Thursday, April 28, 2016

इंटरनेट की दुनिया


एक शिष्य के जीवन में दो ही ऋतुएं होती हैं, एक जब वह सद्गुरू की निकटता का अनुभव करता है और दूसरी जब वह उनसे दूरी का अनुभव करता है. आजकल उसके जीवन में दूसरा मौसम चल रहा है, लेकिन उनकी ‘कृपा’ असीम है कि वह उसे इस ऋतु में नहीं देखना चाहती, वह पुनः उसी निकटता का अनुभव कराना चाहती है, जिसे पाकर उनके भीतर एक प्रेम की लहर दौड़ जाती है. आज भी सद्वचन सुने थे, खुदा का अर्थ है जो खुद आये, उन्हें केवल इंतजार करना है. काल के दायरे में रहने पर मन उन्हें इस दुनिया में खींच कर ले जाता है, पर उन्हें काल से परे उस देश में जाना है, जहाँ आनन्द का मौसम है. उस दुनिया में उड़ान भरने के लिए वे उन्हें बार-बार बुलाते हैं. उनकी पुकार को वे अनसुनी कर ही नहीं सकते, इतनी शिद्धत से वह उन्हें पुकार रहे हैं.

‘मेरो मन अनत कहाँ सुख पावे, जैसे उड़ि जहाज को पंछी पुनि पुनि ताते आवे’ उसके मन की भी ऐसी ही दशा है आजकल. पुण्य उदय होते हैं तो भीतर प्रकाश छा जाता है, गुरु की कृपा का अनुभव होता है. उसकी आध्यात्मिक यात्रा भी बीच में ही दम तोड़ देती यदि कृपा ने पुनः हाथ पकड़ कर न उठा लिया होता. साधक थोड़े से अनुभव पाकर ही स्वयं को ज्ञानी, ध्यानी समझने लगता है. उसे लगता है अब गुरू की क्या आवश्यकता, भीतर से आनंद मिलने लगता है तो वह सोचता है अब स्वनिर्भर हो गया, पर उसे पता नहीं कि उसकी सामर्थ्य ही कितनी है, तत्वज्ञान हो जाने पर भी उसमें टिके रहना सरल नहीं. पूर्वजन्मों के संस्कार कब प्रकट हो जाएँ. उसे पिछले दिनों अपनी कमियों का अहसास कई तरह से हुआ. उसका ज्ञान अल्प है, तुच्छ है, अधूरा है. उसकी भाषा भी संयत नहीं है और उसका समाज के लिए कोई योगदान भी विशेष नहीं है. ऐसे में व्यर्थ ही स्वयं को विशेष मानने की भूल करना अहंकार ही तो है. ध्यान में कई अच्छे अनुभव हुए हैं पर अभी यात्रा बहुत शेष है, अभी तो वे कुछ भी नहीं जानते, कल क्लब की अध्यक्षा ने उसे क्लब की तरफ से मृणाल ज्योति का संयोजक नियुक्त किया, उनसे मिलकर कार्यों की जानकारी लेनी होगी.


गुरु माँ गा रही हैं, ‘प्रभो जी मोरी विनती सुनो’, इंटरनेट पर उनका भजन सुन पा रही है. गीता पर उनका प्रवचन भी उपलब्ध है. नन्हे का कम्प्यूटर कल ठीक हो गया, वह मानसिक रूप से परिपक्व है पर अपने स्वास्थ्य तथा नींद का ख्याल नहीं रखता. उसे उसने कहा, child is the father of the man यह कहावत उसने सिद्ध कर दी है. कल पिता जी से बात हुई, उन्होंने उसकी किताब पूरी पढ़ ली है, उन्होंने कहा कि यह किताब उसने दिल से लिखी है, कुछ दिनों से कुछ नया नहीं लिखा. आज बहुत दिनों बाद कायोत्सर्ग ध्यान किया. सद्गुरू को भी सुना वह कह रहे थे भीतर जो अधूरापन, तलाश जारी है वह साधक को जड़ नहीं बैठने देती, वह उसे आगे बढ़ने को प्रेरित करती है, प्रभु अनंत है, उसका ज्ञान अनंत है, उसे जानने का दावा करने वाले वे उसकी शक्ति का एक कण भी तो नहीं है, प्रेम की एक बूंद भी तो नहीं हैं और ज्ञान की बस झलक भर ही तो पायी है, इसलिए साधक बार-बार उड़ान भरता है और अनंत आकाश की एक झलक पाकर उसे लगता है कि कुछ मिला तो थोड़े दिन बाद फिर कुलबुलाहट होने लगती है कि कुछ और है जो अनजाना है, कि वे तो कुछ जानते ही नहीं !

