग हो गया. एक पंजाबी संत की कथा भी उन्होंने सुनाई जो घूमते हुए यहाँ आ गये थे. सदियों से यहाँ भारत के दूर-दूर स्थानों से साधू-संत आते रहे हैं. भारत एक अनोखी संस्कृति वाला देश है और देश की एकता के सूत्र हर क्षेत्र में बिखरे हुए हैं.  कल उन्हें ‘मायोदिया’ देखने जाना है जो आठ हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित एक दर्रा है.

शाम के पांच बजे हैं. वे अभी-अभी अपने कैम्प में आये हैं. बेंत की चटाइयों से बनी दीवारों वाला यह कमरा आज की रात भी उनका निवास स्थान है. सुबह पांच बजे नींद खुली. बाहर अँधेरा था. वायदे के अनुसार यहाँ काम करने वाला एक किशोर दो बाल्टी गर्म पानी ले आया. यहाँ काम करने वाले तीनों किशोर पढ़ाई भी कर रहे हैं, सुबह का काम निपटा कर वे स्कूल चले जाते हैं, दोपहर बाद फिर से आ जाते हैं. साढ़े सात बजे वे भोजन कक्ष में नाश्ते के लिए पहुंचे. ठीक आठ बजे मायोदिया के लिए रवाना हुए जिसके आगे ‘हुलनी’ नामक स्थान है. रोइंग मात्र सोलह सौ फीट की ऊँचाई पर है. मात्र सत्तावन किमी की यात्रा में उन्हें साढ़े छह हजार फीट की ऊँचाई पर पहुंचना था. रास्ता मनोरम था किन्तु रोमांचक भी. ऊंचे-ऊंचे पेड़ों से घिरे पहाड़ तथा गहरी घाटियाँ. नीली-हरी पर्वतों की श्रंखलायें अपनी ओर बुलाती प्रतीत होती थीं. काफी जगह सड़क टूटी हुई थी, सड़क निर्माण का कार्य चल रहा था. मील के पत्थरों पर तिवारी गाँव का नाम पढ़कर उन्हें थोडा अचरज हुआ. पता चला कि वास्तव में ऐसा कोई गाँव नहीं था, पर एक जगह तिवारी नाम का एक व्यक्ति जो सड़क  निर्माण के कार्य में नियुक्त था, वर्षों तक रहा, उसी के नाम पर उस स्थान का यह नाम पड़ गया.



Monday, September 25, 2017

बड़ा पानी -उमियाम झील


कल शाम चार बजे वे गोहाटी पहुँचे थे. शाम को बाजार गये फिर एक मित्र परिवार से मिलने. रात्रि भोजन भी वहीं किया. आज सुबह ब्रह्मपुत्र के किनारे टहलने गये. नदी के तट पर कई वृक्ष लगे थे, वर्षों पुराने वृक्ष बहुत सुंदर थे पर किनारा टूटा-फूटा था और स्वच्छता का बहुत अभाव था. सड़क के दोनों किनारों पर फूलवालों की कई दुकानें लगी थीं. होटल लौटते समय फल मंडी से होते हुए आये. लौटकर स्नान, नाश्ता आदि कर नौ बजे ही गणेश गुड़ी स्थित पासपोर्ट दफ्तर के लिए रवाना हुए, जहाँ उसे अपने पासपोर्ट का नवीकरण कराना था. वहाँ काफी भीड़ थी पर उन्हें दस बजे से पहले ही बुला लिया गया. तीन भागों में सारी कार्यवाही पूरी हुई, दफ्तर में सभी कार्य काफी व्यवस्थित ढंग से हो रहे थे. साढ़े ग्यारह बजे तक सब काम हो गया. बाजार से असम सिल्क के कुरते के लिए वस्त्र खरीदा. दोपहर बाद पुनः उन्हीं मित्र के यहाँ गये, शाम को जून अपने एक सहकर्मी के घर ले गये. जिनका पुश्तैनी मकान काफी बड़ा है, तथा एक पहाड़ पर बना है. खेती भी है, उनके भाई-भाभी तथा भतीजों से मिलना हुआ. स्वादिष्ट नाश्ता करके वे होटल आ गये हैं. कल सुबह शिलांग के लिए निकलना है. कल वे चेरापूंजी जायेंगे.


‘नार्थ इस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी’ (नेहू) के पुराने गेस्ट हॉउस के वीआईपी कक्ष ‘संख्या-एक’ में बैठकर डायरी लिखने का सम्भवतः यह पहला और अंतिम अवसर है. आज सुबह ही गोहाटी से शिलांग के लिए बल्कि कहें चेरा पूंजी के लिए रवाना हुए. मेघालय और असम काफी दूर तक साथ-साथ चलते हैं, सड़क के मध्य जो विभाजक है उसके बायीं तरफ असम है और दायीं तरफ मेघालय है. असम की सीमा समाप्त होते ही पहाड़ी रास्ता आरम्भ हो जाता है. सडकें ऊंची-नीची हो जाती हैं तथा चीड़ के वृक्ष दिखने लगते हैं. मार्ग में उमियाम या बड़ा पानी नामक एक सुंदर झील पर रुककर कुछ तस्वीरें उतारीं. यह दस वर्ग किलोमीटर क्षेत्र वाली अति विशाल कृत्रिम झील है, जहाँ बिजली का उत्पादन भी किया जाता है. 

चेरापूंजी में प्रवेश करते ही दृश्य पटल बदलने लगा, रास्ता अच्छा था. गाड़ी तेज रफ्तार से चल रही थी. एक तरफ घाटियाँ दिखने लगी. पहाड़ों की ढलान जो मीलों तक नीचे गयी थी, घने जंगलों से ढकी थी. दूर के पर्वत नीले लग रहे थे और उनके पीछे धुंध थी. धूप तेज थी. आगे चलकर झरने देखे तथा प्राकृतिक गुफाएं भी, जो बहुत विचित्र हैं. इनके भीतर वर्षा के जल के निरंतर गिरने से पत्थरों ने जाने कितने वर्षों में टूटकर विभिन्न आकर ग्रहण कर लिए हैं. उनमें प्रवेश करके आड़े-तिरछे रास्तों से गुजरकर बाहर आना एक रोचक व रोमांचक अनुभव था. गुफाओं से लौटकर एक शुद्ध शाकाहारी रेस्तरां ओरेंज कंट्री में भोजन किया. भोजन बनाने वाली महिला थी तथा परोसने वाली भी सभी महिलाएं थीं. वे लगातार उस स्थान को साफ करने में लगी थीं. शिलांग के लिए वापसी की यात्रा में एक अन्य झरना दिखा, जो दूर से दिखाई दे रहा था. काफी ऊँचाई से गिरता हुआ वह नीचे घाटी में मीलों दूर गिर रहा था. शिलांग के सुंदर दृश्यों को देखते हुए वे नेहू वापस आ गये हैं. यह कैम्पस भी बहुत सुंदर है. चीड़ के जंगलों के कारण इसकी सुन्दरता और भी बढ़ जाती है. कल वे शिलांग लेक, लेडी हायड्री पार्क, गोल्फ कोर्स आदि देखने जायेंगे. डॉन बोस्को संग्रहालय भी देखने लायक स्थान होगा. आज नन्हे से बात हुई, उसने एक मित्र के साथ घर लेने का निर्णय किया है.