Showing posts with label अतीत. Show all posts
Showing posts with label अतीत. Show all posts

Tuesday, June 9, 2020

अतीत और वर्तमान


वर्तमान के इस छोटे से क्षण में अनंत छिपा है, जिसने इस राज को जान लिया, वह मुक्त है. मन सदा अतीत में ले जाता है, या भविष्य की कल्पना में, वर्तमान में आते ही वह मिट जाता है. उसे टिकने के लिए कोई आधार चाहिए, वर्तमान का क्षण इतना छोटा है कि उसमें कोई शब्द नहीं ठहर सकता, मन शब्द के सहारे ही जीवित रहता है. उस पुरानी डायरी में पढ़ा, वह फिर कड़वा बोली, कितनी बार कहा है खुद को, अपने तुर्श मिजाज को बदले, उसे पछताना पड़ेगा. जितना कम बोलेगी उतना सही बोलेगी, जितना ज्यादा बोलेगी उतना गलत बोलेगी. जहाँ जानकारी न हो या कोई मतलब न हो वहाँ रहकर चल रहे वार्तालाप में भाग लेने की क्या जरूरत है, अन्य की बातों में दखल देने में क्या तुक है ? कालेज में जब एक खाली पीरियड था, वह कुछ लिख रही थी, उसके हाथों और आँखों की गतिविधियों को देखकर एक छात्रा ने अनुमान लगा लिया कि वह उनके बारे में कुछ लिख रही है. उसने कालेज के कार्यक्रम में कविता पाठ किया है सो इतना तो वे जानती हैं कि उसे लिखने का शौक है. वह उसके निकट आकर वही सब कहने लगी जो पहले भी दो छात्राएं कह चुकी हैं, फिर यह कि मैथमैटिशियन हैं, दिमाग चढ़ा हुआ है. वह चुपचाप सुनती रही. मन में एक नाम कौंध गया, उसका नाम लेते ही उसकी सारी परेशानियाँ दूर हो जाती हैं, क्या जादू है उसके नाम में या उसके नाम के प्रति उसकी आस्था में. आस्था सिर्फ नाम में है उसमें नहीं पर यह कौन मानेगा ? वह कविता उसने एक छात्रा को दे दी, पता नहीं उसे कैसी लगेगी. अपनी एक प्रिय सखी को देती तो प्रतिक्रिया उसके अनुकूल होती, वह तो मिली नहीं जिसके लिए लिखी थी. कोई एक ऐसा वाक्य लिखने का मन होता है जिसमें उसकी सारी भावनाएं समा जाएँ और वह वाक्य सुकून भी दे - तुम्हारी आँखें हर वक्त मुस्कुराती क्यों हैं ? 

मन ही वह राक्षस है जिसका दमन करके पुरुष  अवतारी कहलाये, मन ही वह मार है जिसका सामना बुद्ध ने किया. मन के अनुसार नहीं चलना है, उसको उसका सही स्थान दिखाना है. एक साधक यदि मनमुख होकर जीता है और अपने विवेक का अनादर करता है तो उसे साधक कहलाने का अधिकार नहीं है. मन को मारना आत्मा को जगाना है. कल रात्रि पुनः वही स्वप्न देखा, ‘वह कौन है’ इसका उत्तर जिसमें मिला. स्वप्न शुरू होता है तो वह एक पार्टी में है, जून की कोई ऑफिशियल पार्टी है. साथ में बड़ा भांजा भी है. उसके पास एक बैज है जिसे वह लगाना चाहती है, पर वह जून का है और वह लगाना नहीं चाहते. फिर अचानक वर्षा होने लगती है. वह उठ जाती है. और बाहर निकल आती है. कुछ दूरी पर ही कुछ महिलाएं बैठी हैं, जहाँ जाना है पर रास्ता कच्चा है और ढलान है. वह उतरती है तो कुछ पत्थर भी गिरने लगते हैं, पर सुरक्षित पहुँच जाती है. वर्ष संभवतः रुक गयी है, आगे चल पड़ती है, आगे रास्ता चौड़ा है और सुनसान है. काफी दूर निकल जाने के बाद लौटने का मन होता है तो सड़क पर आते वाहन दिखते हैं, बड़े-बड़े वाहन गुजर जाते हैं फिर एक बड़े से रथ पर कृष्ण और अर्जुन की मूर्ति दिखाई देती है. एक दूसरे विशाल रथ में केवल कृष्ण की. फिर आवाज आती है, माँ, माँ, माँ, माँ  और नींद खुल जाती है. माँ की ध्वनि इतनी तीव्र और स्पष्ट थी, मधुर थी. वह किस  की आवाज थी, वर्षों पहले भी किसी ने माँ कहकर उसे जगाया था. यशोदा का अर्थ है दूसरों को यश देना, जो उसे अच्छा लगता है. 