Wednesday, April 27, 2016

पहला Gmail अकाउंट


आज ‘विश्व विकलांग दिवस’ है. सुबह नौ बजे वह मृणाल ज्योति गयी और साढ़े बारह बजे लौटी. ढेर सारे फोटोग्राफ और वीडियो उतारे. बच्चों ने अच्छा कार्यक्रम प्रस्तुत किया. उनके आयारूम में रहने वाली नैनी का विकलांग पति आज अस्पताल में एडमिट है. कुछ देर पहले नन्हे ने G Mail में उसका अकाउंट खोला है. जून तीन दिनों के लिए छुट्टी पर हैं, पर किसी काम से दफ्तर गये हैं. आज सुबह उसने कैलेंडुला की बची हुई पौध लगायी. इस साल गुलदाउदी के फूल की बहार अभी तक नहीं आयी है. अभी तक आज का ध्यान नहीं हुआ है. पिछले कई दिनों से किसी न किसी कार्यवश ध्यान का क्रम टूट गया है. आजकल कभी-कभी लगता है जैसे वह कुछ भी नहीं जानती. न बोलना, न विचारना, न पढ़ना. जो कुछ भी आज तक जानती थी वह सारा का सारा भूल गयी है. साधना करना भी नहीं भाता अब, न घंटों संतों की वाणी सुनने का पहले का सा आकर्षण शेष है. लगता है जैसे जिसे यह सब करने का शौक था जब वह मन ही नहीं रहा. जिसे जानने के लिए करना था, वह तो स्वयं वह ही है. भीतर गहरी शांति है जब यह ध्यान भी हट जायेगा कि साधना नहीं की, जब प्रकाश, प्रवृत्ति या मोह होने पर भी साक्षी भाव ज्यों का त्यों रहेगा, तब तत्वज्ञान में दृढ़ता सिद्ध होगी, अथवा तो तब ये सब होंगे ही नहीं, कौन जानता है ?

बहुत सारे कार्य एकत्र हो गये हैं, जिनकी सूची बना ली जाये तो निपटाना आसान होगा. कुछ काम उसके हैं, कुछ घर के, कुछ बगीचे के, कुछ इधर-उधर के, अंततः सारे काम उसी परम प्रिय परमात्मा के हैं जो उनका सखा होकर उनके भीतर विराजमान है. ‘मन के पार’ को भेजना है, कहाँ भेजे पता भी लगाना है. ‘नार्थ-ईस्ट’ पर निबन्ध पूरा करना है. ‘दक्षिण भारत की यात्रा’ का संस्मरण पूरा  करना है. ‘मोरान’ पर लेख लिखना है. घर में एक होल्डर लगवाना है. दरवाजे की चौखट पर वार्निश करवानी है. पर्दे ठीक करने हैं. पुराने वस्त्र निकाल कर देने हैं. बगीचे में एक गड्ढा बनवाना है. सफेद कुशन धुलवाने हैं. गमलों में नई मिट्टी भरवानी है. गुलाब में रोज फूड डलवाना है. नई क्यारी बनवा कर कॉर्न फ्लावर की पौध लगानी है जो बड़ी हो गयी है. मृणाल ज्योति की उस आया को पुराना बिस्तर भेजना है. उनके पास ऊर्जा है, समय है, साधन है, पर वे उसका उपयोग नहीं करते, अपनी क्षमताओं की कीमत नहीं जानते. उनका ढेर सारा समय यूँ ही चला जाता है. भीतर कैसी उथल-पुथल मच जाती है जब काम एकत्र हो गये हों और करने का मुहूर्त नहीं निकल रहा हो. कितना जरूरी है इन कामों का होना इस पर ही तो उनका करना निर्भर करता है. वक्त के साथ-साथ अपनी जरूरत के अनुसार होते ही जायेंगे.


