Monday, August 5, 2013

सपनों का ताजमहल



....और कल शाम बस स्टैंड पर बेहद प्रतीक्षा करने के बाद जून आ गये, नन्हे ने दूर से ही देख लिया था, बढ़ी हुई दाढ़ी मैले कपड़े और सफर की थकान, उसने आते ही मौन में ही उससे बात की, उनके एक मित्र भी वहीं थे, उन्हीं की कार से वे लोग गये थे बाद में नहा-धोकर जब वे बाथरूम से निकले तो पहले से नजर आने लगे छलकती हुई मुस्कान के साथ. इस बार भी वह  उनके लिए ढेर सारे उपहार लाये हैं, अपने लिए प्याजी रंग की ऊन जो पहली नजर से देखने पर उसे उतनी अच्छी नहीं लगी पर अब पसंद आ रही है. नन्हा अपना स्कूल बैग पाकर खुश है. घर कैसा भरा-भरा लग रहा है. काम भी जैसे बढ़ गया है, अब उसे समय बिताने के तरीकों के बारे में नहीं सोचना होगा, हर वक्त वे साथ जो होंगे.
आज शाम जब वे टहलने गये तो जून ने सुझाव दिया, सूरत वे नहीं जा रहे तो आगरा ही चलते हैं, ताजमहल देखने की उसे बरसों से तमन्ना है. नन्हे को भी बहुत अच्छा लगा, उसने अभी-अभी ताजमहल के बारे में काफी कुछ पढ़ा है. साथ ही देहरादून जाने पर एक दिन के लिए मसूरी भी जाया जा सकता है.
फरवरी का प्रथम दिन. जून ने फोन किया वह गैराज जाने के कारण देर से आएंगे. धूप बहुत तेज है सो वह खिड़की के पास वाली कुर्सी पर कमरे में ही बैठी है. जैसा कि संदेह था वह आंवले वाला बूढ़ा आज नहीं आया और अभी-अभी उसने पड़ोसिन से उसके माली से बात करने के लिए कहा है. परसों दीदी का पत्र आया था, उन्होंने लिखा है घर में चोरी की बात सुनकर उन्हें अपना आत्मनिर्भर न होना खल रहा था. वह लिख रही थी कि अचानक कानों को चुभने वाला तेज शोर शुरू हुआ और लगभग ५-७ मिनट तक जारी रहा, एक अजीब सी कैफियत थी, और अब वह शोर थम गया है, नन्हा गेट तक देखने गया आकर बताया, गैस को लीक किया जा रहा था. कुछ देर बाद फिर से शोर आने लगा.
 आज उसने लाहौर रेडियो से गजलें सुनी, तो.. टीवी पर रेडियो का भी आनन्द लिया जा सकता है. इस वक्त धूप में बैठे हुए जब बीच-बीच में ठंडी हवा का झोंका आकर सहला जाता है तो हल्की ठंडक का अहसास होता है. कल इतवार था, दोपहर को थोड़ी देर फिल्म देखी, शाम को ब्यूटी पार्लर गयी, एक मोटी सी लडकी थी वहाँ, उसके चेहरे पर एक अच्छा सा भाव था जैसे पुरानी जान-पहचान हो, पार्लर वाली सभी लडकियों के चेहरे पर एक अलग ही भाव होता है, जैसे देखते ही सब जानना चाहती हों. वहाँ से वे एक मित्र के यहाँ गये जहाँ उनके एक मित्र मिले, बता रहे थे, सुबह पांच बजे उठ जाते हैं, ७ बजे तक बेटा पढ़ाई करता है, नन्हा सुबह उठकर पढ़ाई नहीं कर पाता, पर आज समझाने पर थोड़ी देर की. अचानक वह पंछियों की आवाजें सुनने लगी और दस मिनट तक वही सुनती तरही, लॉन में झाडू लगाती नैनी की बेटियों की आवाज भी आ रही थी, वे दोनों कल रात भर अपनी सहेली के यहाँ रहकर आई हैं, कल शाम से उनकी माँ परेशान थी.

अभी कुछ देर पहले सुबह के काम खत्म हुए थे कि ध्यान आया, एक सखी से बात कर ली जाये, उसने कल शाम अपने बगीचे से पत्ता गोभी भिजवाई थी. वह एक सुलझी हुई पढ़ी-लिखी अच्छी मित्र है, उसके साथ कभी नाराजगी या गलतफहमी होने का डर नहीं है. कल शाम बहुत दिनों बाद असमिया सखी से भी मिली, लेकिन जैसी उम्मीद थी, वह इतने दिन न मिलने पर नाराज होगी, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, शायद उसने भी यह मूलमंत्र समझ लिया है कि अपेक्षा ही दुःख देती है. कल सुबह खत लिखने बैठी ही थी, जून आ गये वह छोटी बहन का पत्र लाये थे, पढ़कर अच्छा नहीं लगा, रिश्तों के कारण कितना खिंचाव हो सकता है इस जगत में. जून भी थोड़ा परेशान हो गये. मार्च में उनके घूमने जाने के कार्यक्रम के बारे में सोचकर, वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे उन्हें अपनी ओर से हर परिस्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए और अपने कार्यक्रम को दर्शनीय स्थानों को देखने तक ज्यादा केन्द्रित रखना चाहिए न कि रिश्तेदारों से मिलने तक. एक तटस्थता बनाये रखकर अपने उन स्वप्नों को सच होते देखना चाहिए जो ताजमहल और मसूरी की कल्पना में उन्होंने देखे हैं. माँ-पापा तो यकीनन उन्हें देखकर प्रसन्न होंगे ही...इतना ही पर्याप्त है.






1 comment:

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