कालेज से लौटने पर पहला काम जो उसने किया वह था पुनः जून के उस पत्र को पढ़ना, जो बहुत प्रतीक्षा के बाद मिला था. हर बार पढ़ने पर नया लगता, उसने कहा है, फालतू बातें मत सोचा करे ! मन लगाकर पढ़े, यही तो उससे होता नहीं. प्रयत्न करेगी.  स्टीवेन्सन की उस कहानी के पात्र की तरह वह किन्हीं अदृश्य हाथों द्वारा संचालित होती है. डायरी में पेज के ऊपर लिखा आज का वाक्य है ‘निष्क्रियता मनुष्य के लिए अभिशाप है’ अभी नजर गयी उस पर, वह भी उसे समझा रहा है. आज सुबह कालेज जाते समय दो छोटे बच्चों की बातें कानों में पड़ गयीं, आपकी नाक कितनी लम्बी है, आपके बाल कितने घुंघराले हैं ! और वह बच्चियां .. आओ दीदी, झूल लो, फिर वह छोटी लड़की... यह लड़की हँसती जा रही है. बस में भिखारी बच्चा उसके घुटने को छूकर पैसे मांगने लगा ... यह सब बच्चे उसे कभी -कभी बहुत उदास कभी बहुत खुश नजर आते हैं. उसे बच्चों को देखकर लगता है, अभी स्पंदन है, धरती जीवित है... जीवन है ... सारिका का स्मृति विशेषांक मिला, पूरा तो नहीं पढ़ा है पर जितना पढ़ा बहुत अच्छा लगा. काफी दिनों बाद सारिका का साहित्यिक, आध्यात्मिक तथा सांस्कृतिक रूप देखने को मिला. 



Friday, December 15, 2017

अतीत का गौरव


दोपहर के तीन बजने को हैं. आज सुबह उठी थी पौने चार बजे, पर जून कल शाम थके थे, सोचा उन्हें थोड़ी देर सोने दे, पाँच मिनट में उठती है, पर नींद खुली पूरे एक घंटे बाद. दो स्वप्न देखे, एक में तो घर में चोर आ जाते हैं. ड्रेसिंग टेबल का शीशा तथा दो चादरें गायब हैं, फिर कुछ लोग भी दीखते हैं, एक चोर भी है उनमें. खुद का ही सपना है सो चोर के मुँह से ऐसे वाक्य निकलते हैं कि उनके द्वारा उसकी चोरी पकड़ ली जाये. एक स्वप्न में गुरू माँ के आश्रम में गयी है. वहाँ कुछ महिलायें हैं, फिर एक दुर्घटना देखी. एक कार उलट जाती है साईकिल से टकरा कर. अपना ही सपना था सो किसी को चोट नहीं आती. जब सपना खुद ही बनाया है तो सकारात्मक ही होना चाहिए. इसी बात से सिद्ध होता है कि God loves fun. उनकी आत्मा, जहाँ से ये स्वप्न आते हैं, कितनी हास्य पसंद है. वह उन्हें जगाना भी चाहती है, झकझोर भी देती है पर डराती भी नहीं. वे कितनी गहरी नींद में हैं कि उस वक्त जान नहीं पाते, यह तो स्वप्न ही है. अभी दोपहर को भी एक स्वप्न देखा. यह भी उठाने के लिए ही था. ओशो कहते हैं योगी स्वप्न नहीं देखता, वह विचारों से भी मुक्त है. व्यर्थ का चिन्तन न हो तो न ही व्यर्थ के स्वप्न आएंगे, न ही व्यर्थ की ऊर्जा समाप्त होगी. रात्रि सोने तक छह घंटे उसके पास हैं, इस समय का सदुपयोग हो सके ऐसा प्रयत्न करना होगा. दो घंटे पढ़ने-लिखने में, एक भोजन बनाने-ग्रहण करने में, एक व्यायाम-टहलने में तथा एक टीवी व ‘भारत एक खोज’ देखने में. सभी कुछ करते हुए मन सदा ही उस ‘एक’ से जुड़ा रहे, इसका भी ध्यान रखना है.