दिसम्बर आरम्भ हुए दसवां दिन है. आजकल समय, दिन, तारीख का भी कोई हिसाब नहीं रहता. समय की अनंत धारा में वे बहे जा रहे हैं. नन्हा वापस अपने हॉस्टल पहुंच गया है. उसे अपना कालेज पसंद नहीं है, ऐसा लगा पर कई बार दिखता कुछ और है होता कुछ और है. आज जून ने अपना मेडिकल चेकअप कराया है, पर वह डाक्टरों के रवैये से खुश नहीं लगे. उसके भीतर से संगीत की लहरियां फूट रही हैं और एक अनोखी विश्रांति का अनुभव करा रही हैं. घर में इंटरनेट की सुविधा आ गयी है पर वह स्पीड कम होने के कारण इस्तेमाल नहीं कर पायी. नन्हे ने कहा था, धैर्य रखना पड़ेगा, धैर्य की पूरी परीक्षा लेता है यहाँ का सर्वर. नन्हे ने इस बार उसे जैसे आईना दिखा दिया. उसकी कमियां उसके सामने अपने पूर्ण रूप में उजागर हो गयीं. वाणी का दोष ही सबसे बड़ा दोष है. वाणी पर नियन्त्रण नहीं है. उसने उसे कहा कि दस-पन्द्रह वर्षों में कुछ नहीं बदला है, जब उसने जून से शिकायत भरे शब्द बोले. उसकी भाषा सही नहीं है इसका अंदाज उसे स्वयं नहीं होता, लगता है कि यही ठीक है, जून ने भी थोड़ा सा गुस्सा किया पर कुछ ही मिनटों में सब ठीक हो गया. नन्हे को शायद यह दृश्य देखना था. एक बार उसने कहा कि उसे अपनी सखी को भी वे शब्द नहीं बोलने चाहिए थे, जो एक बार बातचीत के दौरान बोले. तभी तो पूर्वज कहते आये हैं, मौन रहना सबसे श्रेष्ठ है, नैनी की बेटी को पढ़ाने के उसके तरीके पर भी उसने प्रश्न चिह्न लगा दिया. आधा घंटा भी यदि वह कुछ और न करके उस पर पूरा-पूरा ध्यान दे तो पर्याप्त है, ऐसा उसने कहा !

मुम्बई में आतंक


कितनी खौफनाक थी वह घड़ी जब आतंकवादियों ने कल रात मुम्बई के सात इलाकों में धमाके किये. निर्दोषों का खून बहाया और रात भर चलने वाला यह आतंक का दौर अभी तक थमा नहीं है. सुबह छह बजे के समाचार उन्होंने सुने तो दिल दहल गया, तब से लगातार टीवी पर हर समाचार चैनल इसी खबर को दिखा रहा है. एक सौ बीस लोग मारे जा चुके हैं और तीन सौ से ज्यादा घायल हो चुके हैं लेकिन दहशत के शिकार तो करोड़ों लोग हुए हैं. ऐसा लगता है देश में कहीं भी कोई सुरक्षित नहीं है. ताज होटल, ओबेराय होटल, छत्रपति शिवाजी टर्मिनल, अस्पतालों तथा अन्य भी कुछ स्थानों पर फायरिंग हुई और ग्रेनेड फेंक कर धमाके किये गये. नरीमन हाउस तथा कोलाबा में भी धमाके हुए. नन्हा आज सुबह चार बजे घर पहुंच गया है, इस समय सो रहा है, जून अभी तक आए नहीं हैं. एनएसजी के कमांडो होटल ताज में प्रवेश कर चुके हैं. सेना का हेलिकॉप्टर ताज के ऊपर मंडरा रहा है, न जाने कब मुक्त होंगे वे लोग जो कैद हैं होटल के अंदर, डरे हुए लोग जो कल तक खुश थे, शांति का आनन्द उठा रहे थे. वे लोग जो स्टेशन के बाहर मार दिए गये. नीरू माँ कहती हैं जो घट चुका वह न्याय था, तो जो हुआ क्या यही होना चाहिए था, कितना वीभत्स और घृणित था, महाभारत के युद्ध में हुई हिंसा क्या इससे कम थी ? अहिंसा का प्रशिक्षण, एओल का वसुधैव कुटुम्बकम का संदेश सब भुला दिए गये, लेकिन कुछ पागल लोगों की वजह से संसार से प्रेम उठ गया ऐसा भी तो नहीं मान सकते. उसका मन उन लोगों के साथ है जो मारे गये जो घायल हुए, उन की पीड़ा उसके मन में बस गयी है.

