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Tuesday, May 20, 2014

माटी की महक से उगती कविता



It is a warm pleasant morning, she has done all morning chores and has half an hour to think and write. Life is going on smoothly, all seems to be well and as per planned. Yesterday in the meeting  went to the mike and sang four lines of one Assamese song which she had learned last year for chorus competition. She was testing herself and one friend said it was not bad, enjoyed the rangoli competition also, which was well arranged.  Today while ironing the idea of publishing her book of of poems came to her mind. She has to select, refine and arrange them which are in different diaries. Books are her real friend and to own self written book would be a great thing.  

जीवन की छोटी-छोटी खुशियों, सफलता और आशाओं के हिंडोले में झूलता मन संतुष्ट प्रतीत होता है. करने को इतना कुछ है, खोजने को, देखने को, ढूँढने को, महसूस करने को और सजाने-संवारने को, पढने-लिखने को, गुनने और गुनगुनाने को कि किसी और बात की ओर ध्यान नहीं जाता, राजनीति, अख़बार की सुर्खियाँ व्यर्थ लगती हैं, धर्म के नाम पर जाति के नाम पर हिंसा के अतिरिक्त ये राजनेता समाज को क्या देते आ रहे हैं ?

उस क्षण से वह बात उसके मन में मंडरा रही है, अपनी उस तथाकथित मूर्खता पर मन कभी चिढ़ता है कभी हँसता भी है, लेकिन एक पल के लिय भी भूलता नहीं, हो सकता है कुछ देर और सताये फिर अपने आप ही किसी कोने में थक कर बैठ जाये आखिर कितनी देर उछले-कूदेगी. रह-रह कर जो कचोटता है वह उसकी चेतना है या उसकी भीरुता, कुछ समझ में नहीं आता, क्यों अपनी ही समझ से परे हो गयी है, उसे वह करना उचित था या नहीं स्वयं ही इसका फैसला करने में असमर्थ है, इसे ही विडम्बना कहते हैं सो उसने तय किया इसका फैसला वक्त पर छोडती है. आज भी कल का सा वक्त है, कल शाम कम्प्यूटर पर एक कविता लिखी और एक(वही जिसको लेकर मन में इतनी उथल-पुथल मची है) रिकार्ड की. आज बहुत दिनों बाद टीवी पर एक साहित्यिक कार्यक्रम देखा. हिंदी के समालोचक डा. नामवर सिंह के साथ एक कविताओं की किताब( कवि कुमार अंजुम या ऐसा ही कुछ नाम था) पर एक चर्चा थी, ‘झूठ का संसार’ और ‘हारमोनियम की दुकान से’ दो कविताएँ सुनीं. कवि का मुख्य स्वर मुक्त होने की आकांक्षा है, सीधे सपाट शब्दों में उसने भी मुक्ति की आशा व्यक्त करती एक कविता लिखी थी जो इस बार की क्लब मैगज़ीन में छपी है.

जनवरी विदा लेने को है, नया साल आया और एक महीना सौगात में दे गया. कल रात वर्षा हुई, सुबह उठे तो मिट्टी की सोंधी महक पूरे वातावरण में व्याप्त थी, एक तरफ सूरज भी चमक रहा था वहीं बादल भी गरज रहे थे, पर अब चारों ओर शांति है. हल्की सी धूप है. The meaning of culture में culture and poetry पढ़ रही थी, जीवन में कविता तत्व का होना भी सुसंकृत होने का प्रमाण है. रोजमर्रा के जीवन में कई ऐसे अनुभव होते हैं, ऐसे दृश्य दीखते हैं जिनमें कविता छुपी होती है, पतझड़ के पीले झरे पात, काले बादलों की ओट से झांकता रक्तिम रवि, घास में खिला एक अकेला पुष्प और इन सबसे प्रभावित होता संवेदनशील मन व नयन. कोई नया विचार, विचार भी विचार को जन्म देता है. कल एक परिचिता घर आयीं जो पिछले एक साल से कह रही थीं, उन्हें कुछ हिंदी गाने और गजलें लिखवानी थीं, कैसेट दे गयी हैं. रोचक काम है !

एक शीतलता से भरा रविवार का दिन.. उसने वही नई ड्रेस पहनी है जो पिछले हफ्ते स्वयं सिली थी. एक नई पुस्तक भी पढ़नी शुरू की है, The diary of a young girl by Anne Frank. बहुत रोचक किताब है. नन्हा अपने इम्तहान की तैयारी में व्यस्त है. जून टीवी पर शबाना आजमी की एक नई फिल्म देख रहे हैं, ‘बड़ा दिन’. बीच-बीच में वह भी देख लेती है.





