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Thursday, October 16, 2014

गजल का जादू


कल दोपहर उसने एक नई कविता लिखी, सृजन मन को हल्का कर देता है. आज सुबह बड़ी ननद से बात हुई, अगले एक दो वर्षों में माँ-पिता यहाँ आ जायेंगे ऐसा उसने कहा है. अभी छोटी ननद के बच्चों की देखरेख के लिए वे उसके पास रहते हैं क्योंकि वह कामकाजी महिला है. पहले भी ऐसी बात हुई है पर वे बच्चों के मोह के कारण आना नहीं चाहते. अब भी मान जायेंगे इसमें उसे संदेह है. इसका निर्णय वक्त ही करेगा और जो भी होगा अच्छा ही होगा. ईश्वर सबके लिए है और सबकी परवाह उसे है.
या अनुरागी चित्त की गति समझे नहीं कोय
ज्यों ज्यों बूड़े श्याम रंग, त्यों त्यों उज्ज्वल होय !

जिसकी सत्ता से भरण-पोषण होता है, आवागमन की सामर्थ्य होती है, वाणी उत्पन्न होती है तथा यह सब न रहने पर भी जो रहता है वही भगवान है ! वह अनंत ऊर्जा व अखंड आनंद का स्रोत है. वह हमारे साथ है चित्त की प्रसन्नता उसी का आशर्वाद है. आज सुबह जैसे ही उठी, किसी ने कानों में कहा, congratulations ! दो-एक दिन पहले भी किसी की आवाज कानों में पड़ी थी. उस दिन स्वप्न में जून भी उसके साथ पाकिस्तान गये थे और उनके साथ चचेरी बहन भी थी. कल देखा उनके घर की छत व आंगन लकड़ियों से भरे हुए हैं. बड़े-बड़े लकड़ियों के गट्ठर सलीके से पड़े हुए हैं. अभी-अभी छोटे भाई का फोन आया है, रूड़की के एक इंजीनियर उनके मकान को खरीदने में उत्सुक है, जून यह सुनकर जरूर खुश होंगे. लेकिन वह पूरा पैसा छह महीनों में ही दे पाएंगे. कल शाम वे एक मित्र के यहाँ गये, परसों से नन्हे की परीक्षाएं हैं और कल शाम उसे क्लब जाना है सो आज शाम घर पर रहना ही ठीक होगा.

कल दोपहर ‘ध्यान’ में उसने ईश्वर की झलक का अनुभव किया, एक अनोखी स्फूर्ति का अनुभव और जैसे उसके तन से एक सुगन्धि फूट रही है. उसके बाद भी देर तक इसी अहसास से तन-मन ओत-प्रोत रहा, पर कल शाम को उन्हें ‘रूपकुमार राठौर’ और ‘सोनाली राठौर’ के गायन के कार्यक्रम में जाना था, उसे और एक सखी को. रात को लौटने में देर हुई, नींद पूरी नहीं हुई अभी भी सिर में हल्का दर्द है. लेकिन कार्यक्रम अच्छा था. कभी-कभी शोर बहुत खलता था. गायक का धैर्य और लगातार गाने की क्षमता, शास्त्रीय संगीत पर उसकी पकड़ बेजोड़ थी. संगीतकार भी श्रेष्ठ थे. तबला, ढोलक हो या गिटार, वायलिन, सभी मंजे हुए कलाकार थे. उसने सोनाली राठौर से बात भी की, वह सीधी-साड़ी शांत दिखीं. कुछ गजलें अच्छी थीं कुछ हल्की-फुलकी सी ही थीं, लेकिन उन्हें सभी तरह के श्रोताओं को ध्यान में रखकर गाना होता है. आज बाबाजी ने मंत्रजाप का महत्व बताया तथा नाम जप का भी, वह दोनों ही नहीं कर पाती है. कल सुबह कैंसर का एक रोगी सहायता मांगने था, वह उसके दुःख को महसूस कर सकी, उसकी सहायता की, जाते वक्त उसने हाथ जोड़े. मन हल्का हुआ पहले जिनको खाली हाथ ठुकराया था, कुछ प्रायश्चित हुआ. देने से किसी का कुछ घटता नहीं बल्कि आत्मसंतोष का धन पाकर वह धनी ही हो जाता है. ईश्वर सदा उसके साथ रहकर सद् विवेक का भागी बनाये ! उसका जीवन स्वार्थ के लिए नहीं बल्कि कर्त्तव्य रूप में बीते, वह सदा ईश्वर के निकट है !