वे समुद्री रास्ते से आये थे
हथियार बंद और लैस विस्फोटकों से
अपने दिलों में भरे नफरत और हिंसा का लावा लिए
वे दरिंदे थे मौत के
आतंक फ़ैलाने.. करने तबाह शांति
उसने झेली हैं उनकी बन्दूकों से निकली गोलियां
हथगोलों की आग में झुलसी है त्वचा
उड़ कर दूर जा गिरे हैं उसके अंग कटे क्षत विक्षत
खौफनाक मृत्यु का सामना किया है अनेकों बार
और महसूस किया है दर्द उन मरे हुओं का
जिनकी सूक्ष्म देह मंडरा रही है अपने घायल शरीरों पर
जो भौचंक हैं देख ताडंव मृत्यु का !

जीवन की कटु सच्चाई का अनुभव एक बार और हुआ. सच्चाई का सामना कितना ही कटु क्यों न हो, हरेक को करना ही पड़ता है. इस बात को गांठ से बांध लेना चाहिए कि इस दुनिया में वे अकेले आये हैं और अकेले ही जाना है. जीवन में भी वे अकेले हैं और मृत्यु में भी, उनका किसी पर कोई अधिकार नहीं, वे हैं ही नहीं तो अधिकार की बात ही कहाँ आती है. आत्मा स्थूल शरीर से अलग है औए सूक्ष्म शरीर से भी. ये तीनों माया के आवरण हैं जो उसन भ्रमवश ओढ़ लिए हैं, उन्हें इनसे मुक्त होना है.

टीवी पर मेजर उन्नीकृष्णन तथा हेमंत करकरे की अंतिम यात्रा के दृश्य दिखाए जा रहे हैं. सेना, NSG तथा ATS के साथ पुलिस ने भी उनसठ घंटों तक चले युद्ध में भाग लिया तथा मेजर संदीप को भी गोली लगी और भी कई पुलिस व सेना के लोग घायल हुए होंगे, कितने ही देशी व विदेशी मेहमान भी जो होटलों में ठहरे थे. बुधवार शाम से चला यह ऑपरेशन साठ घंटे चला, अभी होटल में सफाई होना बाकी है. पिछले तीन दिनों से यह भयानक युद्ध मुम्बई की भूमि पर लड़ा जा रहा था. मानसिक पीड़ा और घुटन के तीन दिन. कमांडो राजेन्द्र सिंह भी शहीद हुए, कुल सोलह अधिकारी शहीद हुए.

Monday, April 25, 2016

मौन का सागर


भीतर मौन छा गया है, आजकल लिखना नियमित नहीं हो पाता, कभी-कभी लगता है कुछ करने को नहीं रहा, परम विश्रांति को पाया मन शायद ऐसा ही होता होगा. कोई चाहत नहीं तो कोई उद्वेग भी नहीं, कुछ पाना नहीं तो कुछ सोचना भी नहीं, इस जगत में जो प्रारब्ध शेष है उसे सहज भाव से स्वीकारना है और जितना सम्भव हो सके जगत को लौटाना है. सद्गुरू कहते हैं जगत और परमात्मा का भेद भी नहीं रहे, सब एक ही है, कोई विरोध नहीं, जब जो जैसी परिस्थिति आये उसमें वैसे ही मस्त रहना, जैसे आज सफाई कर्मचारी नहीं आया है, पर काम हो ही जायेगा.