Tuesday, March 25, 2014

बुद्ध पूर्णिमा का अवकाश


तीन दिन बाद नन्हे को कविता पाठ प्रतियोगिता में भाग लेना है, अभी तक उसने याद नहीं की है, लेकिन वह जानती है आधे घंटे में ही याद कर लेगा, उसकी स्मरण शक्ति अच्छी है. उसका एक मित्र कविता पाठ की तैयारी में नूना से सहयोग लेने आया है, हिंदी जानने वाली महिला के रूप में उसका नाम थोड़ा बहुत लोग जानने लगे हैं. आज वह कम्प्यूटर से सीखी रेसिपी के अनुसार कढ़ी बनाएगी, उन्हें एक सीडी निशुल्क मिला है, ‘कम्प्यूटर एट होम’ जिसमें कई भारतीय व्यंजन है. कल से जून ने उसे कम्प्यूटर पर काम करना सिखाना शुरू किया है. आज दोपहर लंच पर एक मित्र परिवार आ रहा है, वे लोग ट्रेन से दोपहर एक बजे तक पहुंचेंगे. आज सुबह वे छह बजे उठे, पहले ट्रांजिस्टर पर समाचार सुने फिर star पर निनाद  सुना और फिर ‘जी इंडिया’ पर सन्त वाणी सुनी. भारत के कण-कण में, जन-जन के मन में उपनिषदों की वाणी का प्रचार, प्रसार है. यह कोई रहस्य नहीं रह गया है, न ही कभी था, कि मानव का शरीर प्रतिक्षण बदलता रहता है, किन्तु भीतर कुछ है जो कभी नहीं बदलता, वही आत्मा है, और वही परमात्मा का अंश है.

नौ बजने को हैं, पिछले दो दिनों की हलचल के बाद आज घर शांत है, कल ‘बुद्ध पूर्णिमा’ के कारण नन्हा और जून दोनों की छुट्टी थी. शाम को वे क्लब गये extempore speech में नन्हे ने भाग लिया पर कविता पाठ में नहीं ले पाया. बहुत देर हो चुकी थी, और उन दोनों को नींद आने लगी थी. सुबह स्कूल भी जाना है यह कहकर जून थोड़ा नाराज होकर उन सबको घर ले आये, वह भी ठीक से सो नहीं पायी, नन्हे ने तैयारी की थी पर भाग नहीं ले पाया इसी बात का दुःख अलग-अलग तरीके से तीनों ही महसूस कर रहे थे. पर सुबह वे सामान्य थे. उस दिन क्लब से ‘अनिता देसाई’ की एक किताब लायी थी, आधी पढ़ ली है, अच्छी है पर कड़वी सच्चाईयों से भरी हुई, इस दुनिया में हरेक को अपना बोझ स्वयं उठाना पड़ता है. सभी को सहारा नहीं मिलता.

कल बहुत दिनों बाद चचेरे भाई-बहन का पत्र मिला, अच्छा लगा, आजकल पत्र आना एक दुर्लभ घटना हो गयी है. अभी कुछ देर पहले फिर से पढ़ा कि मानव अपने शुद्ध रूप में आत्मा है और सर्वशक्तिमान परमात्मा से अलग नहीं है किन्तु अहम् का पर्दा होने से वह इस संबंध को पहचान नहीं पाता, ध्यान का अभ्यास भी किया पर गहराई तक नहीं पहुंच सकी. अच्छी बातें जो सुनने और पढ़ने में अच्छी लगती है उनका चित्रण साहित्य में किस तरह कर सकती है. जीवन के शाश्वत मूल्यों का चित्रण बिना किसी आडम्बर और शब्दजाल के, स्वाभाविक रूप से. देसाई की किताब के दो पात्रों तारा और विमला में से वह स्वयं को तारा के निकट क्यों पाती है, जबकि वह  किसी भी तरह से आगे नहीं है, कमजोर, डरी-डरी, लाचार, किसी न किसी पर आश्रित अपनी इस छवि से उसे बाहर निकलना ही होगा.


कल से उसे जुकाम ने जकड़ा हुआ है, बदन में हरारत सी महसूस हो रही है, नाक लाल हो गयी है, आँखें भारी सी हैं पर इन सबके बावजूद उसकी जीवनी शक्ति ज्यों की त्यों बरकरार है, यानि अपने रोजमर्रा के कार्यों को करने का उत्साह भी है और इच्छा भी. यह बात अलग है कि थोड़ा धीरे-धीरे ही कर पा रही है. अपनी छात्रा को कम्प्यूटर पर science encyclopedia दिखाया, नये स्वीपर से बाहर का नाला साफ करवाया, वह काम करना ही नहीं चाहता, दीनदास नाम है और शरीर भी मजबूत है पर थोड़ा आलसी है, सभी उतना ही काम करना चाहते हैं जितना करने भर से काम चल जाये. आज सुबह समाचार नहीं सुन पायी. परमाणु विस्फोटों के खिलाफ किस देश ने क्या कहा और कितने प्रतिबन्ध लगाये, आजकल यही तो होता है. कल शाम वे एक मित्र के यहाँ गये वहाँ उनकी अमीर दीदी के किस्से सुनकर (हजारों रूपये के गहने-कपड़े) कैसा तो लगा, वह  कल यूँ ही जुकाम से परेशान थी, फिर बाल भी धुले नहीं थे, साड़ी भी पुरानी पहनी थी. खैर कपड़ों से ही कोई अमीर नहीं बन जाता है, उसे अपनी अच्छी साड़ियाँ संभाल कर रखने के बजाय  पहननी चाहियें इतनी सीख तो मिली. आज मौसम यूँ तो गर्म है पर उसे पंखे की आवश्यकता महसूस नहीं हो रही है शायद हरारत की वजह से. उनके पेड़ में छोटी छोटी अम्बियाँ लगी हैं, एक दो तोड़कर शाम को चटनी बनाएगी, पुदीना भी अभी हरा है और हरी मिर्च के पौधे भी भरे हुए हैं. यानि सभी कुछ ताजा और शुद्ध...