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Friday, June 14, 2019

वस्त्रों पर सिलवटें



आज उच्च स्तरीय कमेटी के लिए नये अतिथि गृह में विशेष भोज का आयोजन किया गया है. उन्हें भी जाना है. सभी उच्च अधिकारी भी उपस्थित होंगे. सुबह चार घंटे उनमें से एक विशिष्ट महिला अतिथि के साथ बिताये, साथ में क्लब की प्रेसिडेंट भी थीं और एक अन्य अधिकारी की पत्नी. उन्हें लेकर ड्रिलिंग साइट पर भी गये. तेल के कुँओं की ड्रिलिंग कैसे होती है, नजदीक से देखा, समझा. आज सुबह उनके लिए एक कविता लखी थी. उनके पति देश के जाने-माने वैज्ञानिक हैं, उनकी उम्र सत्तर पार कर चुकी है पर अभी तक कार्यरत हैं. क्लब की प्रेसिडेंट के साथ काम करना अच्छा लग रहा है, वह काफ़ी जानकारी रखती हैं और कम्पनी को अपने परिवार की तरह मानती हैं.

आज सुबह शीतल थी पर अब धूप निकली है. बंगाली सखी से बात हुई. वे लोग पुरानी बातों को दिल से लगाकर बैठे हुए हैं, कहने लगी, समय के साथ भी कुछ घाव भरते नहीं हैं. उसकी आवाज आज दो बार ऊँची हुई, एक बार फोन पर उस बात करते हुए दूसरी बार नैनी को समझाते हुए, जिसे 'हाँ' बोलने की आदत है, बिना बात को समझे 'हाँ' बोल देती है. उसे जो क्रोध अथवा रोष बंगाली सखी से बात करके हुआ संभवतः वही नैनी पर उतर गया और फिर मन खाली हो गया. स्वयं को जाने बिना कैसे रहते होंगे लोग, अब आश्चर्य होता है. कुछ देर पहले मृणाल ज्योति से आयी है, वहाँ एक नया दफ्तर बन गया है. अब नई कक्षाओं के लिए जगह मिलेगी. स्कूल आगे बढ़ रहा है, अल्प ही सही उसका कुछ योगदान है इसमें. अगले शनिवार को वे इस समय बंगलौर में होंगे, उसके बाद लगभग एक महीना एक स्वप्न की भांति बीत जायेगा. आज ब्लॉग पर अभी तक तो कुछ नहीं लिखा है. अब जो भी सायास होता है वह नहीं भाता, जो सहज ही होता है, वही ठीक है.

कल दिन भर व्यस्तता बनी रही. सुबह स्कूल, वापस आकर क्लब, शाम को पहले योग कक्षा, फिर क्लब. कार्यक्रम सभी बहुत अच्छे थे, वे जल्दी घर आ गये. जून ने दो बार फोन किया. परसों रात को स्वप्न देखा था, वह आँखें बंद करके उसके साथ चल रही है. एक स्थान पर जाकर आँख खोलती है तो घुप अँधेरा है. वह उससे कहती है, यह रास्ता ठीक नहीं है, वापस चलो. उसने हामी भरी. फिर वह उस पर भरोसा करके आँख मूंद लेती है पर जब वे लक्ष्य पर पहुंचते हैं तो वहाँ का दृश्य ही अलग है. वह पूछती है, मार्ग नहीं बदला था, वह कहता है, नहीं. यह स्वप्न क्या बताता है...

कल कुछ नहीं लिखा. आज यात्रा से पहले का अंतिम दिन है. जून आज घर जल्दी आ गये हैं. मौसम बदली भरा है. मौसम में फेरबदल तो चलता रहता है पर आत्मा का मौसम सदा एक सा रहता है. जैसे पानी पर लकीर हो उतनी ही देर यदि मन का मौसम बदले तो ही मानना चाहिए कि मन आत्मा में स्थित है. मन आत्मा में रहकर यदि व्यवहार करना सीख जाये तो मुक्त ही है. मन पहले से ज्यादा सजग है और दृढ़ भी. आवरण और विक्षेप घट रहे हैं, सतोगुण बढ़ रहा है. तमो और रजो गुण से मुक्त होकर सतोगुण से भी पार जाना है. आज एक स्वामी जी से सुना, वस्र्त्रों को प्रेस करने से न उन्हें कुछ मिलता है न कुछ खोता है. वस्त्र पर सिलवटें मिट जाती हैं. सिलवट जो कुछ भी नहीं हैं, मिट जाती हैं. आत्मा में न कुछ जोड़ा जा सकता है न कुछ घटाया जा सकता है. मन रूपी सिलवट मिट जाती है, जो है ही नहीं. आज नन्हे और सोनू से बात की. वे योग और आहार के द्वारा अपना वजन घटा रहे हैं.   