भिवानी, मुजफ्फरपुर, मोतिहारी, जोधपुर, उपरोक्त शब्दों और फोन पर हुई बात के आधार पर एक कविता लिखनी है एक परिचिता के लिए उनके विवाह की पचीसवीं वर्षगांठ पर ! इस समय दोपहर के एक बजे हैं. पुनः सुंदर वचन सुन रही है, संत कहते हैं कि आनन्द को पाने के लिए आनन्द से होकर ही गुजरना पड़ता है, जीवन को देखने की जैसी किसी की क्षमता होती है, जीवन वैसा ही दिखाई देता है. जीवन से छुटकारा धर्म का लक्ष्य नहीं, परम जीवन ही धर्म का लक्ष्य है. आनन्द के भाव से जीवन, उसका सौन्दर्य, सत्य उपलब्ध होता है. दुःख का भाव हटाकर आनन्द का भाव भीतर समोना होगा. जो जीवन को दुःख के भाव से देखना चाहता है वह गुलाब में कांटे ही देखेगा और जो जीवन को सुख के भाव से देखता है वह काँटों में फूल देखता है. दुखी, निराश व उदास चित्त अँधेरे को ही देखता है, आनन्द से भरा व्यक्ति अंधेरे को भी प्रकाश में बदल सकता है ! संसार और परमात्मा दो नहीं हैं, आनन्द के भाव में देखें तो यही संसार परमात्मा में बदल जाता है.


आज छब्बीस नवम्बर है, पिताजी की शादी की सालगिरह, माँ आज होतीं तो उनकी भी. कल नन्हा आ रहा है, इस समय ट्रेन में बैठा है. कल शाम को वह पब्लिक लाइब्रेरी की fund rasing meeting में गई. अच्छा अनुभव रहा. कल रात ध्यान के रहस्य के बारे में सुना, मन में उठते शब्दों का निरिक्षण करना चाहिए, चेतना जब किसी वस्तु को देख लेती है तो वह वस्तु विलीन हो जाती है, केवल शुद्ध चेतना ही शेष रह जाती है. ऋषिमुख में श्री श्री के विचार पढ़ते-पढ़ते भी ध्यान घटित होने लगता है. वह कहते हैं, चेतना ही निकटस्थ है, मन, बुद्धि व चित्त उसके बहुत बाद है, स्मृति और कल्पना में मन की ऊर्जा व्यर्थ जाती है किन्तु चेतना यदि स्वयं में रहे अर्थात मन चेतना में खो जाये तो ऊर्जा से भर जाता है. वे व्यर्थ ही अपनी शक्ति का अपव्यय करते हैं. जबकि शक्ति बनाने का कार्य उनके ही हाथ में है, कैसा अद्भुत ज्ञान है यह.. जिसे पाकर सारा जगत अपना हो जाता है, सहज समाधि घटित होती है और तब सारे शास्त्र, सारे कर्मकांड, सारी किताबें छोटी पड़ जाती हैं. अनुभव से प्राप्त ज्ञान का एक कण भी उधार के ज्ञान से बड़ा है. उसका मन शांत है क्योंकि इस क्षण वह शांति के उस सागर से जुड़ा है, वह जीवित है, जड़ नहीं है, वह प्रेमपूर्ण है और वह संतुष्ट है, वह है ही नहीं ! 

