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Friday, February 6, 2015

मरुथल या मधुबन


ईश्वर का भक्त किसी से द्वेष नहीं करता, वह दयालु होता है. मिथ्या अहंकार से मुक्त रहना, समता भाव में रहना, हर घटना को ईश्वर का प्रसाद मानना भी भक्त के लक्षण हैं. आज ‘आत्मा’ में कृष्ण द्वारा बताये गये भक्त के गुणों का वर्णन हो रहा है. कल सुबह मेहमानों के लिए भोजन बनाने में थोडा वक्त लग गया, व्यायाम नहीं हो पाया, दिन भर यह बात याद आती रही, आज भी दस बजे दो परिचित महिलाएं आयंगी, सो समय कम पड़ेगा पर किसी तरह आवश्यक कार्य पूजा, स्वाध्याय, योगासन आदि अवश्य करने होंगे. वास्तव में वह आत्मा है, यह शरीर उसका वस्त्र है, जो समय के साथ नष्ट होने वाला है, इसको स्वस्थ रखना जरूरी है न कि इसके आराम का ख्याल रखते-रखते अपने वास्तविक स्वरूप को ही भूल जाये. जिसके अज्ञान से जगत कलह का कारण बनता है, ज्ञान में स्थित हुए के लिए यह जग कृष्ण का मधुबन बन जाता है. कृष्ण उसके साथ हैं, हर क्षण वह निर्देशन देते हैं, जिसे आत्मभाव में स्थित होकर ही कोई सुन सकता है. विपरीत परिस्थितियाँ तो आएँगी ही पर एक वृक्ष की भांति बहार और पतझड़ दोनों को समभाव से सहना होगा. उनके पास इतना सामर्थ्य नहीं है कि अपनी सभी इच्छाओं को पूरा कर सके पर आत्मतुष्ट व्यक्ति की सभी इच्छाएँ जैसे अपने आप पूर्ण होती रहती हैं क्योंकि जो पूरी नहीं हुईं उसे वे अपने लिए अनावश्यक मानते हैं !

आज कितने सुंदर वचन उसने सुने, ईश्वर के प्रति प्रेम जिसके हृदय में नहीं है, वह शुष्क मरुथल के समान है, जहाँ झाड़-झंकाड़ के सिवा कुछ भी नहीं उगता, जहाँ मीठे जल के स्रोत नहीं हैं, जहाँ तपती हुई बालू है. जिसपर दो कदम भी चलना कठिन है, जो मरुथल स्वयं भी तपता है और अन्यों को भी तपाता है. जिस हृदय में भगवद् प्रेम हो वही आनंद का स्रोत है !

आज लगभग तीन हफ्तों के बाद नूना ने अपनी चिर-परिचित डायरी खोली है. उस दिन वे यात्रा पर निकले थे और कल वापस आये. बीच में तीन-चार पर किसी कापी में लिखने का समय निकाला, अन्यथा तो सांसारिक कार्यों में इतना उलझे रहे कि सुबह सवेरे गीतापाठ के अलावा प्रभु का ध्यान कम ही रहा, लेकिन बनारस के एक आश्रम से कुछ पुस्तकें खरीदीं जिन्हें पढ़ने से मन ठिकाने पर रहा. आज सुबह ‘जागरण’ सुना, साथ-साथ कार्य भी चल रहा था. जीवन क्षण भंगुर है मृत्यु किसी भी समय आ सकती है, मिले हुए समय का और मिली हुई सांसों का सदुपयोग करें तभी वास्तविक कल्याण होगा. न जाने कितने जन्म वे ले चुके हैं और कितने अभी लेने शेष हैं. मन में इच्छाओं का स्फुरण यदि इसी प्रकार होता रहा तो अनेकानेक जन्म उन कामनाओं की पूर्ति के लिए लेने होंगे अतः निष्काम होना है और भक्ति उसके लिए सरल उपाय है, भक्ति साध्य भी है और साधन भी. अहैतुकी भक्ति जिसका लक्ष्य केवल भगवद् प्राप्ति हो. ध्यान में प्रतिदिन एक घंटा बैठे तो भक्ति दृढ़ होगी. ध्यान, अध्ययन, लेखन, चिन्तन, मनन आदि में चौबीस घंटो में से चार घंटे तो लगाने ही चाहियें. तभी देह रूपी पिंजरे में स्थित आत्मा रूपी पक्षी संतुष्ट रहेगा और उसकी संतुष्टि उन्हें वास्तविक आनंद की ओर ले जाएगी !