शाम के छह बजे हैं, लग रहा है भीतर से कोई देख रहा है प्रतिपल. कितनी शांति है उसके पास और कितना विश्वास.. एक आश्रय स्थल सा अथवा माँ की गोद सा, लगता है मन घर आ गया है. मन पाए विश्राम जहाँ, वही तो है वह स्थल, उसे अस्तित्त्व कहें या परमात्मा, वह दोनों ही है, वह सभी कुछ है. सभी कुछ उसी से जो प्रकट है. आज सुबह समय से उठे वे, टहलने गये, वर्षा रात भर होकर थम चुकी थी, फिर स्नान आदि करके नाश्ता. जून ने दोपहर को विशेष व्यंजन बनाया. बड़े भाई से बात हुई, वह काफी खुश हैं, छोटा उनके साथ रह रहा है. उनके जीवन में एक परिवर्तन आया है. मंझले भाई-भाभी दुबई गये हैं. पिताजी व दोनों ननदों से भी बात हुई. दोपहर को बच्चों की संडे कक्षा, अभी सांध्य भ्रमण करके वे लौटे हैं.

आज शाम को क्लब में ‘पीकू’ है, वे जायेंगे देखने. सुबह की साधना में एक अद्भुत अनुभव हुआ. वह ‘एक’ उससे मिलने आया था. कल सुबह स्कूल गयी, गर्मी थी पर बच्चों ने ख़ुशी-ख़ुशी योगासन किये. उसके बाद उन्हीं शोकग्रस्त परिचिता के यहाँ गयी, उसके भाई से भी मिली और जेठानी से भी. उसका पुत्र भी था और बाद में उसने कहा, आते रहिये. उसके वृद्ध पिता से बात हुई. वह तीस साल पहले रिटायर हुए थे. जीवन के प्रति कितना उत्साह है उनमें अब भी. अटल जी को जानते थे, असम के पहले गवर्नर को भी. आजादी से पहले की बातें कर रहे थे. सुचेता कृपलानी और अरुणा आसफ अली की बातें. आर एस एस को मानते हैं. चेहरे पर एक चमक है और अतीत का बखान बहुत चाव से करते हैं. शिलांग में काम किया फिर वहीं बस गये. शिलांग के सिन्धी जनों से भी परिचय है और पार्टीशन की बातें भी करते हैं. अपने दामाद को याद करते समय सामान्य रहे, स्वीकार कर लिया है उसकी मृत्यु को जैसे सहजता से. एक दिन फिर जाएगी वहाँ. कल चोल वंश के राजा राज राजेश्वर की कहानी देखी ‘भारत एक खोज’ में. कैसा विचित्र युग रहा होगा तब, जब मन्दिरों का निर्माण राजाओं का एक महत्वपूर्ण कार्य था.