Saturday, November 8, 2014

रंगरेज का काज



आज बाबाजी का प्रवचन बहुत प्रभावशाली था, सुबह गुरु माँ ने भी वही बात कही थी कि जिस तरह एक के भीतर परमात्मा का नाम है, वह भला बनने की चाह रखता है, किसी के अपशब्द या दिया गया अन्य कोई कष्ट उसे सुख-दुःख का अनुभव कराता है, उसी तरह दूसरा भी (जिससे उसका संबंध है, या व्यवहार है) उसी पथ का राही है. किसी के लिए परायेपन की भावना नहीं आनी चाहिए, जो एक के लिए अप्रिय है वही दूसरे के लिए भी अप्रिय है, जो एक को सुखकर है वही दूसरे के लिए भी सुख का कारण है. एक बात बाबाजी ने जोड़ दी, अपने साथ न्याय का व्यवहार करना चाहिए और दूसरे के साथ उदारता का. आज सुबह वे उठे तो धूप बहुत तेज थी पर अब बादल आ गये हैं. कल सुबह वे चार बजे उठे और पाँच बजे क्लब पहुंच गये पर वहाँ इक्का-दुक्का लोग ही थे. फिर वर्षा भी शुरू हो गयी, कुछ देर और प्रतीक्षा करने के बाद वह वापस आ गयी, रेस देर से शुरू हुई होगी. जून को उसका दुबारा वहाँ जाना पसंद नहीं आया, शायद उसके लिए यही उचित रहा हो.

जब तक मन पर रंग नहीं चढ़ा है तब तक ही करना शेष है, रंग मैले कपड़े पर नहीं चढ़ता, गुरु रंगरेज होता है जो मन की चादर को धोकर साफ करता है, फिर प्रेम के रंग से रंगता है. “राम पदार्थ पाय के कबिरा गाँठ न खोल, नहीं पतन नहीं पारखी नहीं ग्राहक नहीं मोल” आज गुरु माँ ने रंगरेज का उदाहरण देते हुए समझाया. उसे लगा यह तो सम्भव जान नहीं पड़ता, वह तो गले तक संसार में डूबी हुई है फिर क्योंकर इससे मुक्त हो सकती है और यही कारण है कि कुछ दिनों तक तो ऐसा लगता है कि आध्यात्मिक ऊँचाई तक पहुंचने के मार्ग पर कदम बढ़ रहे हैं पर फिर दुनियादारी के कार्यों में मन ऐसा रम जाता है कि ईश्वर उससे दूर चला जाता है. आज एक सखी का जन्मदिन है उसने छह बजे बुलाया है, अम्बियाँ मंगाई हैं, सुबह उससे बात करके अच्छा लगा, वह स्वयं तो कभी फोन नहीं करती, बेहद व्यस्त रहती है. आज बाबाजी के प्रवचन में काश्मीर के मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला भी आये हैं, उनके कहने पर सभी काश्मीर की शांति की प्रार्थना कर रहे हैं. अपने दिव्य संकल्प की शक्ति पर उन्हें विश्वास है. कल शाम बहुत दिनों के बाद उसने कुछ नया लिखने का प्रयास किया, कुछ पुरानी कविताएँ पढ़ीं, कुछ अच्छी भी लगीं. उसकी किताब इस माह के अंत तक छप जानी चाहिए थी पर प्रकाशकों के वादों पर भरोसा करना ? उचित नहीं है. अगले हफ्ते नन्हे का स्कूल भी खुल रहा है, उसे लिखने का ज्यादा वक्त मिलेगा, वैसे तो यह पूरा वर्ष ही उन्हें व्यस्त रहना है उसके साथ-साथ.

मन में छोटे-छोटे सुखों-दुखों की कहानी चलती रहती है और प्रेम की आग इन को जलाकर भस्म कर देती है, प्रेम ईश्वर का, सच्चाई का पीड़ा भी देता है पर उस पीड़ा में भी आनंद है, सद्गुरु ही यह आग दिलों में जगाता है, हृदय में श्रद्धा उत्पन्न होती है, मन उड़ना भूल जाता है, स्थिर हो जाता है ! लेकिन सन्त का सान्निध्य इस जन्म में उसे मिलना बहुत कठिन है, निकट भविष्य में यह सम्भव नहीं दीख पड़ता, कुछ वर्षों बाद क्या होता है, कौन कह सकता है ! यह आवश्यक भी नहीं कि मात्र गुरू के दर्शन से ही ज्ञान प्राप्त हो जाता है. आज उन्हें अपना गुरु स्वयं बनना है, उनके भीतर ही ईश्वरीय प्रेरणा विद्यमान है, देर-सबेर जो मंजिल तक पहुंचाएगी ही, कभी-कभी रास्ता भटक गये हैं ऐसा लगता है. कई-कई दिन एक ही जगह खड़े निकल जाते हैं लेकिन उस वक्त भी मन को कोई कचोटता तो रहता है. आज भी पिछले तीन दिनों की तरह तेज धूप निकली है, नैनी ने आम के पेड़ से आम तोड़ दिए हैं, अचार बनाने के लिए जून से मसाले भी मंगाने हैं. कल दीदी व बंगाली सखी को इमेल भेजे. कल उस सखी के यहाँ खाना स्वादिष्ट था, वैसे भी बहुत दिनों के बाद वहाँ जाकर अच्छा लगा.