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Thursday, July 20, 2017

लिट्टी-चोखा


कल ईद थी. शाम को एक मित्र परिवार मिलने आया. वे लोग यहाँ से जा रहे हैं, अपने घर से पौधे ले जाने को कहा था, उन्होंने लिट्टी-चोखा खाने का निमन्त्रण भी दिया है. जून ने गाड़ी भेजी है, अभी माली आएगा, उसे साथ लेकर जाना है. उनके लिए एक कटहल भी लिया है. इस समय भी धूप भी काफी तेज है, शाम के पांच बजने को हैं. कल छोटी बहन का जन्मदिन है, उसके लिए कविता लिखी है. उसने एक कविता की पैरोडी बना दी, खुदा की बात इतनी आसानी से समझ में आती कहाँ है. उसे भी नहीं आती थी, अब भी आई है ऐसा नहीं लगता. खुदा उन्हें खाली कर देता है, बिलकुल ‘हॉलो एंड एम्प्टी’ ! सितम्बर में छोटा भाई परिवार सहित यहाँ आ रहा है, यकीनन वे दिन बहुत अच्छे होंगे ! परसों एक जन्मदिन पार्टी में जाना है, अभी उसे एक कविता ( यदि उसे कविता कहें तो) लिखनी है, मन हल्का है, खाली-खाली सा..सो परमात्मा का सत्य उसमें से वैसे ही बहेगा जैसे खाली बांसुरी से हवा !  

अगस्त का आरम्भ हो चुका है, आज सारे कैलेंडर बदलने हैं. दूधवाले, धोबी, माली, नैनी सभी का हिसाब चुकतू करना है, जन्मदिन के कैलेंडर में इस माह पड़ने वाले विशेष दिनों को भी देखना है, शरीर का भार लेने का एक कार्य और करते हैं वे हर माह के पहले दिन. सुबह वे आज समय पर उठे, पिछले कुछ दिनों से उसका पाचन कुछ ठीक नहीं था. इतने वर्षों उस पर जो जुल्म ढाए हैं, उनकी भरपाई करने का वक्त आ गया है. इन्सान अपने छोटे-से छोटे कृत्य से भी बच नहीं सकता. जितनी नकारात्मकता इस मन के द्वारा उपजी है, उसका भुगतान उन्हें हर हाल में करना होगा. अब समय आ गया है कि पूर्ण सकारात्मकता को अपनाया जाये, उससे कम रत्ती भर नहीं, हर रत्ती का जवाब देना होगा जो सदा बढ़कर ही मिलता है. नन्हे ने बताया, कल कर्नाटक बंद था.

फिर कुछ दिनों का अन्तराल, कल कमेटी की पहली मीटिंग थी, एक सदस्या के साथ मिलकर उसने सभी के लिए स्नैक्स व रात्रि भोजन का इंतजाम किया. सब कुछ ठीक से हो गया. आज सुबह मृणाल ज्योति गयी, बच्चों को राखियाँ बांधी. जीवन एक धारावाहिक की तरह है, उसकी कहानी भी ऐसी ही है. कभी कुछ घटता है जो परेशान कर जाता है पर अपने स्वभाव में टिकते ही सब कुछ पूर्ववत् हो जाता है, बाहर न भी हो पर भीतर तो अवश्य. जो कुछ भी उन्हें निर्बल बनाता है वह त्याज्य है. सकारात्मकता में टिके रहने से हर क्षण नयेपन का अनुभव भी होता है. अभी-अभी नैनी की बच्चियां आई थीं, ईश्वर के प्रेम से परिपूर्ण, कितनी प्यारी मुस्कान है इन दोनों की ! उनके साथ जाकर फुहार में ही फूल चुने और तुलसी के चौरे पर सजाये. बहुत सी बातें वे बिन कहे ही समझ जाती हैं. प्रेम भी प्रेमी हृदय ही महसूस कर सकते हैं, संत या बच्चे ! सामने का दृश्य हरियाली का एक समुन्दर जैसा ही तो है, मौन है पर सब कुछ कहता और सब कुछ सुनता हुआ ! जीवन कितना सुंदर है और कितना अनोखा ! परमात्मा और जीवन एक ही तो हैं !