Monday, June 5, 2017

आंवले की डाल


छोटे भाई का फोन आया था परसों रात सोने से पूर्व, छोटी बुआजी जो दो वर्ष पूर्व घर से चली गयीं थीं, उनकी खबर मिल गयी है. वह बंगलूरू स्टेशन पर थीं, जब पुलिस द्वारा टाइम्स ग्रुप के करुणा ट्रस्ट में पहुंचायी गयीं और वहाँ उनका मानसिक इलाज होता रहा. जब उन्हें अपने घर की याद आयी तो वहाँ के लोगों ने लखनऊ पुलिस से सम्पर्क किया और आज सुबह वे घर आ गयीं. उनका पुत्र उन्हें लेने गया था, वह जहाँ नौकरी करती थीं उस दफ्तर के लोगों ने  सहायता की. नन्हे ने उनसे बात की पर मिलने नहीं जा सका. कल सुबह उसने हिटलर की आत्मकथा पढनी शुरू की है, अभी तो रोचक लग रही है, देखे, क्या मनोदशा है उसकी, परमात्मा किससे क्या करवायेगा, कौन जानता है. हरेक को पूर्णता की ओर जाना है. जिस क्षण भी कोई अपूर्णता का अनुभव करता है वही क्षण उसे चुभन देता है. भूत में जिस क्षण उन्होंने अपूर्णता का अनुभव किया है, वे सारे क्षण उनके मन पर संचित हो गये हैं, उन सबका भार उठाए वे आगे बढ़ते हैं, बढ़ते क्या हैं, घिसटते हैं. उन्ह किसी से कुछ कहना था, पर कह नहीं पाए तो एक भार सिर पर बैठ गया. वे चाहें तो इसी क्षण में पूर्ण हो सकते हैं, हल्के और खाली, क्योंकि वे सारी घटनाएँ जैसी घटनी थीं, घट चुकी हैं. दीदी से बात की, वह भी यही कह रही थीं, एक ही चेतना  है सबमें जो विभिन्न नाम रूपों के द्वारा काम करवा रही है. वह परसों आस्ट्रेलिया जा रही हैं, अब शायद वहीं से अगली बात हो.

जून कल दोपहर गोहाटी चले गये. दोपहर को वह क्लब के काम से बाहर गयी और शाम को मीटिंग में, लौटने में पौने नौ बज गये थे. इसी माह क्लब की पत्रिका निकलेगी, उसके लिए एक नाम का चुनाव करना है. ऐसा नाम जो क्लब की सदस्याओं में जोश भी भरे और कुछ नया करने का जज्बा भी. बगीचे में आंवले के पेड़ की एक बड़ी डाल टूट कर गिर गयी थी कल रात की आंधी में, उसे साफ करवाया. आज फिर दीदी से स्काइप पर बात हुई, वह अभी देहली में हैं, बड़ी बेटी के यहाँ गयी थीं, उनकी दोहती को देखा, उसके लिए एक कविता भेजी, बहुत प्यारी है वह. जून परसों आ रहे हैं. नन्हे से पूछा उसने, कैमरे से वीडियो टीवी पर कैसे देख सकते हैं, उसने जो बताया वह काफी आसान था. उसे पिताजी का एक वीडियो एक सखी को दिखाना है. आज भी तेज वर्षा हो रही है. उसने भीगी-भीगी सी एक कविता लिखी, जो ब्लॉग पर डाल रही है. कल ईद है, वे सेवइयां बनायेंगे.   

जून आज वापस आ गये हैं, घर जैसे भर गया है. ढेर सारे फल, टिंडे, नींबू, सूखे मेवे, कुकीज और उसके लिए नये कंगन लाये हैं अपने साथ. नन्हे का एक सूटकेस यहाँ पड़ा था, जिसकी चाबी उसने खो दी थी. जिसे पिछले महीने खुलवाया था. उसके कालेज के फोटो, ग्रीटिंग कार्ड्स आदि उसमें पड़े हैं और कुछ चिठ्ठियाँ भी. हर व्यक्ति का अपना एक अतीत होता है. हर व्यक्ति अपने भीतर कितना कुछ छिपाए रहता है. उसने भी खुद को पहचाना है, कितना कुछ अनुभव किया है और आज जो भी है वह उन्हीं का परिणाम है. वह बहुत संवेदनशील है, बहुत स्नेह भरा है उसके भीतर पर साथ ही सबसे अलग भी, एक वैराग्य की भावना भी है. उसका जन्म जिन परिस्थितियों में हुआ, बचपन में उसे जैसे संस्कार मिले, उसी के अनुसार ही तो वह बड़ा हुआ. वे स्वयं ही जब आवेगों के वशीभूत थे, अपना ही पता नहीं था तब उन्होंने उसे बड़ा किया. उसके दुःख उनके ही हैं. हर आत्मा अपनी यात्रा कर रही है. वह कुछ संस्कार अवश्य ही पूर्व जन्म के लाया होगा लेकिन वे उनके सजातीय होंगे तभी तो वह उनके जीवन में आया. अच्छा है कि अब वह सजग है, अब उसके जीवन में ऐसी कोई बात नहीं है जो उन्हें ज्ञात नहीं है.