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Monday, April 17, 2017

पितरों का लोक


कल शाम उलझन भरी थी, परमात्मा ही उस रूप में आया था. “जब जैसा तब वैसा रे”. अंदर की ताकत पैदा करनी है, बाहर कर्म करना है. उन्हें अपने पात्र को बड़ा बनाना है. कृपा की वर्षा प्रतिपल हो रही है, वे धन्यभागी हैं, कृपा हासिल करने का कोई अंत नहीं है. आज सुबह पौने चार बजे नींद खुल गयी, ‘यजुर्वेद’ का स्वाध्याय चल रहा है आजकल ‘ज्ञान प्रवाह’ में. परमात्मा की स्तुति सुनते-सुनते प्रातःकालीन कर्म करते हुए टहलने गयी तो मन में वही चिन्तन चल रहा था. लौटकर सूर्य देवता के सम्मुख ध्यान किया. अद्भुत दृश्य था, देखते-देखते बादलों के पीछे से नारंगी सूरज ऊपर उठने लगा और अचानक हवा चलने लगी. पेड़ झूमने लगे, सारा दृश्य स्वर्गिक प्रतीत हो रहा था. प्रकृति इतनी  सुंदर है, आज से पूर्व कहाँ ज्ञात था. परमात्मा चुपचाप अपना काम किये जाता है. मिट्टी से खुशबुएँ उगाता है, रंग बिखेरता है आकाश से. परमात्मा की महिमा सोचने लगो तो बुद्धि चकराने लगती है, उसमें तो बस डूबा जा सकता है, उसे तो बस महसूस किया जा सकता है. वह तो अपने भीतर जगाया जा सकता है, बल्कि यह भी वही करवाता है. आज सुबह टीवी पर ‘महादेव’ धारावाहिक देखा, फिर टिकट सेल करने निकली, दो बिके, शाम को फिर जाना है, इस तरह एक बुक खत्म करनी है, बल्कि हो ही गयी है. सभी महिलाओं ने कितने प्यार से बात की, सभी के दिल एक ही तो हैं, एक के यहाँ सुंदर पक्षी देखे, एक के यहाँ दरवाजे पर लगाने के लिए करटेन रोप का तरीका देखा. लोगों से उसे मिलना-जुलना है इसलिए ही परमात्मा ने उसे मुक्त किया है, अब समय है उसके पास !

उसने आज सुना सद्गुरु कह रहे थे, ‘श्रद्धा से किया जाने वाला कृत्य ही श्राद्ध है. शरीर जो सगुण है जब अनंत चेतना में समा जाता है तो सूक्ष्म शरीर या कारण शरीर में वासना रह जाती है. ब्रह्मांड में रहते हैं तो पिंड की आशा रहती है पिंड में रहते हैं तो ब्रहमांड की. शरीर की वासना को पूर्ण करने के लिए ही पिंडदान किया जाता है. इसका अर्थ है उन्हें पुनः देह मिल जाये. मृतक को यदि लगे कि वह जल रहा है तो उसे दस दिन तक जल व तिल अर्पित करते हैं. उनकी पसंद की वस्तुएं भी देते हैं, बिना नमक के देते हैं, आत्मा को सुगंध मिलती है तो वह तृप्त हो जाती है. तृप्त करना ही तर्पण है. भाव यदि शुद्ध हो तभी लाभ होता है. पितरों से प्रार्थना करके सूक्ष्म जगत से उनसे संपदा व स्वास्थ्य भी मांगते हैं. उस लोक में पितरों का मार्ग सुगम हो इसकी प्रार्थना भी करते हैं और उनके द्वारा तृप्ति मिले इसकी कामना भी. जिन्हें देह नहीं मिली ऐसे पितृ भी होंगे, जिन्हें देह नहीं चाहिए ऐसे भी, दोनों के लिए प्रार्थना करनी है. कुछ ऐसे होंगे जिन्हें देह मिल गयी होगी उनके नये जीवन के लिए प्रार्थना करनी है.’ कितनी अनोखी है भारतीय संस्कृति ! उसने मन ही मन सद्गुरू को इस सुंदर ज्ञान के लिए प्रणाम किया और पितरों से प्रार्थना भी की.


आज दीपावली है, सुबह जल्दी उठे वे, रोज के सभी कार्य निपटा कर नर्सरी से फूलों के पौधे लाये, अब हरसिंगार के नीचे बैठे हैं, हवा बह रही है. कौन है जो इस शीतल पवन को डुला रहा है, कौन सी शक्ति है ? वृक्ष के नीचे कितना सुकून मिलता है इसका आभास आजकल होने लगा है. कल बाल दिवस है, वे मृणाल ज्योति स्कूल जायेंगे. बच्चों के लिए ढेर सारे उपहार लेकर.