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Monday, March 10, 2014

असम स्टाइल का घर


सच्ची ख़ुशी का राज है सृजन, कल शाम उसने इस वर्ष की अपनी पहली कविता लिखी..और लग रहा है असीम सम्भावनाओं के द्वार खुल गये हैं, आज प्यार की सच्ची परिभाषा पढ़ी जहाँ कोई प्रतिदान चाहता है वहाँ व्यापार होता है और जब किसी का मन अपनी ख़ुशी के लिए किसी अन्य पर निर्भर करता है तो वह आजाद नहीं है, वह प्रेम नहीं कर सकता. यह खुबसूरत दुनिया और इसमें बसने वाली हर शै से हमें प्यार तो करना है पर उन पर निर्भर नहीं होना है. आत्मनिर्भरता ही निडरता को जन्म देती है, जब हम किसी पर निर्भर नहीं रहेंगे तो भयभीत होने की भी जरूरत नहीं, एक नाजुक बेसहारा, कमजोर आश्रित होकर जीने से कहीं बेहतर है मजबूत आत्मशक्ति के साथ जीना, क्योंकि वह शक्ति कहीं बाहर से मिलने वाली नहीं है, हमारे अंदर ही मौजूद है. जगत में सच का सामना करते हुए निर्भयता पूर्वक अपनी बात कह देने का आत्मविश्वास लिए जीना ही सही मायनों में आजाद होकर जीना कहा जायेगा. आज सुबह हिंदी कक्षा में ‘वियोगी हरि’ का एक निबंध पढ़ा, ‘विश्व मन्दिर’ फिर IGNOU में एक अफ्रीकन लेखक का साक्षात्कार सुना/देखा. लेखक अपने समाज की विसंगतियों, विषमताओं, कलह तथा अराजकता के प्रति सचेत होता है, लोगों का ध्यान इनकी ओर दिलाना तथा उनको दूर करने के उपाय सुझाना भी उसीका काम होता है. अपने परिवेश तथा समाज, राष्ट्र में चल रही गतिविधियों के प्रति जागरूक होता है और अनुभव करने की उसकी शक्ति तीव्र होती है. वह बदलाव को भी भांपता है और ठहराव को भी. कवि बनने का उसका स्वप्न भी एक दिन पूर्ण होगा !

कल रात भीषण वर्षा हुई, आंधी और तूफान के साथ, एक बार तो बिजली इतनी जोर से कड़की की उनकी नींद टूट गयी, लगा जैसे पास ही में कहीं बिजली गिरी हो. उसके बाद जो नींद आई, एक स्वप्न देखा जिसमें उसे बिजली का करेंट लग जाता है. सुबह आधा घंटा देर से आँख खुली. कल शाम एक मित्र के यहाँ गये, वे लोग जैसे उनका इंतजार ही कर रहे थे, चेहरे बदल जाते हैं लेकिन कोई न कोई ऐसा परिचित परिवार सदा रहा है जहाँ उनका दिल से स्वागत होता है. वहाँ से हँसते-हँसाते लौटे तो रास्ते में ही मूसलाधार वर्षा शुरू हो गयी, एक भीगते हुए परिचित को लिफ्ट भी दी. समाचारों में उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में आये तूफान के बारे में सुनकर प्रकृति की भीषणता और शक्ति का अहसास होता है, प्राकृतिक आपदाओं के सामने मानव विवश है. यहीं आकर उसे ईश्वर की याद आती है, इस विशाल ब्रह्मांड में अपनी तुच्छ स्थिति का बोध होता है. किन्तु मानव ने भी प्रकृति के आगे हार न मानने की कसम खायी है, उन्हीं तटवर्ती इलाकों में जहां तूफान आते हैं, लोग फिर भी बसेंगे. कल दिन भर लिखने-पढने में व्यस्त रही, अरुंधती राय की किताब रोचक है, आराम से पढ़ रही है, उसका बचपन पढ़ते-पढ़ते अपना भी याद आने लगता है.
   