Sunday, April 24, 2016

नीलवर्णी शिव


सोलह दिनों की यात्रा के बाद परसों वे वापस लौट आये हैं. सुबह के दस बजे हैं, बच्चे पढ़ने आये हैं. मौसम सुहावना है, धूप खिली है, बगीचा साफ-सुथरा मिला. वापस आकर सभी परिवार जनों से बात भी हो गयी है. सभी परिपक्व हो रहे हैं उम्र के साथ-साथ, पर बड़ी भाभी अभी भी मन के जाल में कैद हैं, यहाँ उसकी एक सखी का भी वही हाल है. बड़ी बहन ने स्वयं को देह से अलग महसूस करना तो वर्षों पहले ही शुरू कर दिया था अब वह देह को बंधन मानने लगी हैं. देह से मुक्त होकर वह परमधाम में जाकर शांति का अनुभव करना चाहती हैं. देह की अपनी सीमाएं हैं पर देह के बिना आत्मा कुछ जान भी तो नहीं सकती. यदि आत्मा आनन्द है तो इस बात का ज्ञान उसे देह धारण करके ही होता है. ध्यान के द्वारा देह रहते भी यह सम्भव है. विदेह जनक को ऐसा ही अनुभव होता होगा. उसे हिंदी के लेख-कविताएँ एकत्र करने हैं, फोन किये हैं सम्भवतः इतवार तक कुछ बात बनेगी. सद्गुरु का एक सुंदर प्रवचन छोटी ननद से लायी है, बाबाजी का भी, ओशो के दो संगीतमय ध्यान के कैसेट भी. जून ने आज सुबह व्यायाम/ साधना आदि के बाद कहा, आज उन्हें कई हफ्तों के बाद अच्छा अनुभव हुआ. शाम को वे एक वृद्धा परिचिता को जन्मदिन की बधाई देने जायेंगे.

आज सुबह नींद देर से खुली, इतनी गहरी नींद थी कि अलार्म भी सुनाई नहीं दिया, दोनों में से किसी को भी नहीं. अभी तक यात्रा की थकान उतरी नहीं है. सुबह अभी पौने सात ही बजे थे, एक दक्षिण भारतीय सखी का फोन आया, उसकी माँ जो पिछले एक वर्ष से पुत्र के साथ विदेश में रह रही थी, देह सिधार गयी. भाई उनकी देह को भारत लाने का प्रयास कर रहा है. कल शाम को प्रेस गयी थी प्रूफ रीडिंग करने. ‘ध्यान’ पर लिखा लेख उसने तीसरी बार छपने को दिया है क्योंकि यह विषय है ही इतना महत्वपूर्ण !


आज सुबह अचानक वर्षा होने लगी है. बादल रात में एकत्र हुए होंगे. उस वक्त वे निद्रा में मग्न थे. कल रात कैसे अनोखे स्वप्न देखे. भगवान शंकर को देखा, नीला रंग, तन पर वही सब आभूषण जो चित्रों में दिखाई देते हैं. जादू, तिलिस्म तथा कंकाल को झपटते देखा. अजीब सा स्वप्न था पर उस वक्त कितना सहज लग रहा था. कल रात एओल का कार्यक्रम देखा था. गुरूजी को बहुत दिनों बाद देखा व सुना, फिर ‘कृष्णा’ देखा इसी का असर रहा होगा जो मन रहस्यों की दुनिया खो गया. यह जगत एक रहस्य ही तो है ! कल छोटी बहन से बात की, वह एक और मकान खरीद रही है, यानि तीसरा मकान और अपने काम से, जीवन से पूरी तरह संतुष्ट नहीं है. सच ही है लोग जीवन से कभी भी पूर्ण संतुष्ट कहाँ हो पाते हैं, वे जीवन का अर्थ समझे बिना ही जीवन जिए चले जाते हैं. ग्यारह बजने को हैं, जून कुछ देर में आने वाले होंगे उन्हें बाजार भी जाना था पर इस भीगे मौसम में शायद सम्भव नहीं हो सकेगा. उसका देवदिवाली पर लेख पूरा होने को है !

Friday, April 22, 2016

दीवाली - प्रकाश पर्व


कल दीवाली है, उसे एक संदेश लिखना है !
फैले चारों ओर उजाला
स्वच्छ बनें घर-आंगन अपने,
दीप मालिका के उत्सव पर
लक्ष्मी पूर्ण करें सब सपने !

