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Sunday, November 25, 2012

युद्ध की अनिवार्यता...?



मौसम बेहद ठंडा है, दस डिग्री होगा तापमान, दोपहर को नन्हे को सुलाते सुलाते उसे भी नींद आ गयी, सुबह अमृता प्रीतम की नई किताब ‘कोई नहीं जानता’ पढ़ती रही, उसे लगा इस कहानी पर टीवी सीरियल बनाया जा सकता है. पत्र लिखने का काम शुरू नहीं हो पाया. पहले पड़ोस की एक माँ-बेटी मिलने आयीं, जिन्हें चिवड़ा-मटर खिलाया उसने फिर शाम को उसकी छात्रा आ गयी, जून के न रहने पर सोनू बार-बार कुछ न कुछ पूछने या उसके पास आ जाता था . दोपहर को बहुत दिनों बाद उसने पंजाबी कढ़ी बनायी दही वाली, ठीक सी ही थी पर बहुत अच्छी नहीं. पंजाबी गीत भी सुने उसने बहुत मीठे हैं, गजलें अभी ध्यान से सुनी ही नहीं, यूँ ही काम करते करते ...कुछ खास नहीं लगीं..शायद शब्दों को ध्यान से सुनकर अर्थ समझे तो ज्यादा लुत्फ़ आए.

जून ग्यारह बजे आए, उससे पूर्व वह अपने दायें तरफ वाली पडोसिन से आज सुबह हुए दुखद हत्याकांड पर बात कर  रही थी. जून भी इसी कारण आये थे. असम के भूतपूर्व मंत्री के भतीजे के घर जाकर गोलियों से निर्मम हत्या, राष्ट्रपति शासन होते हुए भी सम्भव हो पाई. लेकिन हत्यारे पकड़े जायेंगे, बचेंगे नहीं. आतंकवाद कितनी गहरी जड़ें जमा चुका है हमारे देश में, निर्दोष लोगों की हत्या..? आज नेता जी का जन्मदिवस है, कहाँ हैं उन जैसे लोग, आज तो अपने ही लोगों पर गोली चलाने वाले क्रान्तिकारी कहलाते हैं.  उसके सामने यहाँ यह दूसरी हत्या है, घर में जाकर पत्नी के सामने पति को गोलियों का शिकार बनाना..कैसे पत्थर दिल होते हैं वे लोग..कैसा करुण चीत्कार होगा उस महिला का जिसकी आँखों के सामने उसका जीवन नष्ट हो रहा हो. आज और कुछ भी लिखने का मन नहीं करता, जून आते समय अस्पताल से देखकर आए, सर के पीछे से खून तब तक निकल रहा था. खून कितना सस्ता हो गया है, कब बंद होगा यह सिलसिला. लड़ाईयां बढती जा रही हैं. इसराइल स्कड मिसाइल से किया हमला कितना निर्मम है. अमेरिका के बम भी बगदाद में कितनो की जानें ले चुके होंगे और सिपाही.. उनके तो जन्म ही शहीद होने के लिए हुए हैं.

बहुत दिनों के बाद आज वे लोग पैदल शाम को सात बजे के बाद घर से निकले. जून कर तलप में ही छोड़ आए हैं, सर्विसिंग करानी है. निकट ही एक कन्नड़ परिवार के यहाँ गए, उन्हें बैठे हुए दो मिनट भी नहीं हुए थे कि सामने नारियल के लड्डू और नमकीन रख दी उन्होंने, अपना-अपना रिवाज है. लड्डू अच्छे बने थे, गृहणी कुछ दिनों बाद घर जा रही हैं, शायद ले जाने के लिए बनाये होंगे.

उसने फिर सिलाई-कढ़ाई के अधूरे काम को छोडकर एक और किताब पढ़ी, ‘आक के पत्ते’, उसके गौतम का दुःख आँसू बनकर उसकी आँखों से बहने लगा था. कितनी गहरी चोट लगी थी उसको...इतनी चोट खाए बिना कोई कैसे लिख सकता है वह सब, जरूर अमृता प्रीतम ने भी ऐसी ही पीड़ा को सहा होगा. उसकी जिंदगी में तो सुख ही सुख चाहा है उसने..सुख, आराम, सुविधा,...मन की शांति, स्थिरता..थोड़ी सी भी पीड़ा उससे सही नहीं जाती...पर कभी कभी थोड़ा सा भी दुःख विशाल लगने लगता है उसके साथ भी यही हुआ है. कई बार ऐसा हुआ है..अब भी तो बीती कड़वीं बातें सोचने बैठ जाये तो मन कैसा रोना-रोना हो जाता है. जब याद ही इतनी तकलीफदेह है तो..उस समय क्या स्थिति रही होगी.



प्रिय ब्लॉगर साथियों,  मैं बनारस व बैंगलोर की यात्रा पर जा रही हूँ, अब दिसंबर के तीसरे सप्ताह में मुलाकात होगी. आने वाले वर्ष के लिए तथा क्रिसमस के लिए अग्रिम शुभकामनायें...