पिछले दो दिनों में कितना कुछ घट गया, नन्हे को वे परसों दिगबोई ले गये. लंच उन्होंने दिगबोई के Blw No २६ में किया. असम स्टाइल का खूबसूरत लकड़ी का दुमंजिला घर, खुले-खुले कमरे, ड्राइंग रूम से आगे काफी खुला बरामदा ऊपर, बेडरूम से थोड़ा नीचे उतर कर बाथरूम, सामने सुंदर लॉन और कई वृक्ष. ऊँचाई पर स्थित इस बंगले में घुमावदार मार्ग से आना पड़ता है. दिगबोई वाकई सुंदर जगह है. डीपीएस स्कूल भी काफी अच्छा लगा, बगीचा है, सुन्दर फूल-पौधे हैं, कक्षाओं में रंगीन फर्नीचर है, डेस्क ऐसे हैं जिसके अंदर बच्चे अपना बैग रख सकते हैं. नन्हे का टेस्ट अच्छा हो गया, वह खुश था पर थोड़ा परेशान भी. कल वे सुबह-सवेरे ही दिगबोई चले गये, दोपहर को लौटे, नन्हे का दाखिला भी हो गया. कल रात को चोर फिर आए थे, गाड़ी की बैटरी चोरी करने, पर बोनट में चेन बंधी होने के कारण काट नहीं पाए. जून बेहद परेशान हैं, नन्हा अलग परेशान है कि उसे सेंट्रल स्कूल छोड़कर नहीं जाना है, उसे समझाना आसान कार्य नहीं है. उसे रोज इतना सफर करके पढ़ने जाना होगा, वह पता नहीं किस बात घबरा रहा है. बच्चे खुलकर अपने मन की बात बता भी नहीं पाते, शायद सभी चीजों का मिलाजुला असर हो. उसका मेडिकल checkup भी आज होना है और फोटो भी खिंचानी है. इस वक्त जून उसे लेकर अस्पताल गये हैं.


Sunday, June 17, 2012

हँसता शिशु


सुबह के साढ़े सात बजे हैं, नन्हे को अभी कुछ देर पूर्व ही सुलाया था पर दादी ने उसे उठा दिया है. बस अब दो ही दिन तो रह गए हैं उन्हें वापस जाने में, चाहते हैं कि वह अधिक से अधिक जगता रहे.  रात से ही वर्षा हो रही है. कल रात सोने से पूर्व उसने जून से कहा था कि रात को वह न जगा करे, शिशु के उठने पर वह खुद ही सम्भाल लेगी, उसकी नींद पूरी नहीं हो पाती, वह तो दिन में किसी भी समय सो जाती है. कल बड़ी बुआ का एक अच्छा सा पत्र मिला. यह पेन जिससे वह लिख रही है जून ने उसे उपहार में दिया था उनके विवाह के अवसर पर, कुछ दिन खराब रहकर यह पुनः लिखने लगा है अपने आप.
कल सुबह से ही उसकी मनःस्थिति ठीक नहीं थी जिसका असर शायद अब तक है, अक्तूबर से ही उन्होंने पैसे इकठ्ठे करने आरम्भ किये थे, वह चाहती थी कि उसके खुद के नाम से एक पासबुक हो, माना कि वह अभी तक सब आवश्यक वस्तुएं ले आया है पर उसे स्वयं के आत्मनिर्भर न होने का दंश तो चुभ ही रहा है. पिछले कई महीनों से वह जून को नए कपड़े लेने के लिये कह रही है पर वह उसे टाल जाता है. उसे आश्चर्य भी होता है कि धन के बारे में उसके विचार ऐसे थे उसे खुद भी पता नहीं था.
सब लोग चले गए हैं, घर पर वे तीनों रह गए हैं. नन्हें को ठंड लग गयी लगती है, उसके गले से खर-खर आवाज आ रही थी, और उसके पेट से भी आवाज आ रही थी, छोटा सा तो है वह और इतनी सारी मुसीबतें. हँसता है तो बहुत प्यारा लगता है. अगस्त के दूसरे हफ्ते में जून के इम्तहान  हैं, ऑफिस से आकर उसका ज्यादातर समय बच्चे के साथ ही बीतता है. आज से उसे पढ़ाई में ज्यादा समय देना है, वह तो सम्भाल ही सकती है उनके बेटे को.