आज दीपावली का उत्सव है, यूँ तो उन्होंने कल भी मनाया था, आज शाम को भी घर पर मेहमान आयेंगे, अच्छा लगता है दीपों का यह प्रकाश पर्व, यह परंपरा न जाने कितनी पुरानी है, लाखों वर्ष पुरानी ! वे भी न जाने कितनी बार इसे मना चुके हैं पर हर बार यह नया उत्साह भर जाता है. सभी से बात भी हुई, कुछ से फोन पर कुछ से sms द्वारा. अभी कुछ देर पूर्व जून की इक्कीस वर्ष पूर्व की डायरी पढ़ी, वह उन्हें पढ़ाती थी, ऐसा लिखा है !
आज सुबह वे छह बजे उठे, रात देर से सोये थे, दीवाली का भोज, पटाखे, दिए और मोमबत्तियां ! शाम को एक सखी के यहाँ जाना है. सुबह ध्यान में अद्भुत अनुभव हुआ. भीतर कितना सुख है, लूट मची है और वे हैं कि उस ओर देखते तक नहीं ! जीवन कितना अद्भुत है यह बात वही जान सकता है जिसने एक बार भी आत्मा का अनुभव किया हो, अन्यथा शेष सभी एक मोह की नींद में असत्य को ही सत्य मानकर दुःख-सुखी होते रहते हैं. आत्मदर्शी के लिए जगत में रहना कितना सहज हो जाता है जैसे कोई पंछी अप्रयास गगन में उड़ता है, जैसे कोई मीन अनायास ही जल में तैरती हो, जैसे कोई नवजात शिशु सहज ही अपने मुँह खोल अंगड़ाई लेता हो जैसे सुबह अपने आप हो जाती है और रात भी तारों व चाँद सहित आकाश में अपना साम्राज्य सजाती हो !
आज दोपहर पन्द्रह मिनट के अंदर-अंदर गोहाटी, बारपेटा, कोकराझार तथा बोगाईगाँव में ग्यारह बम विस्फोट हुए. आतंकवादियों का एक और हमला, कितने मरे कितने घायल कोई हिसाब नहीं. लोगों के मनों में डर भर गया है. हालात दिनोंदिन बिगड़ते जा रहे हैं. यह शांतिकाल तो नहीं कहा जा सकता, युद्ध की विभीषिका से भी भयानक है यह काल. लोग धरा पर बोझ हो गये हैं क्या जो..महाभारत के युद्ध में लाखों मरे थे, आज भी आये दिन लोग मर रहे हैं, कभी बम का शिकार होकर तो कभी भूकम्प या बाढ़ का.

आज घर जाना है, यूँ तो घर यहीं है पर वे हजारों साल परदेस में रहने पर भी परदेसी ही बने रहते हैं. कल पुस्तक मेले में किताबों का दुकानदार यही तो कह रहा था. कल गोहाटी में जो हादसा हुआ है, कितना भयानक था, आज न जाने कितने घरों में मातम मनाया जा रहा होगा, कितने घरों में मौत का सन्नाटा होगा, कुछ सिरफिरे आतंकवादियों ने लोगों का शांति से जीना मुश्किल कर दिया है. आज शाम को वे यात्रा पर निकलेंगे, मौसम खुला-खुला है, धूप में अब पहले की सी तेजी नहीं रह गयी है. उसने आवश्यकता से अधिक सामान रख लिया है, शायद अधिक दिन रुकना पड़े. एक व्यक्ति को जीने के लिए कितना चाहिए पर वे कितनी-कितनी वस्तुएं जुटा लेते हैं. वापस आकर वह अपने जीवन में परिवर्तन करने वाली है. ओशो कहते हैं मनुष्य कभी अपने वर्तमान से संतुष्ट नहीं होता, वह सदा एक सुखद कल की आशा में खोया रहता है.  

Thursday, April 21, 2016

उत्तर पूर्वी भारत - सात बहनें


होश में जीना, साक्षीभाव में जीना, जागते हुए जीना ही असली बात है, वे अचेतावस्था में ही सारी भूलें करते हैं. आज सुबह उसने व्यस्तता के कारण फोन नहीं उठाया पर यह मान लिया कि कोई दूसरा उठा लेगा, यह मानना होश में नहीं हो सकता क्योंकि सभी व्यस्त हो सकते हैं. इस एक घटना के अलावा बेहोशी में कुछ विशेष नहीं हुआ. जून ने मृणाल ज्योति के हॉस्टल के लिए काफी चीजें बनवा दी हैं, उनके भीतर कितना परिवर्तन आता जा रहा है, वह मुस्कुराने लगे हैं, सामाजिक कार्य  करने लगे है. जीवन के प्रति नयी ललक जागी है, घर में नये-नये सामान ला रहे हैं. रजोगुण बढ़ रहा है धीरे-धीरे सतोगुण भी आएगा, अब क्रोध नहीं रहा, प्राणायाम का असर स्पष्ट दीख रहा है. जीवन है ही आनन्द के लिए, सेवा के लिए और परोपकार के लिए, वे मानव होने का सबूत तभी दे सकते हैं जब उनके चारों ओर आनन्द का वातावरण हो शांति हो और लोगों को उनसे कुछ न कुछ मिलता रहे, वे दाता बनें तभी जीवन का सच्चा मर्म समझ पाते हैं. प्रकृति हर पल लुटा रही है, बिना किसी आकांक्षा के, वे भी तो उसी प्रकृति का अंश है जैसे प्रकृति के पीछे वह अव्यक्त छिपा है ऐसे ही उनके पीछे आत्मा का साम्राज्य है, वे ही वह चेतन हैं, जड़ हाथों में क्या शक्ति कि अपने आप कुछ कर सकें !

आज ‘मृणाल ज्योति’ गयी थी, उस दिन एक परिचित ने पूछा था, आपकी वह संस्था कैसी है, और एक दिन क्लब की अध्यक्षा ने भी कहा कि वह इस संस्था से जुड़ी ही है तो उससे जुड़ा लेडीज क्लब का भी काम कर दे. कोई थोड़ा सा भी पुण्य का काम करे तो पहचान अपने-आप मिलने लगती है, लेकिन एक सच्चा साधक अपने लक्ष्य पर ही नजरें रखता है, वह लक्ष्य है परमात्मा, उससे कम कुछ भी नहीं ! आज सुबह ‘क्रिया’ के बाद गुरूजी की कृपा का अनुभव हुआ, उन्होंने जैसे उसके मन में उठने वाले सवालों का जवाब दिया. आज जून ने कहा कि अगले महीने मुम्बई में उनकी पांच दिनों की ट्रेनिंग है, क्या वह यात्रा बीच में छोड़कर वहाँ जाएँ ? तो उसने कहा, हाँ, वह जा सकते हैं, भीतर कोई द्वंद्व नहीं बचा, कोई संदेह नहीं. इस दुनिया में ऐसा कुछ रहा ही नहीं बल्कि था ही नहीं जो परमात्मा से बढ़कर हो, वह जिसे मिल जाये अथवा उसकी जिसे तलाश हो वह किसी भी परिस्थिति में प्रसन्न रह सकता है. गायत्री परिवार के संस्थापक श्रीराम शर्मा आचार्य की अमृत वाणी पढ़ी, उनकी वाणी में आग है, कितने स्पष्ट दो टूक हैं उनके वचन. महामानव थे वह और बने कैसे, केवल परमात्मा की कृपा से ! उनके भीतर जो अनंत शक्ति छुपी है वह उसी की तो है, परमात्मा प्रकट होने को उत्सुक है, वे प्रमाद के कारण कभी अज्ञान के कारण स्वयं को दीन-हीन जानते हैं, वास्तव में वे शक्ति के ऐसे पुंज हैं जो इस दुनिया को बदल सकती है ! अगले दो घंटे उसे पढ़ाना है. शाम को सत्संग भी है.
कल दोपहर ‘मिजोरम’ पर पढ़ती रही, शाम को क्लब में मीटिंग थी. इस बार जो सदस्या संपादन कर रही हैं, उनका काम करने का तरीका बिलकुल अलग है. पहले तो उसे पत्रिका के मुखपृष्ठ, सज्जा आदि से कोई मतलब ही नहीं रहता था, केवल हिंदी की प्रूफ रीडिंग तक ही उसका काम सीमित था. कल एक नाम भी उसने सुझाया ‘AAMI NAM METRI’ उत्तर भारत की सात बहनों के सारे नामों के पहले अक्षरों को लेकर. आज अंकुर में दो दर्जन बच्चे आए थे, रामलीला खेली, उससे पहले रामायण की कहानी सुनाई, बच्चों को नाटक में बहुत मजा आता है. आज आकाश में बादल छाये हैं.